सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६५० सूर्य-सिद्धान्त
पूर्व और पूर्व-दक्षिण दिशाओं के बीच ४, ५ तारे क्षितिज के पास ही देख
पड़ते हैं। ये हस्तनक्षत्र के तारे हैं।
पूर्व क्षितिज से लेकर सिर के ऊपर तक वरन् कुछ और पच्छिम तक जितने
नक्षत्र क्रान्तिवृत्त के पास देख पड़ते हैं उनको वर्षा के नक्षत्र कहते हैं। इसलिए नहीं
कि ये वर्षा ऋतु में देख पड़ते हैं वरन् इसलिए कि जब सूर्य इन नक्षत्रों में रहता है
तभी यहाँ वर्षा होती है। वर्षा के नक्षत्रों के नाम क्रमानुसार यह है :—आर्द्रा,
पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त और चित्रा।
पूर्व-दक्षिण — इस दिशा में कोई प्रसिद्ध तारा इस समय नहीं देख पड़ता।
दक्षिण — इस दिशा में क्षितिज के पास कई तेजवान तारों का समूह है जो
जहाज के आकार का देख पड़ता है इसीलिए इसको नौका पुंज (Argo Navis)
कहते हैं। इस समूह का प्रधान तारा अगस्त याम्योत्तरवृत्त से पच्छिम हो गया है
और क्षितिज के पास देख पड़ता है। चमक में इसका स्थान दूसरा है। पहला स्थान
लुब्धक को प्राप्त है जो इससे ठीक ऊपर देख पड़ता है। नौका पुंज के ऊपर लुब्धक
मंडल है।
पच्छिम दक्षिण—इस दिशा में क्षितिज के पास कोई चित्ताकर्षक नक्षत्र
नहीं है। कुछ ऊपर शशक और इससे भी ऊपर प्रसिद्ध आग्रहायण मंडल है।
आग्रहायण मंडल के ऊपर प्रायः सिर पर मिथुन राशि के तारे हैं।
पच्छिम—इस दिशा में कुछ उत्तर को हटकर अश्विनी नक्षत्र क्षितिज के
पास ही है। इससे ऊपर २, ३ बहुत मंद तारे हैं जिसे भरणी नक्षत्र कहते हैं।
भरणी से कुछ और उत्तर तीन तारे त्रिकोण बनाते हुए देख पड़ते हैं। भरणी के
ऊपर कुछ पच्छिम की ओर कृत्तिका नक्षत्र है। कृत्तिका के कुछ ऊपर और पच्छिम
रोहिणी नक्षत्र है। कृत्तिका से उत्तर पारसीक मंडल है इन दोनों नक्षत्रों के ऊपर
प्रजापति मंडल है जिसका अग्नि तारा कृत्तिका के ऊपर और ब्रह्महृदय पारसीक
के ऊपर है। ब्रह्महृदय के ऊपर प्रजापति का तारा है। पारसीक और प्रजापति
मंडलों के उत्तर वाले तारे ब्रह्महृदय, प्रजापति आदि उत्तर पच्छिम दिशा में
देख पड़ते हैं।
त्रिकोण के उत्तर अंतरमदा के कुछ तारे क्षितिज के पास देख पड़ते हैं।
उत्तर पच्छिम—इस दिशा में पारसीक और प्रजापति मंडल के उत्तर वाले
तारे हैं जिनकी चर्चा अभी हो चुकी है। इस दिशा से कुछ उत्तर और हटकर काश्यप
मंडल के तारे क्षितिज के पास हैं।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६५१
आकाश-गंगा—इस समय उत्तर पश्चिम के कोने से दखिन क्षितिज तक
फैली हुई है। उत्तर-पश्चिम क्षितिज से आरम्भ कर के इसमें या इसके आसपास
कश्यप, पारसीक, प्रजापति, आग्रहायण, लुब्धकं मंडल और नौका पुंज के तारे हैं ।
इन चार मासों के आकाश चित्रों और इनके वर्णनों से आकाश के सभी
सभी प्रधान तारों और तारासमूहों की जानकारी की जा सकती है । इनकी सहायता
से रात्रि में जब आकाश निर्मल हो दिशा, देश और काल का ज्ञान सहज ही हो
सकता है ।
इस प्रकार नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार नामक आठवें अध्याय का विज्ञान भाष्य
समाप्त हुआ ।
नवम अध्याय
उदयास्ताधिकार
(संक्षिप्त वर्णन)
[ १ श्लोक-सूर्य के निकट आ जाने के कारण ग्रहों और नक्षत्रों के अदृश्य
होने का विचार । २-३ श्लोक-ग्रहों के उदय और अस्त होने की दिशा । ४-५
श्लोक-ग्रहों का कालांश जानने की रीति । ६-६ श्लोक-- ग्रहों के परम कालांश ।
१०-११ श्लोक-यह जानने की रीति कि किसी इष्टकाल में उदय या अस्त होने को
कितने दिन शेष हैं या बीत गये हैं । १२-१५ श्लोक-किस तारे का क्या परम कालांश
है । १६-१७ श्लोक-तारे के दृश्य या लोप होने के दिन को जानने की रीति ।
१८ श्लोक-उन तारों के नाम जो कभी अदृश्य नहीं होते ]
इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि ग्रहों और तारों का उदय और अस्त
कब होता है और कैसे जाना जाता है । यहाँ उदय और अस्त के अर्थ साधारण
उदय और अस्त के अर्थों से भिन्न हैं। साधारणतः जब सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि पूर्व
क्षितिज के ऊपर आ जाते हैं तब इनका उदय समझा जाता है और जब ये पच्छिम
क्षितिज के नीचे चले जाते हैं तब इनका अस्त समझा जाता है। यह पृथ्वी की दैनिक
गति के कारण होता है जिसे पुराने आचार्य प्रवह-गति कहते थे । इसके सिवा जब
ग्रह चन्द्रमा या तारे सूर्य के बहुत पास हो जाते हैं जिससे वे सूर्योदय के लगभग पूर्व
क्षितिज के ऊपर आते हैं और सूर्यास्त के लगभग पच्छिम क्षितिज के नीचे चले जाते
हैं तब भी वे अस्त कहे जाते हैं। ऐसी दशा में वे सूर्य के तीव्र प्रकाश के कारण देखे
नहीं जा सकते । जिस समय वे सूर्य के निकट आने के कारण अदृश्य हो जाते हैं
उस समय से वे अस्त समझे जाते हैं और जिस समय वे सूर्य से इतनी दूर हो जाते हैं
कि सूर्योदय के कुछ पहले या सूर्यास्त के कुछ पीछे देख पड़ने लगते हैं उस समय उनका
उदय समझा जाता है। इस अधिकार में इसी प्रकार के उदय अस्त की बातें बतलायी
गयी हैं । पाश्चात्य ज्योतिषी इसको heliacal rising and setting कहते हैं ।
अध्याय का प्रयोजन-
अथोदयास्तमययोः परिज्ञानं प्रकीर्त्यते ।
दिवाकरकराक्रान्त मूर्तीनामल्पतेजसाम् ॥१॥
उदयास्ताधिकार ६५३
अनुवाद-(१) सूर्य के प्रकाश से आक्रान्त होने के कारण अथवा दब जाने
के कारण अल्प प्रकाशवाले पिंडों का जो उदय अस्त होता है उसके जानने की रीति
बतलायी जाती है।
विज्ञान भाष्य-इसकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है।
उदय और अस्त की दिशा -
सूर्यादभ्यधिकाः पश्चादस्तं जीवकुजार्कजाः ।
ऊनाः प्रागुदयं यान्ति शुक्रज्ञौ वक्रिणौ तथा ॥२॥
ऊनाः विवस्वतः प्राच्यामस्तं चन्द्रज्ञभार्गवाः ।
व्रजन्त्यभ्यधिकाः पश्चादुदयं शीघ्रयायिनः ॥३॥
अनुवाद-(२) जब गुरु, मंगल और शनि के भोगांश सूर्य के भोगांश से कुछ
अधिक होते हैं तब इनका पच्छिम में अस्त होता है और जब इनके भोगांश से कुछ
कम होते हैं तब इनका पूर्व में उदय होता है। इसी प्रकार वक्री शुक्र और बुध का
भी उदय अस्त होता है, अर्थात् जब वक्री शुक्र और बुध के भोगांश सूर्य के भोगांश से
अधिक होते हैं तब इनका पच्छिम में अस्त और कम होते हैं तब पूर्व में उदय होता
है। (३) चन्द्रमा, (मार्गी) बुध और शुक्र के भोगांश सूर्य के भोगांश से कम होते
हैं तब ये पूर्व में अस्त होते हैं और जब ये तीव्र गति के कारण सूर्य से कुछ आगे बढ़
जाते हैं तब पच्छिम में उदय होते हैं।
विज्ञान भाष्य-इन दो श्लोकों में संक्षेप में यह बतलाया गया है कि सूर्य,
चन्द्रमा, मंगल, बुध इत्यादि के भोगांशों से अथवा स्पष्ट स्थानों से मोटी रीति से कैसे
जाना जा सकता है कि कौन ग्रह किस दिशा में उदय या अस्त होगा । इस काम के
लिए ग्रहों के दो भाग कर दिये गये हैं। एक भाग में गुरु, मंगल और शनि हैं जिनकी
गति सूर्य की गति से मंद है और दूसरे भाग में बुध, शुक्र और चन्द्रमा हैं जिनकी
गति सूर्य की गति से तीव्र है। इनमें भी बुध और शुक्र की गतियों में विशेषता होने
के कारण कुछ भिन्नता है।
गुरु, मङ्गल और शनि की अपेक्षा सूर्य अधिक चलता है इसलिए सूर्य ही
गुरु, मङ्गल और शनि की ओर बढ़ता हुआ देख पड़ता है। जब सूर्य इनके इतना
निकट पहुँच जाता है कि ये अदृश्य हो जाते हैं तब सूर्य के भोगांश से इनका भोगांश
अधिक रहता है क्योंकि भोगांश की नाप पच्छिम से पूरब की ओर होती है। अदृश्य
होने के पहले ये तीनों ग्रह सूर्यास्त के पीछे पच्छिम क्षितिज के पास ही देख पड़ते हैं
और वहीं गोधूली प्रकाश की तीव्रता के कारण अदृश्य हो जाते हैं इसलिए कहा
जाता है कि ये तीन ग्रह पच्छिम में अस्त होते हैं । कुछ दिन में जब सूर्य इनसे आगे
६५४ सूर्य-सिद्धान्त
बढ़ जाता है और इनका भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाता है तब ये फिर पूर्व
में सूर्योदय के कुछ पहले दिखलाई पड़ने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि पूर्व में
इनका उदय होता है ।
जब वक्री बुध और शुक्र के भोगांश सूर्य के भोगांश से अधिक होते हैं तब ये
सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में देख पड़ते हैं और वहीं अदृश्य हो जाते हैं ।
कुछ दिन में ये ग्रह अपनी वक्र गति के कारण सूर्य की दूसरी ओर बहुत शीघ्र चले
जाते हैं और इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाते हैं । ऐसी दशा में ये
सूर्योदय के पहले पूर्व क्षितिज में फिर दीखने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि
वक्री बुध और शुक्र भी पश्चिम में अस्त और पूर्व में उदय होते हैं ।
परन्तु चन्द्रमा तथा मार्गी बुध और शुक्र की गति सूर्य की गति से अधिक
होती है इसलिए जब ये सूर्य की ओर बढ़ते हुए उसके पास इतना पहुँच जाते हैं कि
अदृश्य हो जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम होते हैं और ये पूर्व
क्षितिज में ही सूर्योदय के पहले अदृश्य होते हैं । इसलिए कहा जाता है कि ये पूर्व में
अस्त होते हैं । जब ये सूर्य के आगे बढ़ जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से
अधिक हो जाते हैं और सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में दीखने लगते हैं ।
इसलिए कहा जाता है कि चन्द्रमा और मार्गी बुध और शुक्र पश्चिम में उदय
होते हैं ।
कालांश जानने की रीति—
सूर्यास्तकालिकौ पश्चात्प्राच्यामुदयकालिकौ ।
दिवाकरग्रहौ कुर्यात् दृक्कर्मार्थं ग्रहस्य तु ॥४॥
तयोर्लग्नान्तरप्राणाः कालांशाः षष्टिभाजिताः ।
प्रतीच्यां षड्भयुतयोस्तद्वल्लग्नान्तरासवः ॥५॥
अनुवाद—(४) यदि पश्चिम में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय
जानना हो तो अनुमान से जाने हुए दिन के सूर्यास्त काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट
करे और पूरब में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय जानना हो तो उस
दिन के सूर्योदय-काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट करे तथा ग्रह का दृक्कर्म संस्कार
करे । दृक्कर्म संस्कृत ग्रह और सूर्य के उदय लग्नों के असुओं का अन्तर निकाले
और इसको ६० से भाग दे तो ग्रह का पूर्व में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश ज्ञात
होता है । यदि ग्रह का पश्चिम में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश जानना हो तो
सूर्य और ग्रह के भोगांश में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उनके लग्नों के असुओं के
अन्तर को ६० से भाग देकर कालांश जानना चाहिए ।
1
उदयास्ताधिकार ६५५
विज्ञान भाष्य—सूर्य के उदय होने से जितने समय पहले कोई ग्रह पूर्व
क्षितिज में आता है अर्थात् उदय होता है उस समय को उस ग्रह का कालान्तर
कहते हैं। लग्न काल की गणना सूक्ष्मता के लिए असुओं में की जाती है और
विषुवद्-वृत्त की एक कला का उदय एक असु में होता है। इसलिए ६० काल का
उदय ६० असुओं में होता है परन्तु ६० कला एक अंश के समान है। इसलिए
सूर्य और ग्रह के उदय-कालों के अन्तर को जो प्रायः असुओं में होता है और जिसे
५ वें श्लोक में लग्नान्तर-प्राण या लग्नान्तरासु कहा गया है ६० से भाग देने पर
जो आता है उसको अंशों में समझ लेना चाहिए, इसी को ग्रह का कालांश
कहते हैं।
पृष्ठ ५६१ में बतलाया गया है कि यह जानने के लिए कि ग्रह किस समय
क्षितिज में लग्न होता है इसके स्पष्ट भोगांश में आक्ष और आयन दृक्कर्म संस्कार
करना चाहिए क्योंकि स्पष्टाधिकार के अनुसार ग्रह का जो भोगांश आता है उससे तो
केवल यह मालूम होता है कि ग्रह अपनी कक्षा में कहाँ है। परन्तु ग्रह की कक्षा
क्रान्ति-वृत्त से भिन्न होती है इसलिए जिस समय ग्रह का क्रान्तिवृत्त वाला विन्दु क्षितिज
पर आता है उस समय ग्रह का बिम्ब क्षितिज पर नहीं वरन् अपने शर के अनुसार
कुछ आगे या पीछे उदय होता है (देखो चित्र १०७, १०८) जिसका ज्ञान
दृक्कर्म संस्कार से ही होता है। इसीलिए चौथे श्लोक में पहले दृक्कर्म संस्कार आदि
करने को कहा गया है। दृक्कर्म संस्कार करने पर जब ग्रह के क्षितिज पर का
समय ठीक ठीक ज्ञात हो जाय तभी यह जाना जा सकता है कि सूर्योदय से कितना
पहले वह ग्रह पूर्व क्षितिज में लग्न होता है।
परन्तु जब ग्रह का उदय या अस्त पश्चिम में होता है तब सूर्यास्तकालिक
सूर्य और ग्रह का समय स्पष्ट किया जाता है क्योंकि तब यह जानने की आवश्यकता
पड़ती है कि सूर्यास्त से कितने समय पीछे ग्रह का अस्त होता है। इस काम के लिए
भी ग्रह में दृक्कर्म संस्कार की आवश्यकता पड़ती है जैसा कि उदय लग्न के समय की
जाती है। अब दृक्कर्म संस्कृत ग्रह अथवा भास्कराचार्यजी के शब्दों में दृग्ग्रह और
सूर्य के अस्तलग्नासुओं का अन्तर जानना चाहिए अर्थात् यह देखना चाहिए कि जिस
समय सूर्य अस्त होता है उस समय से कितने असु उपरान्त इष्ट ग्रह का बिम्ब पश्चिम
क्षितिज पर आता है। इन असुओं को ६० से भाग देने पर अस्त समय के कालांश
अथवा अस्तांश का ज्ञान हो जाता है। परन्तु ५वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया
गया है कि अस्तकालिक सूर्य और दृग्ग्रह के भोगांशों में ६ राशि या १८० अंश जोड़
कर दोनों के लग्नासुओं का अन्तर निकाले। इसका कारण यह है कि जिस समय
सूर्य अस्त होता रहता है उस समय पूर्व क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का वह विन्दु लग्न
६५६ सूर्य-सिद्धान्त
होता है जो सूर्य से १८० अंश आगे रहता है। इसी प्रकार जब दृग्ग्रह अस्त होता
रहता है तब भी पूर्व क्षितिज में वह बिन्दु लग्न रहता है जो दृग्ग्रह से १८० अंश
आगे है। इसलिए यदि यह मालूम हो जाय कि सूर्य और दृग्ग्रह के अस्तकालों में
पूर्व क्षितिज के लग्नों के उदयासुओं में क्या अन्तर होता है तो भी अस्तांश या कालांश
का ज्ञान हो सकता है।
ग्रहों के परम कालांश—
एकादशामरेड्यस्य तिथिसङ्ख्याऽर्कजस्य तु।
कालांशा भूमिपुत्रस्य दश सप्ताधिकास्तथा ॥६॥
पश्चादस्तमयोऽष्टाभिः उदयः प्राङ्महत्तया ।
प्रागस्तमुदयः पश्चादल्पत्वाद्वशभिः भृगोः ॥७॥
एवं बुधो द्वादशभिः चतुर्दशभिरंशकैः ।
वक्री शीघ्रगतिश्चार्कात्करोत्यस्तमयोदयौ ॥८॥
एभ्योऽधिकैः कालभागैर्दृश्या न्यूनैरदर्शनाः ।
भवन्ति लोके खचरा भानुभाग्रस्तमूर्तयः ॥६॥
अनुवाद—(६) गुरु का परमकालांश ११; शनि का १५ और मङ्गल का १७
है। (७) शुक्र का बिम्ब बड़ा देख पड़ने के कारण पच्छिम में अस्त होने का और
पूर्व में उदय होने का परमकालांश ८ है परन्तु बिम्ब छोटा देख पड़ने के कारण
इसके पूर्व में अस्त होने का और पच्छिम में उदय होने का परमकालांश १० है।
(८) इसी प्रकार वक्री और शीघ्र गति वाला बुध जब सूर्य से १२ कालांश पर रहता
है तब पच्छिम में उसका अस्त और पूर्व में उदय होता है। परन्तु इसका पूर्व में अस्त
होने और पच्छिम में उदय होने का कालांश १४ है। (६) सूर्य के प्रकाश से ग्रस्त
होने के कारण अथवा दब जाने के कारण यदि किसी ग्रह का किसी समय का कालांश
उसके परमकालांश से अधिक हुआ तो उस समय वह ग्रह देख पड़ता है और कम
हुआ तो नहीं देख पड़ता।
विज्ञान भाष्य— इन श्लोकों में ग्रहों के कालांशों की वह सीमा बतलायी
गयी है जिससे अधिक होने पर ग्रह देख पड़ते हैं और कम होने पर नहीं देख पड़ते ।
इसलिए इस सीमा को परमकालांश कहा जा सकता है। प्रत्येक ग्रह का परम-
कालांश भिन्न है। इसका कारण यह है कि जिस ग्रह का बिम्ब बड़ा होता
है वह सूर्य के पास होने पर भी सुगमतापूर्वक देखा जा सकता है और
जिसका बिम्ब छोटा होता है वह कुछ कठिनाई से देखा जा सकता है। दूर
के ग्रहों में वृहस्पति का बिम्ब सबसे बड़ा है इसलिए इसका परम कालांश ११
उदयास्ताधिकार ६५७
माना गया है अर्थात् यदि सूर्योदय से ११ अंश या ११० पल ४४ मिनट पहले
बृहस्पति उदय हो अथवा सूर्यास्त से इतना ही समय पीछे अस्त हो तो यह प्रातः-
काल या सायङ्काल के संधि-प्रकाश में भी देखा जा सकता है। इसलिए जब
बृहस्पति का कालांश घटते घटते ११ हो जाता है तब यह पच्छिम क्षितिज में
अदृश्य हो जाता है। इसके बाद जब इसका कालांश घटते घटते शून्य हो जाता है
तब यह सूर्य के साथ उदय या अस्त होता है। इस समय से इसका कालांश बढ़ने
लगता है और जब तक ११ अंश नहीं होता तब तक यह अदृश्य रहता है क्योंकि
सूर्य के तीव्र प्रकाश में यह देखा नहीं जा सकता। इसी को साधारण बोलचाल में
गुरु-आदित्य अथवा 'गुरु-बाधिक' भी कहते हैं। यह अवधि साधारणतः १ महीने की
होती है। इस अवधि में हिन्दू लोग विवाह, मुंडन इत्यादि कोई शुभ काम नहीं
करते।
शनि का बिम्ब गुरु के बिम्ब से छोटा और मङ्गल के बिम्ब से बड़ा होता
है इसलिए शनि का परमकालांश १५ और मङ्गल का १७ माना गया है। परन्तु
शुभ कामों में इनके उदय अस्त का विचार नहीं किया जाता है।
शुक्र के परमकालांश ८ और १० माने गये हैं। इसका कारण यह है कि जब
शुक्र वक्री होकर पच्छिम में अस्त होता है और पूर्व में उदय होता है तब पृथ्वी से
इसका अन्तर बहुत कम रहता है क्योंकि यह सूर्य और पृथ्वी के बीच में रहता है
(देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ १०१-१०३)। निकट रहने से इसका बिम्ब बहुत बड़ा
देख पड़ता है इसलिए यह सन्धि प्रकाश में बहुत देर तक देखा जा सकता है।
इसकी सीमा ८ कालांश ३२ मिनट या ८० पल की मानी गयी है अर्थात् जब
सूर्यास्त के उपरान्त ३२ मिनट से भी कम समय में शुक्र अस्त होता है तब नहीं
देख पड़ता और कहा जाता है कि शुक्र पच्छिम में अस्त हो गया। इसके बाद जब
शुक्र सूर्योदय से ३२ मिनट पहले उदय होने लगता है तब यह फिर देख पड़ने लगता
है और कहा जाता है कि पूर्व में शुक्र उदय हो गया। यह अवधि एक सप्ताह से
अधिक नहीं होती क्योंकि जब शुक्र वक्री रहता है तब शुक्र और सूर्य का अन्तर दोनों
की गतियों के योग के समान प्रतिदिन घटता या बढ़ता है इसलिए शुक्र बहुत जल्द
सूर्य के पीछे चला जाता है।
परन्तु जब शुक्र पूर्व में अस्त और पच्छिम में उदय होता है तब इसका परम
कालांश १० होता है क्योंकि इस समय यह पृथ्वी से बहुत दूर सूर्य की दूसरी ओर
रहता है (देखो, चित्र २१, २२)। दूर रहने से शुक्र का बिम्ब छोटा देख पड़ता है
इसलिए यह संध्या प्रकाश में उतनी देर तक नहीं देख पड़ता जितनी देर तक वक्री
६५८ सूर्य-सिद्धान्त
होने पर देख पड़ता है। जब यह पूर्व में अस्त होता है तब मार्गी रहता है अर्थात्
इसकी गति उसी ओर को होती है जिस ओर को सूर्य चलता हुआ देख पड़ता है
इसलिए इन दोनों का अन्तर दोनों की गतियों के अन्तर के समान प्रति दिन घटता
या बढ़ता है। इसलिए शुक्र के अस्त होने की यह अवधि दो महीने के लगभग की
होती है।
जब तक शुक्र अस्त रहता है तब तक भी हिन्दुओं में विवाह, मुण्डन इत्यादि
कोई शुभ काम नहीं किये जाते।
शुक्र की तरह बुध भी जब वक्री रहता है तब पृथ्वी के निकट रहने के कारण
बड़ा देख पड़ता है और इसका परम कालांश १२ होता है। परन्तु जब यह पृथ्वी से
बहुत दूर सूर्य की दूसरी ओर रहता है तब छोटा देख पड़ता है और इसका
परम कालांश १४ होता है।
बुध के अस्त होने का विचार विवाह, मुण्डन इत्यादि में नहीं किया
जाता।
यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ग्रहों के उदय
और अस्त होने की गणना किस प्रकार की जाती है और इनके परम कालांश क्या
हैं। अब यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते हैं, एक तो यह कि क्या कालांश जानने की
यह रीति शुद्ध है, दूसरे यह कि क्या ये परमकालांश ठीक हैं। इसका उत्तर देना
इसलिए सुगम है कि इसकी जांच इन ग्रहों के प्रत्यक्ष दर्शन से की जा सकती है।
क्योंकि इनके उदय अस्त की परिभाषा ही ऐसी है कि जब तक ये सूर्य के निकट
होने के कारण बिना किसी यन्त्र की सहायता के देखे न जा सकें तभी तक इनको
अस्त समझना चाहिये अन्यथा उदय। इस कसौटी पर कसने से तो यही सिद्ध होता है
कि सूर्य-सिद्धान्त अथवा अन्य किसी भारतीय १ ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर
निकाले हुए उदय या अस्त कालों में तो कभी-कभी दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह दिन का
अन्तर पड़ जाता है। यह प्रकट है कि कालांश की शुद्ध-शुद्ध गणना तभी संभव है जब
ग्रहों का स्पष्ट भोगांश और शर बिलकुल शुद्ध हों। परन्तु भारतीय सिद्धान्तों के
आधार पर जाने गये भोगांश और शर ठीक नहीं होते जैसा कि पिछले अध्यायों के
अनेक स्थानों में बतलाया जा चुका है। उदाहरण के लिये (पूर्णिमान्त) चैत्र कृष्ण
११ भौमवार सम्बत् १६८३ वि० तदनुसार २६ मार्च सन् १९२७ की मध्य रात्रि
१. आचार्य केतकर का ज्योतिर्गणित भारतीय ज्योतिष सिद्धान्त के आधार
पर नहीं बनाया गया है वरन् पाश्चात्य सिद्धान्तों के आधार पर बनाया गया है
जिनमें अर्वाचीन आविष्कारों की भी सहायता ली गयी है।
उदयास्ताधिकार ६५६
| मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | |||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | |
| विश्व पंचांग¹ | १ | २५ | ३८ | १० | २१ | ० | १० | २६ | ५० | ० | १८ | ३६ | ७ | ६ | २६ |
| भारतभूषण पंचांग² | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| गणेशदत्त शर्मा का पंचांग³ | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| नवल किशोर प्रेस का पंचांग⁴ | १ | २६ | ५२ | १० | २१ | ४७ | १० | २४ | ४४ | ० | १५ | ४८ | ७ | १४ १८ | |
| विक्रम विजय पंचांग⁵ | १ | २५ | ४० | १० | १७ | ५८ | १० | २२ | ४२ | ० | १६ | ३७ | ७ | १४ | २० |
| ज्योतिर्गणित के अनुसार⁶ | १ | २६ | ५३ | १० | २२ | २० | १० | २३ | ५४ | ० | १५ | ३५ | ७ | १४ | ४६ |
| (नोट—निर्देशों के लिए पृष्ठ ६६० देखें) |
६६० सूर्य-सिद्धान्त
काल के ५ तारा-ग्रहों के निरयन भोग ६ पंचांगों के अनुसार दिये जाते हैं जिनसे
यह भी पता लगेगा कि ग्रहों की गणना में हमारे यहाँ भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार
कितना भेद पड़ता है । (देखें पृष्ठ ६५६)
प्रत्येक ग्रह के भोगांशों की तुलना करने से यह प्रकट हो जाता है कि शुद्ध
सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए भोगांश ज्योतिर्गणित अथवा दृग्गणित से
निकाले हुए भोगांशों से बहुत भिन्न है। गुरु और शनि के भोगांश तो पाँच-पाँच छः
छः अंश भिन्न हैं इसके प्रतिकूल मकरंद सारणी के अनुसार जाने हुए भोगांश
दृग्गणित से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। इसलिए ग्रहों के उदय अस्त का विचार
सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार कदापि ठीक नहीं हो सकता । इसके सिवा यह तो दिखलाया
ही जा चुका है कि दृक्कर्म संस्कार की रीति भी स्थूल है। इसलिए यह सिद्ध है कि
उदय अस्त का विचार करने के लिए हमको दृग्गणित सिद्ध मूलाङ्कों से ही काम
लेना चाहिये और इसके लिए या तो ज्योतिर्गणित से काम लिया जाय जो पाश्चात्य
ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर बनाया गया है अथवा नया स्वतन्त्र सिद्धान्त तैयार
किया जाय, क्योंकि नाविक पंचांगों के आधार पर ग्रहों का उदय अस्त जानकर अपने
धार्मिक कृत्यों, मुण्डन, विवाह इत्यादि का निश्चय करना उचित नहीं जान पड़ता ।
१—शुद्ध सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार बनाया हुआ काशी के हिन्दू विश्वविद्यालय
से प्रकाशित तथा पं० मदनमोहन मालवीय, ज्योतिषाचार्य पं० रामयत्न ओझा, पं०
रामव्यास पाण्डेय, पं० पूर्णचन्द्र त्रिपाठी इत्यादि द्वारा सम्पादित ।
२— मकरंद सारणी के अनुसार बनाया हुआ काशी के ज्योतिषाचार्य पं०
रामनिहोर द्विवेदी तथा श्री रामानन्द मिश्र द्वारा विरचित तथा पं० रामयत्न ओझा
द्वारा अनुमोदित ?
३- यह भी मकरंद सारणी के अनुसार बनाया गया और पं० बलदेव
मिश्रात्मज पं० गणेशदत्त शर्मा द्वारा सम्पादित ।
४-पं० रामप्रसाद सिद्धान्ती के पुत्र श्री पं० श्यामविहारी द्वारा बनाया
गया ।
५- सूर्य-सिद्धान्त संस्कृतं मकरंदीयम् काश्यक्षवृत्तीयं दृग्गणितैक्य विषैरलं-
कृतम् जब्बलपुरीय पं० श्री लक्ष्मीप्रसाद विद्याभूषण विरचितम् ।
६ आचार्य वेंकटेश बाबू केतकर के ज्योतिर्गणित के अनुसार लेखक द्वारा
गणना किया हुआ परन्तु अयनांश २२ अंश ४१ कला मानकर, इसलिये दृग्गणित के
अनुसार शुद्ध है। केवल अश्विनी का आदि बिन्दु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार स्थिर
किया गया है।
उदयास्ताधिकार ६६१
| स्थान | पंचांग का विवरण | शुक्रास्तकाल | शुक्रोदयकाल | गुरु का अस्तकाल | गुरु का उदयकाल |
|---|---|---|---|---|---|
| काशी | बालकृष्ण शास्त्री का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, ८५<br>२६ मई १६२८ ई० | अधिक श्रावण शु० १३, ८५; ३० जुलाई २८ | चैत्र शुक्ल ३, ८५ विक्रमी | वैशाख शुक्ल ८, ८५ वि० २७ |
| " | विश्वपंचांग काशी विश्वविद्यालय का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, २६ मई | अ० श्रा० शु० १३; ३० जुलाई | २४ मार्च १६२८ ई०<br>चैत शुक्ल २, २३ मार्च | अप्रैल १६२८ ई०<br>वैशाख शु० ८, २७ अप्रैल |
| लखनऊ | रामप्रसाद सिद्धान्ती का नवल किशोर प्रेस का | ज्येष्ठ शुक्ल २, २१ मई | अ० श्रा० कृ० ३, ४ अगस्त | चैत शुक्ल ४, २५ मार्च | वैशाख शु० ७, २६ अप्रैल |
| औंध | शास्त्रशुद्ध ऐक्य वर्द्धक पंचांग | आ० कृ० ३,<br>६ जून<br>* | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| बागलकोट | केतकी पंचांग | " " | " " | ? ? | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| पूना | चित्रशाला पंचांग | आ० कृ० ३, ६ जून | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
*यहाँ कृष्ण पक्ष पूर्णिमान्त गणना के अनुसार लिखा गया है, अमान्त गणना से यह ज्येष्ठ कृष्ण है जो महाराष्ट्र प्रान्त में प्रचलित है।
६६२ सूर्य-सिद्धान्त
{|c|c|c|c|c|c|}
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स्थान & पंचांग का विवरण & शुक्रास्तकाल & शुक्रोदयकाल & गुरु का अस्तकाल & गुरु का उदयकाल
\hline
पूना & पंचांग प्रवर्तक कमेटी का & ज्ये० शु० १३, १ जून & श्रा० शु० १५, १ अगस्त & चैत्र शुक्ल ३, २४ मार्च & वैशाख शु० ३, २२ अप्रैल
,, & शंकर शास्त्री का & ज्ये० शु० १४, २ जून & अ० श्रा० शु० ६, २६ जुलाई & ,, २, २३ मार्च & वैशाख शु० ४, २३ अप्रैल
मुंबई & बालकृष्ण तुकाराम का & ,, १५, ३ जून & अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई & ,, १, २२ ,, & वैशाख शु० २, २२ अप्रैल
,, & गुजराती पत्राच्या न्यूज प्रेस में छपी पंचांग & ,, ३, २२ मई & अ० श्रा० कृ० ३, ४ अगस्त & ,, ४, २५ ,, & वैशाख शु० ६, २५ अप्रैल
\hline
उदयास्ताधिकार ६६३
यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि ग्रहों का उदय अस्त जानने के लिए
कालांश जानने की प्राचीन रीति में ही स्थूलता है। अब यह बतला देना भी आवश्यक
है कि यहाँ के परम कालांश के परिमाण में भी आजकल कितना मतभेद है।
उदाहरण के लिये हम इसी वर्ष के गुरु और शुक्र के उदय अस्त के कालों को लेकर
पिछले पृष्ठ पर दिखला चुके हैं कि किसने कितना परम कालांश माना है।
इस कोष्ठक से यह स्पष्ट है कि काशी के दोनों पंचांगों के अनुसार शुक्रास्त
और शुक्रोदय के दिन एक हैं परन्तु गुरु के अस्तकाल के दिन में एक दिन का अन्तर
है। इसी प्रकार औंध के शास्त्रशुद्ध ऐक्यवर्द्धक पंचांग, बागलकोट के केतकी पंचांग
और पूना के चित्रशाला पंचांग में शुक्र तथा गुरु के उदय और अस्त के दिन एक हैं।
इससे जान पड़ता है कि काशी के पंचांगवालों ने इन ग्रहों के परम कालांश एकमत
से कुछ माना है और महाराष्ट्र के तीन पंचागवालों ने एकमत होकर कुछ माना है।
काशी के विश्वपंचांग से यह सिद्ध होता है कि इसमें ग्रहों का उदय अस्त १६२८ ई०
के नाविक पंचांग के आधार पर स्थिर किया गया है। केतकी पंचांग ज्योतिर्गणित
के अनुसार बनाया गया है जो अर्वाचीन ज्योतिष सिद्धान्त से मिलता-जुलता है
इसलिए यह सहज ही जाना जा सकता है कि आचार्य केतकर तथा इनके अनुयायियों
ने गुरु और शुक्र के परमकालांश क्या माना है।
अब हम १६२८ ई० के नाविक पंचांग से शुक्र के उदय और अस्त काल के
दिन के सूर्य और शुक्र के विषुवांश और क्रान्ति से परमकालांश जानने की रीति
लिखते हैं:—
तारीख | सूर्य का विषुवांश | सूर्य की क्रान्ति | शुक्र का विषुवांश | शुक्र की क्रान्ति
| घंटा मिनट | अंश कला | घंटा मिनट | अंश कला
| सेकंड | विकला | सेकंड | विकला
२६ मई | ४ २४ १६.५६ | २१ ३७ ३७.६ | ३ ४७ २.६७ | १६ १२ १६.४
३० जुलाई | ८ ३७ ४६.८६ | १८ ३१ ८.८ | ६ ११ ३७.२६ | १७ ३७ ६.१
६ जून | ४ ५७ ३.३२ | २२ ३६ ३८.२ | ४ २७ ५४.५६ | २१ २० १८.७
२८ जुलाई | ८ २६ ५७.३८ | १९ ५६ ३२.७ | ६ १ ३६.६ | १८ १८ ६.५
६६४ सूर्य-सिद्धान्त
२६ मई को सूर्य की क्रान्ति २१ अंश ३७ कला ३७.६ विकला अथवा
२१°३८' है और शुक्र की क्रान्ति १६ अंश १२ कला १६.४ विकला अथवा १६°१२'
है। यह जानने के लिए कि सूर्य और शुक्र किस समय क्षितिज पर आवेंगे पहले इनके
चरकाल जानना आवश्यक है (देखो चित्र ६० पृष्ठ ३०८)। काशी का अक्षांश
२५°२०' है।
उदयकालिक सूर्य की चरज्या = स्परे २१°३८' X स्परे २५°२०'
= .३९६६ X .४७३७
= .१८७६
∴ चरांश = १०°५०'
∵ चरकाल = ४३ मिनट २० सेकंड
सूर्य की क्रान्ति उत्तर है इसलिए सूर्य के विषुवांश से यह चरकाल घटाने पर
यह ज्ञात होगा कि सूर्योदय के समय विषुवद्वृत्त का कौन सा विन्दु पूर्व में लग्न है
(देखो चित्र ६०)।
घं० मि० से०
सूर्य का विषुवांश ४ २४ १७
चरकाल ४३ २०
अन्तर ३ ४० ५७
इसलिए सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्त का वह विन्दु पूर्व में लग्न है जो वसंत
सम्पात से ३ घण्टा ४० मि० ५७ सेकंड या ३ घण्टा ४१ मिनट आगे है।
उदयकालिक शुक्र की चरज्या = स्परे १६°१२' X स्परे २५°२०'
= .३४८२ X .४७३७
= .१६४६
∵ चरांश = ६°३०'
∴ चरकाल = ३८ मिनट
घं० मि०
शुक्र का विषुवांश ३ ४७
चरकाल ३८
अंतर ३ ६
इसलिए शुक्र जिस समय पूर्व क्षितिज पर आवेगा उस समय विषुवद्वृत्त
का वह विन्दु पूर्व में लग्न होगा जो वसंत सम्पात से ३ घण्टा ६ मिनट आगे है।
उदयस्ताधिकार ६६५
ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य के लग्न काल में विषुवद्वृत्त का ३ घण्टा ४१
मिनट लग्न था इसलिए सूर्य और शुक्र के लग्नकालों में ३ घण्टा ४१ मिनट — ३
घण्टा ६ मिनट = ३२ मिनट का अन्तर होगा । इसलिए विश्वपंचांग के अनुसार पूर्व
अस्त होने के समय शुक्र का परमकाल ३२ मिनट और परमकालांश ८ है । यहाँ यह
बतला देना आवश्यक है कि नाविक पंचांग के जो विषुवांश ऊपर के कोष्ठक में दिये
गये हैं वे ग्रीनविच के २६ मई के मध्यम मध्याह्न काल के हैं जो काशी के साढ़े पाँच
बजे संध्या के लगभग के हैं। यथार्थ में इस दिन के काशी के सूर्योदय काल के
विषुवांशों और क्रान्तियों से काम लेना चाहिए परन्तु शुक्र और सूर्य की गतियों में
बहुत थोड़ा अन्तर है इसलिए इन दोनों का सापेक्ष अन्तर प्रातःकाल भी प्रायः उतना
ही समझ लेने में कोई हर्ज नहीं है जितना सायंकाल के लिए समझा गया है ।
दूसरी बात और भी विचार करने की है । विप्रश्नाधिकार में बतलाया गया
है कि वातावरण के कारण प्रकाश में वर्तन हो जाता है जिससे सूर्य यथार्थ उदयकाल
से दो-ढाई मिनट पहले ही देख पड़ने लगता है (देखो पृष्ठ ३७८) । इसलिए ऊपर
की गणना से शुक्र का जो परमकाल ३२ मिनट होता है वह यथार्थ में ३० ही मिनट
या उससे भी आधा मिनट कम ठहरता है ।
अब देखना चाहिए कि ६ जून को शुक्र का कालांश क्या है। इसके लिए
प्रातःकाल के विषुवांश और क्रान्ति से काम लिया जायगा क्योंकि इससे अधिक
शुद्धता होगी । यहाँ सेकंड और विकलाओं की गणना नहीं की जायगी ।
सूर्य | शुक्र
पूना की | विषुवांश | क्रान्ति | विषुवांश | क्रान्ति
घंटा मिनट | अंश कला | घंटा मिनट | अंश कला
५ जून की संध्या में | ४ ५३ | २२ ३३ | ४ २३ | २१ ६
६ जून की संध्या में | ४ ५७ | २२ ४० | ४ २८ | २१ २०
६ जून के सूर्योदय | ४ ५५ | २२ ३६ | ४ २५·५ | २१ १३
काल में
पूना का अक्षांश १८° ३०' ।
∴ पूना में सूर्य की चरज्या = स्परे १८° ३०' × स्परे २२° ३६
= ·३३४६ × ·४१६३
= ·१३६३
१५
६६६ सूर्य-सिद्धान्त
∵ चरांश = ८°
∵ चरकाल = ३२ मिनट
इसलिये सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्तीय लग्न = ४ घण्टा ५५ मिनट - ३२
मिनट = ४ घण्टा २३ मिनट
शुक्र की चरज्या = स्परे १८°३०' × स्परे २१°१३'
= •३३४६ × •३८८२
= •१२६६
∵ चरांश = ७°२८'
∵ चरकाल = ३० मिनट के लगभग
इसलिए जिस समय शुक्र क्षितिजस्थ होगा उस समय विषुवद्वृत्तीय लग्न
होगा ।
४ घण्टा २५ १/२ मिनट - ३० मिनट = ३ घण्टा ५५ १/२ मिनट
परन्तु सूर्योदय काल में विषुवद्वृत्तीय लग्न = = ४ घण्टा २३ मिनट
इसलिए चित्रशाला पंचांग या केतकी पंचांग के अनुसार शुक्र का परम काल
हुआ ।
४ घण्टा २३ मिनट - ३ घण्टा ५५ १/२ मिनट = = २७ १/२ मिनट
यदि इससे २ १/२ मिनट घटा दिया जाय, क्योंकि वर्तन के कारण सूर्योदय
गणनाकाल से २ या ढाई मिनट पहले ही होता है, तो शुक्र का परमकाल २५ मिनट
ही होता है जो सवा ६ अंश के समान हुआ ।
इस प्रकार यह सिद्ध है कि दृश्य गणना से भी शुक्नोदय काल और शुक्रास्त
काल में बड़ी भिन्नता पड़ जाती है क्योंकि कोई परमकालांश कुछ मानता है और
कोई कुछ । इसलिए इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि भारतवर्ष भर के ज्योतिषी
मिलकर इस बात का निश्चय अवश्य करें कि किस ग्रह का परम कालांश क्या
माना जाय, नहीं तो पंचांगों की यह धाँधली कभी बंद नहीं हो सकती ।
अब अधिक उदाहरण देकर विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है । शुक्र के
परमकालांश के सम्बन्ध में आचार्य बंकटेश बापू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित के
पृष्ठ ३३३ में जो लिखा है वह ज्यों का त्यों यहाँ दे दिया जाता है : -
वातावरणे निर्मले सति हेमन्ततौ षण्मिते कालांशान्तरे शुक्नो दृश्यते । प्रयत्ने
कृते सार्धपञ्चमिते कालांशान्तरेऽपि द्रष्टुं शक्यते । परमस्मिन्प्रसङ्गे तत्तेजोहानिरियती
जायते यत्केवलास्तीक्ष्णेक्षणा ज्योतिर्विद एव तं द्रक्ष्यन्ति ।
उदयास्ताधिकार ६६७
बाल्य और वृद्धकाल
यह स्पष्ट है कि वातावरण सदैव निर्मल नहीं रहता । गरमी के दिनों में तो
धूल इतनी रहती है कि क्षितिज के ऊपर सूर्य भी कुछ दूर तक नहीं देख पड़ता इस-
लिए ऐसी दशा में शुक्र या गुरु को देखना बड़ा कठिन होता है । दूसरी बात यह है कि
देखने वाले की दृष्टि की मंदी और तीव्रता से भी ग्रहों के देखने में दो तीन दिन का
अंतर हो सकता है। इन सब कारणों से ग्रहों के उदय या अस्त होने के दिन से दो
तीन या चार दिन आगे पीछे तक वे अदृश्य हो सकते हैं । जान पड़ता है इसी कारण
पुराने आचार्यों ने गुरु और शुक्र के बाल्य-वृद्धकाल का विचार किया है परन्तु इसमें
भी एकमत नहीं है जैसा कि मुहूर्त चिंतामणि में लिखा है :—
पुरःपश्चाद्गोर्बाल्यं त्रिदशाहं च वार्धकम्
पक्षं पंच दिनं ते द्वेगुरोः पक्षमुदाहृते ॥२७॥
ते दशाहं द्वयोःप्रोक्तं कैश्चित्सप्तदिनं परैः ।
त्र्यहं त्वात्ययिकेऽप्यन्यैरर्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥२८॥१
गुरु और शुक्र के बाल्यकाल और वृद्धकाल में भी बहुत से शुभकर्मों का वैसे
ही निषेध है जैसे इनके अस्तकाल में ।२
उदय वा अस्त का विचार कालांश से होना चाहिए या उन्नतांश से ?
इस सम्बन्ध में एक बात और भी विचार करने के योग्य है । ग्रहों के उदय-
अस्त के विषय में अब तक जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट हो गया है कि जब
ग्रह सूर्य के इतना पास आ जाते हैं कि प्रातः या सायंकाल के संधिप्रकाश (twilight)
के कारण देख नहीं पड़ते तभी कहा जाता है कि वे अस्त हो गये । परन्तु सन्धिप्रकाश
की तीव्रता और सीमा सब ऋतुओं और स्थान में एकसी नहीं रहती । इस बात
का कोई भी अनुभव कर सकता है कि हमारे यहाँ जाड़े के दिनों में संधिप्रकाश की
सीमा बढ़ जाती है और गरमी के दिनों में घट जाती है। इसका कारण यह है कि
संधिप्रकाश का सम्बन्ध क्षितिज के नीचे गये हुए सूर्य के नतांश से होता है जो सूर्य की
क्रान्ति और इष्टस्थान के अक्षांश पर आश्रित है (देखो पृष्ठ २६१ सूत्र १) । अनुभव
से सिद्ध हुआ है कि जब तक सूर्य क्षितिज के नीचे १८° से अधिक नहीं होता तब तक
इसके प्रकाश का कुछ न कुछ अंश वातावरण के द्वारा लौटकर भूतल पर आता रहता
है। सूर्य के अस्तकाल से लेकर उस समय तक जब तक वह क्षितिज के नीचे १८ अंश
से अधिक नहीं जाता जो मन्द प्रकाश मिलता है उसी को सन्धि प्रकाश कहते हैं ।
१. संस्कार प्रकरण
२. देखो मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक ४६,४७
६६८ सूर्य-सिद्धान्त
इसी प्रकार सूर्य के उदयकाल से जब पहले वह क्षितिज से १८ अंश नीचे हो
जाता है तबसे प्रातःकालिक संधि-प्रकाश का आरंभ होता है। यह प्रकट है कि जब
सूर्य १८ अंश क्षितिज से नीचे रहता है तब यह खस्वस्तिक से ६०+१८=१०८
अंश नीचे होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिस समय सूर्य का पूर्व-
नतांश १०८ अंश होता है उस समय से संधिप्रकाश का आरंभ होता है और जिस
समय उसका पूर्वनतांश ६० अंश होता है उस समय तक प्रातःकालिक संधिप्रकाश
रहता है। इसी प्रकार जब तक सूर्य का पच्छिम-नतांश ६० से १०८ रहता है तब तक
सायं-कालिक संधिप्रकाश रहता है।
पृष्ठ २६१ के सूत्र (१) में बतलाया गया है कि नतांश और नतकाल का
क्या सम्बन्ध है और यह अक्षांश और क्रान्ति पर किस प्रकार आश्रित है। इस सूत्र
में नतांश की जगह १०८, तथा इष्टस्थान के अक्षांश और इष्टदिन की सूर्य की
क्रान्ति के मान उत्थापित किये जांय तो जो नतकाल आवेगा उससे सूर्य का उदय-
कालिक या अस्तकालिक नतकाल घटा दिया जाय तो उस दिन के संधिप्रकाश का
परिमाण मालूम हो जायगा। उदय या अस्तकाल का नतकाल जानने के लिए
नतांश का परिमाण ६० अंश ३५ कला लेना पड़ेगा क्योंकि उदय या अस्त होते
हुए सूर्य या किसी ग्रह का प्रत्यक्ष नतांश ६० होता है परन्तु वातावरण के वर्तन के
कारण यथार्थ नतांश ३५ कला और बढ़ जाता है (देखो पृष्ठ ३७८-३८०) इसलिये
सूर्य का उदय या अस्तकालिक नतांश यथार्थ में ६०°३५' होता है।
इस प्रकार यह सिद्ध है कि संधिप्रकाश सब ऋतुओं में और सब स्थानों में
एकसा नहीं होता इसलिए ग्रहों के दर्शन और लोप का दिन जानने के लिए सब
स्थानों और सब ऋतुओं के लिए एक ही ग्रह का परम कलांश भिन्न-भिन्न मानाना
पड़ेगा जहाँ संधिप्रकाश देर तक रहेगा वहाँ उसी परम कलांश से काम न चलेगा जो
थोड़े संधिप्रकाश के लिए काम दे सकता है। इन सब बातों का विचार करने से यही
युक्तियुक्त जान पड़ता है कि ग्रहों के लोप और दर्शन का विचार उनके उन्नतांश
से किया जाय न कि कालांश से जैसा कि आचार्य केतकर जी पृष्ठ ३३३ में
लिखते हैं :-
सर्वे ग्रहाः शीघ्रकेन्द्रगत्या सूर्यमुपेत्य कानिचिद्दिनान्यदृश्या भवन्ति । इयं
चमत्कृती रविग्रहयोरुदयास्तमययोः कालयोरन्तरमाश्रयत इति पूर्वा चार्याणां मतं न
समञ्जसम्। यतः संध्यारुणदीप्तिः सूर्यस्य क्षितिजादपस्तनावत्रांशाननुसरति न च
कालांशान् । यन्न देशे ३५° अक्षांशास्तत्र विषुवदिवसे संधिप्रकाशः सूर्यस्योदयास्त-
कालात्प्राक् पश्चात् ३ घ० ४० पल वर्तते। परमयन्त्रवृत्तिदिवसे स एव ४ घड़ी
उदयस्ताधिकार ६६६
४० पल भवति। एतयोः कालांशाः क्रमेण २२°, २८° भवन्ति । अतएव सिद्धं
यदेकैरेव कालांशैर्यद्दर्शननादर्शन गणितं पूर्वाचार्यैरुक्तं तदुपपत्ति विरुद्धं स्थूलं चेति ।
अतो ग्रहाणां लोपदर्शन गणितं तेषामुन्नतांशश्रयेणैव कार्यम् ।
आचार्य केतकर के मत से शुक्र का उदयास्तकालिक उन्नतांश ६°.४ और
गुरु का ११° है । (देखो ज्योतिर्गणित पृ० ३५१)
उदाहरण—काशी में सायन मकर संक्रान्ति, सायन मेष संक्रांति और
सायन कर्क संक्रान्ति के दिन संधि प्रकाश की अवधि क्या होती है ?
काशी का अक्षांश २५°१८'
सायन मकर संक्रान्ति तथा सायन कर्क संक्रान्ति के दिन सूर्य की क्रान्ति
२३°२७' (देखो पृष्ठ ३०६) और सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन सूर्य की
क्रान्ति शून्य होती है ।
सायन कर्क संक्रान्ति के दिन का सन्धि-प्रकाश जब सूर्य की क्रान्ति
उत्तर होती है—
बतलाया गया है कि संधि प्रकाश के आरंभ या अन्त में सूर्य का नतांश १०८
होता है इसलिए २६१ पृष्ठ के सूत्र (१) के अनुसार
कोज्या १०८° - ज्या २५°१८' X ज्या २३°२७'
कोज्या नतकाल = --------------------------------------------
कोज्या २५°१८' X कोज्या २३°२७'
- ज्या १८° - ज्या २५°१८' X ज्या २३°२७'
= -------------------------------------------
कोज्या २५°१८' X कोज्या २३°२७' - •३०६० - •४२७४ X •३६७६
= ---------------------------------
•९०४१ X •९१७५ - •३०६० - •१७०१
= -------------------
•८२६५ - •४७६१
= ----------
•८२६५
= - •५७७६
यहाँ कोज्या नतकाल ऋणात्मक है इसलिए नतकालांश ९० अंश से अधिक
है । यदि यह ९० अंश से अ अंश अधिक हो तो
कोज्या नतकाल = कोज्या (९० + अ = - ज्या अ = - •५७७६
∵ अ = ३५°१७'
∴ संधि प्रकाश के आरंभ काल का नतकाल
= ९०° + ३५°१७' = १२५°१७'