सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयास्ताधिकार ६६७
बाल्य और वृद्धकाल
यह स्पष्ट है कि वातावरण सदैव निर्मल नहीं रहता । गरमी के दिनों में तो
धूल इतनी रहती है कि क्षितिज के ऊपर सूर्य भी कुछ दूर तक नहीं देख पड़ता इस-
लिए ऐसी दशा में शुक्र या गुरु को देखना बड़ा कठिन होता है । दूसरी बात यह है कि
देखने वाले की दृष्टि की मंदी और तीव्रता से भी ग्रहों के देखने में दो तीन दिन का
अंतर हो सकता है। इन सब कारणों से ग्रहों के उदय या अस्त होने के दिन से दो
तीन या चार दिन आगे पीछे तक वे अदृश्य हो सकते हैं । जान पड़ता है इसी कारण
पुराने आचार्यों ने गुरु और शुक्र के बाल्य-वृद्धकाल का विचार किया है परन्तु इसमें
भी एकमत नहीं है जैसा कि मुहूर्त चिंतामणि में लिखा है :—
पुरःपश्चाद्गोर्बाल्यं त्रिदशाहं च वार्धकम्
पक्षं पंच दिनं ते द्वेगुरोः पक्षमुदाहृते ॥२७॥
ते दशाहं द्वयोःप्रोक्तं कैश्चित्सप्तदिनं परैः ।
त्र्यहं त्वात्ययिकेऽप्यन्यैरर्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥२८॥१
गुरु और शुक्र के बाल्यकाल और वृद्धकाल में भी बहुत से शुभकर्मों का वैसे
ही निषेध है जैसे इनके अस्तकाल में ।२
उदय वा अस्त का विचार कालांश से होना चाहिए या उन्नतांश से ?
इस सम्बन्ध में एक बात और भी विचार करने के योग्य है । ग्रहों के उदय-
अस्त के विषय में अब तक जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट हो गया है कि जब
ग्रह सूर्य के इतना पास आ जाते हैं कि प्रातः या सायंकाल के संधिप्रकाश (twilight)
के कारण देख नहीं पड़ते तभी कहा जाता है कि वे अस्त हो गये । परन्तु सन्धिप्रकाश
की तीव्रता और सीमा सब ऋतुओं और स्थान में एकसी नहीं रहती । इस बात
का कोई भी अनुभव कर सकता है कि हमारे यहाँ जाड़े के दिनों में संधिप्रकाश की
सीमा बढ़ जाती है और गरमी के दिनों में घट जाती है। इसका कारण यह है कि
संधिप्रकाश का सम्बन्ध क्षितिज के नीचे गये हुए सूर्य के नतांश से होता है जो सूर्य की
क्रान्ति और इष्टस्थान के अक्षांश पर आश्रित है (देखो पृष्ठ २६१ सूत्र १) । अनुभव
से सिद्ध हुआ है कि जब तक सूर्य क्षितिज के नीचे १८° से अधिक नहीं होता तब तक
इसके प्रकाश का कुछ न कुछ अंश वातावरण के द्वारा लौटकर भूतल पर आता रहता
है। सूर्य के अस्तकाल से लेकर उस समय तक जब तक वह क्षितिज के नीचे १८ अंश
से अधिक नहीं जाता जो मन्द प्रकाश मिलता है उसी को सन्धि प्रकाश कहते हैं ।
१. संस्कार प्रकरण
२. देखो मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक ४६,४७