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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 838 में से

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पृष्ठ 590

परिलेखाधिकार ५६५
उ पू द प = वलनाश्रित वृत्त
उ, पू, द, प, = उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पच्छिम विन्दु
स वि वी मा = समासवृत्त जिसका व्यासार्ध मानैक्य खंड के समान है
सबसे छोटा वृत्त = चन्द्रविम्ब
च = चन्द्रविम्ब, समास वृत्त और वलनाश्रित वृत्त का केन्द्र
च व = वलनाग्र रेखा अथवा वलनाश्रितवृत्त की त्रिज्या जिसका पूर्व विन्दु
से अन्तर स्पर्शकाल के स्फुट वलन की ज्या पू क के समान है
पू च व = स्पर्शकालिक वलन
व = स्पर्शकाल का वलनाग्र विन्दु
स = स्पर्शकाल की वलनाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु
स वि = स्पर्शकालिक चन्द्रविक्षेप या शर । यह वलनाग्र रेखा के दक्षिण की
ओर खींचा गया है क्योंकि चन्द्रशर उत्तर है और यह परिलेख
चन्द्रग्रहण का है (श्लोक ८)
वि = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र विन्दु अथवा स्पर्शकालिक भूछाया का केन्द्र
वि च = स्पर्शकालिक विक्षेपाग्र रेखा
सा = विक्षेपाग्र रेखा और चन्द्रविम्ब का युति-विन्दु अथवा ग्रहण का स्पर्श
विन्दु
द च वा = मध्यग्रहणकालिक वलन
च वा = मध्यग्रहणकालिक वलनाग्र रेखा (श्लोक ६)
च म = च वा रेखा पर मध्यग्रहणकालिक चन्द्र विक्षेप (श्लोक १०)
म = मध्य ग्रहण काल में भूछाया का केन्द्र । इसको केन्द्र मानकर भूछाया
के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है उसी से मध्यकालिक या परम
ग्रास का परिमाण जाना जाता है ।
प च वू = मोक्षकालिक वलन
च वू = मोक्षकालिक वलनाग्र रेखा
मा = मोक्ष काल की वलनाग्र रेखा और समास वृत्त का युतिविन्दु
मा वी = मोक्षकालिक चन्द्र विक्षेप । यह भी वलनाग्र रेखा के दक्षिण की
ओर खींचा गया है
च वी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा
मी = मोक्षकालिक विक्षेपाग्र रेखा और समासवृत्त का युतिविन्दु अथवा ग्रहण
का मोक्षविन्दु
वी = मोक्षकालिक भूछाया का केन्द्र