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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 838 में से

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पृष्ठ 591

५६६ सूर्य-सिद्धान्त
मु, पु = मध्य ग्रहण तथा मोक्षकाल के भूछाया के केन्द्रों म और वी पर
खींचे हुए मत्स्य के मुख और पुच्छ विन्दु
मू पू = मध्य ग्रहण तथा स्पर्शकाल के भूछाया के केन्द्रों म और वि पर
खींचे हुए मत्स्य के मुख और पुच्छ विन्दु
ख = मु पु और मू पू का युति-विन्दु
वि म वी = ख को केन्द्र और ख वि को त्रिज्या मानकर खींचा हुआ धनु जो
ग्रहण काल में भूछाया के केन्द्र का मार्ग है (श्लोक १४-१६)
च नि अथवा च उ = मानान्तर खंड
नि = निमीलन या सम्मीलन काल में भूछाया का केन्द्र । इसको केन्द्र मान
कर भूछाया के व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है वह चन्द्रविम्ब
को जिस विन्दु पर स्पर्श करता है वहीं सर्वग्रास ग्रहण का आरंभ होता
है। (श्लोक २०-२१)
उ = उन्मीलन काल में भूछाया केन्द्र । इसको केन्द्र मानकर भूछाया के
व्यासार्ध से जो वृत्त खींचा जाता है वह चन्द्र-विम्ब को जिस विन्दु पर
स्पर्श करता वहीं सर्वग्रास का अन्त होता है। (श्लोक २२)
सब के लिए (देखो पृष्ठ ४६०)
भू भा का व्यासार्ध = ४३'·६७ = ४३·६७/३ = १४·५६ अंगुल
चन्द्रविम्ब का व्यासार्ध = १६'·६६ = १६·६६ ÷ ३ = ५·५५ अंगुल
मानैक्य खंड = ६०'·६३ = ६०·६३ ÷ ३ = २०·२१ अंगुल
मानान्तर खंड = २७'·३१ = २७·३१ ÷ ३ = ९·१ अंगुल
यहाँ मैंने विम्बों या शरों का अंगुलात्मक परिमाण जानने के लिए प्रत्येक को
३ से भाग दिया है और ३ कला का अंगुल समझा है जैसा कि ऊपर श्लोक ३ के
विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है। इस परलेख में वलनाश्रित वृत्त का एक अंगुल
१ मिलीमीटर के समान लिया जाता है और अन्य वृत्तों या शरों के खींचने के लिए
एक अंगुल डेढ़ मिलीमीटर के समान माना जाता है ।
अर्वाचीन रीति से स्पर्शबिन्दु की दिशा की गणना—
पाश्चात्य ज्योतिषी समप्रोत वृत्त की दिशा से स्पर्शविन्दु की दिशा की गणना
नहीं करते वरन् ध्रुवप्रोत वृत्त की दिशा से स्पर्श या मोक्ष विन्दु की दिशा की गणना
करते हैं। इसलिए इनकी गणना में स्फुटवलन के जानने की आवश्यकता नहीं
पड़ती । नीचे संक्षेप में यह रीति भी बतला दी जाती है :—