सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
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विप्रश्नाधिकार ४०३
दोनों पक्षों को कोज्या लु से भाग देने पर
स्परे लु = ब ज्या (फ - क) + ब कोज्या (फ - क) स्परे लु
या स्परे लु = $\frac{ब ज्या (फ - क)}{१ - ब कोज्या (फ - क)}$ (३)
यदि इसको पहले की तरह श्रेणी में विस्तार किया जाय तो
लु = $\frac{ब ज्या (फ - क)}{ज्या १''} + \frac{ब^२ ज्या२ (फ - क)}{ज्या२''} + \frac{ब^३ ज्या३ (फ - क)}{ज्या ३''}$
- ...... (४)
जब स्पष्ट क्रान्ति ज्ञात हो तो सूत्र (२) से और यथार्थ क्रान्ति ज्ञात हो तो
सूत्र (३) और (४) से क्रान्ति लम्बन जाना जा सकता है ।
यह जानना कि विषुवांश लम्बन में प्रति घंटा क्या भेद पड़ता है :-
पृष्ठ ३६७ में विषुवांश लंबन का सूत्र यह आया है :-
ज्या ली = $\frac{ज्या लि\timesकोज्या आ\timesज्या घ}{कोज्या क}$
ली और लि धनु बहुत छोटे होते हैं इसलिए
ज्या ली = ली
और ज्या लि = लि
लम्बन के कारण यथार्थ नतकाल और स्पष्ट नतकाल में जो भिन्नता देख
पड़ती है वह भी बहुत कम होती है इसलिए व्यवहार की सुविधा के लिए ज्या घ को
ज्या घ के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं । इसलिए उपर्युक्त सूत्र का रूप यह
हुआ :-
ली = $\frac{लि\timesकोज्या आ\timesज्या घ}{कोज्या क}$
इस सूत्र में घ ही ऐसा है जिसका भेद प्रतिक्षण बहुत बढ़ता रहता है, लि,
ली, आ और क में जो विकार उत्पन्न होता है वह इतना मन्द होता है कि कुछ समय
के लिए यह मात्राएँ स्थिर मानी जा सकती हैं। इसलिए यदि घ को चल राशि मान
कर ली की तात्कालिक गति निकाली जाय तो
त (ली) = $\frac{लि\timesकोज्या आ}{कोज्या क}$ कोज्या घ ता (घ)
यहाँ ता (घ) को रेडियन में लिखना होगा । यदि यह जानना हो कि प्रति
घंटा विषुवांश लम्बन में क्या भेद उत्पन्न होता है तो ता (घ) को १५° के रेडियन
में प्रकट करना चाहिए। यह विदित है कि