सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ सूरसागर सार सटीक
देखि तुहीं सींके पर भाजन, ऊँचे धरि लटकायौ।
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसें करि पायौ।
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्ही, दोना पीठि दुरायौ।
डारि साँटि मुसुकाइ जसोदा, स्यामहिं कठ लगायौ।
बाल-विनोद मोद मन मोह्यौ, भक्ति प्रताप दिखायौ।
सूरदास जसुमत कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥६०॥
अर्थ-हे माँ, मैंने मक्खन नही खाया। ये सभी साथी मेरे पीछे पड गये और
मेरे मुख मे (मक्खन) लपेट दिया। तुम्ही देखो सिकहरे पर बर्तन रख कर ऊँचे लटका
दिया गया। मैं पूछता हूँ कि अपने (इन) छोटे हाथो से मैं इसे कैसे पा सकता हूँ।
इतने मे कृष्ण को एक उपाय सूझा, उन्होने मुंह से दही पोछ कर दोना पीछे छिपा
लिया। (कृष्ण के इस भोलेपन को देखकर) यशोदा ने छडी फेककर और मुस्करा कर
श्याम को गले से लगा लिया। भगवान् ने अपनी भक्ति का प्रताप दिखाया और बाल-
क्रीड़ा के आनन्द से मन को मोहित कर लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा का यह
सुख शिव और ब्रह्मा भी नही पा सके ॥६०॥
जसुमति तेरौ बारौ कान्ह अतिही जु अचगरौ।
दूध-दही माखन लै डारि देत सगरौ।
भोरहिं नित प्रतिही उठि, मोसौ करत झगरौ।
ग्वाल-बाल सग लिए घेरि रहै डगरौ।
हम-तुम सब वैस एक, कातैं को अगरौ।
लियौ दियौ सोई कछु, डारि देहु झंगरौ।
सूर श्याम तेरौ अति, गुननि माहिं अगरौ।
चोली अरु हार तोरि, छोरि लियो सगरौ ॥६१॥
अर्थ-हे यशोदा, तुम्हारा बालक कृष्ण अत्यन्त शरारती है। दूध, दही और
मक्खन लेकर सब गिरा देता है। प्रतिदिन सबेरे ही उठकर मुझसे झगडा करता है।
ग्वाल-बालो को साथ लेकर रास्ता घेर लेता है। (और कहता है कि) हम-तुम सभी
समवयस्क हैं कौन किससे बड़ा है ! जो कुछ लिया-दिया है उसे (यही) छोड़ दो अन्यथा
झगडा होगा। सूरदास कहते है कि (गोपियाँ कहती हैं कि) तुम्हारा पुत्र कृष्ण गुणो मे
अग्रसर हो गया है ! मेरी चोली और हार तोडकर उसने सब कुछ छीन लिया ॥६१॥
ऐसी रिस मैं जौ धरि पाऊँ।
कैसे हाल करौं धरि हरि के, तुमकौं प्रगट दिखाऊँ।
सेंटिया लिए हाथ नंदरानी, थरथरात रिस गात।
मारे बिना आजु जौ छाँड़ौँ, लागै मेरैं तात।
इहिं अंतर ग्वारिनि इक औरे, धरे बाँह हरि ल्यावति।
भली महरि सूधौ सुत जायौ, चोली-हार बतावति।