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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ७३
हरि सब भाजन फोरि पराने।
हाँक देत पैठे दै पैला नैंकु न मनहिं डराने।
सींके छोरि, मारि लरकनि कौं, माखन-दधि सब खाई।
भवन मच्यौ दधि काँदौ, लरिकनि रोवत पाए जाई।
सुनहु-सुनहु सबहिनि के लरिका, तेरौ सौ कहूँ नाहिं।
हाटनिं-बाटनि, गलिनि कहूँ कोउ चलत नहीं डरपाहिं।
रितु आए कौ खेल, कन्हैया सब दिन खेलत फाग।
रोकि रहत गहि गली साँकरी, टेढ़ी बांधत पाग।
बारे तैं सुत ये ढङ्ग लाए, मनहीं मनहिं सिहात।
सुनैं सूर ग्वालिनि की बातैं सकुचि महरि पछिताति ॥५८॥
अर्थ - कृष्ण सभी वर्तनों को तोड़कर भाग निकले, उन्होंने ललकार कर धावा
बोल दिया और मन में जरा भी भयभीत नही हुये। वे सीका खोलकर लड़कों को मार
कर सब मक्खन और दही खा गये। घर में दधिकांदो (दही की होली) मचा था।
(गोपियों ने) जाकर लडको को रोता हुआ पाया। (तब गोपियां यशोदा के पास जाकर
कहती हैं) 'सुनो-सुनो, लडके सभी के हैं किन्तु तुम्हारे (लड़के के) समान कोई नही है।
उसके भय से बाजार, मार्ग और गली मे कही कोई नही जाता। खेल ऋतु मे ही
अच्छा लगता है किन्तु कृष्ण हमेशा होली खेलते हैं। संकीर्ण गलियों मे पकड़कर (हमें)
रोक लेते हैं और टेढ़ी पगड़ी बांधते है ! बचपन से ही तुम्हारे पुत्र का यह ढंग हो गया
है ! (ऐसा कहकर वे) मन-ही-मन कृष्ण के लिये लालायित हो रही है। सूरदास कहते
हैं कि गोपियो की बाते सुनकर महरि (यशोदा) मन-ही-मन पश्चात्ताप करती हैं ॥५८॥
कन्हैया तू नहिं मोहिं डरात।
षटरस घरे छांड़ि कत पर घर, चोरी करि करि खात।
बकत-बकत तोसों पचिहारी, नैंकहुँ लाज न आई।
ब्रज-परगन-सिगदार महर, तू ताकी करत नन्हाई।
पूत सपूत भयौ कुल मेरैं, अब मैं जानी बात।
सूर स्याम अब लौं तुहिँ बक्स्यौ, तेरी जानी घात ॥५६॥
अर्थ- हे कृष्ण, तुम मुझसे नही डरते। घर मे रखे हुये षट्रस व्यंजनों को छोड़
कर दूसरो के घर चोरी करके क्यो खाते हो ? मैं तुमसे कहते-कहते थक गयी किन्तु तुम्हे
बिलकुल लाज नही आती। तुम्हारे पिता व्रज के परगने के सिकदार (अधिकारी) हैं तुम
उनकी हेठी (हीनता) (प्रकट) करते हो। अब मैं समझ गयी कि मेरे परिवार में सुपुत्र
हुआ है ! (सूरदास कहते हैं कि माँ यशोदा ने कहा कि) हे श्याम, अब तक तो मैने
तुम्हे क्षमा कर दिया, किन्तु अब मैं तुम्हारी सभी बाते (दांव) समझ गयी हूँ ॥५८॥
मैया मैं नहिं माखन खायौ।
ख्याल परैं ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ।