सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ सूरसागर सार सटीक
तुम आंगन मे लोट कर हठ क्यो कर रहे हो जो कुछ चाहते हो उसे तुरन्त ही लो और
यह खोटी बुद्धि छोड दो। (मां यशोदा ने) कृष्ण को मनाकर उन्हें कलेवा दिया, मुख
में उबटन लगाया और चोटी संवारी। (अब) सूरदास के स्वामी हाथ मे छोटी सी
लाठी लेकर खड़े हैं ॥२४॥
बरनौँ बाल-वेप मुरारि।
थकित जित-तित अमर-मुनि-गन, नंद-लाल निहारि।
केस सिर बिन बपन के चहुँ दिसा छिटके झारि।
सीस पर धरि जटा, मनु सिसु रूप कियौ त्रिपुरारि।
तिलक ललित ललाट केसरबिंदु सोभाकारि।
रोष-अरुन तृतीय लोचन, रह्यौ जनु रिपु जारि।
कंठ कठुला नील मनि, अंभोज-माल सँवारि।
गरल ग्रीव, कपाल उर इहिँ भाइ भए मदनारि।
कुटिल हरि-नख हिएँ हरि के हरषि निरखति नारि।
ईस जनु रजनीस राख्यो भाल तैँ जु उतारि।
सदन-रज तन स्याम सोभित, सुभग इहिँ अनुहारि।
मनहुँ अंग-बिभूति-राजित सभु सो मधुहारि।
त्रिदस-पति-पति असन कौँ अति जननि सौँ करै आरि।
सूरदास विरंचि जाकौँ जपत निज मुख चारि ॥२५॥
अर्थ—मैं मुरारी (श्री कृष्ण) के बाल रूप का वर्णन कर रहा हूँ। नन्दलाल
(श्री कृष्ण) को देखकर देवर्षि समूह यत्र-तत्र थकित हो गया है। बिना मुण्डन किये
हुए सिर के सभी बाल चारो ओर बिखरे हुए हैं ऐसा प्रतीत होता है मानो शंकर जी
ने सिर पर जटा धारण कर शिशु-रूप बनाया हो। सुन्दर मस्तक पर शोभा उत्पन्न
करने वाली केशर की बिन्दी लगी है वह ऐसी प्रतीत होती है जैसे शत्रु (कामदेव) को
जलाने के लिए क्रोधारुण तृतीय नेत्र हो। कण्ठ मे नीलमणि का कण्ठा तथा (सुन्दर)
कमलों की संवारी हुयी माला (की शोभा) ऐसी प्रतीत होती है जैसे शंकर के कण्ठ मे
विष तथा हृदय पर कपाल माला सुशोभित हो रही हो। स्त्रियां कृष्ण के हृदय पर सिंह
का टेढ़ा नाखून हर्षित होकर देखती हैं ऐसा लगता है जैसे शंकर जी ने चन्द्रमा को
मस्तक से (हृदय पर) उत्तार लिया हो। घर की धूल से भगवान् का शरीर इस प्रकार
सुशोभित हो रहा है जैसे श्मशान की भस्म लगाये शंकर जी सुशोभित हों। सूरदास
कहते हैं ब्रह्मा अपने चारो मुखो से जिनको जपते रहते हैं वही देवराज इन्द्र के स्वामी
(श्री कृष्ण) भोजन के लिए हठ कर रहे हैं ॥२५॥
मैया, कबहिँ बढैगी चोटी ?
किती वार मोहिँ दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौँ, ह्वै है लाँबी-मोटी।