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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ५७
नंद जु के वारे कान्ह, छाँड़ि दे मथनियाँ ।
बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ ।
नैंकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ ।
आरि जनि करौ, बलि बलि जाउँ हौं निधनियाँ ।
जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ ।
ताकौ नंदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ ।
सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ ।
सूर स्याम देखि सबै भूलीं गोप-धनियाँ ॥२२॥
अर्थ—हे नन्द जी के छोटे कृष्ण, मथानी छोड़ दीजिए। बार-बार नन्दरानी,
मां यशोदा कहती हैं कि थोडा ठहरो, मेरे प्राणधन, मैं तुम्हे मक्खन दूँगी। हे मेरी
असीम सम्पत्ति, हठ मत करो, मैं तुम्हारे ऊपर बलिहारी हूँ। जिसका ध्यान सुर-नर-
मुनि जन धारण करते हैं उनको कन्धे पर लेकर नन्दरानी यशोदा उनका मुख चूमती
हैं। शेषनाग को हजारो मुखों से उनका गुणगान करते नही बनता। सूरदास कहते हैं
कि उन्हे देखकर गोपवधुएँ सब कुछ भूल गयी ॥२२॥
कहन लागे मोहन मैया-मैया ।
नंद महर सौं बाबा बाबा, अरु हलधर सौं भैया ।
ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया ।
दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया ।
गोपी ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति वधैया ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, चरननि की वलि जैया ॥२३॥
अर्थ—श्री कृष्ण (यशोदा को) मां-मां कहने लगे। नन्द को बाबा और बलराम
को भैया (कहने लगे) । (कृष्ण को बाहर खेलने के लिए जाता हुआ देखकर) माँ यशोदा
ऊपर चढ़कर कृष्ण का नाम लेकर कहती है कि हे लाल, दूर खेलने मत जाओ, किसी
की गाय मार देगी। गोपियाँ और ग्वाले परस्पर कौतूहल करते है, घर-घर में बधाइयाँ
बज रही है। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, तुम्हारे दर्शन के लिए मैं तुम्हारे चरणो पर
निछावर हूँ ॥२३॥
गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी ।
माखन सहित देहि मेरी मैया, सुपक सुकोमल, मोटी ।
कत हौ आरि करत मेरे मोहन तुम आँगन मैं लोटी ।
जो चाहौ सो लेहु तुरतहीँ, छाँड़ौँ यह मति खोटी ।
करि मनुहारि कलेऊ दाँह्रौ, मुख चुपरचौ अरु चोटी ।
सूरदास कौ ठाकुर ठाढौ, हाथ लकुटिया छोटी ॥२४॥
अर्थ—गोपाल श्री कृष्ण दही और रोटी माँगते हैं। मेरी मां मुझे सुन्दर पकी
हुई पुष्टिकर मोटी रोटी मक्खन के साथ दो। (मां यशोदा कहती है कि) हे मेरे मोहन