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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 359 में से

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पृष्ठ 240

२८० सूरसागर सार सटीक
सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु,इक चित इक मन लाइ ।
वह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रह्म तब आइ ।
दुसह संदेस सुनत माधो कौ, गोपी जन बिलखानी ।
सूर बिरह की कौन चलावै, बूड़तिँ मनु बिनु पानी ॥५०॥
अर्थ—गोपियो, कृष्ण का संवाद सुनो ! समाधि लगाकर अन्तर मे ध्यान करो,
यही उनका संदेश है । वे अविगत, अविनाशी, पूर्ण तथा सभी घट मे व्याप्त है । वेद
तथा पुराणो में गाया गया है कि तत्व-ज्ञान के बिना मुक्ति नही मिलती । चित्त मे
(एकाग्र मन से) यह (विचार) लाकर, सगुण रूप को त्यागकर, निर्गुण का ध्यान करो ।
वही उपाय करो जिससे विरह को तर जाओ, तब ब्रह्म आकर मिल जायेगा । कृष्ण के
दुसह संदेश को सुनकर गोपियां बिलखने लगीं । सूरदास कहते है कि विरह को कौन
चलाये वे मानो बिना पानी के डूब रही हों ॥५०॥
परी पुकार द्वार गृह-गृह तैँ, सुनौ सखी इक जोगी आयौ ।
पवन सधावन, भवन छुड़ावन, रवन-रसाल, गोपाल पठायौ ।
आसन बाँधि, परम ऊरध चित, बनत न तिनिहिँ कहा हित ल्यायो ।
कनक बेलि, कामिनी ब्रजब्राला, जोग जगिनि दहिबे कौँ धायौ ।
भव-भय हरन, असुर मारन हित, कांरन कान्ह मधुपूरी छायौ ।
ब्रज मैँ जादव एकौ नाहीँ, काहैँ उलटौ जस बिथरायौ ।
सुथल जु स्याम धाम मैँ बैठैँ, अबलनि प्रति अधिकार जनायौ ।
सूर बिसारी प्रीति साँवरे, भली चतुरता जगत हँसायौ ॥५१॥
अर्थ—घर-घर के द्वार से पुकार मच गयी कि सखियो सुनो ! एक योगी आया
है । पवन (प्राणायाम) सिद्ध करने के लिए तथा भवन छुड़ाने के लिए रमण करने
वाले रसाल कृष्ण ने भेजा है । आसन लगाकर, चित्त को ऊर्ध्वमुख करना उन्हे
(श्रीकृष्ण को) शोभा नही देता; उन्हें योग से क्यों इस प्रकार का प्रेम हो गया ?
सोने की लता (के समान) ब्रजबालओ को योग की अग्नि पर दग्ध करने के लिए
दौड़कर (आये है) । संसार के दुख को हरने वाले, असुरो को मारने के लिए कृष्ण
मधुपूरी मे रह गए । ब्रज मे एक भी यादव नही, उलटे यश को क्यों बिखरा दिये ।
सुन्दर स्थल तथा भवन मे बैठे कृष्ण अबलाओ के प्रति अपना अधिकार जमा दिये ।
सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती है) साँवले कृष्ण प्रीति को विस्मृत कर गए,
अपने इस भले चातुर्य से संसार मे परिहास करा दिया ॥५१॥
देन आए ऊधौ मत नीकौ ।
आवहु री मिलि सुनहु सयानी, लेहु सुजस कौ टीकौ ।
तजन कहत अंबर आभूषण, गेह नेह सुत ही कौ ।
अंग भस्म करि सीस जटा धरि, सिखवत निरगुन फीकौ ।