सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश १७८
तुम जानत हौ वैसी ग्वारिनि, जैसे कुसुम तिहारे।
घरी पहर सबहिनि बिरमावत, जेते आवत कारे।
सुंदर बदन कमल-दल लोचन, जसुमति नंद-दुलारे।
तन मन सूर अरपि रहीं स्यामहिं, का पै लेहिं उधारे। ४८॥
अर्थ—मधु (शराब) मे मस्त रहने वाले हे मधुकर ! इस निर्गुण से क्या मतलब
है, हमारे कृष्ण बहुत समय तक जीवित रहे। पीले मकरंद के कीचड़ मे लोटते हो
तथा बीच में अंग नही सम्हालते। बार-बार मदिरा के नशे में रस-विरुद्ध बातें बकते
हो। तुम जानते हो कि ग्वालिनियां वैसी ही है, जैसे तुम्हारे कुसुम हैं। जो घड़ी-पहर
के लिए सभी काले लोगो (भ्रमरों) को बिरमाते है। हम सुन्दर मुख, कमल के समान
नेत्र वाले कृष्ण को तन-मन अर्पित कर चुकी है। अब पुनः निर्गुण को अर्पण करने के
लिए तन-मन किससे उधार ले ॥४८॥
मधुकर हम न होहिं वै बेलि।
जिन भजि तजि तुम फिरत और रंग, करन कुसुम-रस केलि।
बारे तैं बर बारि बढ़ी हैं, अरु पोषी पिय पानि।
बिनु पिय परस प्रात उठि फूलत, होति सदा हित हानि।
ये बेली बिरहीं बृंदावन, उरझी स्याम तमाल।
प्रेम-पुहुप-रस-बास हमारे, बिलसत मधुप गोपाल।
जोग समीर धीर नहिं डोलतिं, रूप डार दृढ़ लागीं।
सूर पराग न तजतिं हिए तैं, श्री गुपाल अनुरागीं ॥४६॥
अर्थ—मधुकर हम उन लताओ के समान नही है; जिन्हे छोड़कर भाग जाते
हो ओर दूसरे रंग में रंगकर अन्य कुसुम के सांथ केलि (क्रीडा) करने के लिए फिर
जाते हो। बचपन से ही उपवन मे पानी पीकर पुष्ट हुई हैं, और (प्रियतम) के हाथो
द्वारा पोषित हुई हैं। ये प्रिय के बिना स्पर्श के प्रातः फूल उठती है, जिससे सदा हित
की हानि होती है ! वृन्दावन की ये विरहिणी लताएँ (गोपिकाएँ) श्याम तमाल से
उलझ गयी है। प्रेम रूपी पुष्प के रस से हमारे (भ्रमर) गोपाल कृष्ण बिलसते हैं।
रूप की डालियों मे दृढ़ता पूर्वक लगी है (उलझ गई है), जो योग की हवा से हिलती
नहीं हैं। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) निरन्तर श्री गोपालकृष्ण में अनुरक्त हम
हृदय से पराग नही त्यागती हैं ॥४६॥
उद्धव गोपी संवाद
पहला संवाद
सुनौ गोपी हरि कौ संदेस।
करि समाधि अंतरगति ध्यावहु, यह उनकौ उपदेस।
वै अविगत अविनासी पूरन, सब-घट रहे समाइ।
तत्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीँ है, वेद पुराननि गाइ।