सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
परिशिष्ट
भावार्थ टिप्पणी
विपर्यय का अङ्ग
(१) श्रवणहु देखि-शास्त्र द्वारा देखना या श्रवण करना
यथा-'आत्मा का अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो निदिध्यासितव्य ।'
सुनै पुनि नैनहु - अन्तर्दृष्टि से समझना या मनन । जिव्हा
सू घि-वाणीपर ओम्, राम या ररकार रटन ध्वनि का आनद
लेना । नासिका बोल-श्वास प्रश्वास के साथ 'सोऽहम्' भाव
का अनुसधान करना । गुदा खाई-मूलाधारचक्र से योगाभ्यास
प्रारभ करना । इन्द्रिय जल पीवै-इन्द्रियों का प्रत्याहार
करना । विनही हाथ सुमेरुहि तोल-ममता छोडकर अहकार
को उतार फेंकना । ऊचे पइ-उच्चतम परमपद ब्रह्म को
पाना, अह ब्रह्मास्मि ऐसी ऊची दृष्टि रखना, अपने जीवन
का लक्ष्य ऊचा बनाये रखना, उच्च विचार रखना । मूण्ड
नीचे कूं-अहभाव को तोडना या ईश्वर गुरु सन्तो को
नमस्कार करना । तीनलोक मे विचरत डोल-तीनो अव-
स्थाओ का साक्षी बन कर रहना ।
(२) अधा तीन लोक को देखे-ससार से आख
मू दकर आत्मदृष्ट से या ब्रह्मदृष्टि से सबको
देखना । यथा-यो मा पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि
पश्यति । बहरा सुने बहुत विधि वाद-कर्णावरोध
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करके आन्तरिक ध्वनिया का सुनना या अनासक्त
उदासीन भाव से सब सुनना या सब व्यवहार करना ।
नकटा वास कमल की लेवे-लोकसज्जा छोड कर भगवत्
प्रेम का आनन्द लेना । गूगा करे बहुत सवाद-सासारिक
चर्चाओ मे मौन रहकर ब्रह्मचर्चा मे लीन रहना । टू टा
पकरि उठावै पर्वत-सब व्यवहार करता हुआ भी निष्क्रिय
होना, कर्तृत्वाभिमान से दूर रहना । पगुल करे नृत्य
आल्हाद-निष्काम होकर सतोष का आनन्द लेना ।
अथवा परमेश्वर हमारी तरह चर्मचक्षु न होने पर
भी तीनो लोको का द्रष्टा है । चर्म श्रोत्रेन्द्रिय न होने पर
भी सब सुन रहा है । चर्मनासिका न होने पर भी हमारे
हृदयकमल के पवित्रभावो की सुगध ले रहा है । चर्म
जिव्हा न होने पर भी हमारे हृदय मे बोल रहा है
या हमें बुलवा रहा है । निष्क्रिय होकर भी सारे विश्व के
पालन पोषण का भार उठा रहा है निष्काम होकर भी सब
लीला कर रहा है । यथा—'पश्यत्यक्षु स शृणोत्यकर्ण.’
इत्यादि ।
(३) कु जरको कीरी गिल बैठी-सूक्ष्म विवेक विचार
बुद्धि से कामादि वासनाओ को जीतना । सिंघ हि पाइ
अघानो श्याल-सियार जैसे अल्पप्राण जीव का भी आत्म-
ज्ञान के बल पर अज्ञान को जीतना । मछरी अग्नि माहि
सुख पायो-जीव का ब्रह्मज्ञान की अग्नि मे सुख पाना ।
जल मे हुती बहुत बेहाल-ससार सागर मे जीव का दुखी
होना । पगु चल्यो पर्वतके ऊपर-निष्काम होकर मन
को विजय करना । मृतक हि देखि डरानो काल-जीवत-
मृतक (जीवन्मुक्त) होकर काल या मृत्यु को जीतना ।
(४) बू द हि माहि समुद्र समानो-आत्मा मे परमात्म-
भाव का भर जाना । राई माहि समानो मेर-बीज मे वृक्ष
की तरह आत्मा या ब्रह्म मे सबका लीन हो जाना । पानी
माहि तुम्बिका वूडी-सासारिक वासनाओ के सरोवर मे
आत्मा का डूब जाना । पाहन तिरत न लागी वार-पत्थर
जैसे अज्ञानी जीव का भी ज्ञान द्वारा ससार जगत को
पार कर जाना । सूरज कियो सकल अधेर-ज्ञान द्वारा
सासारिक भेद ज्ञान का लोप हो जाना । मूरख होई सु
अर्थहि पावै-सासारिक दृष्टि से पागल होकर ही परमानन्द
या परमज्ञान प्राप्त करना ।
(५) मछली-विवेक बुद्धि । वगुला-दभ, पाखड ।
मूसा-यथार्थ ज्ञान । साप-सशय ज्ञान । सूवा-ज्ञान या ज्ञानी ।
विलैया-अविद्या । वेटी-ब्रह्मविद्या । मा-माया । वेटा-
आत्मज्ञान । वाप ससार या शरीर ।
(६) देव-परब्रह्म, परमात्मा । देवल-विश्व या शरीर ।
शिष्य-मन । गुरु-आत्मा । राजा-स्वामी, आत्मा । रक-
शरीर । वन्ध्या-निष्काम बुद्धि । पगुपुत्र-निश्चल तत्त्व
ज्ञान । घर-देहाध्यास ।
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(७) कमल-हृदय, मन। पानी-भगवत्प्रेम। सूर-
ब्रह्मज्ञान। शीतलता-शान्ति।
(८) हस-सत्वगुण। ब्रह्मा-रजोगुण। गरुड-रजोगुण।
हरि-सत्त्वगुण। बैल-शरीर। शिव-आत्मा। देव-आत्मज्ञान।
पाती-देहासक्ति। जरख-मन। डायन-विषयासक्ति। पानी-
राग। अ गीठी-सुख दुख।
(६) कपडा-शरीर । धोवी-मन । माटी-तृष्णा ।
कुम्हार-जीवात्मा। सूई-स्वरूप स्मृति । दरजी-जीवात्मा।
सीवे-ब्रह्म से मिलावे । सोना-प्रभुस्मरण । सुनार-मन ।
लकरी-ध्यान । बढई-जीव । छीले-कर्मका क्षय करे ।
खाल-प्राणायामकी-धोकनी । लुहार-प्राणी ।
(१०) घर-शरीर । मिठाई-विषयानन्द । लोन-
ब्रह्मानन्द। पर्वत-अज्ञान का । धौन-पवन ज्ञान का ।
(११) रजनी-प्रवृत्ति । दिवस-निवृत्ति । तेल-ब्रह्म
चिंतन । दीपक-ज्ञान । बाति-बत्ती, पचभूत । पानी-उपासना
निगुरा-निर्गुण ।
(१२) मेघ-भगवत्प्रेम । धार-भनकी धारा । मेरु-
अहकार । नदी-सासारिक आसक्ति । बीजली-रजोगुणी
तमोगुणी बुद्धि । कासा-सत्वगुण । कुटुम्ब-शुभाशुभ सस्कार ।
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(१३) वाडी-कर्म । माली-जीव । हाली-मन ।
खेत-शरीर । हस-जीवात्मा । श्यामरग-प्रभु
प्रेम । भ्रमर-मन । शशिहरि-चन्द्रमा, मन । राहु-रजोगुण
तमोगुण । सूर-ज्ञान का सूर्य । केतु-अज्ञान । सगुरा-सगुण
ससार । निगुरा-निर्गुण ब्रह्म ।
(१४) अग्नि-विरहाग्नि । लकडी-प्रभु प्राप्ति की
लालसा ! पानी-ध्यान । घीव-प्रभुदर्शन ।
(१५) पात्र-शुद्ध हृदय । झोली-सात्विक विचार ।
योगी-जिज्ञासु । भिक्षा-ब्रह्मानुभव । जगत-ससारी जन ।
जागे-प्रवृत्ति मे रहे । गोरख-सतजन । सोवे-समाधि लगावे ।
भिक्षा-ब्रह्मानुभूति ।
(१६) निदंयी-निर्मोही । पशुघातक-इन्द्रियसयमी ।
दयावत-इन्द्रियासक्त । लोभी-जिज्ञासु । निर्लोभी-ईश्वर
विमुख । मिथ्यावादी-जगत को मिथ्या मानने वाला ।
सत्य कहे-जगत को सत्य समझने वाला । धूप-आत्म
ज्ञान । शीतलता-शान्ति ।
(१७) माई-मोहमाया । वाप-देहाध्यास । उमदानी-
उमगती हुई । धी-बुद्धि । खसम-पति, परमेश्वर । बहू
विचारी-विचारशील बुद्धि । बखतावर-शिक्षक । सास-
मनोवृत्ति । भाई-ब्रह्मज्ञान । कुटुम्ब-वासना, ससार ।
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(१८) परधन-श्रात्मानुभव । परनिन्दा अनात्म निवृत्ति ।
परधी-ईश्वर विश्वास । मास-ब्रह्मानन्द । मदिरा-श्रात्म
चितन । अकर्म-निष्काम कर्म । कर्म-सकाम कर्म ।
(१६) बढई-गुरुदेव । चरखा-चित्त । बहू-ब्रह्मबुद्धि ।
सास-स्मृति । नैंन्हू तार-सहज समाधि । पूनी-स्वानुभूति ।
जुलाहा-जीवात्मा । ऊ ची जाति-ब्रह्म से एकता ।
(२०) कुमारी कन्या-गुरुज्ञानरहित बुद्धि । घर-घर
फिरे-भटकती है । वेश्या-विषयासक्त । पतिव्रता-परमात्म
परायण । एक पुरुष-परमात्मा । पापी-जितेन्द्रिय । धर्म-
इन्द्रियासक्ति ।
(२१) विप्र-ज्ञानी संत । रसोई-भजनभाव । चौका-
शम, यम, उपरति, तितिक्षा । लकड़ी-ध्यानवृत्ति ।
चूल्हा-चित्त । रोटी-नामरटन, जप । लकड़ी-ध्यान । तवा-
मन । खिचरी-ब्रह्मबुद्धि । हुण्डिया-माया । आक धतूरा-
कामक्रोधादि मनोविकार ।
(२२) बैल-कर्तृत्वाभिमानी जीव । उलटि-कर्तृत्वाभि
मान छोडकर । नायक-मन बुद्धि को । लांद्यो-कर्तव्य सौंप
दिया । सत्य-परमात्मा । सौदा-ब्रह्मप्राप्ति का । दिसतर-
परदेश । नायकनी-बुद्धि ।
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(२३) वनिक-व्यापारी, जीव । बनजी-व्यापार ईश्वर
भक्ति का । तावडा-सुखदु;ख का । भली वस्तु-ईश्वर भजन,
सत्कर्म । गठरिया बाधी-पुण्य की कमाई की । लेखा-जीवन
का हिसाब । बरी-ब्रह्मरूपी वटवृक्ष । बैल अहकार । पूंजी-
तत्त्वज्ञान की कमाई ।
(२४) पहरायत-पहरेदार व्यवहार बुद्धि । शाह-जीव ।
चोर-वैराग्य बुद्धि या रामनाम । कोतवाल-मन । राजा-
अहकार या जीव । गाव-हृदय या ससार । शोर-प्रशंसा ।
प्रजा-दैवीगुण या मन, प्राण, इन्द्रिय । नगरी-शरीर ।
(२५) राजा-जीवात्मा । विपत्ति-सासारिक तृष्णाएं ।
घर घर-नाना योनि या इन्द्रिया । पाव-शुभाशुभ कर्म
या सकल्प । घोडा-शरीर । बीख-मन की चाल । आक-
इरड-संसार के विषय । सुख-रस । रसभरे ईख-ईश्वर
भक्ति ।
(२६) पानी-ईश्वर प्रेम ; अग्नि-ब्रह्मज्ञान या विरह ।
(२७) खसम-जीव । जोरू-विषयलालसा या
ब्राह्म वृत्ति ।
(२८) पथी-मुमुक्षुजीव, संत पुरुष । पंथ-ज्ञान भक्ति
का मार्ग । निर्भय देश-अद्वैत ब्रह्मस्वरूप । दुष्काल-जन्म-
मरण का चक्कर । सुभिक्ष-अखण्ड ब्रह्मानन्द ।
(२९) अहेरी-मुमुक्षु संत । वन-ससार या शरीर ।
शिकार-मन पर विजय या ब्रह्मप्राप्ति । सिंह व्याघ्र मृग-
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काम क्रोध लोभादि । राजा-राम, परमात्मा । धनुष-ध्यान
या रामनाम । कमर-हृदय । तरकस-बाण, विचार । सावज-
शिकार, मन । जुहार-निवेदन, अर्पण ।
(३०) शुक-ज्ञानी गुरुदेव । कोकिल-कोयल, विचार-
वान पुरुष । सारस-अविवेकी व्यक्ति । हंस-विवेकी जन ।
मुक्ताफल-गूढ, सार अर्थ । मानसरोवर-हृदय । न्हाहि-प्रसन्न
होते है । करक-दोष ।
(३१) द्विज-ब्राह्मण, जीव । भ्रष्टक्रिया-सांसारिक
भोगविलास । ठोर-परमपद, परमानन्द ।
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