सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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७६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सर्प डसै सु नही कछु तालक,
वीछु लगै सु भलौ करि मानौ ।
सिंह हु खाइ तौ नाहि कछू डर,
जौ गज मारत तौ नहि हानी ॥
आगि जरौ, जल बूडि मरौ,
गिरि जाइ गिरौ, कछु भै मति आनौ ।
सुन्दर और भले सब ही दुख,
दुर्जन सग भलौ जनि जानौ ॥५॥
॥ इति दुष्ट को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
(५) तालक-ताल्लुक, चिंता ।