सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३६
जाकै भय ब्रह्मा पुनि होत है कपाइमान,
जाकै भय सुर असुर इन्द्रऊ डरतु है ॥
जाकै भय शिव अरु शेषनाग तीनों लोक,
केऊक कलप बीते लोमश परतु है ।
सुन्दर कहत नर गर्व गुमान कर.
तू तौ शठ एकई पलक मै मरतु है ॥१९॥
काल सौ न बलवत कोऊ नहिं देखियत,
सब कौ करत अंत काल महाजोर है ।
काल ही कौ डर सुन भाग्यो मूसा पैगबर,
जहा जहा जाइ तहा तहां वाकौ गोर है ॥
काल ही भयानक भैभीत सब किये लोक,
स्वर्ग मृत्यु पाताल मैं काल ही कौ सोर है ।
सुन्दर काल कोभी काल एक ब्रह्म है अखंड,
बासौ काल डरै जोई चल्यौ उहि बोर है ॥२०॥
बरखा भये तें जैसे बोलत भभीरी सुर,
खड न परत कहु नेकहुं न जांनिये ।
जेमै पूंगी वाजत अखंड सुर होत पुनि,
ताहू मैं न अंतर अनेक राग गानिये ॥
(१९) कपाइमान-भयभीत । लोमश-एक प्रसिद्ध महा-
दीर्घायु ऋषि । गोर-घाव, भय या कबर। सोर-शोर, हल्ला ।