सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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३२ ] ।। सुन्दर विलास ।।
मारि है काल चपेटि अचानक,
होइ घरी माहि राख की ढेरी ।
सुन्दर ले न चलै कछु सग सु,
भूलि कहै नर मेरी ही मेरी ॥३॥
कै यह देह जराइ कै छार,
किया कि किया कि किया कि किया है ।
कै यह देह जमी महि षोदि,
दिया कि दिया कि दिया कि दिया है ॥
कै यह देह रहै दिन चारि,
जिया कि जिया कि जिया कि जिया है ।
दर काल अचानक आइ,
लिया कि लिया कि लिया कि लिया है ॥४॥
त सदा उपदेश बतावत,
केश सबै सिर शेत भये हैं ।
ममता अजहू नही छाडत,
मौत हू आइ सदेश दिये हैं ॥
ज कि काल्हि चलै उठि मुरिख,
तेरे ही देखत केते गये हैं ।
दर क्यों नहिं राम सभारत,
या जग मैं कहि कौन रहे हैं ॥५॥
मनेह न छाडत है नर,
ानत है शठ है थिर येहा ।