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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २७
होइगा हिसाव तब आवैगा न ज्वाव कछु,
सुन्दर कहत गुन्हैगार है खुदाइ का ॥२७॥
कर कर आयौ जब घर घर काट्यौ नार,
भर भर बाज्यौ ढोल घर घर जान्यौ है ।
दर दर दौर्यौ जाइ नर नर आगै दीन,
बर बर बकत न नेक अलसान्यौ है ॥
सर सर सोधै धन तर तर तोरै पात,
जर जर काटत अधिक मोद मान्यौ है ।
फर फर फूल्यौ फिरै डर डरपै न मूढ,
हर हर हसत न सुन्दर सकान्यौ है ।२८।।।
जनम सिरानौ जाइ भजन बिमुख शठ,
काहे कौ भवन कूप बिन मीच मरि है ।
ग्रहित अविद्या जानि शुक नलिनी ज्यौ मूढ,
करम विकरम करत नहि डरि है ।
(२७) लोड ता है-भोगता है । औजूद-शरीर । बेमिहर-
निर्दय । दोजग-दोजख, नर्क । बलाई का-पापो का ।
गुन्हैगार-अपराधी । धनी-स्वामी, परमेश्वर ।
(२८) कर कर आयो-पाप पुण्य करके जन्म लिया ।
नार-नाभिनात । भर-भर भड भड । दर दर-घर घर के
दरवाजे । बर वर-बड वड । सर-सर सोधै-सूत-सूत कर
इकट्ठा करे । तर तर-तरड तरड । जर जर-जरड-जरड ।
मोद-आनद ।