सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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॥ आतम अनुभव को अग ॥ [ २१५
मूये तै मोक्ष मलेच्छ कहैं,
तेऊ धोखै ही धोखै बखानत वैना ।
सुन्दर आतम कों अनुभै जोई,
जीवत मोक्ष सदा सुख चैना ॥१४॥
जाग्रत तौ नहि मेरे विषै कछु,
स्वप्न सु तौ नहि मेरे दिखै है ।
नाहि सुषूपति मेरे विषै पुनि,
विश्व हु तेजस प्राज्ञ परै है ॥
मेरे विषै तुरिया नहि दीसत,
याही तैं मेरो स्वरूप अखै है ।
दूर तैं दूर परै तैं परै अति,
सुन्दर काउ न मोहि लखै है ॥१५॥
मनहर छन्द
कोउ तौ कहत ब्रह्म नाभि के कवल मधि,
कोउ तौ कहत ब्रह्म हृदै मैं प्रकास है ।
कोउ तौ कहत कठ नासिका कै अग्रभाग,
कोउ तौ कहत ब्रह्म भृकुटी मैं वास है ॥
(१४) शिवसैना-शैव-सम्प्रदाय । मलेच्छ-मुस्लिम
सम्प्रदाय ।