सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ विचार को अंग ॥ [ २०३
जती तूं कहावै तो तू एक या जनन करि,
याही जत नीकौ यह आतमा कों हेरिये ।
तपसी कहावै तौ तू एक याही तप गाढ़ि,
याही तप नीकौ मन इन्द्रीन की घेरिये ॥
भक्त तूं कहावै तौ तू चित्त एक ठौर आनि,
श्वासे श्वास सोहं जाप याही माला फेरिये ।
सं मी कहावै तो तूं एक या संयम करि,
सुन्दर कहत देह आतमा निवेरिये । २३॥
ब्राह्मन कहावै तौ तूं ब्रह्म कौ विचार कर,
सत्त रज तम तीनो ताग तोरि डारिये ।
पंडित कहावै तौ तू याही एक पाठ पढ़ि,
अंत वेद मैं कह्यौ जू ताहि कौ विचारिये ॥
ज्यौतिषी कहावै तो तू ज्योति कौ प्रकाश कर,
अंतहकरन अंधकार कौ निवारिये ।
आगमी कहावै तौ तू अगम ठौर कौ जानि,
सुन्दर कहत याही अनुभव धारिये ॥२४॥
ब्राह्मन कहावं तौ तू आपुही कौं ब्रह्म जानि,
अति ही पवित्र सुख सागर मैं न्हाइये ।
क्षत्री तू कहावै तौ तू प्रजा प्रतिपाल कर,
शीश पर एक ज्ञान छत्र कौ फिराइये ॥