सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६५
आपने भावतैं चार भुजा पुनि,
आपने भाव तै सीग भी मांन्यौ ।
सुंदर आपने भाव के कारन,
आपु हि पूरन ब्रह्म पिछान्यौ ॥१०॥
आपने भाव तै होइ उदास जु,
आपने भाव तै प्रेम सौं रोवै ।
आपने भाव मिल्याँ पुनि जानत,
आपने भाव तैं अनचि जोवै ॥
आपने भाव रहै नित जागत,
आपने भाव समाधि मैं सोवै ।
सुंदर जैसो ई भाव है आपनो,
तैसोइ आपु तहा तहाँ होवै ॥११॥
आपने भाव तै भूलि पर्यो भ्रम,
देह स्वरूप भयौ अभिमानी ।
आपने भाव तै चंचलता धरि,
आपने भाव तैं बुद्धि धिगानी ॥
आपने भाव तैं आप विसारत,
आपने भाव तैं आत्म ज्ञानी ।
सुंदर जैसो हि भाव है आपनो,
तैसो हि होइ रह्यौ यह प्रानी ॥१२॥
। इति आपने भाव को अंग समाप्त ॥