सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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११८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
फिरत हौं उतावरी लगत नहिं तावरी,
मु वाही की बनावरी चल्यौ है जात नाव री ॥
थके हैं दोउ पांव री, चटत नहिं पाव री,
पियागे नहिं पाव री, जहर वाटि पाव री ।
दीरत नहिं नावरी, पुकारि कै सुनाव री,
सुन्दर कोउ नावरी, डूबत राखै नाव री ॥५॥
॥ इति विरहनी उलाहने को अंग सम्पूर्णं ॥
(५) बावरी-बावली, पागल । बाव-वायु, श्वास ।
तावरी-तावडी, धूप । उतावरी-उतावली । पावरी-पावडी ।