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सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary

श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥
करु गहि लेहु एड़ि निबहावै ॥
कहा बुझारति बूझै डोरा ॥
निसि कहीऐ तउ समझै भोरा ॥
कहा बिसनपद गावै गुंग ॥
जतन करै तउ भी सुर भंग ॥
कह पिंगुल परबत पर भवन ॥
नही होत ऊहा उसु गवन ॥
करतार करुणा मै दीनु बेनती करै ॥
नानक तुमरी किरपा तरै ॥६॥
संगि सहाई सु आवै न चीति ॥
जो बैराई ता सिउ प्रीति ॥
बलूआ के गृह भीतरि बसै ॥
अनद केल माइआ रंगि रसै ॥
दृड़ु करि मानै मनहि प्रतीति ॥
कालु न आवै मूड़े चीति ॥

22
बैर बिरोध काम क्रोध मोह ॥
झूठ बिकार महा लोभ ध्रोह ॥
इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥
नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥७॥
तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥
जीउ पिंडु सभु तेरी रासि ॥
तुम मात पिता हम बारिक तेरे ॥
तुमरी कृपा महि सूख घनेरे ॥
कोइ न जानै तुमरा अंतु ॥
ऊचे ते ऊचा भगवंत ॥
सगल समग्री तुमरै सूतृ धारी ॥
तुम ते होइ सु आगिआकारी ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥८॥४॥
सलोकु ॥

23
देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ
॥
नानक कहू न सीझई बिनु नावै पति जाइ
॥१॥
असटपदी ॥
दस बसतू ले पाछै पावै ॥
इेक बसतु कारनि बिखोटि गवावै ॥
इेक भी न देइि दस भी हिरि लेइि ॥
तउ मूड़ा कहु कहा करेइि ॥
जिसु ठाकुर सिउ नाही चारा ॥
ता कउ कीजै सद नमसकारा ॥
जा कै मनि लागा प्रभु मीठा ॥
सरब सूख ताहू मनि वूठा ॥
जिसु जन अपना हुकमु मनाइिआ ॥
सरब थोक नानक तिनि पाइिआ ॥१॥
अगनत साहु अपनी दे रासि ॥

24
खात पीत बरतै अनद उलासि ॥
अपुनी अमान कछु बहुरि साहु लेइ ॥
अगिआनी मनि रोसु करेइ ॥
अपनी प्रतीति आप ही खोवै ॥
बहुरि उस का बिस्वासु न होवै ॥
जिस की बसतु तिसु आगै राखै ॥
प्रभ की आगिआ मानै माथै ॥
उस ते चउगुन करै निहालु ॥
नानक साहिबु सदा दइआलु ॥२॥
अनिक भाति माइआ के हेत ॥
सरपर होवत जानु अनेत ॥
बिरख की छाइआ सिउ रंगु लावै ॥
एह बिनसै उहु मनि पछुतावै ॥
जो दीसै सो चालनहारु ॥
लपटि रहिए तह अंध अंधारु ॥
बटाऊ सिउ जो लावै नेह ॥

25
ता कउ हाथि न आवै केह ॥
मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥
करि किरपा नानक आपि लड़े लाई ॥३॥
मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥
मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥
मिथिआ राज जोबन धन माल ॥
मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥
मिथिआ रथ हसती अस्ब बसत्रा ॥
मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥
मिथिआ द्रोह मोह अभिमानु ॥
मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥
असथिरु भगति साध की सरन ॥
नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥४॥
मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥
मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥
मिथिआ नेत्र पेखत पर तृअ रूपाइ ॥

26
मिथिआ रसना भोजन अन साद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥
मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥
मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥
सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥५॥
बिरथी साकत की आरजा ॥
साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥
मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि बृथा बिहाइ ॥
मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु बृथे सभ काम ॥
जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥

27
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिए हरि नाउ
॥
नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥६॥
रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥
बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥
आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥
तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥
नानक उन जन चरन पराता ॥७॥
करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥
अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥

28
किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥
सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लड़े लड़ि लाइ ॥
थान थन्नतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥
निमख निमख जपि नानक हरी ॥८॥५॥
सलोकु ॥
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ
अहम्मेव ॥
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव
॥१॥
असटपदी ॥
जिह प्रसादि छतीह अंमृत खाहि ॥
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥

29
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि गृह संगि सुख बसना ॥
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥१॥
जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ॥
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ॥

30
नानक पति सेती घरि जावहि ॥२॥
जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा एला रहत ॥
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ॥
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ॥
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई दूलभ देह ॥
नानक ता की भगति करेह ॥३॥
जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि असू हसति असवारी ॥
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ॥

31
राखु परोड़ि प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ॥
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइि जो इेक अलखै ॥
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥४॥
जिह प्रसादि करहि पुन्न बहु दान ॥
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ॥
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रूपु ॥
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरी नीकी जाति ॥
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ॥
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥५॥
जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥

32
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ॥
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ॥
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥६॥
जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसारि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ॥
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेरे कारज पूरे ॥
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ॥

33
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ॥
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥७॥
आपि जपाइै जपै सो नाउ ॥
आपि गावाइै सु हरि गुन गाउ ॥
प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥
प्रभू दइिआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसन्न बसै मनि सोइ ॥
प्रभ दइिआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइिआ ॥
आपहु कछू न किनहू लइिआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हरि नाथ ॥
नानक इन कै कछू न हाथ ॥८॥६॥
सलोकु ॥
अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥
जो जो कहै सु मुकता होइ ॥

34

सुनि मीता नानकु बिनवंता ॥
साध जना की अचरज कथा ॥१॥
असटपदी ॥
साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥
साधसंगि मलु सगली खोत ॥
साध कै संगि मिटै अभिमानु ॥
साध कै संगि प्रगटै सुगिआनु ॥
साध कै संगि बुझै प्रभु नेरा ॥
साधसंगि सभु होत निबेरा ॥
साध कै संगि पाइे नाम रतनु ॥
साध कै संगि इेक ऊपरि जतनु ॥
साध की महिमा बरनै कउनु प्रानी ॥
नानक साध की सोभा प्रभ माहि समानी
॥१॥
साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥
साध कै संगि सदा परफुलै ॥

35
साध कै संगि आवहि बसि पंचा ॥
साधसंगि अंमृत रसु भुंचा ॥
साधसंगि होइ सभ की रेन ॥
साध कै संगि मनोहर बैन ॥
साध कै संगि न कतहूं धावै ॥
साधसंगि असथिति मनु पावै ॥
साध कै संगि माइआ ते भिन्न ॥
साधसंगि नानक प्रभ सुप्रसन्न ॥२॥
साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥
साधू कै संगि महा पुनीत ॥
साधसंगि किस सिउ नही बैरु ॥
साध कै संगि न बीगा पैरु ॥
साध कै संगि नाही को मंदा ॥
साधसंगि जाने परमानन्दा ॥
साध कै संगि नाही हउ तापु ॥
साध कै संगि तजै सभु आपु ॥

36
आपे जानै साध बडाई ॥
नानक साध प्रभू बनि आई ॥३॥
साध कै संगि न कबहू धावै ॥
साध कै संगि सदा सुखु पावै ॥
साधसंगि बसतु अगोचर लहै ॥
साधू कै संगि अजरु सहै ॥
साध कै संगि बसै थानि ऊचै ॥
साधू कै संगि महलि पहूचै ॥
साध कै संगि दृढ़ै सभि धरम ॥
साध कै संगि केवल पारब्रहम ॥
साध कै संगि पाइ़ नाम निधान ॥
नानक साधू कै कुरबान ॥४॥
साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥
साधसंगि साजन मीत कुटंब निसतारै ॥
साधू कै संगि सो धनु पावै ॥
जिसु धन ते सभु को वरसावै ॥

37
साधसंगि धरम राड़ि करे सेवा ॥
साध कै संगि सोभा सुरदेवा ॥
साधू कै संगि पाप पलाइिन ॥
साधसंगि अंमृत गुन गाइन ॥
साध कै संगि स्रब थान गंमि ॥
नानक साध कै संगि सफल जन्नम ॥५॥
साध कै संगि नही कछु घाल ॥
दरसनु भेटत होत निहाल ॥
साध कै संगि कलूखत हरै ॥
साध कै संगि नरक परहरै ॥
साध कै संगि ईहा ऊहा सुहेला ॥
साधसंगि बिछुरत हरि मेला ॥
जो इछै सोई फलु पावै ॥
साध कै संगि न बिरथा जावै ॥
पारब्रहमु साध रिद बसै ॥
नानक उधरै साध सुनि रसै ॥६॥

38
साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥
साधसंगि हरि के गुन गाउ ॥
साध कै संगि न मन ते बिसरै ॥
साधसंगि सरपर निसतरै ॥
साध कै संगि लगै प्रभु मीठा ॥
साधू कै संगि घटि घटि डीठा ॥
साधसंगि भए आगिआकारी ॥
साधसंगि गति भई हमारी ॥
साध कै संगि मिटे सभि रोग ॥
नानक साध भेटे संजोग ॥७॥
साध की महिमा बेद न जानहि ॥
जेता सुनहि तेता बखिआनहि ॥
साध की उपमा तिहु गुण ते दूरि ॥
साध की उपमा रही भरपूरि ॥
साध की सोभा का नाही अंत ॥
साध की सोभा सदा बेअंत ॥

२. अष्टपदी ५-८: कृतघ्नता त्याग, सन्त व ब्रह्मज्ञानी

39
साध की सोभा ऊच ते ऊची ॥
साध की सोभा मूच ते मूची ॥
साध की सोभा साध बनि आई ॥
नानक साध प्रभ भेदु न भाई ॥८॥७॥
सलोकु ॥
मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥
अवरु न पेखै एकसु बिनु कोइ ॥
नानक इह लछण ब्रहम गिआनी होइ ॥१॥
असटपदी ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥
जैसे जल महि कमल अलेप ॥
ब्रहम गिआनी सदा निरदोख ॥
जैसे सूरु सरब कउ सोख ॥
ब्रहम गिआनी कै दृसटि समानि ॥
जैसे राज रंक कउ लागै तुलि पवान ॥
ब्रहम गिआनी कै धीरजु इक ॥

40
जिउ बसुधा कोऊ खोदै कोऊ चंदन लेप ॥
ब्रहम गिआनी का इहै गुनाउ ॥
नानक जिउ पावक का सहज सुभाउ ॥१॥
ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥
जैसे मैलु न लागै जला ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि होइ प्रगासु ॥
जैसे धर ऊपरि आकासु ॥
ब्रहम गिआनी कै मित्र सत्रु समानि ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही अभिमान ॥
ब्रहम गिआनी ऊच ते ऊचा ॥
मनि अपनै है सभ ते नीचा ॥
ब्रहम गिआनी से जन भइ ॥
नानक जिन प्रभु आपि करेइ ॥२॥
ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥
आतम रसु ब्रहम गिआनी चीना ॥
ब्रहम गिआनी की सभ ऊपरि मइआ ॥