सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)
Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary
श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा
प्रस्तावना एवं सुखमनी मंगलाचरण
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गउड़ी सुखमनी मः ५ ॥
सलोकु ॥
१ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदि गुरए नमह ॥
जुगादि गुरए नमह ॥
सतिगुरए नमह ॥
स्री गुरदेवए नमह ॥१॥
असटपदी ॥
सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥
कलि कलेस तन माहि मिटावउ ॥
सिमरउ जासु बिसुंभर एकै ॥
नामु जपत अगनत अनेकै ॥
बेद पुरान सिंमृति सुधाख्यर ॥
कीने राम नाम एक आख्यर ॥
किनका एक जिसु जीअ बसावै ॥
ता की महिमा गनी न आवै ॥
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काँखी डैकै दरस तुहारो ॥
नानक उन संगि मोहि उधारो ॥१॥
सुखमनी सुख अंमृत प्रभ नामु ॥
भगत जना कै मनि बिस्राम ॥ रहाउ ॥
प्रभ कै सिमरनि गरभि न बसै ॥
प्रभ कै सिमरनि दूखु जमु नसै ॥
प्रभ कै सिमरनि कालु परहरै ॥
प्रभ कै सिमरनि दुसमनु टरै ॥
प्रभ सिमरत कछु बिघनु न लागै ॥
प्रभ कै सिमरनि अनदिनु जागै ॥
प्रभ कै सिमरनि भउ न बिआपै ॥
प्रभ कै सिमरनि दुखु न संतापै ॥
प्रभ का सिमरनु साध कै संगि ॥
सरब निधान नानक हरि रंगि ॥२॥
प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि ॥
प्रभ कै सिमरनि गिआनु धिआनु ततु बुधि ॥
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प्रभ कै सिमरनि जप तप पूजा ॥
प्रभ कै सिमरनि बिनसै दूजा ॥
प्रभ कै सिमरनि तीरथ इसनानी ॥
प्रभ कै सिमरनि दरगह मानी ॥
प्रभ कै सिमरनि होइ सु भला ॥
प्रभ कै सिमरनि सुफल फला ॥
से सिमरहि जिन आपि सिमराए ॥
नानक ता कै लागउ पाए ॥३॥
प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥
प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥
प्रभ कै सिमरनि तृसना बुझै ॥
प्रभ कै सिमरनि सभु किछु सुझै ॥
प्रभ कै सिमरनि नाही जम त्रासा ॥
प्रभ कै सिमरनि पूरन आसा ॥
प्रभ कै सिमरनि मन की मलु जाइ ॥
अमृत नामु रिद माहि समाइ ॥
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प्रभ जी बसहि साध की रसना ॥
नानक जन का दासनि दसना ॥४॥
प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥
प्रभ कउ सिमरहि से पतिवंते ॥
प्रभ कउ सिमरहि से जन परवान ॥
प्रभ कउ सिमरहि से पुरख प्रधान ॥
प्रभ कउ सिमरहि सि बेमुहताजे ॥
प्रभ कउ सिमरहि सि सरब के राजे ॥
प्रभ कउ सिमरहि से सुखवासी ॥
प्रभ कउ सिमरहि सदा अबिनासी ॥
सिमरन ते लागे जिन आपि दइिआला ॥
नानक जन की मंगै रवाला ॥५॥
प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन सद बलिहारी ॥
प्रभ कउ सिमरहि से मुख सुहावे ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन सूखि बिहावै ॥
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प्रभ कउ सिमरहि तिन आतमु जीता ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन निरमल रीता ॥
प्रभ कउ सिमरहि तिन अनद घनेरे ॥
प्रभ कउ सिमरहि बसहि हरि नेरे ॥
संत कृपा ते अनदिनु जागि ॥
नानक सिमरनु पूरै भागि ॥६॥
प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥
प्रभ कै सिमरनि कबहु न झूरे ॥
प्रभ कै सिमरनि हरि गुन बानी ॥
प्रभ कै सिमरनि सहजि समानी ॥
प्रभ कै सिमरनि निहचल आसनु ॥
प्रभ कै सिमरनि कमल बिगासनु ॥
प्रभ कै सिमरनि अनहद झुनकार ॥
सुखु प्रभ सिमरन का अंतु न पार ॥
सिमरहि से जन जिन कउ प्रभ मइआ ॥
नानक तिन जन सरनी पड़िआ ॥७॥
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हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥
हरि सिमरनि लगि बेद उपाए ॥
हरि सिमरनि भए सिध जती दाते ॥
हरि सिमरनि नीच चहु कुंट जाते ॥
हरि सिमरनि धारी सभ धरना ॥
सिमरि सिमरि हरि कारन करना ॥
हरि सिमरनि कीए सगल अकारा ॥
हरि सिमरन महि आपि निरंकारा ॥
करि किरपा जिसु आपि बुझाइआ ॥
नानक गुरमुखि हरि सिमरनु तिनि पाइआ
॥८॥१॥
सलोकु ॥
दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ
अनाथ ॥
सरणि तुमारी आइइए नानक के प्रभ साथ
॥१॥
7
असटपदी ॥
जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥
मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई ॥
जह महा भइआन दूत जम दलै ॥
तह केवल नामु संगि तेरै चलै ॥
जह मुसकल होवै अति भारी ॥
हरि को नामु खिन माहि उधारी ॥
अनिक पुनहचरन करत नही तरै ॥
हरि को नामु कोटि पाप परहरै ॥
गुरमुखि नामु जपहु मन मेरे ॥
नानक पावहु सूख घनेरे ॥१॥
सगल सृसटि को राजा दुखीआ ॥
हरि का नामु जपत होइ सुखीआ ॥
लाख करोरी बंधु न परै ॥
हरि का नामु जपत निसतरै ॥
अनिक माइआ रंग तिख न बुझावै ॥
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हरि का नामु जपत आघावै ॥
जिह मारगि इहु जात इकेला ॥
तह हरि नामु संगि होत सुहेला ॥
ऐसा नामु मन सदा धिआईऐ ॥
नानक गुरमुखि परम गति पाईऐ ॥२॥
छूटत नही कोटि लख बाही ॥
नामु जपत तह पारि पराही ॥
अनिक बिघन जह आइ संघारै ॥
हरि का नामु ततकाल उधारै ॥
अनिक जोनि जनमै मरि जाम ॥
नामु जपत पावै बिस्राम ॥
हउ मैला मलु कबहु न धोवै ॥
हरि का नामु कोटि पाप खोवै ॥
ऐसा नामु जपहु मन रंगि ॥
नानक पाईऐ साध कै संगि ॥३॥
जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥
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हरि का नामु ऊहा संगि तोसा ॥
जिह पैडै महा अंध गुबारा ॥
हरि का नामु संगि उजीआरा ॥
जहा पंथि तेरा को न सिञानू ॥
हरि का नामु तह नालि पछानू ॥
जह महा भइिआन तपति बहु घाम ॥
तह हरि के नाम की तुम ऊपरि छाम ॥
जहा तृखा मन तुझु आकरखै ॥
तह नानक हरि हरि अंमृतु बरखै ॥४॥
भगत जना की बरतनि नामु ॥
संत जना कै मनि बिस्रामु ॥
हरि का नामु दास की एट ॥
हरि कै नामि उधरे जन कोटि ॥
हरि जसु करत संत दिनु राति ॥
हरि हरि अउखधु साध कमाति ॥
हरि जन कै हरि नामु निधानु ॥
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पारब्रहमि जन कीनो दान ॥
मन तन रंगि रते रंग इेकै ॥
नानक जन कै बिरति बिबेकै ॥५॥
हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥
हरि कै नामि जन कउ तृपति भुगति ॥
हरि का नामु जन का रूप रंगु ॥
हरि नामु जपत कब परै न भंगु ॥
हरि का नामु जन की वडिआई ॥
हरि कै नामि जन सोभा पाई ॥
हरि का नामु जन कउ भोग जोग ॥
हरि नामु जपत कछु नाहि बिएगु ॥
जनु राता हरि नाम की सेवा ॥
नानक पूजै हरि हरि देवा ॥६॥
हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥
हरि धनु जन कउ आपि प्रभि दीना ॥
हरि हरि जन कै एट सताणी ॥
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हरि प्रतापि जन अवर न जाणी ॥
एति पोति जन हरि रसि राते ॥
सुन्न समाधि नाम रस माते ॥
आठ पहर जनु हरि हरि जपै ॥
हरि का भगतु प्रगट नही छपै ॥
हरि की भगति मुकति बहु करे ॥
नानक जन संगि केते तरे ॥७॥
पारजातु इहु हरि को नाम ॥
कामधेन हरि हरि गुण गाम ॥
सभ ते ऊतम हरि की कथा ॥
नामु सुनत दरद दुख लथा ॥
नाम की महिमा संत रिद वसै ॥
संत प्रतापि दुरतु सभु नसै ॥
संत का संगु वडभागी पाईऐ ॥
संत की सेवा नामु धिआईऐ ॥
नाम तुलि कछु अवरु न होइ ॥
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नानक गुरमुखि नामु पावै जनु कोड़ि
॥८॥२॥
सलोकु ॥
बहु सासत्र बहु सिमृती पेखे सरब ढढोलि
॥
पूजसि नाही हरि हरे नानक नाम अमोल
॥१॥
असटपदी ॥
जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥
खट सासत्र सिमृति वखिआन ॥
जोग अभिआस करम ध्रम किरिआ ॥
सगल तिआगि बन मधे फिरिआ ॥
अनिक प्रकार कीड़े बहु जतना ॥
पुन्न दान होमे बहु रतना ॥
सरीरु कटाड़ि होमै करि राती ॥
वरत नेम करै बहु भाती ॥
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नही तुलि राम नाम बीचार ॥
नानक गुरमुखि नामु जपीऐ इक बार ॥१॥
नउ खंड पृथमी फिरै चिरु जीवै ॥
महा उदासु तपीसरु थीवै ॥
अगनि माहि होमत परान ॥
कनिक अस्व हैवर भूमि दान ॥
निउली करम करै बहु आसन ॥
जैन मारग संजम अति साधन ॥
निमख निमख करि सरीरु कटावै ॥
तउ भी हउमै मैलु न जावै ॥
हरि के नाम समसरि कछु नाहि ॥
नानक गुरमुखि नामु जपत गति पाहि ॥२॥
मन कामना तीरथ देह छुटै ॥
गरबु गुमानु न मन ते हुटै ॥
सोच करै दिनसु अरु राति ॥
मन की मैलु न तन ते जाति ॥
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इसु देही कउ बहु साधना करै ॥
मन ते कबहू न बिखिआ टरै ॥
जलि धोवै बहु देह अनीति ॥
सुध कहा होइ काची भीति ॥
मन हरि के नाम की महिमा ऊच ॥
नानक नामि उधरे पतित बहु मूच ॥३॥
बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥
अनिक जतन करि तृसन ना ध्रापै ॥
भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥
कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥
छूटसि नाही ऊभ पइआलि ॥
मोहि बिआपहि माइआ जालि ॥
अवर करतूति सगली जमु डानै ॥
गोविंद भजन बिनु तिलु नही मानै ॥
हरि का नामु जपत दुखु जाइ ॥
नानक बोलै सहजि सुभाइ ॥४॥
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चारि पदारथ जे को मागै ॥
साध जना की सेवा लागै ॥
जे को आपुना दूखु मिटावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद गावै ॥
जे को अपुनी सोभा लोरै ॥
साधसंगि इह हउमै छोरै ॥
जे को जनम मरण ते डरै ॥
साध जना की सरनी परै ॥
जिसु जन कउ प्रभ दरस पिआसा ॥
नानक ता कै बलि बलि जासा ॥५॥
सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥
साधसंगि जा का मिटै अभिमानु ॥
आपस कउ जो जाणै नीचा ॥
सोऊ गनीऐ सभ ते ऊचा ॥
जा का मनु होइ सगल की रीना ॥
हरि हरि नामु तिनि घटि घटि चीना ॥
१. अष्टपदी १-४: नाम सिमरन, प्रभु शरण व मुक्ति
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मन अपने ते बुरा मिटाना ॥
पेखै सगल सृसटि साजना ॥
सूख दूख जन सम दृसटेता ॥
नानक पाप पुन्न नही लेपा ॥६॥
निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥
निथावे कउ नाउ तेरा थाउ ॥
निमाने कउ प्रभ तेरो मानु ॥
सगल घटा कउ देवहु दानु ॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
अपनी गति मिति जानहु आपे ॥
आपन संगि आपि प्रभ राते ॥
तुम्री उसतति तुम ते होइ ॥
नानक अवरु न जानसि कोइ ॥७॥
सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥
हरि को नामु जपि निरमल करमु ॥
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सगल क्रिआ महि ऊतम किरिआ ॥
साधसंगि दुरमति मलु हिरिआ ॥
सगल उदम महि उदमु भला ॥
हरि का नामु जपहु जीअ सदा ॥
सगल बानी महि अंमृत बानी ॥
हरि को जसु सुनि रसन बखानी ॥
सगल थान ते एहु ऊतम थानु ॥
नानक जिह घटि वसै हरि नामु ॥८॥३॥
सलोकु ॥
निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा
समालि ॥
जिनि कीआ तिसु चीति रखु नानक निबही
नालि ॥१॥
असटपदी ॥
रमईआ के गुन चेति परानी ॥
कवन मूल ते कवन द्रिसटानी ॥
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जिनि तूं साजि सवारि सीगारिआ ॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
बार बिवसथा तुझहि पिआरै दूध ॥
भरि जोबन भोजन सुख सूध ॥
बिरधि भइआ ऊपरि साक सैन ॥
मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥
इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥
बखसि लेहु तउ नानक सीझै ॥१॥
जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥
सुत भ्रात मीत बनिता संगि हसहि ॥
जिह प्रसादि पीवहि सीतल जला ॥
सुखदाई पवनु पावकु अमुला ॥
जिह प्रसादि भोगहि सभि रसा ॥
सगल समग्री संगि साथि बसा ॥
दीने हसत पाव करन नेत्र रसना ॥
तिसहि तिआगि अवर संगि रचना ॥
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ऐसे दोख मूड़ अंध बिआपे ॥
नानक काढि लेहु प्रभ आपे ॥२॥
आदि अंति जो राखनहारु ॥
तिस सिउ प्रीति न करै गवारु ॥
जा की सेवा नव निधि पावै ॥
ता सिउ मूड़ा मनु नही लावै ॥
जो ठाकुरु सद सदा हजूरे ॥
ता कउ अंधा जानत दूरे ॥
जा की टहल पावै दरगह मानु ॥
तिसहि बिसारै मुगधु अजानु ॥
सदा सदा इहु भूलनहारु ॥
नानक राखनहारु अपारु ॥३॥
रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥
साचु छोडि झूठ संगि मचै ॥
जो छडना सु असथिरु करि मानै ॥
जो होवनु सो दूरि परानै ॥
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छोडि जाइ तिस का स्रमु करै ॥
संगि सहाई तिसु परहरै ॥
चंदन लेपु उतारै धोइ ॥
गरधब प्रीति भसम संगि होइ ॥
अंध कूप महि पतित बिकराल ॥
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल ॥४॥
करतूति पसू की मानस जाति ॥
लोक पचारा करै दिनु राति ॥
बाहरि भेख अंतरि मलु माइआ ॥
छपसि नाहि कछु करै छपाइआ ॥
बाहरि गिआन धिआन इसनान ॥
अंतरि बिआपै लोभु सुआनु ॥
अंतरि अगनि बाहरि तनु सुआह ॥
गलि पाथर कैसे तरै अथाह ॥
जा कै अंतरि बसै प्रभु आपि ॥
नानक ते जन सहजि समाति ॥५॥