सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)
Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary
श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा
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ब्रहम गिआनी ते कछु बुरा न भइआ ॥
ब्रहम गिआनी सदा समदरसी ॥
ब्रहम गिआनी की द्रसटि अंमृतु बरसी ॥
ब्रहम गिआनी बंधन ते मुकता ॥
ब्रहम गिआनी की निरमल जुगता ॥
ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन ॥
नानक ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआनु
॥३॥
ब्रहम गिआनी ऐक ऊपरि आस ॥
ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥
ब्रहम गिआनी कै गरीबी समाहा ॥
ब्रहम गिआनी परउपकार उमाहा ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही धंधा ॥
ब्रहम गिआनी ले धावतु बंधा ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ सु भला ॥
ब्रहम गिआनी सुफल फला ॥
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ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु
॥४॥
ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥
ब्रहम गिआनी कै बसै प्रभु संग ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु आधारु ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु ॥
ब्रहम गिआनी सदा सद जागत ॥
ब्रहम गिआनी अह्मबुधि तिआगत ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि परमानन्द ॥
ब्रहम गिआनी कै घरि सदा अन्नद ॥
ब्रहम गिआनी सुख सहज निवास ॥
नानक ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥५॥
ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥
ब्रहम गिआनी एक संगि हेता ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ अचिंत ॥
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ब्रहम गिआनी का निरमल मंत ॥
ब्रहम गिआनी जिसु करै प्रभु आपि ॥
ब्रहम गिआनी का बड परताप ॥
ब्रहम गिआनी का दरसु बडभागी पाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ बलि बलि जाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर ॥
नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर ॥६॥
ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥
ब्रहम गिआनी कै सगल मन माहि ॥
ब्रहम गिआनी का कउन जानै भेदु ॥
ब्रहम गिआनी कउ सदा अदेसु ॥
ब्रहम गिआनी का कथिआ न जाइ
अधाख्यरु ॥
ब्रहम गिआनी सरब का ठाकुरु ॥
ब्रहम गिआनी की मिति कउनु बखानै ॥
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ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै
॥
ब्रहम गिआनी का अंतु न पारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी कउ सदा नमसकारु
॥७॥
ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥
ब्रहम गिआनी सद जीवै नही मरता ॥
ब्रहम गिआनी मुकति जुगति जीअ का दाता
॥
ब्रहम गिआनी पूरन पुरखु बिधाता ॥
ब्रहम गिआनी अनाथ का नाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सभ ऊपरि हाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सगल अकारु ॥
ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥
ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी
॥
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नानक ब्रहम गिआनी सरब का धनी
॥८॥८॥
सलोकु ॥
उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सरब मै पेखै भगवानु ॥
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥
नानक एहु अपरसु सगल निसतारै ॥१॥
असटपदी ॥
मिथिआ नाही रसना परस ॥
मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥
पर तृअ रूपु न पेखै नेत्र ॥
साध की टहल संतसंगि हेत ॥
करन न सुनै काहू की निंदा ॥
सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥
मन की बासना मन ते टरै ॥
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इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥
नानक कोटि मधे को ऐसा अपरसि ॥१॥
बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसन्न ॥
बिसन की माइआ ते होइ भिन्न ॥
करम करत होवै निहकरम ॥
तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
काहू फल की इछा नही बाछै ॥
केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
आपि दृढ़ै अवरह नामु जपावै ॥
नानक एहु बैसनो परम गति पावै ॥२॥
भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥
सगल तिआगै दुस्ट का संगु ॥
मन ते बिनसै सगला भरमु ॥
करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
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साधसंगि पापा मलु खोवै ॥
तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥
भगवंत की टहल करै नित नीति ॥
मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
हरि के चरन हिरदै बसावै ॥
नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै
॥३॥
सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥
राम नामु आतम महि सोधै ॥
राम नाम सारु रसु पीवै ॥
उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
हरि की कथा हिरदै बसावै ॥
सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥
सूखम महि जानै असथूलु ॥
चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥
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नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥४॥
बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥
चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥
जो जो जपै तिस की गति होइ ॥
साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
करि किरपा अंतरि उर धारै ॥
पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥
सरब रोग का अउखदु नामु ॥
कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥
नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि
॥५॥
जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥
तिस का नामु सति रामदासु ॥
आतम रामु तिसु नदरी आइआ ॥
दास दसंतण भाइ तिनि पाइआ ॥
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सदा निकटि निकटि हरि जानु ॥
सो दासु दरगह परवानु ॥
अपुने दास कउ आपि किरपा करै ॥
तिसु दास कउ सभ सोझी परै ॥
सगल संगि आतम उदासु ॥
ऐसी जुगति नानक रामदासु ॥६॥
प्रभ की आगिआ आतम हितावै ॥
जीवन मुकति सोऊ कहावै ॥
तैसा हरखु तैसा उसु सोगु ॥
सदा अन्नदु तह नही बिओगु ॥
तैसा सुवरनु तैसी उसु माटी ॥
तैसा अंमृतु तैसी बिखु खाटी ॥
तैसा मानु तैसा अभिमानु ॥
तैसा रंकु तैसा राजानु ॥
जो वरताइे साई जुगति ॥
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नानक एहु पुरखु कहीऐ जीवन मुकति
॥७॥
पारब्रहम के सगले ठाउ ॥
जितु जितु घरि राखै तैसा तिन नाउ ॥
आपे करन करावन जोगु ॥
प्रभ भावै सोई फुनि होगु ॥
पसरिए आपि होइ अनत तरंग ॥
लखे न जाहि पारब्रहम के रंग ॥
जैसी मति देइ तैसा परगास ॥
पारब्रहमु करता अबिनास ॥
सदा सदा सदा दइआल ॥
सिमरि सिमरि नानक भड़े निहाल ॥८॥६॥
सलोकु ॥
उसतति करहि अनेक जन अंतु न पारावार
॥
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नानक रचना प्रभि रची बहु बिधि अनिक
प्रकार ॥१॥
असटपदी ॥
कई कोटि होइ पूजारी ॥
कई कोटि आचार बिउहारी ॥
कई कोटि भइ तीरथ वासी ॥
कई कोटि बन भ्रमहि उदासी ॥
कई कोटि बेद के स्रोते ॥
कई कोटि तपीसुर होते ॥
कई कोटि आतम धिआनु धारहि ॥
कई कोटि कबि काबि बीचारहि ॥
कई कोटि नवतन नाम धिआवहि ॥
नानक करते का अंतु न पावहि ॥१॥
कई कोटि भइ अभिमानी ॥
कई कोटि अंध अगिआनी ॥
कई कोटि किरपन कठोर ॥
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कई कोटि अभिग आतम निकोर ॥
कई कोटि पर दरब कउ हिरहि ॥
कई कोटि पर दूखना करहि ॥
कई कोटि माइआ स्रम माहि ॥
कई कोटि परदेस भ्रमाहि ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥
नानक करते की जानै करता रचना ॥२॥
कई कोटि सिध जती जोगी ॥
कई कोटि राजे रस भोगी ॥
कई कोटि पंखी सरप उपाड़े ॥
कई कोटि पाथर बिरख निपजाड़े ॥
कई कोटि पवण पाणी बैसंतर ॥
कई कोटि देस भू मंडल ॥
कई कोटि ससीअर सूर नख्यत्र ॥
कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥
सगल सामग्री अपनै सूति धारै ॥
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नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै
॥३॥
कई कोटि राजस तामस सातक ॥
कई कोटि बेद पुरान सिमृति अरु सासत ॥
कई कोटि कीड़े रतन समुद ॥
कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
कई कोटि कीड़े चिर जीवे ॥
कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
कई कोटि जख्य किन्नर पिसाच ॥
कई कोटि भूत प्रेत सूकर मृगाच ॥
सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥
नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥४॥
कई कोटि पाताल के वासी ॥
कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥
कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
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कई कोटि बैठत ही खाहि ॥
कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
कई कोटि कीइ धनवंत ॥
कई कोटि माइआ महि चिंत ॥
जह जह भाणा तह तह राखे ॥
नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥५॥
कई कोटि भइ बैरागी ॥
राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥
आतम महि पारब्रहमु लहंते ॥
कई कोटि दरसन प्रभ पिआस ॥
तिन कउ मिलिए प्रभु अबिनास ॥
कई कोटि मागहि सतसंगु ॥
पारब्रहम तिन लागा रंगु ॥
जिन कउ होइ आपि सुप्रसन्न ॥
नानक ते जन सदा धनि धंनि ॥६॥
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कई कोटि खाणी अरु खंड ॥
कई कोटि अकास ब्रहमंड ॥
कई कोटि होइ अवतार ॥
कई जुगति कीनो बिसथार ॥
कई बार पसरिए पासार ॥
सदा सदा इकु इेकंकार ॥
कई कोटि कीने बहु भाति ॥
प्रभ ते होइ प्रभ माहि समाति ॥
ता का अंतु न जानै कोइ ॥
आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥७॥
कई कोटि पारब्रहम के दास ॥
तिन होवत आतम परगास ॥
कई कोटि तत के बेते ॥
सदा निहारहि इेको नेत्रे ॥
कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥
अमर भइे सद सद ही जीवहि ॥
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कई कोटि नाम गुन गावहि ॥
आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥
नानक एइ परमेसुर के पिआरे ॥८॥१०॥
सलोकु ॥
करण कारण प्रभु इकु है दूसर नाही कोइ
॥
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि
सोइ ॥१॥
असटपदी ॥
करन करावन करनै जोगु ॥
जो तिसु भावै सोई होगु ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
अंतु नही किछु पारावारा ॥
हुकमे धारि अधर रहावै ॥
हुकमे उपजै हुकमि समावै ॥
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हुकमे ऊच नीच बिउहार ॥
हुकमे अनिक रंग परकार ॥
करि करि देखै अपनी वडिआई ॥
नानक सभ महि रहिआ समाई ॥१॥
प्रभ भावै मानुख गति पावै ॥
प्रभ भावै ता पाथर तरावै ॥
प्रभ भावै बिनु सास ते राखै ॥
प्रभ भावै ता हरि गुण भाखै ॥
प्रभ भावै ता पतित उधारै ॥
आपि करै आपन बीचारै ॥
दुहा सिरिआ का आपि सुआमी ॥
खेलै बिगसै अंतरजामी ॥
जो भावै सो कार करावै ॥
नानक दृसटी अवरु न आवै ॥२॥
कहु मानुख ते किआ होइ आवै ॥
जो तिसु भावै सोई करावै ॥
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इस कै हाथि होइ ता सभु किछु लेइ ॥
जो तिसु भावै सोई करेइ ॥
अनजानत बिखिआ महि रचै ॥
जे जानत आपन आप बचै ॥
भरमे भूला दह दिसि धावै ॥
निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै ॥
करि किरपा जिसु अपनी भगति देइ ॥
नानक ते जन नामि मिलेइ ॥३॥
खिन महि नीच कीट कउ राज ॥
पारब्रहम गरीब निवाज ॥
जा का द्रसटि कछू न आवै ॥
तिसु ततकाल दह दिस प्रगटावै ॥
जा कउ अपुनी करै बखसीस ॥
ता का लेखा न गनै जगदीस ॥
जीउ पिंडु सभ तिस की रासि ॥
घटि घटि पूरन ब्रहम प्रगास ॥
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अपनी बणत आपि बनाई ॥
नानक जीवै देखि बडाई ॥४॥
इस का बलु नाही इसु हाथ ॥
करन करावन सरब को नाथ ॥
आगिआकारी बपुरा जीउ ॥
जो तिसु भावै सोई फुनि थीउ ॥
कबहू ऊच नीच महि बसै ॥
कबहू सोग हरख रंगि हसै ॥
कबहू निंद चिंद बिउहार ॥
कबहू ऊभ अकास पइिआल ॥
कबहू बेता ब्रहम बीचार ॥
नानक आपि मिलावणहार ॥५॥
कबहू निरति करै बहु भाति ॥
कबहू सोइ रहै दिनु राति ॥
कबहू महा क्रोध बिकराल ॥
कबहूं सरब की होत रवाल ॥
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कबहू होइ बहै बड राजा ॥
कबहु भेखारी नीच का साजा ॥
कबहू अपकीरति महि आवै ॥
कबहू भला भला कहावै ॥
जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै ॥
गुर प्रसादि नानक सचु कहै ॥६॥
कबहू होइ पंडितु करे बख्यानु ॥
कबहू मोनिधारी लावै धिआनु ॥
कबहू तट तीरथ इसनान ॥
कबहू सिध साधिक मुखि गिआन ॥
कबहू कीट हसति पतंग होइ जीआ ॥
अनिक जोनि भरमै भरमीआ ॥
नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै ॥
जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥
जो तिसु भावै सोई होइ ॥
नानक दूजा अवरु न कोइ ॥७॥