श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 2/89-94 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা
अनुवाद—मैंने शेषलीलाका सूत्ररूपमें कुछ वर्णन
किया है और अब मेरी यह इच्छा है कि मैं विस्तारसे
इसका वर्णन करूँ। यदि मेरा जीवन रहा और मेरे
सौभाग्यसे महाप्रभुकी कृपा हुई, तो मैं शेष लीलाको
विस्तारसे कहूँगा॥89॥
ग्रन्थकारका अपनी अयोग्यता और दैन्य ज्ञापन :-
आमि वृद्ध जरा Provideतुर, लिखते काँपये कर,
मने किछु स्मरण ना हय।
ना देखिये नयने, ना शुनिये श्रवणे,
तबु लिखि-ए बड़ विस्मय॥90॥
अनुवाद—मैं वृद्ध हो गया हूँ और चलने-फिरनेमें
असमर्थ हूँ। जब मैं लिखता हूँ, तो मेरे हाथ काँपते
हैं। मुझे कुछ स्मरण भी नहीं रहता है और न ही
मैं ठीकसे देख और सुन पाता हूँ। तो भी मैं लिख
रहा हूँ, यह बहुत बड़ा आश्चर्य है॥90॥
महाप्रभुकी दिव्योन्मादात्मक अन्त्यलीला ही
गौरभक्तोंके लिये नित्य आलोच्य :-
एइ अन्त्यलीला-सार, सूत्रमध्ये विस्तार,
करि’ किछु करिलुँ वर्णन।
इहा-मध्ये मरि यबे, वर्णिते ना पारि तबे,
एइ लीला भक्तगण-धन॥91॥
अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाके सारका
सूत्रोंके मध्य कुछ विस्तार करके वर्णन किया है। यदि
मैं इसे विस्तार करते हुए बीचमें ही देह त्याग दूँगा,
तो भी सूत्ररूपमें यह लीला भक्तोंके लिये दिव्य निधि
होगी॥91॥
अभी संक्षेपमें और बादमें विस्तारकी इच्छा :-
संक्षेपे एइ सूत्र कैल, येइ इँहा ना लिखिल,
आगे ताहा करिब विचार।
यदि तत दिन जिये, महाप्रभुर कृपा हये,
इच्छा भरि’ करिब विस्तार॥92॥
अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें
कहा है। इस लीलाके विषयमें जो कुछ मैंने नहीं कहा
है, आगे उसपर विचार करके लिखूँगा। यदि महाप्रभुकी
कृपासे मैं उतने दिनों तक जीवित रहूँगा, तो मन भरके
इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥92॥
भक्तों की वन्दना और श्रौतपन्थामें अवस्थान :-
छोट बड़ भक्तगण, वन्दों सबार-चरण,
सबे मोरे करह सन्तोष।
स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत,
ताइ लिखि, नाहि मोर दोष॥93॥
अनुवाद—मैं कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम भक्त,
सभीके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ कि वे मुझसे
सन्तुष्ट हों। मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे
श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा,
उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार
कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई
दोष नहीं है॥93॥
अनुभाष्य—‘भजनविज्ञ’ (भजनमें दक्ष), ‘भजनशील’
और ‘कृष्णनाममें दीक्षित कृष्णनामकारी’—ये तीन प्रकारके
छोटे-बड़े भक्त हैं, सभी मुझपर कृपा करें। कनिष्ठ
भक्तोंकी तर्क करनेमें रुचि होती है। वे सिद्धान्त नहीं
जानते हैं, परन्तु अपनेको रसिकभक्त मानते हैं। मैंने
लीलाके साथ सिद्धान्तको भी लिखा है, परन्तु कहीं ये
कनिष्ठ भक्त इसे मेरा पाण्डित्य, भक्तिहीनता और
कुतर्कमें निष्ठाका फल मानकर मुझे दोषी समझकर
मुझपर कृपा न करें, इस आशङ्कासे मैं विनीत-भावसे
निवेदन कर रहा हूँ कि मैं इस विषयमें स्वतन्त्र नहीं
हूँ। मैं जिनके चरणकमलोंमें बिका हुआ हूँ, उन
श्रीरूप-रघुनाथ-श्रीदामोदरस्वरूपसे जो श्रीगौरलीला-तत्त्व
मैंने जाना है, उसीको मैंने लिखा है॥93॥
पञ्चतत्त्व, गुरुवर्ग और हरिदास-पण्डितकी वन्दना :-
श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्तवृन्द,
शिरे धरि सबार चरण।
78
दूसरा अध्याय 2/94-95 ]
स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण,
धूलि करों मस्तके भूषण ॥ 94 ॥
पाञा याँर आज्ञाधन, व्रजेर वैष्णवगण,
वन्दों ताँर मुख्य हरिदास।
चैतन्यविलास-सिन्धु- कल्लोलेर एक बिन्दु,
तार कणा कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥
गोस्वामी आदि भक्तोंके श्रीचरणोंकी धूलिको अपने
मस्तकका भूषण बनाना चाहता हूँ। इस प्रकार मैं
उनकी कृपाकी वाञ्छा करता हूँ। इन सभीकी और
व्रजके सभी वैष्णवों, विशेषकर श्रीहरिदास पण्डित
(श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी) की आज्ञा पाकर मैं,
कृष्णदास, श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला-विलासके समुद्रकी
लहरकी एक बिन्दुके एक कणको कह रहा हूँ॥ 94-95 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अन्त्यलीला सूत्रकथने
प्रेमोन्माद-प्रलापवर्णनं नाम द्वितीय-परिच्छेदः।
श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीलामें अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें
प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद
समाप्त।
अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु
और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके चरणकमलोंको अपने शीशपर
धारण करनेकी अभिलाषा करता हूँ। मैं श्रीस्वरूप
दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ
अनुभाष्य—आदिलीला 8/49-60 संख्या देखें ॥ 95 ॥
दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
। 79
तीसरा अध्याय
कथासार-कटोया-ग्राममें संन्यास ग्रहणके बाद तीन
दिनोंतक राढ़देशमें भ्रमण करते-करते महाप्रभुका
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चतुराईसे शान्तिपुरके पश्चिम पारमें
आगमन हुआ। महाप्रभुने गङ्गाको यमुना समझकर
उनकी स्तव-स्तुति की। उसके बाद श्रीअद्वैतप्रभु नौका
लेकर आये और महाप्रभुको स्नान करवाकर उन्हें
अपने घर ले आये। वहाँपर नवद्वीप धामवासियों और
श्रीशचीमाताके साथ महाप्रभुका मिलन हुआ। उनके
साथ मिलनेके बाद शचीमाताने भोजन बनाया। जब
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु भोजन कर रहे थे, तब
श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ श्रीअद्वैतप्रभुका नाना प्रकारसे
कौतुक हुआ। दोपहरके बाद भक्त समुदायके साथ
सङ्कीर्तन होने लगा। इस प्रकार वहाँ कुछ दिन बीतनेके
बाद भक्तोंनें शचीमाताके साथ परामर्श करके महाप्रभुसे
नीलाचलमें रहनेका अनुरोध किया। महाप्रभुने उसे
स्वीकार करके श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीजगदानन्द
पण्डित और श्रीदामोदर पण्डितको साथ लिया तथा
शान्तिपुरके भक्तों और शचीमातासे विदायी लेकर
छत्रभोग मार्गसे श्रीपुरुषोत्तमकी यात्रा की।
-(अमृतप्रवाहभाष्य)
संन्यास लेते ही भ्रमण करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरो
वृन्दावनं गन्तुमना भ्रमाद् यः।
राढ़े भ्रमन् शान्तिपुरीमयित्वा
ललास भक्तैरिह तं नतोऽस्मि ॥ १ ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - संन्यास ग्रहण करनेके बाद
श्रीकृष्णप्रेममें वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर भी
भ्रान्तचित्तके कारण राढ़देशमें भ्रमण करते-करते शान्तिपुर
पहुँचकर भक्तोंसे भेंट करके हर्षित हुए श्रीगौरचन्द्रको
मैं नमस्कार करता हूँ॥ १॥
अनुभाष्य-
यः गौरः (विश्वम्भरः) न्यासं (तुर्याश्रमं) विधाय
(वेदविहित-संन्यास-संस्कारादिकं गृहीत्वा) उत्प्रणयः (प्रेमाकृष्टः
सन्) वृन्दावनं गन्तुमनाः (व्रजगमनोत्सुकमानसः) भ्रमात् (प्राकृतनेत्रेषु
भ्रमं प्रदर्शनात्, प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनपदं कृष्णधाम
प्राकृतचेष्टया दुर्लभं शुद्धभजनलभ्यं चेति प्रदर्शयन्) राढ़े
(गङ्गायाः पश्चिमे राष्ट्र
(गत्वा) इह (अस्मिन् शान्तिपुर्यां) भक्तैः सह ललास, तं गौरं
नतोऽस्मि।
श्लोक भावानुवाद-जिन विश्वम्भरने वैदिक
नियमानुसार संन्यास ग्रहण किया और श्रीकृष्णप्रेममें
विह्वल होकर वृन्दावन जानेकी इच्छा की, किन्तु
प्रेमावेशमें भ्रमवश राढ़देशमें भ्रमण करते हुए शान्तिपुर
पहुँच गये और वहाँ भक्तोंसे मिलकर आनन्दित हुए,
उन श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ।
(श्रीकृष्णधामकी प्राप्ति केवल प्रेमरूपी अञ्जनसे
रञ्जित भक्तिनेत्रोंके द्वारा ही सम्भव है। प्राकृत चेष्टासे
इसका पाना अति दुर्लभ है। जड़ीय नेत्र और जड़ीय
चेष्टा केवल भ्रम ही उत्पन्न करते हैं, वास्तव वस्तुका
दर्शन नहीं, महाप्रभुकी लीला इसी सत्यको दिखानेके
लिये हुई)।
'राढ़े'-गङ्गाका पश्चिम प्रदेश ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो;
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
तथा समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥
। 81
[ 3/3-4 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चौबीस वर्षके अन्तमें महाप्रभुका संन्यास-ग्रहण :-
चब्बिश वत्सर शेष येइ माघ-मास।
तार शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास ॥ ३ ॥
अनुवाद—चौबीस वर्षके अन्तमें माघ मासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया ॥ ३ ॥
त्रिदण्डि भिक्षुकका गीत पढ़ते हुए महाप्रभुका
राढ़देशमें तीन दिन तक भ्रमण :-
संन्यास करि' प्रेमावेशे चलिला वृन्दावन।
राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥ ४ ॥
अनुवाद—संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु प्रेमके आवेशमें वृन्दावनकी ओर चले, परन्तु वे तीन दिनोंतक राढ़देशमें ही भ्रमण करते रहे ॥ ४ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'राढ़देश'—'राष्ट्र' बना है। गङ्गाके पश्चिमपार गौड़-भूमिको 'राढ़देश' कहते हैं; इसका एक नाम 'पौण्ड्र' पौण्ड्र राजधानी थी ॥ ४ ॥
अमृताणुकणा—(जावालोपनिषत्)—
“यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।”
अर्थात् 'जिस दिन कोई संसारसे विरक्त होगा, उसी दिन वह प्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करेगा।' यह बात श्रीमद्भागवत (1/13/27)में और अधिक स्पष्ट रूपसे कहा गयी है—
“यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्।
हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥”
अर्थात् “जो आत्मज्ञ-व्यक्ति अपने विवेकसे अथवा दूसरोंके उपदेशोंको सुनकर संसारको दुःखपूर्ण समझकर श्रीहरिको अपने हृदयमें धारण करके गृह त्याग करके संन्यास ग्रहण करते हैं, वे नरोत्तम (मनुष्योंमें उत्तम) हैं।” इस प्रकार शास्त्रोंमें संन्यास ग्रहण और अधिकारके विषयमें कहा गया है। पुराणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीमद्भागवत, याज्ञवल्क्य यति-प्रकरण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, हारित-संहिता, संवर्त्त-संहिता, दक्ष-संहिता, मनु-संहिता आदि विविध शास्त्रोंमें त्रिदण्ड-संन्यासकी विधिका वर्णन है। किन्तु तो भी कोई-कोई,
“अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।
देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत्॥”
—इस ब्रह्मवैवर्त्त-पुराणके वाक्यके अनुसार कहते हैं कि कलियुगमें संन्यास ग्रहण करना वर्जित है। समस्त वेद-इतिहास-पुराण जिनके श्वाससे प्रकाशित हुए हैं, उनके भी जो अंशी हैं, वे सर्वावतारी स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने कलियुगमें अवतरित होकर चतुर्थ आश्रमरूप संन्यासको ग्रहण करके महाभारतमें कहे गये विष्णुसहस्रनामके अन्तर्गत अपने 'संन्यासकृत्' नामको सार्थक किया। इसलिये उपरोक्त पुराण वाक्यका तात्पर्य अन्य प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये।
“कलियुगमें संन्यास वर्जित है, ऐसा कहनेका भाव यह है—आचार्य-शङ्करके द्वारा प्रवर्त्तित 'सोऽहं', 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि अवैध चिन्तनसे उत्पन्न एकदण्ड संन्यास कभी भी ग्रहण करनेके योग्य नहीं है; इसलिये संन्यासको निषिद्ध कहा गया है। त्रिदण्ड संन्यास ही वास्तविक सनातन चतुर्थ आश्रम है। यह सदा ही ग्रहण योग्य है, कभी भी निषिद्ध नहीं है। त्रिदण्ड-संन्यास किसी-किसी समय बाहरसे एकदण्डाकारमें भी देखा जाता है। इस श्रेणीके एकदण्डी संन्यासी महाजन 'सेव्य-सेवक-सेवा'-रूप त्रिदण्डका नित्यत्व स्वीकार करके शङ्कर-प्रवर्त्तित 'एकदण्ड'-संन्यासको सभी प्रकारसे अवैध जानकर ग्रहण करनेके अयोग्य मानते हैं। इसलिये (रघुनन्दन)-स्मार्त्ताचार्यके द्वारा संग्रहीत उक्त वचनोंके बलपर भी निवृत्तिपथके साधकोंके पक्षमें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करना ही उक्त प्रमाणका तात्पर्य है।” (—त्रिदण्डीस्वामी श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज)
श्रीचैतन्यभागवत (मध्यखण्ड 28/154-159)के पाठसे यह जाना जाता है कि श्रीगौरसुन्दरने शङ्कर-सम्प्रदायके
82 ।
तीसरा अध्याय 3/4-6 ]
एकदण्डी संन्यासी श्रीमत् केशव-भारतीसे संन्यास ग्रहणके
समय पहले श्रीकेशव-भारतीके कानमें संन्यास-मन्त्र
प्रदान करके उनको संन्यास प्रदान किया या परात्मनिष्ठामें
परिनिष्ठित किया था। उसके बाद उनसे महाप्रभुने
अपने द्वारा दिये हुए संन्यास-मन्त्रको ग्रहण किया।
“सर्व-शिक्षागुरु-गौरचन्द्र वेदे बले।
केशव-भारती-स्थाने ताहा कहे छले॥ 154॥
प्रभु कहे,-'स्वप्ने मोर कोन महाजन।
कर्णे संन्यासेर मन्त्र करिल कथन॥ 155॥
बूझ देखि ताहा तुमि हय किंवा नहे।'
एत बलि' प्रभु तार कर्णे मन्त्र कहे॥ 156॥
छले प्रभु कृपा करि' तारे शिष्य कैल।
भारतीर चित्ते महा-विस्मय जन्मिल॥ 157॥
प्रभुर आज्ञाय तबे केशव भारती।
सेइ मन्त्र प्रभुरे कहिला महामति॥” 159॥
अर्थात् “समस्त वेद श्रीगौरचन्द्रको 'सर्व-शिक्षागुरु'
कहते हैं। उन्होंने श्रीकेशव-भारतीसे छलसे कहा, - 'स्वप्नमें
किसी महाजनने मेरे कानमें यह संन्यास-मन्त्र दिया।
देखो, आप इसे समझ पाते हो अथवा नहीं।' यह
कहकर महाप्रभुने उनके कानमें मन्त्र कहा। छलसे
महाप्रभुने उनपर कृपा करके उन्हें अपना शिष्य बना
लिया। यह मन्त्र सुनकर श्रीभारतीके हृदयमें बड़ा
विस्मय हुआ और महाप्रभुकी आज्ञासे तब श्रीकेशव
भारतीने वही मन्त्र उनको प्रदान किया।”
इस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने शाङ्कर-
संन्यासको अस्वीकार करके श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्ड-
संन्यास ग्रहणका ही दृष्टान्त स्थापित किया। उन्होंने
उपरोक्त 'अश्वमेधं---' संन्यास निषेध करनेवाले पुराण-
वाक्यके तात्पर्यको प्रकाशित करते हुए शास्त्रीय
संन्यास-विधिकी परम सार्थकता स्थापित की। संन्यास
ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्डी-
भिक्षु-गीतका कीर्तन करते हुए वृन्दावनकी ओर
गमनकी लीला की। इसके द्वारा महाप्रभुने संन्यास ग्रहण
करनेके तात्पर्य और त्रिदण्ड ग्रहणकर वृन्दावनधाम
जानेकी विधिको प्रकाश किया। मनुसंहिता (12/10)—
“वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते॥”
अर्थात् “जिसकी बुद्धिमें ये तीन-वाणीपर नियन्त्रण
(वाग्दण्ड), मनपर नियन्त्रण (मनोदण्ड) और देहपर
नियन्त्रण (कायदण्ड) दृढ़तासे स्थित हैं, उसे ही
(वास्तविक) त्रिदण्डी कहा जाता है।” इसलिये वाग्दण्ड,
मनोदण्ड और कायदण्ड-ग्रहणरूप त्रिदण्ड-विचारको
अस्वीकार करनेसे जीव जिह्वा-मन-कायको अपने
नियन्त्रणमें रखनेके स्थानपर उनके अधीन रहेगा। ऐसी
अनियन्त्रित इन्द्रियाँ व्यक्तिको व्यभिचारमें प्रवृत्त होनेके
लिये बाध्य करेंगी और वह केवल मायाके चङ्गुलमें ही
फंसा रहेगा। ऐसा मायाबद्ध जीव श्रीचैतन्यदेवके द्वारा
प्रदर्शित श्रीकृष्णसे विरहका कैसे अनुभव करेगा?
अर्थात् वह विप्रलम्भात्मक (विरहमें) भजनमें कभी भी
अधिकार नहीं प्राप्त कर सकता। (आदिलीला 3/20)—
“आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे।”
अर्थात् “महाप्रभुने स्वयं आचरण करके सभीको
भक्तिकी शिक्षा दी।” सर्वलोकगुरु श्रीगौरसुन्दरकी यह
त्रिदण्डसंन्यास- ग्रहणलीला एकमात्र उत्तमा-भक्तिकी प्राप्तिके
इच्छुक साधक जीवोंके लिये एक विशेष उदाहरण
स्थापित करनेके लिये ही हुई, किन्तु कलिसे प्रभावित
जीव इसे समझ नहीं पाते॥ 4॥
एइ श्लोक पड़ि' प्रभु भावेर आवेशे।
भ्रमिते पवित्र कैल सब राढ़-देशे॥ 5॥
अनुवाद—महाप्रभुने राढ़देशमें भ्रमण करते हुए उसे
पवित्र कर दिया और भावावेशमें एक श्लोक पढ़ा॥ 5॥
श्रौतपन्था-अनुसरणसे ही त्रिदण्डिभिक्षुकी
सिद्धि-प्राप्तिकी आशा :-
(श्रीमद्भागवत 11/23/57 श्लोक)—
एतां समास्थाय परात्म-
निष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं
तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव॥ 6॥
83
[ 3/6 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अवन्तीदेशके भिक्षुक ब्राह्मणने
कहा,—“प्राचीन महात्माओंके द्वारा उपासित इस
परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं
श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर
संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा॥”६॥
अनुभाष्य—संसारमें त्रितापसे जलते हुए अवन्तीके
त्रिदण्डिभिक्षुने समस्त कायमनोवाक्यके द्वारा भगवान्के
एकान्त शरणागत होकर सेवा करनेके उद्देश्यसे यह
गीत गान किया—
पूर्वैस्तमैः (प्राचीनैः) महद्भिः (महाभागवतैः) उपासितां (सेविताम्)
एतां परात्मनिष्ठां (परः “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारण-कारणम्॥” इति वचनात् सर्वस्मात्
परः यः आत्मा, तस्मिन् या निष्ठा अनर्थनिवृत्त्यनन्तरं
नैसर्गिकभजनपरावस्थितिः तां) समास्थाय (आदौ श्रद्धादिक्रम-
पन्थानुसारेण सम्यक् प्रकारेण श्रौतमार्गे भजनं कुर्वन्)
मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवया (साधन-भावभक्ताख्या) एव दुरन्तपारं (दुस्तरं)
तमः (कृष्णसेवारहित-जड़ाहङ्कार-भोगरूप संसाराख्यम् अज्ञानं)
तरिष्यामि (कृष्णोतर-कैङ्कर्यवासनां त्यक्त्वा अतिक्रमिष्यामि)।
श्लोक-भावानुवाद—“प्राचीनकालमें महाभागवतोंके द्वारा
सेवित इस परात्म-निष्ठा [‘परः’—‘‘ईश्वरः परमः कृष्णः
सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥”
ब्रह्मसंहिताके इस वचनके द्वारा जो सबसे श्रेष्ठ आत्मा
(श्रीकृष्ण) हैं, उनमें निष्ठा अर्थात् अनर्थ निवृत्तिके
उपरान्त स्वाभाविक भजन-परायणता]के द्वारा [श्रद्धासे
प्रेम तक क्रमपथका सम्पूर्णरूपसे श्रौतमार्ग (गुरुसे श्रवण
किये ज्ञान)के अनुसार] भजन करते हुए श्रीकृष्णसेवासे
इस दुस्तर अन्धकारसे [श्रीकृष्णसेवारहित
जड़-अहङ्कार-भोगरूप संसार कहलानेवाले अज्ञानसे]
तर जाऊँगा अर्थात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त मैं अन्य
किसीका सेवक हूँ, इस भावका अतिक्रमण कर
जाऊँगा।”
चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंमें ‘वैष्णवचिह्नधारण’के
अन्तर्गत चतुर्थाश्रम (संन्यास)के लिये उचित वेष-धारण
करना एक अङ्ग है। जो यह चतुर्थाश्रममोचित वेष धारण
करते हैं, उनका ही मुकुन्दसेवाके द्वारा संसारसे उद्धार
होता है। परमात्मनिष्ठ व्यक्ति त्रिदण्डिभिक्षुका वेष धारण
करते हैं। पूर्वकालमें महर्षिगण त्रिदण्डिवेश धारण करते
थे, बादमें विष्णुस्वामीने कलियुगमें त्रिदण्डवेशको ही
‘परात्मनिष्ठा’ कहकर मुकुन्दसेवामें निष्ठाका प्रचलन
किया। ऐकान्तिक-भक्तिनिष्ठ वैष्णव उस त्रिदण्डके साथ
चतुर्थ ‘जीवदण्ड’को जोड़ देते हैं, तो भी वैष्णव संन्यासी
त्रिदण्डि-संन्यासी कहलाते हैं। मायावादी संन्यासी एकदण्ड
ग्रहण करते हैं, वे त्रिदण्डके तात्पर्यको नहीं समझ पाते।
विष्णुस्वामीके परवर्ती कालमें शिवस्वामी सम्प्रदायके
लोगोंने निर्विशेष-ब्रह्मज्ञानको लक्ष्य करके शङ्कराचार्यके
एकदण्ड संन्यासके आदर्शको अपनाकर सेव्य-सेवक-भाव
अर्थात् मुकुन्दसेवाका परित्याग कर दिया। विष्णुस्वामी
सम्प्रदायके द्वारा प्रवर्तित संन्यासके एक सौ आठ
नामोंके स्थानपर केवलद्वैतवादी संन्यासी दस नामोंको
ही ग्रहण करते हैं।
श्रीगौरसुन्दरने यद्यपि भारतकी तात्कालिक प्रथाके
अनुसार एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया था, तथापि उस
एकदण्डके भीतर चतुष्दण्ड एकीभूत था,—यही प्रचार
करनेके लिये उन्होंने श्रीमद्भागवतमें वर्णित त्रिदण्डि-भिक्षुके
गीतका गान किया। श्रीगौरसुन्दरने कभी भी परात्मनिष्ठाके
अभाववाले एकदण्ड संन्यासका अनुमोदन नहीं किया।
त्रिदण्डी संन्यासी त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके संयोगसे
ऐकान्तिकी भक्तिका विधान करके रखते हैं। अप्राकृत
भक्तिरहित एकदण्डि-संन्यासी निर्विशेष मतका अवलम्बन
करनेके कारण परात्मनिष्ठासे विमुख होते हैं, इसलिये
वे ब्रह्म नामक प्रकृतिमें लीन होकर निर्विशेष होनेको
ही ‘मुक्ति’ मानते हैं। आर्यवर्त्तके (भारतके) मायावादी
लोग श्रीचैतन्यदेवको उनके बाह्यज्ञानके कारण त्रिदण्डी
न मानकर एकदण्डी संन्यासी ही मानते हैं, यह उनका
भ्रम ही है। श्रीमद्भागवतमें एकदण्ड संन्यासका कहीं भी
वर्णन नहीं है, त्रिदण्ड-धारणको ही चतुर्थ आश्रमका
एकमात्र वेष कहा गया है। भगवान्की बहिरङ्गा शक्तिसे
84 ।
तीसरा अध्याय 3/6-10 ]
मोहित मायावादी लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि
श्रीगौरसुन्दर श्रीमद्भागवतकी वाणीका बहुत आदर करते
हैं।
श्रीचैतन्यदेवकी शिक्षानुसार आज तक उनके अनुगत
भक्तोंमें शिखा और सूत्र (जनेऊ) युक्त संन्यास प्रचलित
है। एकदण्डि-मायावादी लोग शिखा और सूत्रका
परित्याग करते हैं, इसलिये वे त्रिदण्डका माहात्म्य
समझनेमें असमर्थ हैं, क्योंकि उनमें श्रीभगवान्की सेवा
करनेकी वृत्ति नहीं है। उनका चित्त विषयकी सेवामें
निमग्न होनेसे वे धैर्यहीन होकर सेव्य-सेवक-भावका
त्याग करके ब्रह्ममें लीन होनेका विचार करते हैं।
दैव-वर्णाश्रम (गीता एवं भागवतके अनुसार गुण-कर्मके
आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय) प्रवर्त्तनकारी आचार्यगण
असुरवर्णाश्रम (जन्मके आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय)
वालोंके ज्ञान और चिन्तन-धारा आदि किसीको भी
ग्रहण नहीं करते हैं।
श्रीगौरसुन्दरके अत्यन्त अन्तरङ्ग भक्त, श्रीमद्भागवत
शास्त्रमें परम प्रवीण श्रीमद् गदाधर पण्डित गोस्वामी
प्रभुने स्वयं त्रिदण्ड संन्यासका विचार ग्रहण किया और
श्रीमाधव उपाध्यायको त्रिदण्ड संन्यास प्रदान किया।
इन्हीं श्रीमाधवाचार्यसे ही पश्चिम भारतमें
वल्लभाचार्य-सम्प्रदायकी उत्पत्ति हुई है। गौड़ीय-वैष्णव-
स्मृत्याचार्य श्रीगोपालभट्टने अपने श्रीगुरुदेव त्रिदण्डिस्वामी
श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीसे किस प्रकार त्रिदण्ड-विधानमें
दीक्षित होकर वेश ग्रहण किया, इसका स्पष्ट उल्लेख
नहीं मिलता है। तथापि श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा रचित
'श्रीउपदेशामृत'के प्रथम श्लोकमें निहित त्रिदण्ड-विधानका
आनुगत्य श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीमें उत्तम रूपमें प्रकाशित
होता था। श्रीगौरसुन्दरके अनुगत भक्त केवलाद्वैत-विचारसे
'एकदण्ड'-संन्यासको कभी भी ग्रहण नहीं करते।
शिखाका मुण्डन और सूत्रका त्यागकर भगवान्को
निर्विशेष ब्रह्म कहनेवाले संन्यासी अपनी विचार-प्रणालीको
गौड़ीय-वैष्णव-सम्प्रदायमें प्रचलित करनेमें कभी सफल
नहीं हुए हैं।
त्रिदण्डि-श्रीधर स्वामीकी प्रणालीका श्रीगौरसुन्दरने
अनुमोदन किया है। केवलाद्वैतवादी लोग श्रीधर स्वामीकी
शुद्धाद्वैत-विचार-प्रणालीको न समझकर उन्हें भी अपने
सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त करना चाहते हैं, परन्तु श्रीगौरसुन्दरका
यह विचार नहीं है॥ 6॥
त्रिदण्डि-भिक्षुकी कृष्णसेवा-निष्ठा-दर्शनसे सुख :-
प्रभु कहे,—“साधु एइ भिक्षुक-वचन।
मुकुन्द सेवन-व्रत कैल निर्धारण॥ 7॥
परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण।
मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥ 8॥
सेइ वेष कैल, एबे वृन्दावन गिया।
कृष्णनिषेवण करि निभृते बसिया॥”9॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,– “इस भिक्षुकके वचन
अति सुन्दर हैं, क्योंकि उसने मुकुन्दसेवाका व्रत ग्रहण
किया है। परात्मनिष्ठा ही संन्यास वेश धारण करनेका
एकमात्र तात्पर्य है। मुकुन्द सेवासे ही संसारसे मुक्ति
मिलती है। संन्यास वेश धारण करके मैं अब वृन्दावन
जाकर किसी एकान्त स्थानमें वास करके केवल
श्रीकृष्णका भजन और सेवा करूँगा॥” 7-9॥
अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासवेश ग्रहण करके महाप्रभुने
कहा,– “भिक्षुकके ये वचन साधु (सुन्दर) हैं, क्योंकि
इनके द्वारा श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी सेवारूपी व्रत निर्धारित
हुआ है।” जड़ात्म-निष्ठाका निषेध करके परात्मनिष्ठा
ही संन्यासवेश धारण करनेका तात्पर्य है॥ 7-8॥
महाप्रभुकी प्रेमोन्मत्त अवस्थामें वृन्दावन-यात्रा :-
एत बलि' चले प्रभु, प्रेमोन्मादेर चिह्न।
दिक्-विदिक्-ज्ञान नाहि, किवा रात्रि-दिन॥ 10॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे वृन्दावनकी
ओर चले। उनके शरीरमें प्रेमोन्मादके चिह्न उदित हो
गये और उस प्रेमोन्मादमें उन्हें न तो दिशा-विदिशा
और न ही रात्रि-दिनका ज्ञान रहा॥ 10॥
। 85
[ 3/11-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुके पीछे चलनेवाले निताइ,
चन्द्रशेखर और मुकुन्द :-
नित्यानन्द, आचार्यरत्न, मुकुन्द, — तिनजन।
प्रभु-पाछे-पाछे तिने करेन गमन ॥ 11 ॥
**अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य
और श्रीमुकुन्द प्रभु, —ये तीनों भी महाप्रभुके पीछे-पीछे
चले ॥ 11 ॥
महाप्रभुके दर्शन मात्रसे लोगोंका उद्धार :-
येइ येइ प्रभु देखे, सेइ सेइ लोक।
प्रेमावेशे 'हरि' बोले, खण्डे दुःख-शोक ॥ 12 ॥
बालकोंके प्रति महाप्रभुका स्नेह :-
गोप-बालक सब प्रभुके देखिया।
'हरि' 'हरि' बलि' डाके उच्च करिया ॥ 13 ॥
शुनि' ता-सबार निकटे गेला गौरहरि।
'बल' 'बल' बोले सबार शिरे हस्त धरि' ॥ 14 ॥
ता'-सबार स्तुति करे, —“तोमरा भाग्यवान्।
कृतार्थ करिले मोरे शुनाञा हरिनाम् ॥” 15 ॥
**अनुवाद—**जिस-जिसने महाप्रभुके दर्शन किये, वह
भी प्रेमावेशमें 'हरि' 'हरि' बोलने लगता और उसके
समस्त दुःख-शोक दूर हो जाते। वहाँके गोप-बालक
भी महाप्रभुको देखकर उच्च स्वरसे 'हरि' 'हरि' बोलने
लगे। श्रीगौरहरि उनकी हरिध्वनि सुनकर उन गोप-बालकोंके
पास गये और उनके सिरोंपर हाथ रखकर उनसे पुनः
पुनः 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहने लगे। तब
महाप्रभुने उन सबकी स्तुति करते हुए कहा, —“तुम
लोग बड़े सौभाग्यवान् हो। तुमने मुझे हरिनाम् सुनाकर
कृतार्थ किया है॥” 12-15 ॥
श्रीनित्यानन्दकी चतुरायी और बालकोंको
एकान्तमें उपदेश :-
गुप्ते ता-सबाके आनि' ठाकुर नित्यानन्द।
शिखाइला सबाकारे करिया प्रबन्ध ॥ 16 ॥
“वृन्दावन-पथ प्रभु पुछेन तोमारे।
गङ्गातीर-पथ तबे देखाइह ताँरे ॥” 17 ॥
**अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन गोप बालकोंको
एकान्तमें जाकर कुछ बात बतलायी जिसका उन्हें
विश्वास हो गया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनसे कहा, —“यदि
महाप्रभु तुमसे वृन्दावनका मार्ग पूछें, तो उन्हें गङ्गाके
किनारेका मार्ग दिखला देना॥” 16-17 ॥
अनुभाष्य—'प्रबन्ध'—सुसङ्गत कहानीकी रचना ॥ 16 ॥
महाप्रभुके द्वारा बालकोंसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछनेपर
बालकोंका उनको नवद्वीप-पथ दिखाना :-
तबे प्रभु पूँछिलेन, —“शुन, शिशुगण।
कह देखि, कोन् पथे याब वृन्दावन ॥” 18 ॥
शिशु सब गङ्गातीरपथ देखाइल।
सेइ पथे आवेशे प्रभु गमन करिल ॥ 19 ॥
**अनुवाद—**तब महाप्रभुने उन बालकोंसे पूछा— “हे
बच्चों सुनो! वृन्दावन जानेका कौनसा मार्ग है?” सब
बालकोंने गङ्गाके किनारेका पथ उन्हें दिखला दिया।
महाप्रभु आवेशमें उस पथपर चले गये ॥ 18-19 ॥
सब प्रकारकी आवश्यकताओंकी पूर्ति हेतु और चारों ओर
महाप्रभुके आगमनकी सूचना देनेके लिये श्रीनिताइके द्वारा
श्रीचन्द्रशेखरको शान्तिपुरमें भेजना :-
आचार्यरत्नेरे कहे नित्यानन्द-गोसाञि।
“शीघ्र याह तुमि अद्वैत-आचार्येर ठाञि ॥ 20 ॥
प्रभु लये याब आमि ताँहार मन्दिरे।
सावधाने रहेन येन नौका लञा तीरे ॥ 21 ॥
तबे नवद्वीपे तुमि करह गमन।
शचीमाता लञा आइस आर भक्तगण ॥” 22 ॥
**अनुवाद—**तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीचन्द्रशेखर
आचार्यको कहा, —“आप तुरन्त ही श्रीअद्वैताचार्यके घर
जाँय। मैं महाप्रभुको शान्तिपुर ले आऊँगा और
श्रीअद्वैताचार्य वहीं गङ्गाके किनारे सावधानीपूर्वक एक
86 ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
तीसरा अध्याय 3/20-29 ]
नौकामें हमारी प्रतीक्षा करें। तब आप नवद्वीप जाकर
शचीमाताके साथ सभी भक्तोंको लेकर शान्तिपुर आ
जाना॥” 20-22 ॥
महाप्रभुके सामने निताइका अचानक आगमन :-
ताँरे पाठाइया नित्यानन्द महाशय।
महाप्रभुर आगे आसि' दिल परिचय ॥ 23 ॥
अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आचार्यको भेजकर श्रीनित्यानन्द
प्रभु महाप्रभुसे आगे निकलकर उनके सामने आये ॥ 23 ॥
श्रीनित्यानन्दको देखकर महाप्रभुकी जिज्ञासा
और श्रीनिताइका छल :-
प्रभु कहे,—“श्रीपाद, तोमार कोथाके गमन।”
श्रीपाद कहे,—“तोमार सङ्गे याब वृन्दावन ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीपाद! आप कहाँ
जा रहे हैं?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मैं भी आपके
साथ वृन्दावन जाऊँगा ॥” 24 ॥
गङ्गाको यमुना कहकर दिखलाना :-
प्रभु कहे,—“कत दूरे आछे वृन्दावन।”
तेंहो कहेन,—“कर एइ यमुना दरशन ॥” 25 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, — “वृन्दावन कितनी दूर
है?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “वह देखिये, सामने ही
श्रीयमुनाके दर्शन कीजिये ॥” 25 ॥
महाप्रभुको गङ्गाके दर्शनसे यमुनाका उद्दीपन :-
एत बलि' आनिल ताँरे गङ्गा-सन्निधाने।
आवेशे प्रभुर हैल गङ्गांरे यमुना-ज्ञाने ॥ 26 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें
गङ्गाके तटपर ले आये। आवेशमें डूबे हुए महाप्रभुने
गङ्गाको यमुना ही समझा ॥ 26 ॥
महाप्रभुके द्वारा यमुनाका स्तव :-
“अहो भाग्य, यमुनारे पाइलूँ दरशन।”
एत बलि' यमुनार करेन स्तवन ॥ 27 ॥
अनुवाद—“मेरा अहो भाग्य है कि मैंने यमुनाका
दर्शन पाया है।”—यह कहकर महाप्रभु यमुनाकी स्तव-स्तुति
करने लगे ॥ 27 ॥
चैतन्यचन्द्रोदयनाटक (5/13)में उद्धृत पद्मपुराणवाक्य :-
चिदानन्दभानोः सदा नन्दसूनोः
परप्रेमपात्री द्रवब्रह्मगात्री।
अघानां लवित्री जगत्क्षेमधात्री
पवित्रीक्रियान्नो वपुर्मित्रपुत्री ॥ 28 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चिदानन्दसूर्यस्वरूप नन्दनन्दनकी
सर्वदा प्रेमकी पात्री, ब्रह्मद्रवस्वरुपिणी, पापनाशिनी, जगत्की
मङ्गलकारिणी, सूर्यपुत्री यमुना हमारे शरीरोंको पवित्र
करें ॥ 28 ॥
अनुभाष्य—
चिदानन्दभानोः (सम्वित्प्रीतिप्रकाशकस्य) नन्दसूनोः (कृष्णस्य)
सदा (नित्यं) परप्रेमपात्री (परमप्रीतिप्रदात्री) द्रवब्रह्मगात्री
(चित्सलिलरूपा) अघानाम् (अपराधानां) लवित्री (विनाशयित्री)
जगत्क्षेमधात्री (जगतां लोकानां मङ्गलविधात्री) मित्रपुत्री (रविसुता
कालिन्दी यमुना) नः (अस्माकं) वपुः [दिव्यज्ञानेन] पवित्रीक्रियात्
(शुद्धी कुर्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—प्रीति-प्रकाशक सम्वित्के
अधिष्ठाता नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी नित्य परम प्रीतिको
प्रदान करनेवाली, चिन्मय जलरूपा, अपराधोंका विनाश
करनेवाली, जगत्के मङ्गलका विधान करनेवाली हे
सूर्यपुत्री यमुना! हमारा दिव्यज्ञानके द्वारा शोधन करो ॥ 28 ॥
एक कौपीनमात्र ही महाप्रभुका सहारा :-
एत बलि' नमस्करि' कैल गङ्गास्नान।
एक कौपीन, नाहि द्वितीय परिधान ॥ 29 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने नमस्कार करके
गङ्गामें स्नान किया। महाप्रभुने जो कौपीन पहना था,
उसके अतिरिक्त उनके पास दूसरा कोई वस्त्र नहीं
था ॥ 29 ॥
। 87
[ 3/30-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीअद्वैताचार्यका आगमन :- गङ्गाय यमुना बहे हञा एकधार।
हेनकाले आचार्य-गोसाञि नौकाते चड़िञा। पश्चिमे यमुना बहे, पूर्वे गङ्गाधार॥ ३६॥
आइल नूतन कौपीन-बहिर्वास लञा॥ ३०॥ महाप्रभुको नया कौपीन देना और निमन्त्रण :-
श्रीअद्वैतके दर्शनसे महाप्रभुको सन्देह और जिज्ञासा :- पश्चिमधारे यमुना बहे, ताँहा कैले स्नान।
आगे आचार्य आसि' रहिला नमस्कार करि'। आर्द्र कौपीन छाड़ि' शुष्क कर परिधान॥ ३७॥
आचार्य देखि' बले प्रभु मने संशय करि'॥ ३१॥ प्रेमावेशे तिन दिन आछ उपवास।
“तुमि त' आचार्य-गोसाञि, एथा केने आइला। आजि मोर घरे भिक्षा, चल मोर वास॥ ३८॥
आमि वृन्दावने, तुमि केमते जानिला॥” ३२॥ कहीं महाप्रभु अस्वीकार न करें, इसी भयसे अपने घरमें
श्रीअद्वैतका सरल भावसे महाप्रभुको उत्तर देना :- भिक्षाकी सामग्रीका सामान्य रूपसे वर्णन :-
आचार्य कहे,–“तुमि याँहा, सेइ वृन्दावन। एकमुष्टि अन्न मुञि करियाछौं पाक।
मोर भाग्ये गङ्गातीरे तोमार आगमन॥” ३३॥ शुखरुखा व्यञ्जन कैलुँ, सूप आर शाक॥” ३९॥
अनुवाद—उस समय श्रीअद्वैताचार्य नौकामें नये अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“श्रीपाद नित्यानन्दके
कौपीन और बहिर्वास (बाहर पहननेवाले कपड़े) लेकर वचन मिथ्या नहीं हैं। आपने अभी यमुनामें ही स्नान
आये और महाप्रभुके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया। किया है। (प्रयागके बाद) गङ्गा और यमुना मिलकर
श्रीअद्वैताचार्यको देखकर महाप्रभुके मनमें संशय हुआ। एक धाराके रूपमें बहती हैं, पश्चिमकी ओरवाली धारा
[महाप्रभु अभी आवेशमें ही थे, इसलिये] उन्होंने उनसे यमुना है और पूर्वकी ओरवाली धारा गङ्गा है। पश्चिम
पूछा,—“आप तो अद्वैताचार्य हैं ना, आप यहाँ कैसे धारामें यमुना बह रही हैं, वहीं आपने स्नान किया।
आये? मैं वृन्दावनमें हूँ, यह आपने कैसे जाना?” अब आप गीले कौपीनको छोड़कर सूखे वस्त्र धारण
श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप जहाँपर हैं, वह स्थान ही करें। प्रेमके आवेशमें आपने तीन दिनतक उपवास
वृन्दावन है। यह मेरा सौभाग्य है कि आप गङ्गातटपर किया है। आज मेरे घर चलकर भिक्षा ग्रहण करें।
आये हैं॥”३०-३३॥ मैंने केवल एक मुट्ठी भर अन्न (चावल) पकाया है।
साथमें एक सूखी सब्जी, एक रसेवाली सब्जी और
श्रीअद्वैतके समक्ष श्रीनिताइकी चतुरायीका वर्णन :- शाक है॥”३५-३९॥
प्रभु कहे,–“नित्यानन्द आमारे वञ्चिला।
गङ्गाके आनिया मोरे यमुना कहिला॥” ३४॥ अनुभाष्य—‘शुखरुखा व्यञ्जन’—सूखी सब्जी;
‘सूप’—रसा॥३९॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने कहा,—“नित्यानन्दने मेरे महाप्रभुको शान्तिपुरमें अपने घरमें लाना और सत्कार :-
साथ छल किया। मुझे गङ्गाके तटपर लाकर उन्होंने एत बलि' नौकाय चढ़ाञा निल निज-घर।
इसे यमुना बतलाया॥” ३४॥ पादप्रक्षालन कैल आनन्द-अन्तर॥ ४०॥
श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनिताइ-वाक्यका समर्थन अनुवाद—यह कहकर श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको
और सत्यताका प्रतिपादन :- नौकापर चढ़ाकर अपने घर ले आये। घर पहुँचकर
आचार्य कहे,–“मिथ्या नहे श्रीपाद-वचन। महाप्रभुके चरणोंको धोकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत
यमुनाते स्नान तुमि करिला एखन॥ ३५॥ आनन्द हुआ॥ ४०॥
88 ।
तीसरा अध्याय 3/41–55 ]
सीता-ठाकुराणीके द्वारा रसोई और स्वयं
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा भोग-निवेदन :-
प्रथमे पाक करियाछेन आचार्याणी।
विष्णु-समर्पण कैल आचार्य आपनि॥ 41 ॥
दोनों प्रभु (महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द) और श्रीकृष्ण-इन
तीनोंके लिये तीन पात्रोंमें नैवेद्यको सजाना :-
तिनठाञि भोग बाड़ाइल सम करि'।
कृष्णेर भोग बाड़ाइल धातु-पात्रोपरि ॥ 42 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नी सीता ठाकुराणीने
पहलेसे ही भोग बना रखा था और तब श्रीअद्वैताचार्यने
उसे भगवान् विष्णुको निवेदन किया। उन्होंने उस
भोगको तीन बराबर भागोंमें सजाया। उनमेंसे एक
भागको धातुके पात्रके ऊपर रखकर उसे श्रीकृष्णको
निवेदनके लिये रखा॥ 41-42 ॥
नैवेद्यका वर्णन :-
बत्तिशा-आठिया-कलार आङ्गटिया पाते।
दुइ ठाञि भोग बाड़ाइल भाल मते॥ 43 ॥
मध्ये पीत-घृतसिक्त शाल्यन्नेर स्तूप।
चारिदिके व्यञ्जन-डोङ्गा, आर मुदगसूप ॥ 44 ॥
साद्रक, वास्तुक-शाक विविध प्रकार।
पटोल, कुष्माण्ड-बड़ि, मानकचु आर ॥ 45 ॥
चङ्ग-मरिच-सुखुत दिया सब फल-मूले।
अमृतनिन्दक पञ्चविध तिक्त-झाले ॥ 46 ॥
कोमल निम्बपत्र सह भाजा वार्त्ताकी।
पटोल-फुलबड़ि-भाजा, कुष्माण्ड-मानचाकी ॥ 47 ॥
नारिकेल-शस्य, छाना, शर्करा मधुर।
मोचाघण्ट, दुग्धकुष्माण्ड, सकल प्रचुर॥ 48 ॥
मधुराम्लबड़ा, अम्लादि पाँच-छय।
सकल व्यञ्जन कैल लोके यत हय॥ 49 ॥
मुद्गबड़ा, माषबड़ा, कलाबड़ा, मिष्ट।
क्षीरपुली, नारिकेल, यत पिठा इष्ट॥ 50 ॥
बत्तिशा-आठिया-कलार डोङ्गा बड़ बड़।
चले हाले नाहि, डोङ्गा अति बड़ दृढ़ ॥ 51 ॥
पञ्चाश पञ्चाश डोङ्गा व्यञ्जने पूरिञा।
तिन भोगेरे आशे पाशे राखिल धरिञा ॥ 52 ॥
सघृत-पायस नव-मृत्कुण्डिका भरिञा।
तिन पात्रे घनावर्त्त-दुग्ध राखेत धरिञा ॥ 53 ॥
दुग्ध-चिड़ा-कला आर दुग्ध-लक्लकी।
यतेक करिल, ताहा कहिते ना शक्ति ॥ 54 ॥
दुइ पाशे धरिल सब मृत्कुण्डिका भरि'।
चाँपाकलि-दधि-सन्देश कहिते ना पारि॥ 55 ॥
अनुवाद-'बत्तिशा-आठिया-कला' अर्थात् जिस केलेके
वृक्षकी डालपर कम-से-कम बत्तीस केलोंका गुच्छा
आता है, उस वृक्षके अखण्ड (कहींसे भी न कटे)
पत्तोंके ऊपर निम्नलिखित व्यञ्जनोंवाले भोगके बाकी
दो भागोंको अच्छी प्रकार सजाकर रखा। भोगपात्रके
बीचमें पीले रङ्गके घीसे युक्त उत्तम धानके चावलको
स्तूपके आकारमें रखा गया तथा उस चावलके स्तूपके
चारों ओर केलेके पत्तेसे बने दोनोंमें नाना प्रकारके
व्यञ्जन सजाये गये। उनमें मूँगकी दाल, अनेक
प्रकारके साग, परमल, कच्चे पेठेके साथ दाल मिलाकर
बनायी गयी बड़ी, अरबी आदिको सजाया गया। तीखी
मिर्च अथवा तीखे और कटु मसालोंके साथ कच्चे
केले, पपीते, कन्दमूल, मूली आदिके द्वारा बनायी गयी
पाँच प्रकारकी ऐसी तरकारियाँ, जो अमृतको भी
निन्दित करने वाली थीं।
इन व्यञ्जनोंमें कोमल-कोमल नीमके पत्तेसे युक्त
बैंगन, परमल और नर्म बड़ीका भाजा तथा सरसोंका
छौंक लगाकर कच्चे पेठे और अरबीकी सूखी सब्जी
थी। नारियलके गूदे, पनीर और शक्करसे बना हुआ
मधुर मिष्ठान, केलेके फूलसे बनी सब्जी, दूधमें कच्चे
पेठेको डालकर बनाया गया व्यञ्जन-ये सभी प्रचुर
मात्रामें बनाये गये थे। खट्टा-मीठा बड़ा, पाँच-छह
। 89
[ 3/44-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रकारके खट्टे पदार्थादि तथा जितने प्रकारके व्यञ्जन
लोक-प्रसिद्ध हैं, उन्हें भी भोगमें सजाया। मूँगकी
दालका बड़ा, उड़दकी दालका बड़ा, केलेका बड़ा,
रबड़ी और नारियल और अनेक प्रकारका पीठा बनाया
गया था। बत्तिशा-आठिया केलेके पत्तोंके दोने बड़े
और बहुत मजबूत थे, इसलिये वे हिल-डुल नहीं रहे
थे। इस प्रकार पचास-पचास दोने व्यञ्जनोंसे भरकर
तीनों भोगोंके आस-पास रखे गये थे। घीसे बनी
खीरको नये मिट्टीके बर्तनोंमें भरकर रखा गया था तथा
तीन पात्रोंमें दूधको गाढ़ा करके बनायी रबड़ी भी रखी
गयी। चिड़वा और केलेको दूधमें मिलाकर बनाये गये
व्यञ्जन तथा लौकीकी खीर आदि जितने और व्यञ्जन
प्रस्तुत किये गये, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है,
वे मिट्टीके कसोरोंमें रखे हुए थे। छोटे-छोटे केले, दही
और सन्देश आदि विविध प्रकारके व्यञ्जन भी थे,
जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 44-55 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘बत्तिशा-आठिया-कलार
आङ्गटिया’—जिसमें बत्तीस या अधिक केलोंका गुच्छा
आता है, ऐसा केलेका वृक्ष। आङ्गटिया अर्थात्
अखण्ड केलेका पत्ता ॥ 43 ॥
अनुभाष्य-ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी अपनी
पाक-कलाके नैपुण्यको सुन्दर रूपसे प्रदर्शित कर रहे
हैं। ‘लोके’—जगत्में। ‘इष्ट’—प्रयोजनीय, वाञ्छित। ‘चले-हाले
नाहि’—हिलता-डुलता नहीं। ‘दृढ़’—दृढ़, मजबूत।
‘शक्ति’—कर सकता हूँ॥ 44-55 ॥
नैवेद्यके ऊपर तुलसी और उसके साथ
आचमन-जल प्रदान करना :-
अन्न-व्यञ्जन-उपरि दिल तुलसीमञ्जरी।
तिन जलपात्रे सुवासित जल भरि' ॥ 56 ॥
तिन शुभ्रपीठ, तार उपरि वसन।
कृष्णेर भोग साक्षात् कृष्णे कराइल भोजन ॥ 57 ॥
अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने उन सब अन्न और
व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रख दी और तीन
जलपात्रोंमें सुगन्धित जल भरकर रख दिया तथा भोग
लगानेके उद्देश्यसे तीन सुन्दर लकड़ीके आसनोंपर
कपड़ा बिछा दिया। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने भगवान्
श्रीकृष्णके लिये सजाये गये भोगको साक्षात् श्रीकृष्ण
(महाप्रभु)को भोजन कराया॥ 56-57 ॥
अनुभाष्य- ‘साक्षात् कृष्णे’—श्रीमन् महाप्रभुको ॥ 57 ॥
स्वयं श्रीअद्वैतके द्वारा आरती-सम्पादन और दोनों
प्रभुओंका अपने भक्तोंके साथ आरती-दर्शन :-
आरतिर काले दुइ प्रभु बोलाइल।
प्रभु-सङ्गे सबे आसिं आरति देखिल ॥ 58 ॥
अनुवाद—भोग निवेदन करनेके बाद भोग-आरतीके
समय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द
प्रभुको बुलवा लिया। महाप्रभुके साथ आकर सभी
भक्तोंने आरतीके दर्शन किये॥ 58 ॥
ठाकुरको शयन प्रदान करना :-
आरति करिया कृष्णे करा'ल शयन।
आचार्य आसिं प्रभुरे तबै कैला निवेदन ॥ 59 ॥
दोनों प्रभुओंका भोजन करनेके लिये
घरके भीतर आना :-
दुइ भाइ आइला तबै करिते भोजन।
गृहेर भितरे प्रभु करेन गमन ॥ 60 ॥
अनुवाद-आरती करके श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने श्रीकृष्णको
शयन कराया और महाप्रभुके पास आकर घरके भीतर
आनेका निवेदन किया। उनकी प्रार्थनाको सुनकर दोनों
भाई भोजन करनेके लिये अन्दर आये॥ 59-60 ॥
मुकुन्द और हरिदासको भोजनके लिये प्रार्थना करनेपर
उन दोनोंकी अपनी मर्यादाकी रक्षा और दैन्य-विनय :-
मुकुन्द, हरिदास,–दुइ प्रभु बोलाइल।
जोड़हाते दुइ जन कहिते लागिल ॥ 61 ॥
मुकुन्द बोले,–“मोर किछु कृत्य नाहि सरे।
पाछे मुञि प्रसाद पामु, तुमि याह घरे ॥”62 ॥
90 ।
तीसरा अध्याय 3/61-69 ]
हरिदास बले,-"मुञि पापिष्ठ अधम।
बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन॥" 63 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदासको
भी भोजन करनेके लिये घरके भीतर आनेके लिये
कहा। उनकी बात सुनकर श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदास
हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे। श्रीमुकुन्दने
कहा, - "मेरा कुछ नित्यकार्य अभी बाकी हैं, इसलिये
मैं बादमें प्रसाद पाऊँगा, आप भीतर जाइये।" श्रीहरिदासने
कहा,-"मैं पापी और अधम हूँ, इसलिये बाहर बैठकर
बादमें एक मुट्ठी प्रसाद ग्रहण करूँगा॥" 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृत्य नाहि सरे'-कर्त्तव्य कुछ
बाकी है॥ 62 ॥
प्रसादके दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द
और श्रीअद्वैतको सम्मान देना :-
दुइ प्रभु लञा आचार्य गेला भितर-घरे।
प्रसाद देखिया प्रभुर आनन्द अन्तरे॥ 64 ॥
"ऐछे अन्न ये कृष्णके कराय भोजन।
जन्मे जन्मे शिरे धरौं ताँहार चरण॥" 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको जब
श्रीअद्वैताचार्य घरके भीतर ले गये, तब प्रसादको
देखकर आनन्दित होकर महाप्रभुने कहा, - "जो व्यक्ति
इस प्रकार श्रीकृष्णको अन्न-व्यञ्जनादि अर्पण कर
भोजन कराता है, मैं उसके चरणोंको जन्म-जन्मान्तर
तक अपने सिरपर धारण करता हूँ॥" 64-65 ॥
महाप्रभुको न बतलाकर श्रीअद्वैतका दोनों
प्रभुओंके लिये आसन प्रदान करना :-
प्रभु जाने तिन भोग-कृष्णेर नैवेद्य।
आचार्येर मन-कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥ 66 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने यह समझा कि तीनों भोग
श्रीकृष्णको समर्पित हुए हैं, परन्तु श्रीअद्वैताचार्यके
मनकी बातको महाप्रभु नहीं जान पाये ॥ 66 ॥
अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभुने तीन भागोंमें भोगको समान
मात्रामें बाँटकर सजा दिया था। (इसी अध्यायकी 42
संख्या देखें), उसमेंसे धातुके पात्रमें सजाया गया भोग
श्रीकृष्णके लिये था; और बाकी दो भाग केलेके पत्तोंके
ऊपर सजाये गये थे। धातुके पात्रवाले भोगको श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं श्रीकृष्णको निवेदन किया था। बाकी केलेके
पत्तोंवाले दो भोग श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
लिये अनिवेदित अवस्थामें ही रखे हुए थे, -उनको
श्रीअद्वैताचार्यने मन-ही-मनमें रखा था, महाप्रभुके सामने
उन्होंने इस बातको प्रकाशित नहीं किया। इसलिये
महाप्रभुने तीनों भोगोंको ही श्रीकृष्णका नैवेद्य-प्रसाद ही
समझा था॥ 66 ॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य, दोनोंका ही एक दूसरेको
भोजन करनेके लिये अनुरोध :-
प्रभु बले,-"वैस तुमि करिते भोजन।"
आचार्य कहे,-"आमि करिब परिवेश्न ॥" 67 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे कहा,-"आप
भी बैठकर भोजन कीजिये।" यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने
कहा,-"मैं भोजन परोसूँगा ॥" 67 ॥
महाप्रभुके वचन :-
"कोन् स्थाने बसिब, आर आन दुइ पात।
अल्प करि' ताहे आनि' देह व्यञ्जन भात ॥" 68 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 68 ॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,-"मैं
और नित्यानन्द किस स्थानपर बैठेंगे?" भोगके परिमाणको
बहुत अधिक देखकर और भी अन्य दो पात्रको लाकर
उनमें ही कम मात्रामें अन्न-व्यञ्जन देनेको कहा ॥ 68 ॥
श्रीअद्वैताचार्यका दोनों प्रभुओंको आसन-प्रदान :-
आचार्य कहे,-"बैस दाँहे पिण्डार उपरे।"
एत बलि' हाते धरि' बसाइल दुँहारे ॥ 69 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-"आप दोनों यहाँ
। 91
[ 3/69-74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आसनोंपर बैठ जाइये।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने
उनको हाथोंसे पकड़कर आसनपर बैठा दिया॥ ६९॥
महाप्रभुकी विधिमार्गमें आचार्योचित वैराग्य-लीला :-
प्रभु कहे, — “संन्यासीर भक्ष्य नहे उपकरण।
इहा खाइले कैछे हय इन्द्रिय-वारण॥” 70॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “संन्यासीके लिये इतने
प्रकारके व्यञ्जनोंका भोजन करना उचित नहीं है। इन्हें
खाकर अपनी इन्द्रियोंपर संयम कैसे रखा जा सकता
है?” ॥ 70 ॥
अनुभाष्य — 'उपकरण'—दाल, सब्जी आदि जिनके
साथ उत्तम स्वाद लेते हुए चावलका भोजन किया जा
सकता है। परन्तु संन्यासीका जिह्वाको अच्छे लगनेवाले
द्रव्योंमें अधिकार नहीं है। इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाली
वस्तुओंके सेवनसे भोग प्रवृत्ति और अधिक प्रबल होती
है, इसलिये महाप्रभुने वैराग्य प्रधान भक्तोंके सम्बन्धमें
श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कहा था—
“भाल ना परिबे आर भाल ना खाइबे।”
अर्थात् “बहुत अच्छे-अच्छे वस्त्र मत पहनना
और बहुत स्वादिष्ट वस्तुएँ मत खाना।”
भक्तगण कृष्णप्रसादके अतिरिक्त कभी भी और
कोई वस्तु ग्रहण नहीं करते। धनी गृहस्थ व्यक्ति
अत्यन्त स्वादिष्ट लगनेवाले उत्तम-उत्तम द्रव्योंका
श्रीकृष्णको भोग अर्पण करते हैं। श्रीकृष्णविलासके
सहचर मुखशुद्धि ताम्बूल (पान), सुगन्धित मसाले,
पुष्प-मालाएँ, पलङ्ग, वस्त्र, आभूषणादि प्रसादी वस्तुएँ
यद्यपि वैष्णवोंके लिये आदरणीय हैं, तथापि महाप्रभुकी
आज्ञानुसार अकिञ्चन वैष्णव अपनी देहको घृणित
प्राकृत मानकर इन वस्तुओंको स्वीकार करनेमें अपनी
अयोग्यता दिखलाते हैं कि इसके द्वारा अपराध होगा।
वैष्णवाभिमानी अवैष्णव सहजिया आदि अनर्थोंमें प्रवृत्त
व्यक्ति महाप्रभुके आदेशके तात्पर्यको समझनेमें असमर्थ
हैं॥ 70॥
गौरगतप्राण आचार्यके द्वारा महाप्रभुको
भोजनके लिये अत्यधिक अनुरोध :-
आचार्य कहे, — “छाड़ तुमि आपनार चुरि।
आमि जानि तोमार संन्यासेर भारिभूरि॥ 71॥
भोजन करह, छाड़ वचन चातुरी।”
प्रभु कह, — “एत अन्न खाइते ना पारि॥” 72॥
आचार्य बोले, — “अकपटे करह आहार।
यदि ना खाइते पार, रहिबेक आर॥” 73॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “आप अपने आपको
छिपानेकी चेष्टा मत करो। मैं आपको और आपके
संन्यास ग्रहणके रहस्यको भी अच्छी तरह जानता हूँ।
अपनी वाक्-चातुरीको छोड़कर भोजन कीजिये।” यह
सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं कर
सकता।” श्रीअद्वैताचार्य कहने लगे, — “आप बहाने मत
बनाइये और भोजन कीजिये। यदि पूरा नहीं खा सकते,
तो उच्छिष्ट पत्तेमें ही छोड़ दीजिये॥” 71-73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'भारिभूरि'— गोपनीय बात ॥ 71॥
भोजन-पात्रमें उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीके लिये निषेध :-
प्रभु बोले, — “एत अन्न नारिब खाइते।
संन्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते॥” 74॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं
खा सकूँगा और उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीका धर्म नहीं
है॥” 74॥
अनुभाष्य—संन्यासी उच्छिष्ट नहीं छोड़ते
(भाः 11/18/19)—
“बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।
विभज्य पारितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम्॥”
अर्थात् “संन्यासी भिक्षा प्राप्त करनेके पश्चात्
ग्रामके बाहर स्थित जलाशयमें जाकर स्नान-आचमन
करके जलके द्वारा भिक्षाको पवित्र कर ले। फिर
शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये,
92 ।
तीसरा अध्याय 3/74-83 ]
उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन रहकर पूरा खा
लेना चाहिये। दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और
न ही अधिक माँगकर लाये।”
उक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका—
“विभज्य विष्णु ब्रह्मार्कभूतैभ्यः, अशेषमिति भोजनपात्रेऽवशिष्टं
न रक्षणीयमित्यर्थः।”
अर्थात् “विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य आदि देवताओं तथा
अन्य प्राणियोंके उद्देश्यसे विभक्त करके बचे हुए
भोजनको पूरा खाकर भोजनपात्रमें अवशिष्ट न छोड़े—यह
अर्थ है॥”74॥
आचार्यका महाप्रभुपर आक्षेप और दीनता प्रदर्शन :-
आचार्य बले,—“नीलाचले खाओ चौयान्नबार।
एकबारे अन्न खाओ शत शत भार ॥ 75॥
तीन जनार भक्ष्यपिण्ड—तोमार एक ग्रास।
तार लेखाय एइ अन्न नहे पञ्चग्रास ॥ 76॥
मोर भाग्ये, मोर घरे, तोमार आगमन।
छाड़ह चातुरी, प्रभु, करह भोजन ॥”77॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य (महाप्रभुको श्रीजगन्नाथसे अभिन्न
जानते हुए) कहने लगे,—“नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ रूपमें)
तो आप चौवन बार भोजन करते हो और एक-एक
बारमें सौ-सौ पात्रोंमें भरे हुए अन्न खा जाते हो। तीन
लोग जितना भोजन करते हैं, उतना तो आपका एक
ग्रास मात्र होता है। उस अनुपातमें तो यह अन्न आपके
पाँच ग्रासके भी बराबर नहीं है। मेरे परम सौभाग्यसे
आज आपका मेरे घरमें आगमन हुआ है। इसलिये हे
प्रभो! अपनी चतुराईको छोड़कर भोजन करो॥”75-77॥
अनुभाष्य—'लेखाय'—अनुपातमें॥ 76॥
दोनों प्रभुओंका अलग-अलग जलसे
आचमन करनेके बाद भोजन आरम्भ :-
एत बलि' जल दिल दुइ गोसाञिर हाते।
हासिया लागिला दुँहे भोजन करिते ॥ 78 ॥
अनुवाद—इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंके
हाथोंमें आचमनके लिये जल दिया और दोनों हँसते हुए
भोजन करने लगे॥78॥
श्रीअद्वैतके साथ श्रीनिताइका प्रेम कौतुकमय-कलह :-
नित्यानन्द कहे,—“कैलुँ तिन उपवास।
आजि पारणा करिते बड़ छिल आश ॥ 79॥
आजि उपवास हैल आचार्य-निमन्त्रणे।
अर्धपेट ना भरिल एइ ग्रासेक अन्ने ॥”80॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने उपहास करते
हुए कहा,—“मैं तीन दिनसे उपवास कर रहा हूँ और
आज पारण करनेकी अर्थात् पेट भरकर खानेकी बड़ी
आशा थी। श्रीआचार्यने मुझे अपने घरपर भोजनके
लिये निमन्त्रण तो दिया है, परन्तु लगता है आज भी
उपवास करना पड़ेगा, क्योंकि केवल इस एक ग्रास
अन्नसे मेरा आधा पेट भी नहीं भरेगा॥”79-80॥
आचार्य कहे,—“तुमि तैर्थिक संन्यासी।
कभु फल-मूल खाओ, कभु उपवासी ॥ 81 ॥
दरिद्र-ब्राह्मण-घरे ये पाइला मुष्टिकात्र।
इहाते सन्तुष्ट हओ, छाड़ लोभ-मन ॥”82॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप
तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले एक संन्यासी हो। (वहाँ तो
आपको भर पेट भोजन नहीं मिलता) इसलिये कभी
मिल जाय, तो आप फल-मूल खाते हो और वह भी
नहीं मिले, तो उपवास करते हो। इस दरिद्र ब्राह्मणके
घर जो मुट्ठी भर अन्न आपको मिला है, उसीमें सन्तुष्ट
रहो, मनमें अधिक लोभ मत करो॥”81-82॥
नित्यानन्द बले,—“यबे कैले निमन्त्रण।
तत दिते चाह, यत करिये भोजन ॥”83॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“मैं
जो भी हूँ, परन्तु आपने मुझे भोजनके लिये निमन्त्रण
। 93
[ 3/81-90 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दिया है। इसलिये मैंने जितना खाना है, उतना आपको
देना पड़ेगा॥”83॥
शुनि' नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत।
कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत॥84॥
“भ्रष्ट अवधूत तुमि, उदर भरिते।
संन्यास लइयाछ, बूझि, ब्राह्मण दण्डिते॥85॥
तुमि खेते पार दश-विश मानेर अन्न।
आमि ताहा काँहा पाब, दरिद्र ब्राह्मण॥86॥
ये पाञाछ मुष्टिकान्न, ताहा खाञा उठ।
पागलामि ना करिह, ना छाड़ाइओ झूठ॥”87॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको सुनकर
श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने भी परिहास करते हुए कहा, — “तुम
एक भ्रष्ट अवधूत हो। मैं जानता हूँ कि अपना पेट
भरनेके लिये ही तुमने संन्यास लिया है और मुझ जैसे
सरल ब्राह्मणोंको परेशान करते हो। तुम तो दस-बीस
'मान' चावल खा सकते हो। मैं दरिद्र ब्राह्मण हूँ। इतना
चावल कहाँसे लाऊँगा ? इसलिये जो एक मुट्ठी अन्न
मिला है, उसे खाकर उठ जाओ। पागलपन मत करो
और कुछ झूठा भी मत छोड़ना॥”84-87॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मान'-चार सेर (लगभग साढ़े
तीन किलो) को एक 'मान' कहते हैं॥ 86॥
अनुभाष्य—'तैर्थिक संन्यासी'—श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं
अवधूत होनेपर भी तीर्थ भ्रमण करनेवाले बहुदक
संन्यासीका अभिनय कर रहे थे। 85 संख्याका
अनुभाष्य देखें।
'भ्रष्ट'—प्राकृत-स्मार्त्तसमाज-भ्रष्ट अर्थात् विधि और
निषेधसे अतीत, यहाँ निन्दाके छलसे स्तुतिके अर्थमें
व्यवहार हुआ है।
संन्यासकी चरम अवस्था—परमहंस कहलाती है;
उसीका ही दूसरा नाम 'अवधूत' है। अवधूत स्वेच्छाचारी
होते हैं। विषय ग्रहण करनेपर भी वे विषयोंके द्वारा
बाध्य नहीं है। संन्यासके चिह्न वे कभी तो ग्रहण करते
हैं और कभी परित्याग करते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा
कहे गये ये सब वचन परिहासमात्र हैं, वास्तवमें सत्य
नहीं हैं। कोई-कोई खड़दहमें त्रिपुरासुन्दरीको श्रीश्यामसुन्दरके
साथ अधिष्ठित देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके अवधूत
आचरणको शाक्त सम्प्रदायके कौल-अवधूतका आचरण
समझकर भ्रमित होते हैं—
“अन्तः शाक्तः बहिः शैवः सभायां वैष्णवो मतः।”
अर्थात् “अन्तरमें शाक्त, बाहरसे शैव और सभामें
वैष्णव”—वास्तवमें ऐसा नहीं है। श्रीनित्यानन्दस्वरूप
एक वैदिक-संन्यासीके अनुगत 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी
हैं अर्थात् वैदिक-संन्यासी गुरुने उन्हें ब्रह्मचारी नाम
'स्वरूप' दिया था, परन्तु वास्तवमें वे स्वयं परमहंस हैं।
और कोई-कोई कहते हैं कि श्रीलक्ष्मीपति तीर्थ ही
उनके आचार्य (गुरु) हैं, किन्तु वैसा होनेपर भी वे
श्रीमध्व सम्प्रदायके ही अन्तर्गत हैं, — वे बङ्गदेशीय
तान्त्रिक नहीं हैं।
'झूट'—उच्छिष्ट ॥ 81-87 ॥
श्रीअद्वैत और श्रीनिताइ दोनों प्रभुओंके प्रीतिपूर्वक
कलह-कौतुकको देखकर महाप्रभुका हँसना :—
एइ मत हास्यरसे करेन भोजन।
अर्ध-अर्ध खाञा प्रभु छाड़ेन व्यञ्जन ॥ 88 ॥
आचार्यकी इच्छानुसार महाप्रभुका परिपूर्ण भोजन :—
सेइ व्यञ्जन आचार्य पुनः करेन पूरण।
एइ मत पुनः पुनः परिवेशे व्यञ्जन ॥ 89 ॥
अनुवाद—इस प्रकार परस्पर हास-परिहास करते
हुए दोनों प्रभु भोजन कर रहे थे। महाप्रभु थोड़ा-थोड़ा
खाकर हर व्यञ्जन दोनेमें छोड़ रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य
उन-उन व्यञ्जनोंसे दोने पुनः भर देते थे। इस प्रकार
श्रीअद्वैताचार्य बार-बार व्यञ्जन परोस रहे थे॥ 88-89 ॥
दोना व्यञ्जने भरि' करेन प्रार्थन।
प्रभु बलेन,–“आर कत करिब भोजन ॥”90॥
94 ।
तीसरा अध्याय 3/90-98 ]
आचार्य कहे, — “ये दियाछि, ताहा ना छाड़िबा।
एखन ये दिये, तार अर्द्धेक खाइबा ॥” 91 ॥
नाना यत्ने-दैन्ये प्रभुर कराइल भोजन।
आचार्येर इच्छा प्रभु करिल पूरण ॥ 92 ॥
अनुवाद—इस प्रकार दोने व्यञ्जनोंसे भरकर
श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुसे और भोजन करनेके लिये
प्रार्थना करने लगे, तो महाप्रभु बोले, — “और कितना
भोजन करूँगा?” श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “मैंने जो पहले
दिया है, उसे मत छोड़ना। और अब जो दिया है,
उसका आधा तो खाइयेगा ही।” इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने
बड़े यत्नसे और दीनतापूर्वक महाप्रभुको भोजन कराया।
महाप्रभुने भी श्रीअद्वैताचार्यकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 90-92 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दोना'—दोना। ‘करेन प्रार्थना'—
खानेके लिये प्रार्थना करना ॥ 90 ॥
आधा पेट भरे होनेका भान करते हुए कृत्रिम
क्रोध भरे श्रीनिताइका एक मुट्ठी अन्न फेंकना :—
नित्यानन्द कहे, — “आमार पेट ना भरिल।
लञा याह, तोर अन्न किछु ना खाइल ॥” 93 ॥
एत बलि' एकग्रास अन्न हाते लञा।
उझालि' फेलिल आगे येन क्रुद्ध हञा ॥ 94 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मेरा पेट ही
नहीं भरा। अपना भोजन वापिस ले जाओ, मैंने तुम्हारे
अन्नमेंसे कुछ भी नहीं खाया है।” इतना कहकर उन्होंने
चावलका एक ग्रास हाथमें लेकर फेंककर सामने
भूमिपर बिखेर दिया जैसे वे क्रोधमें हैं॥ 93-94 ॥
अनुभाष्य—‘उझालि'—बिखेरना ॥ 94 ॥
श्रीनिताइके द्वारा फेंके हुए उच्छिष्टका अङ्गोंसे
स्पर्श होनेसे श्रीअद्वैतका प्रेमपूर्वक नृत्य :—
भात दुइ-चारि लागे आचार्येर अङ्गे।
भात गाये लञा आचार्य नाचे बहुरङ्गे ॥ 95 ॥
“अवधूतेर झूटा मोर लागिल अङ्गे।
परम पवित्र मोरे कैल एइ ढङ्गे ॥ 96 ॥
निन्दाके छलसे श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनित्यानन्द-स्तुति :—
तोरे निमन्त्रण करि' पाइनु तार फल।
तोर जाति-कुल नाहि, सहजे पागल ॥ 97 ॥
आपनार सम मोरे करिबार तरे।
झूठा दिले, विप्र बलि' भय ना करिले ॥” 98 ॥
अनुवाद—फेंके हुए चावलके दो-चार दाने
श्रीअद्वैताचार्यके अङ्गमें लगे। वे अङ्गोंमें चावल लगे-लगे
ही तरह-तरहसे नाचने लगे और कहने लगे, — “इस
अवधूतका जूठा मेरे अङ्गसे लगा है। इस प्रकार उसने
मुझे परम पवित्र कर दिया है। तुम्हें निमन्त्रण देकर
मैंने उसका फल पा लिया है। तुम्हारा जाति-कुल
आदि कुछ भी निश्चित नहीं है। तुम तो स्वभावसे
पागल हो। मुझे अपने जैसे पागल बनानेके लिये ही
तुमने अपना जूठा मेरे अङ्गोंपर फेंका है। मैं ब्राह्मण
हूँ, इस बातका भी तुम्हें भय नहीं हुआ।” (यह
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीनित्यानन्द प्रभुकी निन्दाके छलसे
स्तुति ही है) ॥ 95-98 ॥
अनुभाष्य—‘अवधूत'—असंस्कृतदेह (भाः 3/1/19
श्लोककी श्रीधरस्वामी-टीका देखें)। परमहंस-आचरणकी
लीला करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुने अन्नको फेंककर
पागलपन जैसे व्यवहारको दिखानेका छल किया।
अभक्त स्मार्त्तसमाजकी विधिके अनुसार उच्छिष्टके
स्पर्शसे व्यक्ति अपवित्र हो जाता है, परन्तु इस
उच्छिष्टके स्पर्शसे अपवित्र होनेके बदले वास्तवमें मैं
(अद्वैताचार्य) परम पवित्र और शुद्ध हुआ था।
वैष्णव अथवा परमहंसका उच्छिष्ट—महामहाप्रसाद
होता है, वह स्वयं चेतनमय विष्णुके समान है।
महामहाप्रसाद अभक्तोंकी इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाला
साधारण चावल-दाल नहीं है। वर्णाश्रमसे अतीत
परमहंसश्रेष्ठ श्रीगुरुदेवके या परमहंस अर्थात् वैष्णवोंके
। 95
[ 3/96-102
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उच्छिष्टका स्पर्श और सेवनरूपी सङ्ग सांसारिक
जीवोंके हृदयमें स्थित हरि-विमुखताको सम्पूर्ण रूपसे
दूर करके उनको अप्राकृत परमहंस-दास्यरूप शुद्ध
ब्राह्मणत्वमें प्रतिष्ठित करता है, —यही आचार्य श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं मूढ़ जीवोंके मङ्गलके लिये बोला।
‘सहजे पागल’—आत्मा अर्थात् चेतनाके साथ ही
उत्पन्न अप्राकृत परमहंस धर्मपरायण, प्रतिक्षण सभी
इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवामें रत (भाः 11/18/28-29)
देखें।
‘आपणार सम’—अर्थात् सिद्धवैष्णव या विधि-निषेधसे
अतीत परमहंस। श्रीगुरु नित्यानन्द और परमहंस या
वैष्णव और उनके दास कभी भी हरिविमुख प्राकृत
स्मार्त्त-समाजके भयसे उनके विधि-विधानसे नहीं चलते
हैं—यही श्रीअद्वैताचार्यके कहनेका तात्पर्य है। शुद्धवैष्णव
या परमहंसोंके दास चेतनमय महाप्रसादका सेवन और
सम्मान करते हैं, उसे प्रकृतिसे उत्पन्न जड़ेन्द्रियोंकी
तृप्ति करनेवाले चावल-दालके समान मानकर उसमें
स्पर्शदोषका विचार नहीं करते। वे यह जानते हैं—शुद्ध
वैष्णवकी तो बात दूर है, चण्डालके मुखसे भी गिरे
महाप्रसादके सेवनके फलसे भी ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व
पूरी तरहसे अटूट रहता है, ब्राह्मणत्वमें किसी प्रकारकी
अपवित्रता स्पर्श नहीं करती। महाप्रसादके सेवनसे
जड़-जगत्की समस्त पवित्र और अपवित्र वस्तुएँ
श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होकर अप्राकृत (दिव्य) पवित्र
वस्तुके रूपमें दिखायी देती हैं॥96-98॥
किया है। यदि तुम सौ संन्यासियोंको भोजन कराओगे,
तभी तुम्हारा यह अपराध दूर होगा॥”99-100॥
अनुभाष्य—बृहद्विष्णुपुराणमें—
“नैवेद्यं जगदीशस्य अन्नपानादिकञ्च यत्।
भक्ष्याभक्ष्यविचारश्च नास्ति तद्भक्षणे द्विजाः।
ब्रह्मवनिर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत्।
विकारं ये प्रकुर्वन्ति भक्षणे तद्द्विजातयः॥
कुष्ठव्याधिसमायुक्ताः पुत्रदारविवर्जिताः।
निरयं यान्ति ते विप्रास्तस्मान्नावर्त्तते पुनः॥”
अर्थात् “हे ब्राह्मणों! श्रीहरिका नैवेद्य और अन्नपान
आदि द्रव्य सेवन करते समय किसी प्रकारके
खाद्य-अखाद्यका विचार न करें। श्रीहरिका नैवेद्य
ब्रह्मकी भाँति निर्विकार और विष्णुके सदृश है।
विष्णुका नैवेद्य आदि ग्रहण करनेमें जिनके चित्तमें
संशय आदि विकार उत्पन्न होते हैं, उनको कुष्ठरोगसे
युक्त और पुत्र-स्त्री-विहीन होकर नरकगामी होना पड़ता
है। वहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता।”
महाप्रसादको साधारण चावल-दालके समान मानकर
उसमें भोग-बुद्धि रखनेके अपराधसे सावधान करनेके
लिये ही ग्रन्थकारने महाप्रसादके माहात्म्यके विषयमें
(अन्त्यलीला, 16/56-63 संख्यामें) लिखा है॥99-100॥
वैष्णव संन्यासके द्वारा स्मार्त्त विधिका लुप्त होना :—
आचार्य कहे, —“ना करिब संन्यासि-निमन्त्रण।
संन्यासी नाशिल मोर सब स्मृति-धर्म॥”101॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने उत्तर दिया,—“मैं आजके
बाद किसी भी संन्यासीको निमन्त्रण नहीं दूँगा, क्योंकि
एक संन्यासीने ही मेरे ब्राह्मण स्मृति-धर्मको नष्ट कर
दिया है॥”101॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘स्मृतिधर्म’—स्मार्त्तधर्म॥101॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीअद्वैतको दण्डका भय
दिखाना और उसके प्रायश्चित्तकी व्यवस्था :—
नित्यानन्द बोले,—“एइ कृष्णेर प्रसाद।
इहाके ‘झुठा’ कहिले, कैले अपराध॥99॥
शतेक संन्यासी यदि कराह भोजन।
तबे एइ अपराध हइबे खण्डन॥”100॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“यह
श्रीकृष्णका प्रसाद है। इसे 'झूठा' कहकर तुमने अपराध
आचमन देनेके बाद श्रीअद्वैतके द्वारा दोनों
प्रभुओंकी समयके अनुसार सेवा :—
एत बलि’ दुइ जने कराइल आचमन।
उत्तम शय्याते लइया कराइल शयन॥102॥
96 ।
तीसरा अध्याय 3/102-113 ]
लवङ्ग एलाची-बीज-उत्तम रसवास।
तुलसी-मञ्जरीसह दिल मुखवास ॥ 103 ॥
सुगन्धि चन्दने लिप्त कैल कलेवर।
सुगन्धि पुष्पमाला आनि' दिल हृदय-उपर ॥ 104 ॥
अनुवाद-यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंको आचमन कराया और उनको शयनके लिये उत्तम शय्या प्रदान की। मुखके अच्छे स्वादके लिये लौंग, इलायचीके दानेसे बने उत्तम रसवासको तुलसी मञ्जरीके साथ दिया। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने तब सुगन्धित चन्दनके द्वारा उनके अङ्गोंका लेपन किया और सुगन्धित पुष्पमाला उनके वक्षःस्थलपर धारण करा दी ॥ 102-104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'रसवास'-रसयुक्त गन्ध ॥ 103 ॥
श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके पाद-सम्वाहनकी चेष्टा :-
आचार्य करिते चाहे पाद-सम्वाहन।
सङ्कुचित हञा प्रभु बलेन वचन ॥ 105 ॥
महाप्रभुकी लज्जा ओर श्रीअद्वैताचार्यको मुकुन्द तथा हरिदासके साथ भोजन करनेकी आज्ञा :-
“बहुत नाचाइले तुमि, छाड़ नाचान।
मुकुन्द-हरिदास लइया करह भोजन ॥” 106 ॥
तबे त' आचार्य सङ्गे लञा दुइ जने।
करिल भोजन, इच्छा ये आछिल मने ॥ 107 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुका पाद-सम्वाहन करना चाहते थे, परन्तु महाप्रभुने सङ्कोच करके कहा,-“आपने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना छोड़ो। जाकर मुकुन्द और हरिदासके साथ भोजन करो।” तब श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमुकुन्द तथा श्रीहरिदासको साथ ले जाकर, महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रसादको पाकर अपने मनकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 105-107 ॥
अनुभाष्य-संन्यासीको उत्तम शय्या, लौंग, इलायची, चन्दन, पुष्पमालादान ओर स्वयं श्रीअद्वैताचार्यकी पाद सम्वाहन अर्थात् चरण दबानेकी चेष्टाको देखकर (यह सब संन्यासीके लिये उचित नहीं है, ऐसा जनानेके लिये) महाप्रभुने कहा, - “तुमने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना बन्द करो ॥" 106-107 ॥
स्थानीय लोगोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आना :-
शान्तिपुरेर लोक शुनि' प्रभुर आगमन।
देखिते आइला लोक प्रभुर चरण ॥ 108 ॥
चारों ओर हरिध्वनि और महाप्रभुके रूपका दर्शन कर लोगोंको आनन्दकी प्राप्ति :-
'हरि' 'हरि' बले लोक आनन्दित हञा।
चमत्कार पाइल प्रभुर सौन्दर्य देखिञा ॥ 109 ॥
गौर-देह-कान्ति सूर्य जिनिया उज्ज्वल।
अरुण-वस्त्रकान्ति ताहे करे झलमल ॥ 110 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके आगमनकी बात सुनकर शान्तिपुरके लोग उनके श्रीचरणोंके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुका दर्शन करके लोग आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। महाप्रभुके सौन्दर्यको देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये। उनके गौर-देहकी उज्ज्वल कान्ति सूर्यकी कान्तिको भी परास्त कर रही थी और संन्यासके गेरुए वस्त्र उनकी देहपर झलमल कर रहे थे ॥ 109-110 ॥
सारा दिन लोगोंका आना-जाना :-
आइसे याय लोक सब, नाहि समाधान।
लोकेर सङ्घट्टे दिन हैल अवसान ॥ 111 ॥
अनुवाद-कितने लोग आये और गये, इसका कोई हिसाब नहीं था। सारा दिन लोगोंका जमघट लगा रहा ॥ 111 ॥
अनुभाष्य - 'समाधान'- हिसाब, मीमांसा ॥ 111 ॥
सन्ध्याके समय श्रीअद्वैतका सङ्कीर्तन :-
सन्ध्याते आचार्य आरम्भिल सङ्कीर्त्तन।
आचार्य नाचेन, प्रभु करेन दर्शन ॥ 112 ॥
नित्यानन्द गोसाञि बुले आचार्य धरिञा।
हरिदास पाछे नाचे हरषित हञा ॥ 113 ॥
। 97
[ 3/112-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—सन्ध्यामें श्रीअद्वैताचार्यने सङ्कीर्तन आरम्भ
किया। श्रीअद्वैताचार्य प्रेमावेशमें नाचने लगे और महाप्रभु
उन्हें देख रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीअद्वैताचार्यको
पकड़कर उनके साथ चलने लगे (कहीं वे गिर न
जाँय)। श्रीहरिदास ठाकुर भी परमानन्दित होकर उनके
पीछे-पीछे नृत्य करने लगे॥112-113॥
अनुभाष्य—'बुले'—नाचते हुए चल रहे थे॥113॥
विद्यापतिका पद :—
कि कहिब रे सखि आजुक आनन्द ओर।
चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥114॥ध्रु॥
एइ पद गाओयाइया हर्षे करेन नर्त्तन।
स्वेद-कम्प-पुलकाश्रु-हुङ्कार-गर्जन॥115॥
अनुवाद—(श्रीअद्वैताचार्य इस पदको गाने लगे),—“हे
सखि! आजके मैं अपने आनन्दकी सीमाके विषयमें
क्या कहूँ? चिरकालके बाद आज माधव मेरे घरमें
आये हैं।” इस पदको गाते हुए श्रीअद्वैताचार्य हर्षसे नृत्य
करने लगे और उनके शरीरमें स्वेद, कम्प, पुलक,
अश्रु, हुँकार तथा गर्जन आदि सात्त्विक भाव उत्पन्न हो
गये॥114-115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'ओर'—सीमा; यह विद्यापतिका
पद है॥114॥
अनुभाष्य—विद्यापति द्वारा रचित गीत—
“कि कहब रे सखि आजुक आनन्द ओर।
चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥
पाप सुधाकर यत सुख देल।
पियामुख-दरशने तत सुख भेल॥
आचर भरिया यदि महानिधि पाइ।
तब् हाम् पिया दूरदेशे ना पाठाइ॥
*शीतेर ओड़नी पिया, गिरिशीर वा'। *
वरिषार छत्र पिया, दरियार ना'॥
भणये विद्यापति, शुन, वरनारि।
सुजनक दुख दिवस दुइ चारि॥”
अर्थात् “हे सखि! क्या बताऊँ, आज मेरे
आनन्दकी कोई सीमा नहीं है, बड़े दिनोंके बाद
माधव आज मेरे घरमें आये हैं। रात्रिमें चन्द्रमा जैसे
सुख प्रदान करता है, माधवके मुखके दर्शन करके मैं
वैसी ही सुखी हुई हूँ। आँचल भरकर भी यदि
महानिधि कोई दे, तो भी मैं उसे छोड़कर अपने
प्रियतमको अपने पास ही रखना चाहूँगी, उन्हें दूरदेश
नहीं भेजूँगी। प्रियतमका सङ्ग शीतकालमें ओढ़नीके
समान और ग्रीष्म एवं वर्षाकालमें छातेके समान
सुखदायक होता है। हे सखि! विद्यापति कहते हैं कि
सज्जनोंके दुःख दिन दो-चार ही होते हैं, एक न एक
दिन उन्हें अपने प्रियतम मिल ही जाते हैं।”
श्रीलराधामोहन ठाकुरने 'पदामृत-समुद्र' ग्रन्थमें इस
गीतकी पहली चार पंक्तियोंको नहीं लिखा। कोई-कोई
'माधव'-शब्दसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीको लक्ष्य करके इसे
श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका गीत मानते हैं, किन्तु ऐसा विचार
सङ्गत नहीं है। माथुर-विरहके बाद सम्भोग, इसकी यहाँ
अधिक सङ्गति है, ऐसा जानना होगा॥114॥
श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके निकट सविनय प्रार्थना :—
फिरि' फिरि' कभु प्रभुर धरेन चरण।
चरण धरिया प्रभुरे बलेन वचन॥116॥
“अनेक दिन तुमि मोरे बेड़ाइले भाण्डिया।
घरेते पाञाछि, एबे राखिब बाँधिया॥”117॥
एत बलि' आनन्दे आचार्य करेन नर्त्तन।
प्रहरेक-रात्रि आचार्य कैल सङ्कीर्त्तन॥118॥
अनुवाद—घूमते-घूमते श्रीअद्वैताचार्य कभी महाप्रभुके
चरण पकड़ लेते और चरण पकड़कर उनसे
कहते,—“बहुत दिनोंसे मुझे धोखा देकर भागते रहे हो,
किन्तु अब आप मेरे घरमें हो, मैं आपको बाँधकर
रखूँगा।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने आनन्दपूर्वक नृत्य
करते हुए उस रात एक प्रहर तक सङ्कीर्तन
किया॥116-118॥
98 ।