श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 942, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय 3/61-69 ]
हरिदास बले,-"मुञि पापिष्ठ अधम।
बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन॥" 63 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदासको
भी भोजन करनेके लिये घरके भीतर आनेके लिये
कहा। उनकी बात सुनकर श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदास
हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे। श्रीमुकुन्दने
कहा, - "मेरा कुछ नित्यकार्य अभी बाकी हैं, इसलिये
मैं बादमें प्रसाद पाऊँगा, आप भीतर जाइये।" श्रीहरिदासने
कहा,-"मैं पापी और अधम हूँ, इसलिये बाहर बैठकर
बादमें एक मुट्ठी प्रसाद ग्रहण करूँगा॥" 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृत्य नाहि सरे'-कर्त्तव्य कुछ
बाकी है॥ 62 ॥
प्रसादके दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द
और श्रीअद्वैतको सम्मान देना :-
दुइ प्रभु लञा आचार्य गेला भितर-घरे।
प्रसाद देखिया प्रभुर आनन्द अन्तरे॥ 64 ॥
"ऐछे अन्न ये कृष्णके कराय भोजन।
जन्मे जन्मे शिरे धरौं ताँहार चरण॥" 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको जब
श्रीअद्वैताचार्य घरके भीतर ले गये, तब प्रसादको
देखकर आनन्दित होकर महाप्रभुने कहा, - "जो व्यक्ति
इस प्रकार श्रीकृष्णको अन्न-व्यञ्जनादि अर्पण कर
भोजन कराता है, मैं उसके चरणोंको जन्म-जन्मान्तर
तक अपने सिरपर धारण करता हूँ॥" 64-65 ॥
महाप्रभुको न बतलाकर श्रीअद्वैतका दोनों
प्रभुओंके लिये आसन प्रदान करना :-
प्रभु जाने तिन भोग-कृष्णेर नैवेद्य।
आचार्येर मन-कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥ 66 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने यह समझा कि तीनों भोग
श्रीकृष्णको समर्पित हुए हैं, परन्तु श्रीअद्वैताचार्यके
मनकी बातको महाप्रभु नहीं जान पाये ॥ 66 ॥
अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभुने तीन भागोंमें भोगको समान
मात्रामें बाँटकर सजा दिया था। (इसी अध्यायकी 42
संख्या देखें), उसमेंसे धातुके पात्रमें सजाया गया भोग
श्रीकृष्णके लिये था; और बाकी दो भाग केलेके पत्तोंके
ऊपर सजाये गये थे। धातुके पात्रवाले भोगको श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं श्रीकृष्णको निवेदन किया था। बाकी केलेके
पत्तोंवाले दो भोग श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
लिये अनिवेदित अवस्थामें ही रखे हुए थे, -उनको
श्रीअद्वैताचार्यने मन-ही-मनमें रखा था, महाप्रभुके सामने
उन्होंने इस बातको प्रकाशित नहीं किया। इसलिये
महाप्रभुने तीनों भोगोंको ही श्रीकृष्णका नैवेद्य-प्रसाद ही
समझा था॥ 66 ॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य, दोनोंका ही एक दूसरेको
भोजन करनेके लिये अनुरोध :-
प्रभु बले,-"वैस तुमि करिते भोजन।"
आचार्य कहे,-"आमि करिब परिवेश्न ॥" 67 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे कहा,-"आप
भी बैठकर भोजन कीजिये।" यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने
कहा,-"मैं भोजन परोसूँगा ॥" 67 ॥
महाप्रभुके वचन :-
"कोन् स्थाने बसिब, आर आन दुइ पात।
अल्प करि' ताहे आनि' देह व्यञ्जन भात ॥" 68 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 68 ॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,-"मैं
और नित्यानन्द किस स्थानपर बैठेंगे?" भोगके परिमाणको
बहुत अधिक देखकर और भी अन्य दो पात्रको लाकर
उनमें ही कम मात्रामें अन्न-व्यञ्जन देनेको कहा ॥ 68 ॥
श्रीअद्वैताचार्यका दोनों प्रभुओंको आसन-प्रदान :-
आचार्य कहे,-"बैस दाँहे पिण्डार उपरे।"
एत बलि' हाते धरि' बसाइल दुँहारे ॥ 69 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-"आप दोनों यहाँ
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