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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 938

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

तीसरा अध्याय 3/20-29 ]
नौकामें हमारी प्रतीक्षा करें। तब आप नवद्वीप जाकर
शचीमाताके साथ सभी भक्तोंको लेकर शान्तिपुर आ
जाना॥” 20-22 ॥
महाप्रभुके सामने निताइका अचानक आगमन :-
ताँरे पाठाइया नित्यानन्द महाशय।
महाप्रभुर आगे आसि' दिल परिचय ॥ 23 ॥
अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आचार्यको भेजकर श्रीनित्यानन्द
प्रभु महाप्रभुसे आगे निकलकर उनके सामने आये ॥ 23 ॥
श्रीनित्यानन्दको देखकर महाप्रभुकी जिज्ञासा
और श्रीनिताइका छल :-
प्रभु कहे,—“श्रीपाद, तोमार कोथाके गमन।”
श्रीपाद कहे,—“तोमार सङ्गे याब वृन्दावन ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीपाद! आप कहाँ
जा रहे हैं?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मैं भी आपके
साथ वृन्दावन जाऊँगा ॥” 24 ॥
गङ्गाको यमुना कहकर दिखलाना :-
प्रभु कहे,—“कत दूरे आछे वृन्दावन।”
तेंहो कहेन,—“कर एइ यमुना दरशन ॥” 25 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, — “वृन्दावन कितनी दूर
है?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “वह देखिये, सामने ही
श्रीयमुनाके दर्शन कीजिये ॥” 25 ॥
महाप्रभुको गङ्गाके दर्शनसे यमुनाका उद्दीपन :-
एत बलि' आनिल ताँरे गङ्गा-सन्निधाने।
आवेशे प्रभुर हैल गङ्गांरे यमुना-ज्ञाने ॥ 26 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें
गङ्गाके तटपर ले आये। आवेशमें डूबे हुए महाप्रभुने
गङ्गाको यमुना ही समझा ॥ 26 ॥
महाप्रभुके द्वारा यमुनाका स्तव :-
“अहो भाग्य, यमुनारे पाइलूँ दरशन।”
एत बलि' यमुनार करेन स्तवन ॥ 27 ॥
अनुवाद—“मेरा अहो भाग्य है कि मैंने यमुनाका
दर्शन पाया है।”—यह कहकर महाप्रभु यमुनाकी स्तव-स्तुति
करने लगे ॥ 27 ॥
चैतन्यचन्द्रोदयनाटक (5/13)में उद्धृत पद्मपुराणवाक्य :-
चिदानन्दभानोः सदा नन्दसूनोः
परप्रेमपात्री द्रवब्रह्मगात्री।
अघानां लवित्री जगत्क्षेमधात्री
पवित्रीक्रियान्नो वपुर्मित्रपुत्री ॥ 28 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चिदानन्दसूर्यस्वरूप नन्दनन्दनकी
सर्वदा प्रेमकी पात्री, ब्रह्मद्रवस्वरुपिणी, पापनाशिनी, जगत्की
मङ्गलकारिणी, सूर्यपुत्री यमुना हमारे शरीरोंको पवित्र
करें ॥ 28 ॥
अनुभाष्य—
चिदानन्दभानोः (सम्वित्प्रीतिप्रकाशकस्य) नन्दसूनोः (कृष्णस्य)
सदा (नित्यं) परप्रेमपात्री (परमप्रीतिप्रदात्री) द्रवब्रह्मगात्री
(चित्सलिलरूपा) अघानाम् (अपराधानां) लवित्री (विनाशयित्री)
जगत्क्षेमधात्री (जगतां लोकानां मङ्गलविधात्री) मित्रपुत्री (रविसुता
कालिन्दी यमुना) नः (अस्माकं) वपुः [दिव्यज्ञानेन] पवित्रीक्रियात्
(शुद्धी कुर्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—प्रीति-प्रकाशक सम्वित्के
अधिष्ठाता नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी नित्य परम प्रीतिको
प्रदान करनेवाली, चिन्मय जलरूपा, अपराधोंका विनाश
करनेवाली, जगत्के मङ्गलका विधान करनेवाली हे
सूर्यपुत्री यमुना! हमारा दिव्यज्ञानके द्वारा शोधन करो ॥ 28 ॥
एक कौपीनमात्र ही महाप्रभुका सहारा :-
एत बलि' नमस्करि' कैल गङ्गास्नान।
एक कौपीन, नाहि द्वितीय परिधान ॥ 29 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने नमस्कार करके
गङ्गामें स्नान किया। महाप्रभुने जो कौपीन पहना था,
उसके अतिरिक्त उनके पास दूसरा कोई वस्त्र नहीं
था ॥ 29 ॥
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