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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

दूसरा अध्याय 2/70-72 ]
अमृताणुकणिका—पुनः जैसे श्रीकृष्ण आकर
बोले, — 'प्रिये ! किसलिये मान करके मुझे कटु वचन
कह रही हो? मेरे प्रति प्रसन्न होओ।' इस प्रकार
अनुनय कर रहे हैं, ऐसा मनमें जानकर अमर्षके
अनुगत अवहित्था भाव राधाजीमें उदय हुआ। अवहित्था
भाव उदय होनेपर राधाजी धीरप्रगल्भ भावके गुणका
आश्रयकर उदासीनतासे कहने लगीं, — ' 'हे नाथ !' तुम
तो हम ब्रजवासियोंके रक्षक हो, ऐसी कौनसी निर्बुद्धि
(मूर्ख) रमणी है, जो तुम्हें सन्तुष्ट नहीं करेगी? किन्तु
ब्राह्मणियोंके कहनेपर मैंने मौनव्रत धारण किया था, इस
कारण मैं अब तक तुमसे बातचीत नहीं कर पायी,
इसलिये मेरा यह अपराध क्षमा करो—यह भाव है।'
धीरप्रगल्भाके लक्षण (उःनीः 5/53)—
"उदास्ते सुरते धीरा सावहित्था च सादरा॥”
अर्थात् “मानिनी अवस्थाको प्राप्त होकर सम्भोगके
विषयमें उदासीना और अवहित्थाके द्वारा अपने मानके
भावको गुप्त रखकर ऊपरसे कान्तके प्रति आदर
दिखलानेवालीको 'धीरप्रगल्भा' कहते हैं।"
पुनः श्रीकृष्ण जैसे चले गये हैं, ऐसा मन-ही-मनमें
कहने लगीं, — 'बार-बार मेरे व्यवहारसे दुःखी होकर
चले गये हैं, अब वे लौटकर नहीं आयेंगे।' ऐसा मनमें
भाव आनेसे चापल नामक भावके उदय होनेसे मनमें
चिन्तन करने लगीं, — 'यदि कृपापूर्वक पुनः वे दर्शन
प्रदान करेंगे, तब मैं स्वयं ही उनके कण्ठको धारण
करूँगी (गले लग जाऊँगी)।' इस प्रकार दैन्यसहित
बोलने लगीं, — ' 'हे रमण !' तुम सदा ही मुझे आनन्द
प्रदान करते हो, इसलिये पहलेके समान अब भी
आकर मेरे साथ विहार करो—यह अर्थ है ॥'70॥

मोर वाक्य निन्दा मानि', कृष्ण छाड़ि' गेला जानि,
शुन, मोर ए स्तुति-वचन।
नयनेर अभिराम, तुमि मोर धन-प्राण,
हाहा पुनः देह दरशन ॥" 71 ॥

अनुवाद—[हे नयनाभिराम!] मेरे वचनोंको निन्दा
मानकर कृष्ण मुझे छोड़कर चले गये हैं, ऐसा मानकर
श्रीराधिका कहने लगीं— हे कृष्ण! मेरे मधुर वचन
सुनो। तुम मेरे नयनोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हो,
तुम ही मेरे प्राण-धन हो। हा-हा! मुझे पुनः दर्शन
दो॥"71॥
अमृताणुकणिका—अब सामने श्रीकृष्ण आये हैं,
यह जानकर सहज उत्सुकताके द्वारा मन आक्रान्त
होनेपर राधाजीने आलिङ्गनके लिये दोनों भुजायें फैला
दीं। किन्तु श्रीकृष्णको न पानेपर बाह्य स्फूर्ति होनेपर
अत्यन्त विकलताके साथ कहने लगीं, — 'हे नयनाभिराम !'
हे नयनोंके आनन्ददायक ! कब तुम मेरे नयनपथके
पथिक होओगे ?' अर्थात् राधाजी अति खेदसे कह रही
हैं, हाय हाय, कब तुम मेरे दृष्टिगोचर होओगे ? ॥ 71 ॥
महाप्रभुके महाभावके लक्षण :-
स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद,
देह हैल पुलके व्यापित।
हासे, कान्दे, नाचे, गाय, उठि' इति-उति धाय,
क्षणे भूमे पड़िया मूर्च्छित ॥ 72 ॥
अनुवाद—राधाभावाविष्ट महाप्रभुके शरीरमें श्रीकृष्ण
विरहके कारण स्तम्भ, कम्प, स्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु,
स्वरभेद, पुलकादि सात्त्विकभाव उदित हो गये। वे कभी
हँसते, कभी रोते, कभी नाचते, कभी गाते, कभी
इधर-उधर दौड़ते और कभी मूर्च्छित होकर भूमिपर
गिर पड़ते ॥ 72 ॥
अनुभाष्य—'स्तम्भ'—अष्ट-सात्त्विक विकारोंमें एक।
(भ.र.सि. दःविः तृतीय लः)—
“चित्तं सत्त्वीभवत् प्राणे न्यस्यत्यात्मानमुद्धतम्।
प्राणस्तु विक्रियां गच्छन् देहं विक्षोभयत्यलम्।
तदा स्तम्भादयो भावा भक्तदेहे भवन्त्यमी ॥
स्तम्भं भूमिस्थितः प्राणस्तनोति।
स्तम्भो हर्षभयाश्चर्यविषादामर्षसम्भवः ।
तत्र वागादि-राहित्यं नैश्चल्यं शून्यतादयः ॥”
। 71

[ 2/72-73 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अर्थात् “चित्त सात्त्विक भाव प्राप्त करनेपर चञ्चल
मनको प्राणमें समर्पण कर देता है, उससे प्राण भी
विकार प्राप्त होनेपर देहको क्षुब्ध करते हैं। तब
भजनशीलकी देहपर स्तम्भादि सात्त्विक भावोंका उदय
होता है। प्राण पञ्चभूतोंमेंसे भूमिपर स्थित होनेसे ‘स्तम्भ’
विकार होता है। हर्ष, भय, विस्मय, विषाद और क्रोधसे
स्तम्भ उत्पन्न होता है। स्तम्भमें वाणी-हस्त-पादादिका
चेष्टारहित होना, निश्चलता एवं शून्यताके कारण अन्य
इन्द्रियोंकी क्रियाओंका स्थगित होना लक्षण प्रकाशित
होते हैं। स्तम्भ मनकी एक विशेष अवस्थाका नाम है।
वाक्यादि रहित देहमें उत्पन्न विकार बाहरमें और
अन्तरमें व्याप्त होकर अवस्थान करते हैं। ये विकार
पहले सूक्ष्म देहमें अवस्थित होते हैं और बादमें स्थूल
देहमें अवस्थित होते हैं। वाक्यादि-हीनता कर्मेन्द्रियोंकी
और शून्यता ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियारहित होनेके ज्ञापक
हैं।”
‘कम्प’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“वित्रासामर्षहर्षाद्यैर्वेपथुर्गात्रलौल्यकृत्॥”
अर्थात् “विशेष भय, क्रोध और हर्षादिके द्वारा
शरीरमें जो चञ्चलता उत्पन्न होती है, उसे ‘वेपथु’ या
‘कम्प’ कहते हैं।”
‘वैवर्ण्य’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“विषादरोषभीत्यादेर्वैवर्ण्यं वर्णविक्रिया।
भावज्ञैरत्र मालिन्यकार्श्याद्याः परिकीर्त्तिताः॥”
अर्थात् “विषाद, क्रोध और भयादिसे शरीरमें
वर्ण-विकारको ‘वैवर्ण्य’ कहते हैं। वैवर्ण्यसे देहमें
मलिनता और कृशतादि होती है।”
‘अश्रु’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“हर्षरोषविषादाद्यैरश्रु नेत्रे जलोद्गमः।
हर्षजेऽश्रुणि शीतत्वमौष्ण्यं रोषादि सम्भवे।
सर्वत्र नयनक्षोभ-रागसंमार्जनादयः॥”
अर्थात् “हर्ष, क्रोध और विषादादिके द्वारा बिना
प्रयत्नके नेत्रोंमें जो जल-भर आता है, उसे ‘अश्रु’
कहते हैं। हर्षजनित अश्रुओमें शीतलता और क्रोधादिजनित
अश्रुओंमें उष्णता लक्षित होनेपर भी सभी अश्रुओंमें
नेत्रोंकी चञ्चलता, लालिमा और उनका पोंछनाादि देखा
जाता है।”
‘स्वेद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“स्वेदो हर्षभयक्रोधादिजः क्लेदकरस्तनोः॥”
अर्थात् “हर्ष, भय और क्रोधादिसे उत्पन्न जो
शरीरमें क्लेद (पसीना) आता है उसको ‘स्वेद’ कहते
हैं।”
‘गद्गद’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“विषादविस्मयामर्षहर्षभीत्यादिसम्भवम्।
वैस्वर्यं स्वरभेदः स्याद्देश गद्गदिकादिकृत्।”
अर्थात् “विषाद, आश्चर्य, क्रोध, आनन्द और
भयादिसे ‘स्वरभेद’ या ‘वैस्वर्य’ होता है। इस स्वरभेदमें
वाणी गद्गद हो जाती है।”
‘पुलक’—(भःरःसिः दःविः तृतीय लः)—
“रोमाञ्चोऽयं किलाश्चर्यहर्षोत्साहभयादिजः।
रोम्णामभ्युद्गमस्तत्र गात्रसंस्पर्शनादयः॥”
अर्थात् “विस्मय, हर्ष, उत्साह और भयादिसे रोम
खड़े होनेसे ‘पुलक’ या ‘रोमाञ्च’ होता है और शरीरमें
किसी वस्तुके स्पर्श जैसा अनुभव होने लगता है॥”72॥
महाप्रभुको कृष्णदर्शनका भ्रम :—
मूर्च्छाय हैल साक्षात्कार, उठि’ करे हुहुङ्कार,
कहे—एइ आइला महाशय।
कृष्णेर माधुरी-गुणे, नाना भ्रम हय मने,
श्लोक पड़ि’ करये निश्चय॥ 73 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको मूर्च्छित अवस्थामें श्रीकृष्णका
साक्षात्कार हुआ। वे आनन्दमें भरकर सहसा उठे और
जोरसे हुङ्कार करके कहने लगे,—‘ये महाशय (श्रीकृष्ण)
आये हैं।’ श्रीकृष्णकी माधुरी और गुणोंके प्रभावसे
उनका मन अनेक प्रकारसे भ्रमित होने लगा और वे
एक श्लोक पढ़कर श्रीकृष्णकी उपस्थितिको निश्चित
करने लगे॥ 73 ॥
72 ।

दूसरा अध्याय 2/74-76 ]
श्रीकृष्णकर्णामृतमें (68) बिल्वमङ्गल-वाक्य :-
मारः स्वयं नु मधुरद्युतिमण्डलं नु
माधुर्यमेव नु मनो नयनामृतं नु।
वेणीमृजो नु मम जीवितवल्लभो नु
कृष्णोऽयमभ्युदयते मम लोचनाय॥ 74 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 74 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि! साक्षात् कन्दर्पस्वरूप,
द्युतिसमूहके माधुर्यस्वरूप, मूर्त्तिमान् माधुर्यस्वरूप, मन-नयनके
अमृतस्वरूप, गोपियोंके (वेणी-मोचनकारी) आनन्दस्वरूप,
मेरे प्राणवल्लभस्वरूप, साक्षात् नन्दनन्दन ही हैं, जो मेरे
दर्शनपथपर प्रकट हुए हैं॥ 74 ॥
अनुभाष्य—
मारः (कन्दर्पः) नु (किं) स्वयं नु (वितर्के) मधुरद्युतिमण्डलं
(हृत्स्पर्शि सुन्दरस्निग्धज्योतिर्बिम्बं) नु (किं न) तत् माधुर्यम्
एव नु (किं), मनोनयानामृतं (हृदयनेत्रसुधास्वरूपः) नु
(किं), वेणीमृजः (वेण्युन्मोचनकारी) नुः (किं) अयं जीवितवल्लभः
(कृष्णः) मम लोचनाय (लोचनसुखदातुं) अभ्युदयते (मत्सन्निधौ
प्रकटयति)।
श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! क्या साक्षात् कामदेव
यहाँ आये हैं? नहीं, क्या ये पुरुष हृदयस्पर्शि
सुन्दर-स्निग्ध ज्योतिर्बिम्ब हैं? अथवा क्या मूर्त्तिमान
माधुर्य हैं? अथवा क्या मेरे मन-नयनोंके अमृतस्वरूप
हैं? क्या ये गोपियोंके वेणी-मोचनकारी कान्त हैं?
अथवा क्या ये मेरे जीवन-वल्लभ कृष्ण हैं, जो मेरे
नयनोंको आनन्द प्रदान करनेके लिये मेरे दृष्टिपथपर
प्रकट हुए हैं?॥ 74 ॥
अमृतानुकणिका—'श्रीकृष्णका दर्शन मेरे भाग्यमें
नहीं हैं'—इस प्रकार सखियोंके साथ बात करते-करते
अकस्मात् श्रीकृष्णको दूरसे देखकर विरहमें व्याकुल
राधाजी कहने लगीं,—'मारः स्वयं नु', हे सखियों! जो
अदृश्य रहकर भी जगत्को मारते हैं, वे 'मार' अर्थात्
कन्दर्प क्या स्वयं आये हैं?' 'नु'—शब्दका अर्थ वितर्क
से है। पुनः माधुर्य अनुभव करके आश्चर्यसहित
बोलीं, —'कन्दर्प इस प्रकार मधुर नहीं हो सकता, तो
क्या ये मधुर ज्योतिसमूहके मण्डल हैं?' पुनः अत्यन्त
आश्चर्य अनुभव करके कहने लगीं,—'माधुर्य ही क्या
साक्षात् मूर्त्तिमान् होकर प्रकट हुआ है?' पुनः मन और
नयनोंकी अतिशय तृप्तिसे परम सन्तोषसे कहने लगीं,—'ये
क्या मन और नयनोंको तृप्त करनेवाले अमृतस्वरूप
हैं?' पुनः अपनी देहको अनुभव करके सम्भ्रमसे कहने
लगीं,—'मेरी वेणी खोलनेवाले विदेशसे आये मेरे कान्त
हैं क्या?' पुनः सम्पूर्णरूपसे अवलोकन करके आनन्दके
साथ बोलीं,—'हे सखियों! ये मेरे प्राणवल्लभ नवकिशोर
कृष्ण हैं, जो मेरे नयनोंके आनन्दको वर्धित करनेके
लिये आये हैं, तुम सब उनके दर्शन करो।'
'मारः स्वयं नु' आदिसे लेकर 'वेणीमृजः' तक
सन्देह ही है। 'मम जीवितवल्लभः कृष्णः अभ्युदयते'—यह
निश्चित है। इसलिये यह सन्देहान्त निश्चय अलङ्कार
है॥ 74 ॥
श्लोकका अर्थ :-
"किवा एइ साक्षात् काम, द्युतिबिम्ब मूर्त्तिमान्,
कि माधुर्य स्वयं मूर्त्तिमन्त।
किवा मनो-नेत्रोत्सव, किवा प्राणवल्लभ,
सत्य कृष्ण आइला नेत्रानन्द॥" 75 ॥
अनुवाद—"क्या ये साक्षात् कामदेव हैं अथवा
ज्योतिपुञ्ज मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुए हैं? क्या समस्त
माधुर्य ही मूर्त्तिमान होकर प्रकट हुआ है? या ये मेरे
मन-नेत्रोंके उत्सवस्वरूप हैं? क्या ये मेरे प्राणवल्लभ
हैं? ये सचमुच कृष्ण ही हैं जो मेरे नेत्रोंको आनन्द
देनेके लिये आये हैं॥" 75 ॥
भावके वशीभूत महाप्रभु :-
गुरु—नाना भावगण, शिष्य—प्रभुर तनु-मन,
नाना रीते सतत नाचाय।
निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, मन्यु,
एइ नृत्ये प्रभुर काल याय॥ 76 ॥
। 73

[ 2/76–79 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद— निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, क्रोधादि भाव गुरुके समान महाप्रभुके शरीर और मनरूपी शिष्यको अनेक प्रकारसे सदा नचाते। इसी प्रकार उनका सारा समय व्यतीत होता॥ ७६॥
अनुभाष्य— गुरु जिस प्रकार शासन करके शिष्योंको कलाकी शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके हृदयके भाव गुरु बनकर महाप्रभुके श्रीअङ्ग और मनरूपी दो शिष्योंको नाना प्रकारसे नृत्य कराते॥ ७६॥
स्वरूप-रामानन्दके साथ महाप्रभुकी प्रतिदिनकी कार्यावली :—
चण्डीदास, विद्यापति, रायेर नाटक–गीति,
कर्णामृत, श्रीगीतगोविन्द।
स्वरूप–रामानन्द–सने, महाप्रभु रात्रि–दिने,
गाय, शुने—परम आनन्द॥ ७७॥
अनुवाद— श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराय रामानन्दके साथ महाप्रभु (अपने भावोंके अनुरूप) रात-दिन श्रीचण्डीदास और श्रीविद्यापतिके पद, श्रीराय रामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटक, श्रीबिल्वमङ्गलके श्रीकृष्णकर्णामृत और श्रीजयदेव गोस्वामीके श्रीगीतगोविन्दके श्लोक गाते और सुनते परम आनन्दसे समय बिताते॥ ७७॥
अनुभाष्य— 'रायेरे नाटक'—'जगन्नाथवल्लभ' नाटक; 'गीति'— श्रीचण्डीदास, श्रीविद्यापति, श्रीराय रामानन्द, श्री बिल्वमङ्गल और श्रीजयदेव—इनके द्वारा रचित ग्रन्थोंकी पदावलीका गान॥ ७७॥
महाप्रभुके विभिन्न रसाश्रित भक्तगण :—
पुरीर वात्सल्य मुख्य, रामानन्देर शुद्धसख्य,
गोविन्दाद्येर शुद्धदास्यरस।
गदाधर, जगदानन्द, स्वरूपेरे मुख्य रसानन्द,
एइ चारि भावे प्रभु वश॥ ७८॥
अनुवाद— श्रीपरमानन्द पुरीका महाप्रभुके प्रति वात्सल्यभाव था। श्रीराय रामानन्दका उनमें शुद्धसख्य-भाव, श्रीगोविन्दादिका उनमें दास्यभाव था। श्रीगदाधर पण्डित, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदरका महाप्रभुमें मुख्य (मधुर) रसमें प्रेम था। महाप्रभु इन चार भावोंके वशीभूत रहते थे॥ ७८॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'पुरीर'— श्रीपरमानन्द पुरीका। 'मुख्यरस'— मधुर रस॥ ७८॥
अनुभाष्य— श्रीपरमानन्द पुरीका (व्रजके उद्धवका) वात्सल्य-रसप्रधान भाव, श्रीरामानन्दका (अर्जुन या विशाखाका) शुद्ध सख्यभाव, श्रीगोविन्दादि सेवकोंका शुद्ध दास्यभाव, और अन्तरङ्ग-भक्त श्रीगदाधर, श्रीजगदानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरका मुख्य मधुररस,—इन चार भावोंमें महाप्रभु उनकी भजन-सङ्गसुख-सेवा ग्रहण करके उनके वशीभूत थे॥ ७८॥
महाप्रभुके पक्षमें मधुररसमें महाभाव आश्चर्यजनक नहीं :—
लीलाशुक–मर्त्यजन, ताँर हय भावोद्गम,
ईश्वरे से–कि इहा विस्मय।
ताहे मुख्य–रसाश्रय, हइयाछे महाशय,
ताते हय सर्वभावोदय॥ ७९॥
अनुवाद— लीलाशुक (श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर) यद्यपि मनुष्य थे, तो भी उनके शरीरमें अनेक भावोंके विकार प्रकट होते थे। तो फिर इसमें क्या आश्चर्यकी बात है कि ये भाव स्वयं भगवान् महाप्रभुके शरीरमें उदित हुए। मधुररसके भावोंमें डूबे हुए महाप्रभुकी तो सर्वोच्च स्थिति है, इसलिये सभी प्रकारके भाव उनके शरीरमें दिखायी देते थे॥ ७९॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'लीलाशुक'— श्रीबिल्वमङ्गल गोस्वामी। इनके पूर्व आश्रमका नाम शिहलण मिश्र था और ये दक्षिण भारतके ब्राह्मण थे। गृहस्थ-धर्मका शास्त्रोचित रूपसे पालन करते-करते चिन्तामणि नामक वेश्यासे उपदेश सुनकर इन्हें वैराग्य हो गया और 'शान्तिशतक' नामक ग्रन्थकी रचना की। बादमें श्रीकृष्ण-वैष्णव कृपासे भक्तिलाभ करके इनका नाम
74 ।

दूसरा अध्याय 2/79-83 ]


'बिल्वमङ्गल गोस्वामी' हुआ और इन्होंने 'श्रीकृष्णकर्णामृत'
ग्रन्थकी रचना की। उनके प्रेमसे उन्मत्त भावोंको
देखकर लोग उन्हें 'लीलाशुक' कहते थे॥ 79 ॥
अनुभाष्य- 'लीलाशुक'—इनके अन्य नाम 'लीलासुख',
'चित्सुखाचार्य' और 'बिल्वमङ्गल' थे। ये विष्णुस्वामी
सम्प्रदायके त्रिदण्डिस्वामी थे। आदिलीला 1/57 का
अनुभाष्य देखें॥ 79 ॥

आश्रयके प्रणयभावमय विषयविग्रह श्रीगौरसुन्दर :—
पूर्व व्रजविलासे, येइ तिन अभिलाषे,
सेइ यत्ने आस्वादन नहिल।
श्रीराधार भावसार, आपने करि' अङ्गीकार,
सेइ तिनवस्तु आस्वादिल॥ 80 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णकी पहले व्रजलीलामें जिन तीन
भावोंको आस्वादन करनेकी अभिलाषा थी, परन्तु सब
प्रकारसे यत्न करनेपर भी वे उन्हें पूरा नहीं कर पाये,
क्योंकि ये भाव श्रीमती राधिकाकी सम्पत्ति हैं। इसलिये
श्रीकृष्णने राधाजीके इन भावोंको अङ्गीकार करके
महाप्रभुके रूपमें अवतरित होकर उन तीन भावोंका
आस्वादन किया॥ 80 ॥
अनुभाष्य— आदिलीला 4/230 संख्या देखें॥ 80 ॥

महावदान्य महाप्रभुके द्वारा उसी आश्रयका सेवा-भाव-वितरण :—
आपने करि' आस्वादने, शिखाइल भक्तगणे,
प्रेमचिन्तामणिर् प्रभु धनी।
नाहि जाने स्थानास्थान, यारे तारे कैल दान,
महाप्रभु—दाता-शिरोमणि॥ 81 ॥

अनुवाद— श्रीकृष्णप्रेमके भावोंका महाप्रभुने स्वयं तो
आस्वादन किया ही और अपने भक्तोंको भी इसकी
शिक्षा दी। वे कृष्णप्रेमरूपी चिन्तामणिके धनसे धनी हैं।
उन्होंने इस धनका पात्र-अपात्रका विचार न करके
सर्वत्र ही इसका दान किया, इसलिये वे दान करनेवालोंमें
शिरोमणि हैं॥ 81 ॥


अमृतप्रवाह भाष्य— प्रभु श्रीचैतन्यदेवका प्रेम-चिन्तामणि
ही धन है ओर वे उस धनसे धनी हैं। प्राकृत-चिन्तामणिके
कार्यके समान प्रेम-चिन्तामणि भी अनेक-अनेक
प्रेम-चिन्ताणियोंका उत्पादन करनेपर भी महाप्रभुके
भण्डारमें वह पूर्णरूपसे विराजमान है। और भक्त
महाप्रभुके द्वारा दी गयी प्रेम-चिन्तामणिसे अनन्त-कोटि
चिन्तामणियाँ समस्त जगत्में विस्तार करते हैं॥ 81 ॥

परम दयाल अवतार :—
एइ गुप्त भाव-सिन्धु, ब्रह्मा ना पाय एक बिन्दु,
हेन धन बिलाइल संसारे।
ऐछे दयालु अवतार, ऐछे दाता नाहि आर,
गुण केह नारे वर्णिवारे॥ 82 ॥

अनुवाद— महाप्रभुके हृदयमें जिन गुप्त भावोंका
सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी ब्रह्माजी जैसे ऐश्वर्य-भावके
भक्त नहीं पा सकते। परन्तु महाप्रभु ऐसे दयालु
अवतार हैं, जिन्होंने अहैतुककृपावश इस धनका संसार
भरमें दान किया है। उन जैसा महान् दाता जगत्में
और कोई नहीं है, इसलिये उनके दिव्य-गुणोंका कौन
वर्णन कर सकता है ? ॥ 82 ॥

श्रीचैतन्य-आनुगत्यके बिना कृष्णसेवा-प्राप्ति असम्भव :—
कहिबार कथा नय, कहिले केह ना बुझय,
ऐछे चित्र चैतन्येर रङ्ग।
सेइ से बुझिते पारे, चैतन्येर कृपा याँरे,
हय ताँर दासानुदास-सङ्ग॥ 83 ॥

अनुवाद— कृष्णप्रेमके जो भाव महाप्रभु दिखला रहे
हैं, उनकी चर्चा साधारण लोगोंमें नहीं करनी चाहिये,
क्योंकि वे उन्हें समझ नहीं सकते। महाप्रभुकी ऐसी
अद्भुत लीलाएँ हैं। यदि कोई इसे समझ सकता है, तो
यह निश्चय जानना चाहिये कि वह महाप्रभुका कृपापात्र
है जिसे उन्होंने अपने दासके दासका सङ्ग दिया
है॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— इस राधानुगत भावतत्त्वमें


। 75

[ 2/83-86 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
साधारण लोगोंका अधिकार नहीं है। अयोग्यपात्रसे ये
भाव कहनेसे वे 'सहजिया', 'बाउल' आदि लोगोंके
विकृत भावोंकी भाँति इनका रूपान्तर ग्रहण करेंगे।
पाण्डित्यका अभिमान रखनेवाले व्यक्ति भी इस रसत्तत्त्वमें
प्रवेश करने योग्य नहीं हैं॥83॥
श्रीदामोदर स्वरूप और श्रीरघुनाथसे भक्तोंके
द्वारा महाप्रभुके भावोंका श्रवण :-
चैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार,
तेंहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे।
ताँहा किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इँहा विस्तारिलुँ,
भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे ॥ 84 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि
हैं जो श्रीस्वरूप दामोदरके भण्डारमें रखी हैं। श्रीस्वरूप
दामोदरने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको इन लीलाओंकी
व्याख्या की थी। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके द्वारा कण्ठस्थ
उन लीलाओंमें जो कुछ मैंने (ग्रन्थकार) सुनी हैं,
उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह
भक्तोंके निमित्त भेंट है॥84॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुकी
शेषलीलाको सूत्ररूपमें अपने कड़चामें लिखा था और
उसे श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके कण्ठमें रखा था, अर्थात्
उन्हें कण्ठस्थ करावकर श्रीकृष्णदास कविराजके द्वारा
जगत्में इनका प्रचार करवाया। इसलिये श्रीस्वरूप
दामोदरका कड़चा पृथक् पुस्तकके रूपमें नहीं लिखा
गया है। यह श्रीचैतन्यचरितामृत ही श्रीस्वरूप दामोदरके
कड़चाका निष्कर्ष है॥84॥
अनुभाष्य- 'भेटे'- उपहार ॥84॥
ग्रन्थकार की निरपेक्षता :-
यदि केह हेन कय, ग्रन्थ कैल श्लोकमय,
इतर-जने नारिबे बुझिते।
प्रभुर येइ आचरण, सेइ करि वर्णन,
सर्व-चित्त नारि आराधिते ॥ 85 ॥
अनुवाद-यदि कोई कहे कि इस ग्रन्थमें अनेक
संस्कृतके श्लोक हैं जिन्हें साधारण लोग नहीं समझ
सकते, तो मेरा यह कहना है कि महाप्रभुकी लीलाएँ
जैसी हैं [और उन्होंने जिन श्लोकोंका पाठ किया है],
मैंने उनका वैसा ही वर्णन किया है। मैं सभीके मनको
प्रसन्न करनेके लिये महाप्रभुकी लीलाओंको तोड़-मरोड़कर
नहीं लिख सकता॥85॥
अनुभाष्य-(श्रीकृष्णदास कविराजके भाव)
श्रीगौरसुन्दरके चरित्रका यथायथ (अर्थात् जैसा है, वैसा)
वर्णन करते हुए मैंने सभी मतवादियोंकी प्रशंसाका पात्र
बननेकी इच्छा नहीं की है। वे लोग मेरी निन्दा करेंगे,
यह विचार करके यहाँ महाप्रभुके चरित्रकी वास्तविक
कथा न लिखकर कुछ अंशोंका वर्जन (त्याग) या
वर्द्धन या आवरण (ढकना) या शोधन नहीं किया। इस
ग्रन्थमें संस्कृत श्लोकोंको सम्मिलित करनेसे अनेक
लोग तर्क कर सकते हैं कि संस्कृत न जाननेवाले
लोग श्लोकोंके वास्तविक भावार्थको नहीं समझ
सकेंगे ॥85॥
नाहि काँहा सविरोध, नाहि काँहा अनुरोध,
सहज वस्तु करि विवरण।
यदि हय राग Florist, ताँहा हये आवेश,
सहज वस्तु ना याय लिखन ॥ 86 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहीं भी किसी वस्तु
अथवा व्यक्ति विशेषके विचारोंके न तो विरोध अथवा
अनुरोधके प्रभावमें कुछ लिखा है। केवलमात्र महाप्रभुकी
लीला और सिद्धान्तको सहज रूपसे जैसा मैंने श्रेष्ठ
वैष्णवोंके मुखसे सुना है, वैसा ही लिखा है। यदि
किसीसे मेरा रागका उद्देश्य होगा, तो मेरा उसमें आवेश
होगा और मैं उन्नत भक्तोंके मुखसे श्रवण की गयी
वाणीको यथायथ (जैसी है, वैसी) नहीं लिख पाऊँगा ॥86॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे इस ग्रन्थमें कहीं भी
किसीके भी सिद्धान्तका विरोध नहीं है, अथवा अन्य
76 ।

दूसरा अध्याय 2/86-89 ]
किसी व्यक्तिके मतके प्रति अनुरोध भी नहीं है। मैंने
सहजतत्त्व विचार करके लिखा है। जीवके लिये
रागतत्त्व ही सहज है, परन्तु विचारतत्त्व सहज नहीं है।
रागतत्त्वसे जो उदित होता है, वही श्रीमहाप्रभुके द्वारा
प्रदर्शित भजनतत्त्व है। यदि किसी अन्यके मतसे या
अन्य प्रकार तर्कसिद्धान्तसे रागका उद्देश्य हो, तो उसमें
आविष्ट होकर निरपेक्षता दूर हो जाती है; इसलिये
जीवका स्वतःसिद्ध सहजत्व लिखा नहीं जाता है॥86॥
मध्यलीला दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-इस ग्रन्थमें किसी वस्तुकी अपेक्षा करके
मैंने किसीके साथ विरोध या किसीके साथ अनुरोधके
वशीभूत होकर कुछ नहीं लिखा है; मैंने केवलमात्र
सहज-वस्तुका विवरण लिखा है। जिसमें महाप्रभुके प्रति
राग हो जाय और उसमें आविष्ट हो जाय, तो वह
सभी लिखित वर्णनके अर्थोंको सहज ही समझ लेगा।
सहज वस्तु रागानुगजनोंके द्वारा ही अनुभव करनेकी
वस्तु है। इस प्रकार लिखी लेखनी रागमें आविष्ट
व्यक्तिके हृदयमें स्फुरित होगी; रागहीन व्यक्ति उस
लेखनीमें उस प्रकार प्रवेश नहीं कर पायेंगे। सहज वस्तु
अनुभव करनेकी वस्तु है। पाठान्तरमें—'यदि हय
राग-द्वेष', उसका अर्थ इस प्रकार है—'यदि कृष्णसेवाका
परित्याग करके कृष्णसे इतर वस्तुमें अनुराग अर्थात्
अभिनिवेश एवं द्वेष या विराग आकर किसीको
आविष्ट करेगा, तो उसके द्वारा शुद्धात्माके सहज
अप्राकृत कृष्णप्रेमके विषयमें कुछ भी वर्णन करना
सम्भव नहीं होगा॥86॥
अनुवाद-महाप्रभुके चरितको यदि कोई प्रारम्भिक
अवस्थामें नहीं समझ पाये, तो भी इसे बार-बार श्रवण
करनेसे धीरे-धीरे समझमें आने लगेगा। महाप्रभुका
अद्भुत चरित श्रवण करनेसे श्रोताके हृदयमें कृष्णप्रेम
उदित होगा। तब वह श्रीराधा-कृष्णकी लीलाके मधुररसकी
रीतिको समझ सकेगा। इसलिये इसको बार-बार श्रवण
करो, इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा॥87॥
संस्कृत भाषामें लिखित भागवतके साथ उपमा :-
भागवत-श्लोकमय, टीका तार संस्कृत हय,
तबु कैछे बुझे त्रिभुवन।
इँहा श्लोक दुइ चारि, तार व्याख्या-भाषा करि,
केने ना बुझिबे सर्वजन ॥ 88 ॥
अनुवाद-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतम् संस्कृतके श्लोकोंके
द्वारा रचित है और उसकी टीकाएँ भी संस्कृतमें हैं,
तो जगत्के लोग उसे कैसे समझ लेते हैं? इस ग्रन्थमें
मैंने कहीं-कहीं ही श्लोक लिखे हैं और उसकी
व्याख्या भी सरल भाषामें दी है, तब सभी उसे क्यों
नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥
अनुभाष्य-पयर संख्या 85में वादियोंके वादके
सम्बन्धमें मेरा यह कहना है—'श्रीमद्भागवत-ग्रन्थमें सभी
श्लोक संस्कृतमें हैं; उसकी सभी व्याख्याएँ भी संस्कृत
भाषामें लिखी गयी हैं। यदि उसे त्रिभुवनके लोग
समझकर कृष्णभक्ति लाभ करते हैं, तब इस
चैतन्यचरितामृतमें मैंने जो दो-चार संस्कृतके श्लोक
उद्धृत करके उनकी बङ्गला कवितामें व्याख्या भी की
है, उसे सभी गौरभक्त क्यों नहीं समझ सकेंगे ? ॥ 88 ॥
श्रद्धापूर्वक चैतन्यलीला श्रवणके
फलस्वरूप कृष्णप्रीतिका उदय :-
येबा नाहि जाने केह, शुनिते शुनिते सेह,
कि अद्भुत चैतन्यचरित।
कृष्ण उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति,
शुनिलेइ बड़ हय हित ॥ 87 ॥
महाप्रभुकी शेषलीला-वर्णन करनेकी इच्छा :-
शेष-लीलार सूत्रगण, कैलुँ किछु विवरण,
इँहा विस्तारिते चित्त हय।
थाके यदि आयु-शेष, विस्तारिब लीला-शेष,
यदि महाप्रभुर कृपा हय ॥ 89 ॥
। 77

[ 2/89-94 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা
अनुवाद—मैंने शेषलीलाका सूत्ररूपमें कुछ वर्णन
किया है और अब मेरी यह इच्छा है कि मैं विस्तारसे
इसका वर्णन करूँ। यदि मेरा जीवन रहा और मेरे
सौभाग्यसे महाप्रभुकी कृपा हुई, तो मैं शेष लीलाको
विस्तारसे कहूँगा॥89॥
ग्रन्थकारका अपनी अयोग्यता और दैन्य ज्ञापन :-
आमि वृद्ध जरा Provideतुर, लिखते काँपये कर,
मने किछु स्मरण ना हय।
ना देखिये नयने, ना शुनिये श्रवणे,
तबु लिखि-ए बड़ विस्मय॥90॥
अनुवाद—मैं वृद्ध हो गया हूँ और चलने-फिरनेमें
असमर्थ हूँ। जब मैं लिखता हूँ, तो मेरे हाथ काँपते
हैं। मुझे कुछ स्मरण भी नहीं रहता है और न ही
मैं ठीकसे देख और सुन पाता हूँ। तो भी मैं लिख
रहा हूँ, यह बहुत बड़ा आश्चर्य है॥90॥
महाप्रभुकी दिव्योन्मादात्मक अन्त्यलीला ही
गौरभक्तोंके लिये नित्य आलोच्य :-
एइ अन्त्यलीला-सार, सूत्रमध्ये विस्तार,
करि’ किछु करिलुँ वर्णन।
इहा-मध्ये मरि यबे, वर्णिते ना पारि तबे,
एइ लीला भक्तगण-धन॥91॥
अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाके सारका
सूत्रोंके मध्य कुछ विस्तार करके वर्णन किया है। यदि
मैं इसे विस्तार करते हुए बीचमें ही देह त्याग दूँगा,
तो भी सूत्ररूपमें यह लीला भक्तोंके लिये दिव्य निधि
होगी॥91॥
अभी संक्षेपमें और बादमें विस्तारकी इच्छा :-
संक्षेपे एइ सूत्र कैल, येइ इँहा ना लिखिल,
आगे ताहा करिब विचार।
यदि तत दिन जिये, महाप्रभुर कृपा हये,
इच्छा भरि’ करिब विस्तार॥92॥
अनुवाद—इस अध्यायमें मैंने अन्त्यलीलाको सूत्ररूपमें
कहा है। इस लीलाके विषयमें जो कुछ मैंने नहीं कहा
है, आगे उसपर विचार करके लिखूँगा। यदि महाप्रभुकी
कृपासे मैं उतने दिनों तक जीवित रहूँगा, तो मन भरके
इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥92॥
भक्तों की वन्दना और श्रौतपन्थामें अवस्थान :-
छोट बड़ भक्तगण, वन्दों सबार-चरण,
सबे मोरे करह सन्तोष।
स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत,
ताइ लिखि, नाहि मोर दोष॥93॥
अनुवाद—मैं कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम भक्त,
सभीके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ कि वे मुझसे
सन्तुष्ट हों। मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे
श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा,
उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार
कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई
दोष नहीं है॥93॥
अनुभाष्य—‘भजनविज्ञ’ (भजनमें दक्ष), ‘भजनशील’
और ‘कृष्णनाममें दीक्षित कृष्णनामकारी’—ये तीन प्रकारके
छोटे-बड़े भक्त हैं, सभी मुझपर कृपा करें। कनिष्ठ
भक्तोंकी तर्क करनेमें रुचि होती है। वे सिद्धान्त नहीं
जानते हैं, परन्तु अपनेको रसिकभक्त मानते हैं। मैंने
लीलाके साथ सिद्धान्तको भी लिखा है, परन्तु कहीं ये
कनिष्ठ भक्त इसे मेरा पाण्डित्य, भक्तिहीनता और
कुतर्कमें निष्ठाका फल मानकर मुझे दोषी समझकर
मुझपर कृपा न करें, इस आशङ्कासे मैं विनीत-भावसे
निवेदन कर रहा हूँ कि मैं इस विषयमें स्वतन्त्र नहीं
हूँ। मैं जिनके चरणकमलोंमें बिका हुआ हूँ, उन
श्रीरूप-रघुनाथ-श्रीदामोदरस्वरूपसे जो श्रीगौरलीला-तत्त्व
मैंने जाना है, उसीको मैंने लिखा है॥93॥
पञ्चतत्त्व, गुरुवर्ग और हरिदास-पण्डितकी वन्दना :-
श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्तवृन्द,
शिरे धरि सबार चरण।
78

दूसरा अध्याय 2/94-95 ]
स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण,
धूलि करों मस्तके भूषण ॥ 94 ॥
पाञा याँर आज्ञाधन, व्रजेर वैष्णवगण,
वन्दों ताँर मुख्य हरिदास।
चैतन्यविलास-सिन्धु- कल्लोलेर एक बिन्दु,
तार कणा कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥
गोस्वामी आदि भक्तोंके श्रीचरणोंकी धूलिको अपने
मस्तकका भूषण बनाना चाहता हूँ। इस प्रकार मैं
उनकी कृपाकी वाञ्छा करता हूँ। इन सभीकी और
व्रजके सभी वैष्णवों, विशेषकर श्रीहरिदास पण्डित
(श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी) की आज्ञा पाकर मैं,
कृष्णदास, श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला-विलासके समुद्रकी
लहरकी एक बिन्दुके एक कणको कह रहा हूँ॥ 94-95 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अन्त्यलीला सूत्रकथने
प्रेमोन्माद-प्रलापवर्णनं नाम द्वितीय-परिच्छेदः।
श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीलामें अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें
प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद
समाप्त।
अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु
और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके चरणकमलोंको अपने शीशपर
धारण करनेकी अभिलाषा करता हूँ। मैं श्रीस्वरूप
दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरघुनाथ
अनुभाष्य—आदिलीला 8/49-60 संख्या देखें ॥ 95 ॥
दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
। 79

तीसरा अध्याय
कथासार-कटोया-ग्राममें संन्यास ग्रहणके बाद तीन
दिनोंतक राढ़देशमें भ्रमण करते-करते महाप्रभुका
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चतुराईसे शान्तिपुरके पश्चिम पारमें
आगमन हुआ। महाप्रभुने गङ्गाको यमुना समझकर
उनकी स्तव-स्तुति की। उसके बाद श्रीअद्वैतप्रभु नौका
लेकर आये और महाप्रभुको स्नान करवाकर उन्हें
अपने घर ले आये। वहाँपर नवद्वीप धामवासियों और
श्रीशचीमाताके साथ महाप्रभुका मिलन हुआ। उनके
साथ मिलनेके बाद शचीमाताने भोजन बनाया। जब
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु भोजन कर रहे थे, तब
श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ श्रीअद्वैतप्रभुका नाना प्रकारसे
कौतुक हुआ। दोपहरके बाद भक्त समुदायके साथ
सङ्कीर्तन होने लगा। इस प्रकार वहाँ कुछ दिन बीतनेके
बाद भक्तोंनें शचीमाताके साथ परामर्श करके महाप्रभुसे
नीलाचलमें रहनेका अनुरोध किया। महाप्रभुने उसे
स्वीकार करके श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द, श्रीजगदानन्द
पण्डित और श्रीदामोदर पण्डितको साथ लिया तथा
शान्तिपुरके भक्तों और शचीमातासे विदायी लेकर
छत्रभोग मार्गसे श्रीपुरुषोत्तमकी यात्रा की।
-(अमृतप्रवाहभाष्य)
संन्यास लेते ही भ्रमण करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरो
वृन्दावनं गन्तुमना भ्रमाद् यः।
राढ़े भ्रमन् शान्तिपुरीमयित्वा
ललास भक्तैरिह तं नतोऽस्मि ॥ १ ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - संन्यास ग्रहण करनेके बाद
श्रीकृष्णप्रेममें वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर भी
भ्रान्तचित्तके कारण राढ़देशमें भ्रमण करते-करते शान्तिपुर
पहुँचकर भक्तोंसे भेंट करके हर्षित हुए श्रीगौरचन्द्रको
मैं नमस्कार करता हूँ॥ १॥
अनुभाष्य-
यः गौरः (विश्वम्भरः) न्यासं (तुर्याश्रमं) विधाय
(वेदविहित-संन्यास-संस्कारादिकं गृहीत्वा) उत्प्रणयः (प्रेमाकृष्टः
सन्) वृन्दावनं गन्तुमनाः (व्रजगमनोत्सुकमानसः) भ्रमात् (प्राकृतनेत्रेषु
भ्रमं प्रदर्शनात्, प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्ति-विलोचनपदं कृष्णधाम
प्राकृतचेष्टया दुर्लभं शुद्धभजनलभ्यं चेति प्रदर्शयन्) राढ़े
(गङ्गायाः पश्चिमे राष्ट्र
(गत्वा) इह (अस्मिन् शान्तिपुर्यां) भक्तैः सह ललास, तं गौरं
नतोऽस्मि।
श्लोक भावानुवाद-जिन विश्वम्भरने वैदिक
नियमानुसार संन्यास ग्रहण किया और श्रीकृष्णप्रेममें
विह्वल होकर वृन्दावन जानेकी इच्छा की, किन्तु
प्रेमावेशमें भ्रमवश राढ़देशमें भ्रमण करते हुए शान्तिपुर
पहुँच गये और वहाँ भक्तोंसे मिलकर आनन्दित हुए,
उन श्रीगौरचन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ।
(श्रीकृष्णधामकी प्राप्ति केवल प्रेमरूपी अञ्जनसे
रञ्जित भक्तिनेत्रोंके द्वारा ही सम्भव है। प्राकृत चेष्टासे
इसका पाना अति दुर्लभ है। जड़ीय नेत्र और जड़ीय
चेष्टा केवल भ्रम ही उत्पन्न करते हैं, वास्तव वस्तुका
दर्शन नहीं, महाप्रभुकी लीला इसी सत्यको दिखानेके
लिये हुई)।
'राढ़े'-गङ्गाका पश्चिम प्रदेश ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो;
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
तथा समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥
। 81

[ 3/3-4 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चौबीस वर्षके अन्तमें महाप्रभुका संन्यास-ग्रहण :-
चब्बिश वत्सर शेष येइ माघ-मास।
तार शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास ॥ ३ ॥
अनुवाद—चौबीस वर्षके अन्तमें माघ मासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया ॥ ३ ॥
त्रिदण्डि भिक्षुकका गीत पढ़ते हुए महाप्रभुका
राढ़देशमें तीन दिन तक भ्रमण :-
संन्यास करि' प्रेमावेशे चलिला वृन्दावन।
राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥ ४ ॥
अनुवाद—संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु प्रेमके आवेशमें वृन्दावनकी ओर चले, परन्तु वे तीन दिनोंतक राढ़देशमें ही भ्रमण करते रहे ॥ ४ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'राढ़देश'—'राष्ट्र' बना है। गङ्गाके पश्चिमपार गौड़-भूमिको 'राढ़देश' कहते हैं; इसका एक नाम 'पौण्ड्र' पौण्ड्र राजधानी थी ॥ ४ ॥
अमृताणुकणा—(जावालोपनिषत्)—
“यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।”
अर्थात् 'जिस दिन कोई संसारसे विरक्त होगा, उसी दिन वह प्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करेगा।' यह बात श्रीमद्भागवत (1/13/27)में और अधिक स्पष्ट रूपसे कहा गयी है—
“यः स्वकात् परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान्।
हृदि कृत्वा हरिं गेहात् प्रव्रजेत् स नरोत्तमः॥”
अर्थात् “जो आत्मज्ञ-व्यक्ति अपने विवेकसे अथवा दूसरोंके उपदेशोंको सुनकर संसारको दुःखपूर्ण समझकर श्रीहरिको अपने हृदयमें धारण करके गृह त्याग करके संन्यास ग्रहण करते हैं, वे नरोत्तम (मनुष्योंमें उत्तम) हैं।” इस प्रकार शास्त्रोंमें संन्यास ग्रहण और अधिकारके विषयमें कहा गया है। पुराणोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीमद्भागवत, याज्ञवल्क्य यति-प्रकरण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, हारित-संहिता, संवर्त्त-संहिता, दक्ष-संहिता, मनु-संहिता आदि विविध शास्त्रोंमें त्रिदण्ड-संन्यासकी विधिका वर्णन है। किन्तु तो भी कोई-कोई,
“अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।
देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत्॥”
—इस ब्रह्मवैवर्त्त-पुराणके वाक्यके अनुसार कहते हैं कि कलियुगमें संन्यास ग्रहण करना वर्जित है। समस्त वेद-इतिहास-पुराण जिनके श्वाससे प्रकाशित हुए हैं, उनके भी जो अंशी हैं, वे सर्वावतारी स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने कलियुगमें अवतरित होकर चतुर्थ आश्रमरूप संन्यासको ग्रहण करके महाभारतमें कहे गये विष्णुसहस्रनामके अन्तर्गत अपने 'संन्यासकृत्' नामको सार्थक किया। इसलिये उपरोक्त पुराण वाक्यका तात्पर्य अन्य प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये।
“कलियुगमें संन्यास वर्जित है, ऐसा कहनेका भाव यह है—आचार्य-शङ्करके द्वारा प्रवर्त्तित 'सोऽहं', 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि अवैध चिन्तनसे उत्पन्न एकदण्ड संन्यास कभी भी ग्रहण करनेके योग्य नहीं है; इसलिये संन्यासको निषिद्ध कहा गया है। त्रिदण्ड संन्यास ही वास्तविक सनातन चतुर्थ आश्रम है। यह सदा ही ग्रहण योग्य है, कभी भी निषिद्ध नहीं है। त्रिदण्ड-संन्यास किसी-किसी समय बाहरसे एकदण्डाकारमें भी देखा जाता है। इस श्रेणीके एकदण्डी संन्यासी महाजन 'सेव्य-सेवक-सेवा'-रूप त्रिदण्डका नित्यत्व स्वीकार करके शङ्कर-प्रवर्त्तित 'एकदण्ड'-संन्यासको सभी प्रकारसे अवैध जानकर ग्रहण करनेके अयोग्य मानते हैं। इसलिये (रघुनन्दन)-स्मार्त्ताचार्यके द्वारा संग्रहीत उक्त वचनोंके बलपर भी निवृत्तिपथके साधकोंके पक्षमें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करना ही उक्त प्रमाणका तात्पर्य है।” (—त्रिदण्डीस्वामी श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज)
श्रीचैतन्यभागवत (मध्यखण्ड 28/154-159)के पाठसे यह जाना जाता है कि श्रीगौरसुन्दरने शङ्कर-सम्प्रदायके
82 ।

तीसरा अध्याय 3/4-6 ]
एकदण्डी संन्यासी श्रीमत् केशव-भारतीसे संन्यास ग्रहणके
समय पहले श्रीकेशव-भारतीके कानमें संन्यास-मन्त्र
प्रदान करके उनको संन्यास प्रदान किया या परात्मनिष्ठामें
परिनिष्ठित किया था। उसके बाद उनसे महाप्रभुने
अपने द्वारा दिये हुए संन्यास-मन्त्रको ग्रहण किया।
“सर्व-शिक्षागुरु-गौरचन्द्र वेदे बले।
केशव-भारती-स्थाने ताहा कहे छले॥ 154॥
प्रभु कहे,-'स्वप्ने मोर कोन महाजन।
कर्णे संन्यासेर मन्त्र करिल कथन॥ 155॥
बूझ देखि ताहा तुमि हय किंवा नहे।'
एत बलि' प्रभु तार कर्णे मन्त्र कहे॥ 156॥
छले प्रभु कृपा करि' तारे शिष्य कैल।
भारतीर चित्ते महा-विस्मय जन्मिल॥ 157॥
प्रभुर आज्ञाय तबे केशव भारती।
सेइ मन्त्र प्रभुरे कहिला महामति॥” 159॥
अर्थात् “समस्त वेद श्रीगौरचन्द्रको 'सर्व-शिक्षागुरु'
कहते हैं। उन्होंने श्रीकेशव-भारतीसे छलसे कहा, - 'स्वप्नमें
किसी महाजनने मेरे कानमें यह संन्यास-मन्त्र दिया।
देखो, आप इसे समझ पाते हो अथवा नहीं।' यह
कहकर महाप्रभुने उनके कानमें मन्त्र कहा। छलसे
महाप्रभुने उनपर कृपा करके उन्हें अपना शिष्य बना
लिया। यह मन्त्र सुनकर श्रीभारतीके हृदयमें बड़ा
विस्मय हुआ और महाप्रभुकी आज्ञासे तब श्रीकेशव
भारतीने वही मन्त्र उनको प्रदान किया।”
इस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने शाङ्कर-
संन्यासको अस्वीकार करके श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्ड-
संन्यास ग्रहणका ही दृष्टान्त स्थापित किया। उन्होंने
उपरोक्त 'अश्वमेधं---' संन्यास निषेध करनेवाले पुराण-
वाक्यके तात्पर्यको प्रकाशित करते हुए शास्त्रीय
संन्यास-विधिकी परम सार्थकता स्थापित की। संन्यास
ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने श्रीमद्भागवतीय त्रिदण्डी-
भिक्षु-गीतका कीर्तन करते हुए वृन्दावनकी ओर
गमनकी लीला की। इसके द्वारा महाप्रभुने संन्यास ग्रहण
करनेके तात्पर्य और त्रिदण्ड ग्रहणकर वृन्दावनधाम
जानेकी विधिको प्रकाश किया। मनुसंहिता (12/10)—
“वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते॥”
अर्थात् “जिसकी बुद्धिमें ये तीन-वाणीपर नियन्त्रण
(वाग्दण्ड), मनपर नियन्त्रण (मनोदण्ड) और देहपर
नियन्त्रण (कायदण्ड) दृढ़तासे स्थित हैं, उसे ही
(वास्तविक) त्रिदण्डी कहा जाता है।” इसलिये वाग्दण्ड,
मनोदण्ड और कायदण्ड-ग्रहणरूप त्रिदण्ड-विचारको
अस्वीकार करनेसे जीव जिह्वा-मन-कायको अपने
नियन्त्रणमें रखनेके स्थानपर उनके अधीन रहेगा। ऐसी
अनियन्त्रित इन्द्रियाँ व्यक्तिको व्यभिचारमें प्रवृत्त होनेके
लिये बाध्य करेंगी और वह केवल मायाके चङ्गुलमें ही
फंसा रहेगा। ऐसा मायाबद्ध जीव श्रीचैतन्यदेवके द्वारा
प्रदर्शित श्रीकृष्णसे विरहका कैसे अनुभव करेगा?
अर्थात् वह विप्रलम्भात्मक (विरहमें) भजनमें कभी भी
अधिकार नहीं प्राप्त कर सकता। (आदिलीला 3/20)—
“आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे।”
अर्थात् “महाप्रभुने स्वयं आचरण करके सभीको
भक्तिकी शिक्षा दी।” सर्वलोकगुरु श्रीगौरसुन्दरकी यह
त्रिदण्डसंन्यास- ग्रहणलीला एकमात्र उत्तमा-भक्तिकी प्राप्तिके
इच्छुक साधक जीवोंके लिये एक विशेष उदाहरण
स्थापित करनेके लिये ही हुई, किन्तु कलिसे प्रभावित
जीव इसे समझ नहीं पाते॥ 4॥
एइ श्लोक पड़ि' प्रभु भावेर आवेशे।
भ्रमिते पवित्र कैल सब राढ़-देशे॥ 5॥
अनुवाद—महाप्रभुने राढ़देशमें भ्रमण करते हुए उसे
पवित्र कर दिया और भावावेशमें एक श्लोक पढ़ा॥ 5॥
श्रौतपन्था-अनुसरणसे ही त्रिदण्डिभिक्षुकी
सिद्धि-प्राप्तिकी आशा :-
(श्रीमद्भागवत 11/23/57 श्लोक)—
एतां समास्थाय परात्म-
निष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं
तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव॥ 6॥
83

[ 3/6 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अवन्तीदेशके भिक्षुक ब्राह्मणने
कहा,—“प्राचीन महात्माओंके द्वारा उपासित इस
परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं
श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर
संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा॥”६॥
अनुभाष्य—संसारमें त्रितापसे जलते हुए अवन्तीके
त्रिदण्डिभिक्षुने समस्त कायमनोवाक्यके द्वारा भगवान्के
एकान्त शरणागत होकर सेवा करनेके उद्देश्यसे यह
गीत गान किया—
पूर्वैस्तमैः (प्राचीनैः) महद्भिः (महाभागवतैः) उपासितां (सेविताम्)
एतां परात्मनिष्ठां (परः “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारण-कारणम्॥” इति वचनात् सर्वस्मात्
परः यः आत्मा, तस्मिन् या निष्ठा अनर्थनिवृत्त्यनन्तरं
नैसर्गिकभजनपरावस्थितिः तां) समास्थाय (आदौ श्रद्धादिक्रम-
पन्थानुसारेण सम्यक् प्रकारेण श्रौतमार्गे भजनं कुर्वन्)
मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवया (साधन-भावभक्ताख्या) एव दुरन्तपारं (दुस्तरं)
तमः (कृष्णसेवारहित-जड़ाहङ्कार-भोगरूप संसाराख्यम् अज्ञानं)
तरिष्यामि (कृष्णोतर-कैङ्कर्यवासनां त्यक्त्वा अतिक्रमिष्यामि)।
श्लोक-भावानुवाद—“प्राचीनकालमें महाभागवतोंके द्वारा
सेवित इस परात्म-निष्ठा [‘परः’—‘‘ईश्वरः परमः कृष्णः
सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥”
ब्रह्मसंहिताके इस वचनके द्वारा जो सबसे श्रेष्ठ आत्मा
(श्रीकृष्ण) हैं, उनमें निष्ठा अर्थात् अनर्थ निवृत्तिके
उपरान्त स्वाभाविक भजन-परायणता]के द्वारा [श्रद्धासे
प्रेम तक क्रमपथका सम्पूर्णरूपसे श्रौतमार्ग (गुरुसे श्रवण
किये ज्ञान)के अनुसार] भजन करते हुए श्रीकृष्णसेवासे
इस दुस्तर अन्धकारसे [श्रीकृष्णसेवारहित
जड़-अहङ्कार-भोगरूप संसार कहलानेवाले अज्ञानसे]
तर जाऊँगा अर्थात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त मैं अन्य
किसीका सेवक हूँ, इस भावका अतिक्रमण कर
जाऊँगा।”
चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंमें ‘वैष्णवचिह्नधारण’के
अन्तर्गत चतुर्थाश्रम (संन्यास)के लिये उचित वेष-धारण
करना एक अङ्ग है। जो यह चतुर्थाश्रममोचित वेष धारण
करते हैं, उनका ही मुकुन्दसेवाके द्वारा संसारसे उद्धार
होता है। परमात्मनिष्ठ व्यक्ति त्रिदण्डिभिक्षुका वेष धारण
करते हैं। पूर्वकालमें महर्षिगण त्रिदण्डिवेश धारण करते
थे, बादमें विष्णुस्वामीने कलियुगमें त्रिदण्डवेशको ही
‘परात्मनिष्ठा’ कहकर मुकुन्दसेवामें निष्ठाका प्रचलन
किया। ऐकान्तिक-भक्तिनिष्ठ वैष्णव उस त्रिदण्डके साथ
चतुर्थ ‘जीवदण्ड’को जोड़ देते हैं, तो भी वैष्णव संन्यासी
त्रिदण्डि-संन्यासी कहलाते हैं। मायावादी संन्यासी एकदण्ड
ग्रहण करते हैं, वे त्रिदण्डके तात्पर्यको नहीं समझ पाते।
विष्णुस्वामीके परवर्ती कालमें शिवस्वामी सम्प्रदायके
लोगोंने निर्विशेष-ब्रह्मज्ञानको लक्ष्य करके शङ्कराचार्यके
एकदण्ड संन्यासके आदर्शको अपनाकर सेव्य-सेवक-भाव
अर्थात् मुकुन्दसेवाका परित्याग कर दिया। विष्णुस्वामी
सम्प्रदायके द्वारा प्रवर्तित संन्यासके एक सौ आठ
नामोंके स्थानपर केवलद्वैतवादी संन्यासी दस नामोंको
ही ग्रहण करते हैं।
श्रीगौरसुन्दरने यद्यपि भारतकी तात्कालिक प्रथाके
अनुसार एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया था, तथापि उस
एकदण्डके भीतर चतुष्दण्ड एकीभूत था,—यही प्रचार
करनेके लिये उन्होंने श्रीमद्भागवतमें वर्णित त्रिदण्डि-भिक्षुके
गीतका गान किया। श्रीगौरसुन्दरने कभी भी परात्मनिष्ठाके
अभाववाले एकदण्ड संन्यासका अनुमोदन नहीं किया।
त्रिदण्डी संन्यासी त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके संयोगसे
ऐकान्तिकी भक्तिका विधान करके रखते हैं। अप्राकृत
भक्तिरहित एकदण्डि-संन्यासी निर्विशेष मतका अवलम्बन
करनेके कारण परात्मनिष्ठासे विमुख होते हैं, इसलिये
वे ब्रह्म नामक प्रकृतिमें लीन होकर निर्विशेष होनेको
ही ‘मुक्ति’ मानते हैं। आर्यवर्त्तके (भारतके) मायावादी
लोग श्रीचैतन्यदेवको उनके बाह्यज्ञानके कारण त्रिदण्डी
न मानकर एकदण्डी संन्यासी ही मानते हैं, यह उनका
भ्रम ही है। श्रीमद्भागवतमें एकदण्ड संन्यासका कहीं भी
वर्णन नहीं है, त्रिदण्ड-धारणको ही चतुर्थ आश्रमका
एकमात्र वेष कहा गया है। भगवान्की बहिरङ्गा शक्तिसे
84 ।

तीसरा अध्याय 3/6-10 ]

मोहित मायावादी लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि
श्रीगौरसुन्दर श्रीमद्भागवतकी वाणीका बहुत आदर करते
हैं।
श्रीचैतन्यदेवकी शिक्षानुसार आज तक उनके अनुगत
भक्तोंमें शिखा और सूत्र (जनेऊ) युक्त संन्यास प्रचलित
है। एकदण्डि-मायावादी लोग शिखा और सूत्रका
परित्याग करते हैं, इसलिये वे त्रिदण्डका माहात्म्य
समझनेमें असमर्थ हैं, क्योंकि उनमें श्रीभगवान्‌की सेवा
करनेकी वृत्ति नहीं है। उनका चित्त विषयकी सेवामें
निमग्न होनेसे वे धैर्यहीन होकर सेव्य-सेवक-भावका
त्याग करके ब्रह्ममें लीन होनेका विचार करते हैं।
दैव-वर्णाश्रम (गीता एवं भागवतके अनुसार गुण-कर्मके
आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय) प्रवर्त्तनकारी आचार्यगण
असुरवर्णाश्रम (जन्मके आधारपर वर्णाश्रमका निर्णय)
वालोंके ज्ञान और चिन्तन-धारा आदि किसीको भी
ग्रहण नहीं करते हैं।
श्रीगौरसुन्दरके अत्यन्त अन्तरङ्ग भक्त, श्रीमद्भागवत
शास्त्रमें परम प्रवीण श्रीमद् गदाधर पण्डित गोस्वामी
प्रभुने स्वयं त्रिदण्ड संन्यासका विचार ग्रहण किया और
श्रीमाधव उपाध्यायको त्रिदण्ड संन्यास प्रदान किया।
इन्हीं श्रीमाधवाचार्यसे ही पश्चिम भारतमें
वल्लभाचार्य-सम्प्रदायकी उत्पत्ति हुई है। गौड़ीय-वैष्णव-
स्मृत्याचार्य श्रीगोपालभट्टने अपने श्रीगुरुदेव त्रिदण्डिस्वामी
श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीसे किस प्रकार त्रिदण्ड-विधानमें
दीक्षित होकर वेश ग्रहण किया, इसका स्पष्ट उल्लेख
नहीं मिलता है। तथापि श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा रचित
'श्रीउपदेशामृत'के प्रथम श्लोकमें निहित त्रिदण्ड-विधानका
आनुगत्य श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीमें उत्तम रूपमें प्रकाशित
होता था। श्रीगौरसुन्दरके अनुगत भक्त केवलाद्वैत-विचारसे
'एकदण्ड'-संन्यासको कभी भी ग्रहण नहीं करते।
शिखाका मुण्डन और सूत्रका त्यागकर भगवान्‌को
निर्विशेष ब्रह्म कहनेवाले संन्यासी अपनी विचार-प्रणालीको
गौड़ीय-वैष्णव-सम्प्रदायमें प्रचलित करनेमें कभी सफल
नहीं हुए हैं।

त्रिदण्डि-श्रीधर स्वामीकी प्रणालीका श्रीगौरसुन्दरने
अनुमोदन किया है। केवलाद्वैतवादी लोग श्रीधर स्वामीकी
शुद्धाद्वैत-विचार-प्रणालीको न समझकर उन्हें भी अपने
सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त करना चाहते हैं, परन्तु श्रीगौरसुन्दरका
यह विचार नहीं है॥ 6॥

त्रिदण्डि-भिक्षुकी कृष्णसेवा-निष्ठा-दर्शनसे सुख :-
प्रभु कहे,—“साधु एइ भिक्षुक-वचन।
मुकुन्द सेवन-व्रत कैल निर्धारण॥ 7॥
परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण।
मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥ 8॥
सेइ वेष कैल, एबे वृन्दावन गिया।
कृष्णनिषेवण करि निभृते बसिया॥”9॥

अनुवाद—महाप्रभुने कहा,– “इस भिक्षुकके वचन
अति सुन्दर हैं, क्योंकि उसने मुकुन्दसेवाका व्रत ग्रहण
किया है। परात्मनिष्ठा ही संन्यास वेश धारण करनेका
एकमात्र तात्पर्य है। मुकुन्द सेवासे ही संसारसे मुक्ति
मिलती है। संन्यास वेश धारण करके मैं अब वृन्दावन
जाकर किसी एकान्त स्थानमें वास करके केवल
श्रीकृष्णका भजन और सेवा करूँगा॥” 7-9॥

अमृतप्रवाह भाष्य—संन्यासवेश ग्रहण करके महाप्रभुने
कहा,– “भिक्षुकके ये वचन साधु (सुन्दर) हैं, क्योंकि
इनके द्वारा श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी सेवारूपी व्रत निर्धारित
हुआ है।” जड़ात्म-निष्ठाका निषेध करके परात्मनिष्ठा
ही संन्यासवेश धारण करनेका तात्पर्य है॥ 7-8॥

महाप्रभुकी प्रेमोन्मत्त अवस्थामें वृन्दावन-यात्रा :-
एत बलि' चले प्रभु, प्रेमोन्मादेर चिह्न।
दिक्-विदिक्-ज्ञान नाहि, किवा रात्रि-दिन॥ 10॥

अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे वृन्दावनकी
ओर चले। उनके शरीरमें प्रेमोन्मादके चिह्न उदित हो
गये और उस प्रेमोन्मादमें उन्हें न तो दिशा-विदिशा
और न ही रात्रि-दिनका ज्ञान रहा॥ 10॥

। 85

[ 3/11-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुके पीछे चलनेवाले निताइ,
चन्द्रशेखर और मुकुन्द :-
नित्यानन्द, आचार्यरत्न, मुकुन्द, — तिनजन।
प्रभु-पाछे-पाछे तिने करेन गमन ॥ 11 ॥
**अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य
और श्रीमुकुन्द प्रभु, —ये तीनों भी महाप्रभुके पीछे-पीछे
चले ॥ 11 ॥
महाप्रभुके दर्शन मात्रसे लोगोंका उद्धार :-
येइ येइ प्रभु देखे, सेइ सेइ लोक।
प्रेमावेशे 'हरि' बोले, खण्डे दुःख-शोक ॥ 12 ॥
बालकोंके प्रति महाप्रभुका स्नेह :-
गोप-बालक सब प्रभुके देखिया।
'हरि' 'हरि' बलि' डाके उच्च करिया ॥ 13 ॥
शुनि' ता-सबार निकटे गेला गौरहरि।
'बल' 'बल' बोले सबार शिरे हस्त धरि' ॥ 14 ॥
ता'-सबार स्तुति करे, —“तोमरा भाग्यवान्।
कृतार्थ करिले मोरे शुनाञा हरिनाम् ॥” 15 ॥
**अनुवाद—**जिस-जिसने महाप्रभुके दर्शन किये, वह
भी प्रेमावेशमें 'हरि' 'हरि' बोलने लगता और उसके
समस्त दुःख-शोक दूर हो जाते। वहाँके गोप-बालक
भी महाप्रभुको देखकर उच्च स्वरसे 'हरि' 'हरि' बोलने
लगे। श्रीगौरहरि उनकी हरिध्वनि सुनकर उन गोप-बालकोंके
पास गये और उनके सिरोंपर हाथ रखकर उनसे पुनः
पुनः 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहने लगे। तब
महाप्रभुने उन सबकी स्तुति करते हुए कहा, —“तुम
लोग बड़े सौभाग्यवान् हो। तुमने मुझे हरिनाम् सुनाकर
कृतार्थ किया है॥” 12-15 ॥
श्रीनित्यानन्दकी चतुरायी और बालकोंको
एकान्तमें उपदेश :-
गुप्ते ता-सबाके आनि' ठाकुर नित्यानन्द।
शिखाइला सबाकारे करिया प्रबन्ध ॥ 16 ॥
“वृन्दावन-पथ प्रभु पुछेन तोमारे।
गङ्गातीर-पथ तबे देखाइह ताँरे ॥” 17 ॥
**अनुवाद—**श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन गोप बालकोंको
एकान्तमें जाकर कुछ बात बतलायी जिसका उन्हें
विश्वास हो गया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनसे कहा, —“यदि
महाप्रभु तुमसे वृन्दावनका मार्ग पूछें, तो उन्हें गङ्गाके
किनारेका मार्ग दिखला देना॥” 16-17 ॥
अनुभाष्य—'प्रबन्ध'—सुसङ्गत कहानीकी रचना ॥ 16 ॥
महाप्रभुके द्वारा बालकोंसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछनेपर
बालकोंका उनको नवद्वीप-पथ दिखाना :-
तबे प्रभु पूँछिलेन, —“शुन, शिशुगण।
कह देखि, कोन् पथे याब वृन्दावन ॥” 18 ॥
शिशु सब गङ्गातीरपथ देखाइल।
सेइ पथे आवेशे प्रभु गमन करिल ॥ 19 ॥
**अनुवाद—**तब महाप्रभुने उन बालकोंसे पूछा— “हे
बच्चों सुनो! वृन्दावन जानेका कौनसा मार्ग है?” सब
बालकोंने गङ्गाके किनारेका पथ उन्हें दिखला दिया।
महाप्रभु आवेशमें उस पथपर चले गये ॥ 18-19 ॥
सब प्रकारकी आवश्यकताओंकी पूर्ति हेतु और चारों ओर
महाप्रभुके आगमनकी सूचना देनेके लिये श्रीनिताइके द्वारा
श्रीचन्द्रशेखरको शान्तिपुरमें भेजना :-
आचार्यरत्नेरे कहे नित्यानन्द-गोसाञि।
“शीघ्र याह तुमि अद्वैत-आचार्येर ठाञि ॥ 20 ॥
प्रभु लये याब आमि ताँहार मन्दिरे।
सावधाने रहेन येन नौका लञा तीरे ॥ 21 ॥
तबे नवद्वीपे तुमि करह गमन।
शचीमाता लञा आइस आर भक्तगण ॥” 22 ॥
**अनुवाद—**तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीचन्द्रशेखर
आचार्यको कहा, —“आप तुरन्त ही श्रीअद्वैताचार्यके घर
जाँय। मैं महाप्रभुको शान्तिपुर ले आऊँगा और
श्रीअद्वैताचार्य वहीं गङ्गाके किनारे सावधानीपूर्वक एक
86 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

तीसरा अध्याय 3/20-29 ]
नौकामें हमारी प्रतीक्षा करें। तब आप नवद्वीप जाकर
शचीमाताके साथ सभी भक्तोंको लेकर शान्तिपुर आ
जाना॥” 20-22 ॥
महाप्रभुके सामने निताइका अचानक आगमन :-
ताँरे पाठाइया नित्यानन्द महाशय।
महाप्रभुर आगे आसि' दिल परिचय ॥ 23 ॥
अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आचार्यको भेजकर श्रीनित्यानन्द
प्रभु महाप्रभुसे आगे निकलकर उनके सामने आये ॥ 23 ॥
श्रीनित्यानन्दको देखकर महाप्रभुकी जिज्ञासा
और श्रीनिताइका छल :-
प्रभु कहे,—“श्रीपाद, तोमार कोथाके गमन।”
श्रीपाद कहे,—“तोमार सङ्गे याब वृन्दावन ॥” 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “श्रीपाद! आप कहाँ
जा रहे हैं?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मैं भी आपके
साथ वृन्दावन जाऊँगा ॥” 24 ॥
गङ्गाको यमुना कहकर दिखलाना :-
प्रभु कहे,—“कत दूरे आछे वृन्दावन।”
तेंहो कहेन,—“कर एइ यमुना दरशन ॥” 25 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, — “वृन्दावन कितनी दूर
है?” श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “वह देखिये, सामने ही
श्रीयमुनाके दर्शन कीजिये ॥” 25 ॥
महाप्रभुको गङ्गाके दर्शनसे यमुनाका उद्दीपन :-
एत बलि' आनिल ताँरे गङ्गा-सन्निधाने।
आवेशे प्रभुर हैल गङ्गांरे यमुना-ज्ञाने ॥ 26 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें
गङ्गाके तटपर ले आये। आवेशमें डूबे हुए महाप्रभुने
गङ्गाको यमुना ही समझा ॥ 26 ॥
महाप्रभुके द्वारा यमुनाका स्तव :-
“अहो भाग्य, यमुनारे पाइलूँ दरशन।”
एत बलि' यमुनार करेन स्तवन ॥ 27 ॥
अनुवाद—“मेरा अहो भाग्य है कि मैंने यमुनाका
दर्शन पाया है।”—यह कहकर महाप्रभु यमुनाकी स्तव-स्तुति
करने लगे ॥ 27 ॥
चैतन्यचन्द्रोदयनाटक (5/13)में उद्धृत पद्मपुराणवाक्य :-
चिदानन्दभानोः सदा नन्दसूनोः
परप्रेमपात्री द्रवब्रह्मगात्री।
अघानां लवित्री जगत्क्षेमधात्री
पवित्रीक्रियान्नो वपुर्मित्रपुत्री ॥ 28 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चिदानन्दसूर्यस्वरूप नन्दनन्दनकी
सर्वदा प्रेमकी पात्री, ब्रह्मद्रवस्वरुपिणी, पापनाशिनी, जगत्की
मङ्गलकारिणी, सूर्यपुत्री यमुना हमारे शरीरोंको पवित्र
करें ॥ 28 ॥
अनुभाष्य—
चिदानन्दभानोः (सम्वित्प्रीतिप्रकाशकस्य) नन्दसूनोः (कृष्णस्य)
सदा (नित्यं) परप्रेमपात्री (परमप्रीतिप्रदात्री) द्रवब्रह्मगात्री
(चित्सलिलरूपा) अघानाम् (अपराधानां) लवित्री (विनाशयित्री)
जगत्क्षेमधात्री (जगतां लोकानां मङ्गलविधात्री) मित्रपुत्री (रविसुता
कालिन्दी यमुना) नः (अस्माकं) वपुः [दिव्यज्ञानेन] पवित्रीक्रियात्
(शुद्धी कुर्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—प्रीति-प्रकाशक सम्वित्के
अधिष्ठाता नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी नित्य परम प्रीतिको
प्रदान करनेवाली, चिन्मय जलरूपा, अपराधोंका विनाश
करनेवाली, जगत्के मङ्गलका विधान करनेवाली हे
सूर्यपुत्री यमुना! हमारा दिव्यज्ञानके द्वारा शोधन करो ॥ 28 ॥
एक कौपीनमात्र ही महाप्रभुका सहारा :-
एत बलि' नमस्करि' कैल गङ्गास्नान।
एक कौपीन, नाहि द्वितीय परिधान ॥ 29 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने नमस्कार करके
गङ्गामें स्नान किया। महाप्रभुने जो कौपीन पहना था,
उसके अतिरिक्त उनके पास दूसरा कोई वस्त्र नहीं
था ॥ 29 ॥
। 87

[ 3/30-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीअद्वैताचार्यका आगमन :- गङ्गाय यमुना बहे हञा एकधार।
हेनकाले आचार्य-गोसाञि नौकाते चड़िञा। पश्चिमे यमुना बहे, पूर्वे गङ्गाधार॥ ३६॥
आइल नूतन कौपीन-बहिर्वास लञा॥ ३०॥ महाप्रभुको नया कौपीन देना और निमन्त्रण :-
श्रीअद्वैतके दर्शनसे महाप्रभुको सन्देह और जिज्ञासा :- पश्चिमधारे यमुना बहे, ताँहा कैले स्नान।
आगे आचार्य आसि' रहिला नमस्कार करि'। आर्द्र कौपीन छाड़ि' शुष्क कर परिधान॥ ३७॥
आचार्य देखि' बले प्रभु मने संशय करि'॥ ३१॥ प्रेमावेशे तिन दिन आछ उपवास।
“तुमि त' आचार्य-गोसाञि, एथा केने आइला। आजि मोर घरे भिक्षा, चल मोर वास॥ ३८॥
आमि वृन्दावने, तुमि केमते जानिला॥” ३२॥ कहीं महाप्रभु अस्वीकार न करें, इसी भयसे अपने घरमें
श्रीअद्वैतका सरल भावसे महाप्रभुको उत्तर देना :- भिक्षाकी सामग्रीका सामान्य रूपसे वर्णन :-
आचार्य कहे,–“तुमि याँहा, सेइ वृन्दावन। एकमुष्टि अन्न मुञि करियाछौं पाक।
मोर भाग्ये गङ्गातीरे तोमार आगमन॥” ३३॥ शुखरुखा व्यञ्जन कैलुँ, सूप आर शाक॥” ३९॥
अनुवाद—उस समय श्रीअद्वैताचार्य नौकामें नये अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“श्रीपाद नित्यानन्दके
कौपीन और बहिर्वास (बाहर पहननेवाले कपड़े) लेकर वचन मिथ्या नहीं हैं। आपने अभी यमुनामें ही स्नान
आये और महाप्रभुके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया। किया है। (प्रयागके बाद) गङ्गा और यमुना मिलकर
श्रीअद्वैताचार्यको देखकर महाप्रभुके मनमें संशय हुआ। एक धाराके रूपमें बहती हैं, पश्चिमकी ओरवाली धारा
[महाप्रभु अभी आवेशमें ही थे, इसलिये] उन्होंने उनसे यमुना है और पूर्वकी ओरवाली धारा गङ्गा है। पश्चिम
पूछा,—“आप तो अद्वैताचार्य हैं ना, आप यहाँ कैसे धारामें यमुना बह रही हैं, वहीं आपने स्नान किया।
आये? मैं वृन्दावनमें हूँ, यह आपने कैसे जाना?” अब आप गीले कौपीनको छोड़कर सूखे वस्त्र धारण
श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप जहाँपर हैं, वह स्थान ही करें। प्रेमके आवेशमें आपने तीन दिनतक उपवास
वृन्दावन है। यह मेरा सौभाग्य है कि आप गङ्गातटपर किया है। आज मेरे घर चलकर भिक्षा ग्रहण करें।
आये हैं॥”३०-३३॥ मैंने केवल एक मुट्ठी भर अन्न (चावल) पकाया है।
साथमें एक सूखी सब्जी, एक रसेवाली सब्जी और
श्रीअद्वैतके समक्ष श्रीनिताइकी चतुरायीका वर्णन :- शाक है॥”३५-३९॥
प्रभु कहे,–“नित्यानन्द आमारे वञ्चिला।
गङ्गाके आनिया मोरे यमुना कहिला॥” ३४॥ अनुभाष्य—‘शुखरुखा व्यञ्जन’—सूखी सब्जी;
‘सूप’—रसा॥३९॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने कहा,—“नित्यानन्दने मेरे महाप्रभुको शान्तिपुरमें अपने घरमें लाना और सत्कार :-
साथ छल किया। मुझे गङ्गाके तटपर लाकर उन्होंने एत बलि' नौकाय चढ़ाञा निल निज-घर।
इसे यमुना बतलाया॥” ३४॥ पादप्रक्षालन कैल आनन्द-अन्तर॥ ४०॥
श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनिताइ-वाक्यका समर्थन अनुवाद—यह कहकर श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको
और सत्यताका प्रतिपादन :- नौकापर चढ़ाकर अपने घर ले आये। घर पहुँचकर
आचार्य कहे,–“मिथ्या नहे श्रीपाद-वचन। महाप्रभुके चरणोंको धोकर श्रीअद्वैताचार्यके हृदयमें बहुत
यमुनाते स्नान तुमि करिला एखन॥ ३५॥ आनन्द हुआ॥ ४०॥
88 ।

तीसरा अध्याय 3/41–55 ]
सीता-ठाकुराणीके द्वारा रसोई और स्वयं
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा भोग-निवेदन :-
प्रथमे पाक करियाछेन आचार्याणी।
विष्णु-समर्पण कैल आचार्य आपनि॥ 41 ॥
दोनों प्रभु (महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द) और श्रीकृष्ण-इन
तीनोंके लिये तीन पात्रोंमें नैवेद्यको सजाना :-
तिनठाञि भोग बाड़ाइल सम करि'।
कृष्णेर भोग बाड़ाइल धातु-पात्रोपरि ॥ 42 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नी सीता ठाकुराणीने
पहलेसे ही भोग बना रखा था और तब श्रीअद्वैताचार्यने
उसे भगवान् विष्णुको निवेदन किया। उन्होंने उस
भोगको तीन बराबर भागोंमें सजाया। उनमेंसे एक
भागको धातुके पात्रके ऊपर रखकर उसे श्रीकृष्णको
निवेदनके लिये रखा॥ 41-42 ॥
नैवेद्यका वर्णन :-
बत्तिशा-आठिया-कलार आङ्गटिया पाते।
दुइ ठाञि भोग बाड़ाइल भाल मते॥ 43 ॥
मध्ये पीत-घृतसिक्त शाल्यन्नेर स्तूप।
चारिदिके व्यञ्जन-डोङ्गा, आर मुदगसूप ॥ 44 ॥
साद्रक, वास्तुक-शाक विविध प्रकार।
पटोल, कुष्माण्ड-बड़ि, मानकचु आर ॥ 45 ॥
चङ्ग-मरिच-सुखुत दिया सब फल-मूले।
अमृतनिन्दक पञ्चविध तिक्त-झाले ॥ 46 ॥
कोमल निम्बपत्र सह भाजा वार्त्ताकी।
पटोल-फुलबड़ि-भाजा, कुष्माण्ड-मानचाकी ॥ 47 ॥
नारिकेल-शस्य, छाना, शर्करा मधुर।
मोचाघण्ट, दुग्धकुष्माण्ड, सकल प्रचुर॥ 48 ॥
मधुराम्लबड़ा, अम्लादि पाँच-छय।
सकल व्यञ्जन कैल लोके यत हय॥ 49 ॥
मुद्गबड़ा, माषबड़ा, कलाबड़ा, मिष्ट।
क्षीरपुली, नारिकेल, यत पिठा इष्ट॥ 50 ॥
बत्तिशा-आठिया-कलार डोङ्गा बड़ बड़।
चले हाले नाहि, डोङ्गा अति बड़ दृढ़ ॥ 51 ॥
पञ्चाश पञ्चाश डोङ्गा व्यञ्जने पूरिञा।
तिन भोगेरे आशे पाशे राखिल धरिञा ॥ 52 ॥
सघृत-पायस नव-मृत्कुण्डिका भरिञा।
तिन पात्रे घनावर्त्त-दुग्ध राखेत धरिञा ॥ 53 ॥
दुग्ध-चिड़ा-कला आर दुग्ध-लक्लकी।
यतेक करिल, ताहा कहिते ना शक्ति ॥ 54 ॥
दुइ पाशे धरिल सब मृत्कुण्डिका भरि'।
चाँपाकलि-दधि-सन्देश कहिते ना पारि॥ 55 ॥
अनुवाद-'बत्तिशा-आठिया-कला' अर्थात् जिस केलेके
वृक्षकी डालपर कम-से-कम बत्तीस केलोंका गुच्छा
आता है, उस वृक्षके अखण्ड (कहींसे भी न कटे)
पत्तोंके ऊपर निम्नलिखित व्यञ्जनोंवाले भोगके बाकी
दो भागोंको अच्छी प्रकार सजाकर रखा। भोगपात्रके
बीचमें पीले रङ्गके घीसे युक्त उत्तम धानके चावलको
स्तूपके आकारमें रखा गया तथा उस चावलके स्तूपके
चारों ओर केलेके पत्तेसे बने दोनोंमें नाना प्रकारके
व्यञ्जन सजाये गये। उनमें मूँगकी दाल, अनेक
प्रकारके साग, परमल, कच्चे पेठेके साथ दाल मिलाकर
बनायी गयी बड़ी, अरबी आदिको सजाया गया। तीखी
मिर्च अथवा तीखे और कटु मसालोंके साथ कच्चे
केले, पपीते, कन्दमूल, मूली आदिके द्वारा बनायी गयी
पाँच प्रकारकी ऐसी तरकारियाँ, जो अमृतको भी
निन्दित करने वाली थीं।
इन व्यञ्जनोंमें कोमल-कोमल नीमके पत्तेसे युक्त
बैंगन, परमल और नर्म बड़ीका भाजा तथा सरसोंका
छौंक लगाकर कच्चे पेठे और अरबीकी सूखी सब्जी
थी। नारियलके गूदे, पनीर और शक्करसे बना हुआ
मधुर मिष्ठान, केलेके फूलसे बनी सब्जी, दूधमें कच्चे
पेठेको डालकर बनाया गया व्यञ्जन-ये सभी प्रचुर
मात्रामें बनाये गये थे। खट्टा-मीठा बड़ा, पाँच-छह
। 89

[ 3/44-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रकारके खट्टे पदार्थादि तथा जितने प्रकारके व्यञ्जन
लोक-प्रसिद्ध हैं, उन्हें भी भोगमें सजाया। मूँगकी
दालका बड़ा, उड़दकी दालका बड़ा, केलेका बड़ा,
रबड़ी और नारियल और अनेक प्रकारका पीठा बनाया
गया था। बत्तिशा-आठिया केलेके पत्तोंके दोने बड़े
और बहुत मजबूत थे, इसलिये वे हिल-डुल नहीं रहे
थे। इस प्रकार पचास-पचास दोने व्यञ्जनोंसे भरकर
तीनों भोगोंके आस-पास रखे गये थे। घीसे बनी
खीरको नये मिट्टीके बर्तनोंमें भरकर रखा गया था तथा
तीन पात्रोंमें दूधको गाढ़ा करके बनायी रबड़ी भी रखी
गयी। चिड़वा और केलेको दूधमें मिलाकर बनाये गये
व्यञ्जन तथा लौकीकी खीर आदि जितने और व्यञ्जन
प्रस्तुत किये गये, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है,
वे मिट्टीके कसोरोंमें रखे हुए थे। छोटे-छोटे केले, दही
और सन्देश आदि विविध प्रकारके व्यञ्जन भी थे,
जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 44-55 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘बत्तिशा-आठिया-कलार
आङ्गटिया’—जिसमें बत्तीस या अधिक केलोंका गुच्छा
आता है, ऐसा केलेका वृक्ष। आङ्गटिया अर्थात्
अखण्ड केलेका पत्ता ॥ 43 ॥
अनुभाष्य-ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी अपनी
पाक-कलाके नैपुण्यको सुन्दर रूपसे प्रदर्शित कर रहे
हैं। ‘लोके’—जगत्में। ‘इष्ट’—प्रयोजनीय, वाञ्छित। ‘चले-हाले
नाहि’—हिलता-डुलता नहीं। ‘दृढ़’—दृढ़, मजबूत।
‘शक्ति’—कर सकता हूँ॥ 44-55 ॥
नैवेद्यके ऊपर तुलसी और उसके साथ
आचमन-जल प्रदान करना :-
अन्न-व्यञ्जन-उपरि दिल तुलसीमञ्जरी।
तिन जलपात्रे सुवासित जल भरि' ॥ 56 ॥
तिन शुभ्रपीठ, तार उपरि वसन।
कृष्णेर भोग साक्षात् कृष्णे कराइल भोजन ॥ 57 ॥
अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने उन सब अन्न और
व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रख दी और तीन
जलपात्रोंमें सुगन्धित जल भरकर रख दिया तथा भोग
लगानेके उद्देश्यसे तीन सुन्दर लकड़ीके आसनोंपर
कपड़ा बिछा दिया। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने भगवान्
श्रीकृष्णके लिये सजाये गये भोगको साक्षात् श्रीकृष्ण
(महाप्रभु)को भोजन कराया॥ 56-57 ॥
अनुभाष्य- ‘साक्षात् कृष्णे’—श्रीमन् महाप्रभुको ॥ 57 ॥
स्वयं श्रीअद्वैतके द्वारा आरती-सम्पादन और दोनों
प्रभुओंका अपने भक्तोंके साथ आरती-दर्शन :-
आरतिर काले दुइ प्रभु बोलाइल।
प्रभु-सङ्गे सबे आसिं आरति देखिल ॥ 58 ॥
अनुवाद—भोग निवेदन करनेके बाद भोग-आरतीके
समय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द
प्रभुको बुलवा लिया। महाप्रभुके साथ आकर सभी
भक्तोंने आरतीके दर्शन किये॥ 58 ॥
ठाकुरको शयन प्रदान करना :-
आरति करिया कृष्णे करा'ल शयन।
आचार्य आसिं प्रभुरे तबै कैला निवेदन ॥ 59 ॥
दोनों प्रभुओंका भोजन करनेके लिये
घरके भीतर आना :-
दुइ भाइ आइला तबै करिते भोजन।
गृहेर भितरे प्रभु करेन गमन ॥ 60 ॥
अनुवाद-आरती करके श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने श्रीकृष्णको
शयन कराया और महाप्रभुके पास आकर घरके भीतर
आनेका निवेदन किया। उनकी प्रार्थनाको सुनकर दोनों
भाई भोजन करनेके लिये अन्दर आये॥ 59-60 ॥
मुकुन्द और हरिदासको भोजनके लिये प्रार्थना करनेपर
उन दोनोंकी अपनी मर्यादाकी रक्षा और दैन्य-विनय :-
मुकुन्द, हरिदास,–दुइ प्रभु बोलाइल।
जोड़हाते दुइ जन कहिते लागिल ॥ 61 ॥
मुकुन्द बोले,–“मोर किछु कृत्य नाहि सरे।
पाछे मुञि प्रसाद पामु, तुमि याह घरे ॥”62 ॥
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तीसरा अध्याय 3/61-69 ]
हरिदास बले,-"मुञि पापिष्ठ अधम।
बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन॥" 63 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदासको
भी भोजन करनेके लिये घरके भीतर आनेके लिये
कहा। उनकी बात सुनकर श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदास
हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे। श्रीमुकुन्दने
कहा, - "मेरा कुछ नित्यकार्य अभी बाकी हैं, इसलिये
मैं बादमें प्रसाद पाऊँगा, आप भीतर जाइये।" श्रीहरिदासने
कहा,-"मैं पापी और अधम हूँ, इसलिये बाहर बैठकर
बादमें एक मुट्ठी प्रसाद ग्रहण करूँगा॥" 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृत्य नाहि सरे'-कर्त्तव्य कुछ
बाकी है॥ 62 ॥
प्रसादके दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द
और श्रीअद्वैतको सम्मान देना :-
दुइ प्रभु लञा आचार्य गेला भितर-घरे।
प्रसाद देखिया प्रभुर आनन्द अन्तरे॥ 64 ॥
"ऐछे अन्न ये कृष्णके कराय भोजन।
जन्मे जन्मे शिरे धरौं ताँहार चरण॥" 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको जब
श्रीअद्वैताचार्य घरके भीतर ले गये, तब प्रसादको
देखकर आनन्दित होकर महाप्रभुने कहा, - "जो व्यक्ति
इस प्रकार श्रीकृष्णको अन्न-व्यञ्जनादि अर्पण कर
भोजन कराता है, मैं उसके चरणोंको जन्म-जन्मान्तर
तक अपने सिरपर धारण करता हूँ॥" 64-65 ॥
महाप्रभुको न बतलाकर श्रीअद्वैतका दोनों
प्रभुओंके लिये आसन प्रदान करना :-
प्रभु जाने तिन भोग-कृष्णेर नैवेद्य।
आचार्येर मन-कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥ 66 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने यह समझा कि तीनों भोग
श्रीकृष्णको समर्पित हुए हैं, परन्तु श्रीअद्वैताचार्यके
मनकी बातको महाप्रभु नहीं जान पाये ॥ 66 ॥
अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभुने तीन भागोंमें भोगको समान
मात्रामें बाँटकर सजा दिया था। (इसी अध्यायकी 42
संख्या देखें), उसमेंसे धातुके पात्रमें सजाया गया भोग
श्रीकृष्णके लिये था; और बाकी दो भाग केलेके पत्तोंके
ऊपर सजाये गये थे। धातुके पात्रवाले भोगको श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं श्रीकृष्णको निवेदन किया था। बाकी केलेके
पत्तोंवाले दो भोग श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
लिये अनिवेदित अवस्थामें ही रखे हुए थे, -उनको
श्रीअद्वैताचार्यने मन-ही-मनमें रखा था, महाप्रभुके सामने
उन्होंने इस बातको प्रकाशित नहीं किया। इसलिये
महाप्रभुने तीनों भोगोंको ही श्रीकृष्णका नैवेद्य-प्रसाद ही
समझा था॥ 66 ॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य, दोनोंका ही एक दूसरेको
भोजन करनेके लिये अनुरोध :-
प्रभु बले,-"वैस तुमि करिते भोजन।"
आचार्य कहे,-"आमि करिब परिवेश्न ॥" 67 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे कहा,-"आप
भी बैठकर भोजन कीजिये।" यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने
कहा,-"मैं भोजन परोसूँगा ॥" 67 ॥
महाप्रभुके वचन :-
"कोन् स्थाने बसिब, आर आन दुइ पात।
अल्प करि' ताहे आनि' देह व्यञ्जन भात ॥" 68 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 68 ॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,-"मैं
और नित्यानन्द किस स्थानपर बैठेंगे?" भोगके परिमाणको
बहुत अधिक देखकर और भी अन्य दो पात्रको लाकर
उनमें ही कम मात्रामें अन्न-व्यञ्जन देनेको कहा ॥ 68 ॥
श्रीअद्वैताचार्यका दोनों प्रभुओंको आसन-प्रदान :-
आचार्य कहे,-"बैस दाँहे पिण्डार उपरे।"
एत बलि' हाते धरि' बसाइल दुँहारे ॥ 69 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-"आप दोनों यहाँ
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