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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

ब्रजेन्द्र-श्लोकेर ]
ब्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' 17/303 शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर 10/90 शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद 17/72
ब्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार 17/277 “शास्त्रेर विचार भाल-मन्द 16/94 शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द 17/235
शिरे धरि वन्दों, नित्य 17/336 शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य 12/37
शिवपत्नीर भर्त्ता'—इहा 16/64 शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न 12/48
शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत 11/49 शुनिया प्रभुर वाक्य दिग्विजयी 16/87
श शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर 10/63 शुनिया पाइला आचार्य 12/17
शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य 10/54 शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते 16/36
शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास 11/52 शिवानन्देर उपशाखा—ताँर 10/61 शुनिया मुरारि श्लोक कहिते 17/77
शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर 10/106 शिशुगण लये पाड़ा-पड़सीर 14/40 शुनिया ये क्रु
शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग 17/13 शिशुगणे मिलि' कैल विविध 14/23 शुनिया सकल लोक विस्मित 14/92
शची आसि' कहे,—“केने 14/74 शिशुद्वारे कैल मोरे एत 16/96 शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता 15/15
शची कहे,—“आर एक 14/80 'शिशुद्वारे देवी मोरे करिल 16/95 शुनिलुँ फाँकिते तोमार 16/32
शची कहे,—“ना खाइब 15/10 शिशुर शून्यपदे केने नूपूरेर 14/79 शुनि' शची पुत्रे किछु 14/41
शची कहे,—“मुञि देखों 13/83 शिशुसब शची-स्थाने कैल 14/41 शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी 15/13
शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत 17/10 शिष्यगण पड़ाइते करिला 16/4 शुनि' शची-मिश्रेर मने 14/20
शची-जगन्नाथे देखि' देन 14/71 शिष्यगण लज्जा पुनः विद्यार 16/24 शुनि' सब म्लेच्छ आसि' 17/192
शची बले,—“याह, पुत्र 14/77 शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्य 9/24 शुनि' सब लोक तबे 16/39
शची-मिश्रेर पूजा लञा 13/118 शिष्येते ना बुझे, आमि 16/33 शुनि' स्तब्ध हैल काजी 17/168
शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल 15/30 शिष्येर प्रतीत हय 13/29 शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि 14/90
शत दुइ फल प्रभु शीघ्र 17/82 शिष्येर समान मुञि ना 16/103 शूकर चराय डोम, सेइ 10/83
शत शत पड़ुया आसि 16/9 शुकाइया मरे, तबु जल 17/28 शेष अष्टादश वर्ष 13/37
शत शत शिष्यसङ्गे सदा 16/5 शुक्लाम्वर-ब्रह्मचारी बड़ 10/38 शेष-लीला शुनिते सबार 8/71
शत-श्लोकेर एक श्लोक 16/40 शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर 17/176 शेषे अवतीर्ण हैला 13/62
शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय 16/65 शुनि' क्रु शैशव-चापल्य किछु ना 16/103
शब्दालङ्कारे—तिनपदे आछे 16/73 शुनि' क्रोध कैल सब 17/254 श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र 17/15
शयने आमार उपर लाफ 17/180 शुनि' चमकित हैल पिता 14/78 श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ 17/279
शाखार उपरे हैल वृक्ष-दुइ 9/21 शुनि' देखि' सर्वलोक 17/187 श्लोक पड़ि' ताँर भाव 14/68
शाखार उपशाखा, तार 12/77 शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे 17/250 श्लोकेर अर्थ कैल विप्र 16/45
शाखा-श्रेष्ठ ध्रुवानन्द, श्रीधर 12/79 शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' 17/234
शाप शुनि' महाप्रभुर हइल 17/63 शुनि प्रभु 'हरि' बलि' उठिला 17/223
“शापिब तोमारे मुञि 17/62 शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर 16/104
शालग्राम सेवा करे 13/86 शुनिया आविष्ट हैला प्रभु 17/91
शास्त्र-आज्ञाय वध कैले 17/157 शुनिया कहिल प्रभु बहुत 16/37
पद्य सूची | 293

[ श्रवण-षोल
श्र
श्रवण-मात्रे कण्ठे कैल १५/५
श्रीईश्वरपुरी-रूपे अङ्कुर ९/११
श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत १७/३३३
श्रीकृष्णचैतन्य-दया करह ८/१५
श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपे १३/८
श्रीकृष्णचैतन्यलीला १७/३३१
श्रीगदाधरदास-शाखा १०/५३
श्रीगदाधर पण्डित-उपशाखा १२/७८
श्रीगोपाल-नामे आर १२/१९
श्रीगोपालभट्ट-एक शाखा १०/१०५
'श्रीगोविन्द-देव' नाम ८/५१
श्रीगोविन्द-नाम ताँर १०/१३८
श्रीगौरीदास पण्डिते प्रेमोद्दण्ड ११/२६
श्रीचन्द्रशेखर वैद्य, द्विज १०/११२
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द १३/१२४
श्रीचैतन्य-नित्यानन्दे करि' ११/२७
श्रीचैतन्य मालाकार पृथिवीते ९/९
श्रीचैतन्य-माली कैला १७/३२२
श्रीचैतन्येर अति प्रिय १०/७४
श्रीजगदीश पण्डित हय ११/३०
श्रीजीव, गोपालभट्ट ९/४
श्रीजीव पण्डित नित्यानन्द ११/४४
श्रीधरेर लौहपात्रे कैल १७/७०
श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर १२/८३
श्रीनाथ पण्डित-प्रभुर १०/१०७
श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द १०/११०
श्रीनित्यानन्द-पद बिना ११/४७
श्रीनित्यानन्द-वृक्षर स्कन्ध ११/५
श्रीनित्यानन्देर तेंहो ११/३६
श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त १०/११०
श्रीनृसिंह-उपासक-प्रद्युम्न १०/३५
श्रीनृसिंह तीर्थ, आर ९/१४
श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर १०/९
श्रीपुरुषोत्तमदास-ताँहार ११/३८
श्रीमन्त, गोकुलदास ११/४९
श्रीमाधव घोष-मुख्य ११/१८
श्रीमाध्वाचार्य, कमलाकान्त १०/११९
श्रीमान्पण्डित शाखा १०/३७
श्रीमान् सेन प्रभुर सेवक १०/५२
श्रीमुकुन्द-दत्त शाखा १०/४०
श्रीमुरारि गुप्त-शाखा १०/४९
श्रीयदुनन्दनाचार्य-अद्वैतेर १२/५६
'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थे १६/७७
श्रीरघुनाथदास, आर १७/३३५
श्रीराधार दासीमध्ये याँर १०/१३७
श्रीराधार प्रलाप यैछे १३/४१
श्रीरामदास आर, गदाधर ११/१३
श्रीरामदास, माधव, आर १०/११८
श्रीरूप-रघुनाथ-चरणेर एड् ८/८४
श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ ९/४
'श्रीलक्ष्मी'-शब्दे १६/७३
श्रीवत्स पण्डित, ब्रह्मचारी १२/६२
श्रीवल्लभसेन, आर सेन १०/६३
श्रीवास कहेन तबे रास १७/२३९
श्रीवास कहे,-'वंशी १७/२३३
श्रीवास-गृहेते गिया गदा १७/९४
श्रीवास पण्डित आर १०/८
"श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे १७/५७
श्रीवास-पुत्रेरे ताँहा हैल १७/२२८
श्रीवास बलेन,-'ये १७/९६
श्रीवास वर्णन वृन्दावन १७/२३४
श्रीवासादि गदाधरादि यत १७/३३३
श्रीवासादि यत महाप्रभुर १७/३००
श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी १७/५२
श्रीवासे कहेन प्रभु करिया १७/९५
श्रीवासेर ब्राह्मणी १३/११०
श्रीवासेर वस्त्र सिये दरजी १७/२३१
श्रीवासेरे दुःख दिते नाना १७/३६
श्रीविजयदास-नाम प्रभुर १०/६५
श्रीवीरभद्र गोसाञि-स्कन्ध ११/८
श्रीशची-जगन्नाथ १३/५४
श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे १६/७६
श्रीशिखि माहिति, आर १०/१३६
श्रीसदाशिव कविराज-बड़ ११/३८
श्रीस्वरूप-श्रीरूप १७/३३५
श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र १३/५६
श्रीहरि आचार्य, दास-पुरिया १२/८४
श्रीहरिचरण, आर माधव १२/६४
श्रीहर्ष, रघुमिश्र, पण्डित १२/८५
शृङ्ग-वेत्र-गोपवेश, शिरे ११/२१
ष
षड्वर्ग, अष्टवर्ग, सर्व १३/९०
षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत १७/३१९
षोड़श वत्सर कैल १०/९३
षोड़शे कहिलुँ 'कैशोर १७/३२७
षोलसाङ्गेर काष्ठ तुलि' ये १०/११६
षोलसाङ्गेर काष्ठ ये तुलि' ११/१६
294 | श्रीचैतन्यचरितामृत

सङ्कीर्त्तन-सुन्दर ]
स
सङ्कीर्त्तन करि' वैसे श्रमयुक्त 17/79
सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे 17/221
संक्षेपे करिये किछु से 10/123
संक्षेपे कहिये, कहा ना 13/53
संक्षेपे कहिल जन्मलीला 14/4
संक्षेपे कहिल महाप्रभुर 10/163
संक्षेपे कहिलाङ एइ 11/60
संक्षेपे कहिलुँ अति, —ना 17/329
संक्षेपे लिखिये सम्यक् 13/51
सङ्गे चलि' आइसे काजी 17/224
सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर 17/273
संन्यास करह तुमि' 15/18
संन्यास करिया तीर्थ करिवारे 15/12
संन्यास करिया यबे प्रभु 17/55
संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत 17/265
संन्यासी-बुद्धये मोरे 8/11
“संसार-सुख तोमार हउक 17/63
स-कलङ्क चन्द्रे आर 13/91
सकल पण्डित जिनि' करे 17/6
सकल भरिया आछे प्रेम 10/161
सकल शाखार सेइ स्कन्ध 9/12
सख्य, दास्य, —दुइ भाव 17/299
सगणे सचेले गया कैल 17/74
सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वेर' 17/320
सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ 17/327
सप्त मिश्र ताँर पुत्र—सप्त 13/57
सत्यराज आदि—ताँर 10/48
स्थावर-जङ्गम हैल 13/97
सदा नाम लइबे, यथा 17/30
सदाशिव-पण्डित याँर 10/34
सन्ध्याकाले कर सबे नगर 17/133
सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल 17/134
सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' 17/120
“सब देश भ्रष्ट कैल एकला 17/255
सबाके खाओयाल आगे 17/84
सबार अध्यक्ष-प्रभुर मर्म 10/124
सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय 13/5
सबार सम्मान-कर्त्ता, करेन 8/56
सबारे कहे श्रीवास हासिया 17/41
सबारे निषेधिल, —“इहार 17/73
सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य 10/81
'सबे घरे याह, आमि 17/214
सबे मिलि' नृत्य करे 17/119
सबे मेलि' करे तबे 17/254
समग्र बलिते नारे 'सहस्र 10/163
समस्त भक्तरे दिल इष्ट 17/70
समासे गौण हैल, शब्दार्थ 16/59
सरस्वती याहा बलाय, सेइ 16/94
सरस्वती रात्रे ताँरे उपदेश 16/106
सर्व अङ्ग-सुनिर्माण 13/116
सर्वज्ञ कहे, —“आमि ताहा 17/112
सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार 17/259
सर्व त्यजि' कैल प्रभुर 10/91
सर्वत्र करेन कृष्णनामेर अ28
सर्वत्र लओयाइल प्रभु 13/27
सर्वप्राणीर उपकार हय 9/45
सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य 12/57
सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर 11/41
सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर 17/212
सर्वलोके करिबे एइ धारण 14/19
सर्वलोके मत्त कैला आपन 9/52
सर्व वैष्णवगण हरिध्वनि 8/76
सर्वशाखागणेर यैछे फल 17/323
सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र 11/56
सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर 13/65
सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय 16/6
सर्वस्व दण्डिया तार जाति 17/128
सर्वाङ्ग बेडिल कीटे, काटे 17/46
सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे 17/45
सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे 16/110
सर्वोत्तम हइलेओ तारे 8/12
सवंशे करेन याँरा चैतन्येर 10/11
सवंशे तोमारे आर यवन 17/185
सहजे यवन-शास्त्रे अदृढ़ 17/171
सहस्र दण्डवत् करे, लय 10/99
सहस्र-मुखे याँर गुण 10/41
सहस्र-वदने सेवा ना 8/53
सहस्र-वदने तँहो 13/45
'सहस्र वदने' यार दिते 10/162
सहस्र सेवक सेवा करे 8/53
'साक्षात्', 'आवेश' आर 10/56
साक्षात् ईश्वर करि' प्रभुरे 16/106
साक्षात् ईश्वर तँहो, —नाहिक 16/13
'साक्षाते' सकल भक्ते देखे 10/57
साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय 16/11
सात सात पुत्र हबे—चिरायु 14/55
सार्द्ध सप्त प्रहर करे 10/102
सालङ्कार हैले अर्थ करे 16/86
सावित्री, गौरी, सरस्वती 13/105
साहजिक प्रीति दुँहार 14/64
सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट 10/149
सिंह-राशि, सिंह-लग्न 13/90
सिन्दूर, हरिद्रा, तैल 13/110
सुखी हइया लोक मोर 9/40
सुन्दर शरीर यैछे भूषणे 16/70
सुन्दरानन्द—नित्यानन्देर शाखा 11/23
पद्य सूची | 295

[ सुपठित-हरि
सुपठित विद्या कारओ ना 17/257 | सेइ दुइस्कन्धे शाखा यत 9/22 | से-सब गुणेर ताँर 8/57
सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द 10/111 | सेइ देशे विप्र, नाम-मिश्र 16/10 | से-सब सामग्री आगे करिब 10/28
सुवर्णेर कड़ि-बउलि 13/112 | सेइ नन्दसुत-इहाँ 17/295 | से-सब सामग्री यत झालिते 10/26
सुशील, सहिष्णु, शान्त 8/55 | सेइ नामे आमि तोमाय 17/175 | से सम्बन्धे हओ तुमि 17/149
सुस्थ हञा कहे प्रभु अपूर्व 15/17 | सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य 17/296 | सेह महावैष्णव हय 8/38
सूक्ष्म विचारिये यदि आछये 16/84 | सेइ पत्रीर कथा आचार्य 12/30 | सोनार मुषल हल ये 10/73
सूत्र करि' गणे यदि 13/45 | सेइ पापी दुःख भोगे 17/54 | स्कन्धेर उपरे बहु शाखा 9/17
सूत्र करि' ग्रन्थिलेन 13/16 | सेइ पुण्ये हैलाङ आमि 17/111 | स्तनपान करे प्रभु ईषत् 14/35
सूत्र करि' सब लीला 8/45 | सेइ फल खाय, नाचे 9/53 | स्तन पियाइते पुत्रेर चरण 14/11
सूत्रधृत कोन लीला ना 8/47 | सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द 17/295 | स्थावर हइया धरे 9/32
सूत्ररूपे मुरारिगुप्त 13/15 | सेइ भक्तगणे एबे करिये 10/129 | स्थूल एइ पञ्च दोष 16/84
सूत्र-वृत्ति-टीकाय कृष्णनामेर 13/29 | सेइमत उन्माद-प्रलाप 13/41 | स्फुट करि' कह तुमि 17/177
सूर्यदास सरखेल, ताँर भाइ 11/25 | सेइ मोर प्रिय, अन्य 10/82 | स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर 16/26
सृजाइल, जीयाइल, ताँरे 12/68 | सेइ रात्रे एक सिंह महा 17/179 | स्वतःसिद्धज्ञान, तबे शिक्षा 14/88
सेइ अंश कहि, ताँरे 16/27 | सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु 10/103 | स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त 8/32
सेइ अनुसारे लिखि लीला 13/47 | सेइरूपे एइरूपे देखि 17/113 | स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम-निगूढ 8/21
सेइ आचार्यगणे मोर कोटी 12/75 | सेइ लिखि, मदनगोपाल 8/79 | स्वप्न देखि' मिश्र आसि' 16/14
सेइ आचार्येर गण 12/73 | सेइ वीरभद्र-गोसाञिर 11/12 | स्वप्ने एक विप्र कहे 16/12
सेइ काले दैवयोगे 13/20 | सेइ व्रजेश्वर-इहँ 17/294 | स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल 16/14
सेइकाले निजालय 13/99 | सेइ व्रजेश्वरी-इहँ शचीदेवी 17/294 | स्वमत कल्पना करे 12/9
सेइ कृष्ण, सेइ गोपी 17/304 | सेइ शास्त्रे कहे,-प्रवृत्ति 17/156 | स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस 17/317
सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् 12/6 | सेइ सब लीलार शुनिते 8/49 | स्वयं भगवान् येइ 17/314
सेइक्षणे गौरकृष्ण 13/94 | सेइ सेइ आचार्येर कृपार 12/74 | स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला 10/93
सेइ क्षणे जागि' निमाइ 14/10 | सेइ सेइ रसे कृष्ण 17/301 | स्वर्ग वाद्य-नृत्य करे 13/96
सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते 17/245 | सेइ सेइ स्थाने किछु 13/49 | स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान 16/18
सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन 17/290 | सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल 12/6 | स्वेद-कम्प-पुलकादि 8/27
सेइ चिह्न पाये देखि' मिश्रे 14/11 | सेइ हैते एकादशी करिते 15/10 |
सेइ जन याय चैतन्येरे 17/309 | सेइ हैते जिह्वा मोर बले 17/200 | ह
सेइ जले जीये शाखा 12/66 | सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि 13/36 |
सेइ जले पुष्ट स्कन्ध 12/5 | से दण्डप्रसाद आर लोके 12/42 |
सेइ जले स्कन्धे करे 12/7 | से दिन बहुत नाहि कैलि 17/184 |
सेइ तुमि हओ,-हेन 17/215 | से पत्रीते लेखा आछे-एइ 12/31 |
सेइ दिन एक आमार 17/188 | सेवार अध्यक्ष-श्रीपण्डित 8/54 | 'हरि' 'कृष्ण' 'नारायण' 17/218
296 | श्रीचैतन्यचरितामृत

हरिदास-हृदय ]
हरिदास ठाकुर-शाखार 10/43 | 'हरेर्नाम' श्लोकेर कैल 17/20 | हुङ्कारे आकृष्ट हैला 13/71
हरिदास ठाकुरेर करिल 17/71 | हाड़िके आनिया सब दूर 17/44 | हेनकाले दिग्विजयी ताहाँइ 16/29
हरिदासे लञा सङ्गे 13/99 | हासि' ताहे महाप्रभु पुछेन 17/171 | हेनकाले पाषण्डी हिन्दु 17/203
हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्त 17/39 | हासे, कान्दे, पड़े 17/208 | हेनकाले राधा आसि' दिला 17/289
हरिनाम लओयाइला 13/22 | हासे, कान्दे, नाचे, गाय 17/194 | हेन कृपामय चैतन्य ना 8/12
'हरि' बलि' नारीगण 13/96 | हित-उपदेश कैल हइया 17/56 | हेन कृष्णनाम यदि लय 8/29
'हरि' बलि' हिन्दुके 13/95 | हिन्दुके परिहास कैनु से 17/201 | हेन प्रेम श्रीचैतन्य दिला 8/20
'हरि हरये नमः, कृष्ण 17/122 | हिन्दुर ईश्वर बड़ येइ 17/215 | हेन बुझि, जन्मिबेन 13/85
'हरि' 'हरि' करि' हिन्दु 17/195 | हिन्दुर देवतार नाम लह 17/197 | हैते हैते हैल गर्भ त्रयोदश 13/87
'हरि' 'हरि' ध्वनि बड़ 17/193 | हिन्दुर धर्म नष्ट कैल 17/210 | होड़ कृष्णदास-नित्यानन्द 11/47
'हरि' 'हरि'-ध्वनि बिना 17/123 | हिन्दुशास्त्रे 'ईश्वर' नाम 17/212 | हृदयानन्द सेन, आर 12/60
'हरि' 'हरि' बले लोक 13/21 | 'हिन्दु 'हरि' बले, तार 17/196 |
पद्य सूची | 297

298 | श्रीचैतन्यचरितामृत

शब्दकोश
अ
अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान
अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी
सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली
अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो
अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके
अच्युत—जो च्युत नहीं हो
अज—अजन्मा
अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली
स्तनके जैसी चीज
अज्ञ—ज्ञानरहित
अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक,
जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म
हो जाता है
अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका
उल्लङ्घन
अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया
हुआ
अतिशय—अत्यधिक
अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर
कहना
अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
अत्युत्तम—अति उत्तम
अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात
अधिदैव—आराध्य देवता
अधिरूढ़—बढ़ा हुआ
अधिष्ठान—आधार, आश्रय
अनभिज्ञ—न जाननेवाला
अनवरत—निरन्तर
अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य
अनुक्षण—निरन्तर
अनुगत—अनुगामी, अधीन
अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन
अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य
अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न
अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना
अन्तर्भूत—अन्तर्गत
अन्त्य—अन्तका, आखिरी
अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ
अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध,
मेल
अन्वेषण—खोज, ढूँढना
अपकार—अहित
अपटुता—अकुशलता
अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो
अपरिमित—अगणित, अनगिनत
अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण
अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा
अप्राकट्य—अप्रकट होना
अप्राकृत—अलौकिक
अपारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न
भोगा जा रहा हो
अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध,
प्रसङ्गके विरुद्ध
अबाध—बाधारहित
अभयत्व—अभयता
अभिज्ञ—जाननेवाला
अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली
शब्द शक्ति
अभिधान—शब्दकोष
अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय

[ अभिप्राय-ईशिता श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अभिप्राय—मूल अर्थ, तात्पर्य
अभिप्रेत—उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत
अभिवृद्धि—अभ्युदय, बढ़ना
अभिव्यक्ति—प्रकट करना
अभिसन्धि—जोड़, समझौता
अभिसार—आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना
अभिहित—कहा हुआ
अभीष्ट—प्रिय, रुचिकर
अभ्यस्त—बार बार अभ्यास किया गया
अभ्युदय—उदय
अमित—अत्यधिक
अरण्य—वन
अवगत—जाना हुआ
अर्वाचीन—नया, बादमें उत्पन्न हुआ
अवतारणा—नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना
अवतीर्ण—अवतारके रूपमें प्रकट
अवधारण—शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना,
निश्चय करना
अवयव—अङ्ग, अंश
अवरुद्ध—रुका हुआ
अवलम्बन—आश्रय लेना, सहारा लेना
अवलोकन—देखना
अवशिष्ट—बचा हुआ, शेष
अवस्थान—रहना, अवस्थिति
अविचिन्त्य—अचिन्त्य
अविच्छिन्न—अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न
तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट
अव्यय—अविकारी
अव्याकृत—अव्यक्त
अशेष—सम्पूर्ण
अष्टसिद्धि—आठ प्रकारकी सिद्धियाँ
असङ्ग—आसक्तिहीन
असङ्गत—प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित
असङ्गति—मेलका ना होना
असंस्कृत—संस्कारहीन
असमोध्र्द्ध—जिससे बड़ा और जिसके बराबर
कोई नहीं हो
असार—सारहीन
असूया—ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ
आख्यायिका—कहानी
आच्छन्न—ढका हुआ
आत्मविषयणी—आत्म-सम्बन्धी
आत्मसात्—अपने अधिकारमें
आत्यन्तिक—असीम
आदित्य—सूर्य
आधान—स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान
रखना
आधिदैविक—देवताओंके द्वारा कृत
आधिभौतिक—अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त
आध्यात्मिक—मानसिक, आत्म-सम्बन्धी
आपाततः—अचानक, अन्तमें
आप्त—पूर्ण, कुशल
आम्नाय—वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश
आयुध—अस्त्र
आरूढ़—आसीन
आरोहण—चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना
आर्त्ति—क्लेश, पीड़ा
आर्ष—ऋषियोंका
आलोचना—गुण-दोष निरूपण
आलोच्य—आलोचना योग्य
आह्लादित—आनन्दित
इ
इति—इस प्रकार, समाप्ति
इहलोक—यह लोक
ई
ईक्षण—दृष्टिपात
ईशिता—ईश्वरत्व
300 |

शब्दकोश उच्छिष्ट-छन्दविद्या ]
उ
उच्छिष्ट—खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त
उत्कृष्ट—उन्नत, श्रेष्ठ
उद्बुद्ध—जगा या जगाया हुआ, विकसित
उद्भासित—व्यक्त, चमकता हुआ
उद्यत—तैयार
उद्रेक—प्रचुरता, बढ़ती
उद्वेग—क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता
उपक्रम—योजना, आरम्भ, प्रयास
उपशम—विराग, विरक्ति
उपलक्षित—इशारेसे बताया हुआ
उपाङ्ग—छोटा या सहायक अंग
उपार्जित—कमाया हुआ
उपादान—साधन-सामग्री
उपादेय—ग्रहण करने योग्य, उपयोगी
उपेयत्व—उपाय-योग्य होनेका भाव
उरु—विस्तृत, महान
उरुक्रम—विष्णु
उरुगाय—उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका
स्तुतिगान किया गया हो
ए
एकरस—जो सदा एक रूपमें रहे,
एकीभूत—जो मिलकर एक हो गया हो
ऐ
ऐहिक—सांसारिक
औ
औत्सुक्य—उत्सुकता
औद्धत्य—उद्धतता, अख्खड़पन
औपाधिक—उपाधियुक्त
क
कर्त्तृत्व—कर्ताका धर्म, कार्य
कलुषित—गंदा, कलुषयुक्त
कल्प—वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन
कल्पवृक्ष—इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष
काम्यकर्म—फलकी कामनासे किया
जानेवाला कर्म
कैतव—छल, धोखा
केवला भक्ति—शुद्धा भक्ति
कैङ्कर्य—दासत्व
कैवल्य मुक्ति—निर्वाण मुक्ति
कौतूहलवश—उत्सुकतावश
क्रोड़ीभूत—अन्तर्भूत
क्लान्त—थका हुआ, क्षीण
क्ष
क्षिति—पृथ्वी
क्षेत्र—शरीर
क्षेत्रज्ञ—शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा
परमात्मा
क्षोभ—असन्तोष, व्याकुलता
ग
ग्रथित—गूँथा हुआ
ग्रन्थि—गाँठ
ग्रास—आहार
ग्रीवा—गर्दन
घ
घ्राण—गन्ध, सूँघनेकी शक्ति
च
चित्तगुहा—हृदयरूपी कन्दरा
चित्-शक्ति—भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति
चिदालोचना—चित्-वस्तुकी आलोचना
चिन्तामल—चिन्तारूपी मल
चिन्मयत्व—चिन्मयता
चैतन्यत्व—चेतनता
चैतन्यनिष्ठ—चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है
चैतन्यहीन—चेतनारहित
छ
छन्दविद्या—अठारह विद्याओंमें एक
। 301

[ जर्जरित-नैतिक
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
ज
जर्जरित—जो जर्जर हो गया हो
त
तत्त्वज्ञान—तत्त्ववस्तुका ज्ञान
तत्त्वतः—यथार्थतः
तत्त्वविद्—तत्त्वको जाननेवाला
तदीय—भगवत्-सम्बन्धी
तनय—पुत्र
तन्मय—तल्लीन
तादात्म्य—दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न
होनेका स्वभाव
तारतम्य—दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका
भाव
तिर्यग्—पशु-पक्षी
तैलधारावत्—तैलकी भाँति धारावाला
त्रिगुणातीत—तीनों गुणोंसे अतीत
त्रिवर्ग—धर्म, अर्थ और काम
द
दिक्पाल—दश दिशाओंके रक्षक देवता
दुर्ज्ञेय, दुर्बोध—कठिनाईसे जानने योग्य
दुर्निगृहीत—कठिनाईसे वशमें लाया हुआ
दुर्निवारित—कठिनाईसे निवारण किया हुआ
दुरुह—कठिन
दुस्त्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
देदीप्यमान—चकमता-दमकता हुआ
देहाध्यास—देहमें मिथ्या अभिमान
द्रव्यमययज्ञ—द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ
द्विजवर—ब्राह्मणश्रेष्ठ
द्वैतभाव—दो होनेका भाव
ध
धूसरित—धूलसे भरा हुआ
ध्वनित होना—पता चलना
न
नराकृति—मनुष्यके समान आकृति
नामाभास—नामका आभास
निःशक्तिक—शक्तिरहित
निःश्वास—प्राणवायु या साँसका बाहर
निकलना
निःसृत—निकला हुआ
निकृष्ट—तुच्छ
निकेतन—घर
निक्षेप करना—फेंकना
निगृहीत—निग्रह किया हुआ
निग्रह—संयम
निन्तान्त—अत्यन्त, एकदम
निमज्जित—डूबा हुआ, स्नात
नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य
निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित
निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं
निर्गत—बाहर निकला हुआ
निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत
निर्दिष्ट—निर्देशित
निर्वाण—मोक्ष
निर्विकल्प—विकल्पसे रहित
निर्विवाद—बिना विवादका
निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ
निरूपक—निरूपण करनेवाला
निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा
देना
निशा—रात्रि
निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म
निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है
निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की
सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद)
निस्तारक—निस्तार करनेवाला
निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत
निहत—मारा हुआ
नीलमणि—नीलम
नैतिक—नीति-सम्बन्धी
302 ।

शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ]
नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न
नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव
नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता
प
पक्षान्तर—दूसरी ओर
पन्था—पथ
परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात
परनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला
परदार—दूसरेकी स्त्री
परवर्ती—बादमें
पराक्रान्त—शक्तिशाली
परिग्रह—ग्रहण
पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति
पराभूत—पराजित
परिचर्या—सेवा
परिचालक—चलानेवाला
परिदृष्ट—दृष्ट
परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण
परिमित—सीमित
परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ
परिव्राजक—संन्यासी
परिवेष्टित—घिरा हुआ
पर्यन्त—तक
पर्यवसित—समाप्त
पाण्डित्य—विद्वता
पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी
पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी
पार्षद—परिकर
पाषण्डी—पाखण्डी
पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न
पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग
प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग
प्रकृत—यथार्थ
प्रकृष्ट—उत्तम
प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ
प्रच्छन्न—ढका हुआ
प्रजल्प—इधर-उधरकी बात
प्रज्ञा—बुद्धि
प्रणयन—रचना, निर्माण
प्रणत—शरणागत
प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले
प्रणति—प्रणाम, शरणागति
प्रताड़ित—सताया गया
प्रतिपादित—प्रमाणित
प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय
प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात
प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति
हो रही हो
प्रत्यगात्मा—जीवात्मा
प्रत्यवाय—दोष
प्रत्याहार—निरोध, रोकना
प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई
प्रदत्त—दिया हुआ
प्रधान—मायाकी एक वृत्ति
प्रधानतः—मुख्यरूपसे
प्रपत्ति—शरणागति
प्रभूत—अत्यधिक
प्रभृति—जैसा
प्रयोजनीयता—आवश्यकता
प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला
प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव
प्रवर—श्रेष्ठ
प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ
करनेवाला
प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव,
प्रभाव
प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य
प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा
प्रशामक—शान्त करनेवाला
प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी
। 303

[ प्राक्तन-विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
प्राक्तन—प्राचीन
प्रादुर्भूत—आविर्भूत, अवतरित
प्रादेशिक वाक्य—प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य
प्रापक—प्राप्त करने या करानेवाला
प्रापञ्चिक—जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी
प्राप्य—प्राप्त होने योग्य
प्रार्थित—प्रार्थना किया हुआ
प्रेमास्पद—प्रेमका स्थल
प्रेमोत्कर्ष—प्रेमका उत्कर्ष
ब
बाहुल्य—अधिकता
बाह्य अङ्ग—बाहरी अङ्ग
बिद्ध—छेदा हुआ, आहत
बृहत्—बड़ा
बोधगम्य—समझमें आने योग्य
ब्रह्मलय—ब्रह्ममें लय होना
ब्रह्मवेत्ता—ब्रह्मको जाननेवाला
ब्रह्मानन्द—ब्रह्मका आनन्द
ब्रह्मानुभूति—ब्रह्मकी अनुभूति
भ
भक्तानन्दायिनी—भक्तोंको आनन्द देनेवाली
भोक्तृत्वभाव—भोक्ता होनेका भाव
म
मत्सम्बन्धी—मेरे सम्बन्धी
मत्सरता—डाह, जलन, द्वेष
मथन—मथनेका भाव
मधुरिमा—माधुर्य
मन्वन्तर—ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग
मन्तव्य—विचार, मत
मर्मार्थ—सार
महत्—बड़ा
मायाच्छन्न—मायाके द्वारा आच्छन्न
मुकुलित—आधा विकसित
मुमुक्षु—मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त—मेधावी
मोहान्ध—मोहसे अन्धा
म्लेच्छ—चारो वर्णोंसे भी नीच
य
यतिगण—संन्यासी लोग
याग—यज्ञ
यादृच्छिक—स्वतन्त्र, ऐच्छिक
युक्तियुक्त—उचित, युक्तिपूर्ण
युगपत्—एक ही समयमें, साथ-साथ
युगावतार—प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार
योगमाया—भगवान्‌की परा शक्ति
योगस्थैर्य—योगकी स्थिरता
र
रक्तिम—लालिमायुक्त
रञ्जित—रंगा हुआ
रूक्ष—रूखा, नीरस
ल
लिङ्गशरीर—सूक्ष्म शरीर
लिप्स—किसी वस्तुको पानेकी इच्छा
लुब्ध—ललचाया हुआ, लोभित
लोकपाल—लोकका पालन करनेवाला
लोकप्रवर्त्तन—लोगोंके कल्याणके लिये
व
वञ्चक—वञ्चना करनेवाला
वयस—उम्र
वर्चस्व—अधिकार
वर्णविशिष्ट—वर्णवाला
वर्णसङ्कर—भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न
वाक्—वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय
वाचाल—अधिक बोलनेवाला
वागिन्द्रिय—जिह्वा
विक्षिप्त—पागल, उद्विग्न
304 ।

शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ]
विगुण-गुणहीन
विच्युति-भूल, पतन, वियोग
विजितात्मा-जिसने मनको जीत लिया है
विज्ञ-पण्डित, जाननेवाला
विदित-मालूम
विधर्म-धर्मविरुद्ध
विधिवादिगण-नैतिक लोग
विधेय-करने योग्य
विधेयात्मा-जिसकी आत्मा संयत हो
विन्यास-व्यवस्थित करना
विपर्यय-प्रतिकूलता, विपरीतता
विभूति-ऐश्वर्य
विरहकातर-विरहसे कातर
विरोधाभास-विचारमें विरोध प्रतीत होना
विलास-क्रीड़ा
विवक्षित-इच्छित, कथित
विवृत-स्पष्ट, व्यक्त
विशारद-निपुण
विशिष्ट-विशेषतायुक्त
विशिष्टता-विशेषता
विशुद्धचित्त-जिसका चित्त शुद्ध है
विशेषत्व-विशेषता
विषयणी-विषयसे सम्बन्धित
विहित-आदेश किया हुआ
वृष्टि-वर्षा
वेदज्ञ-वेदोंके जाननेवाला
वैषम्य-विषमता
व्यङ्गोक्ति-गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो
व्यतिक्रम-उल्लङ्घन
व्यतिरेक-असङ्गति, निषेध
व्यवहृत-व्यवहार किया हुआ
व्योम-आकाश
श
शोच्य-शोचनीय
शैव-शिवके उपासक
श्रुत-सुना हुआ
श्रोतव्य-सुनने योग्य
श्लेषोक्ति-छिपे अर्थवाली बात
ष
षडैश्वर्यपूर्ण-छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण
स
सङ्कीर्णता-उदार ना होनेका भाव
संवरण-छिपाना
संवेदन-अनुभूति
संस्पर्श-अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श
संहर्त्ता-संहार करनेवाला
सङ्गति-मेल
सञ्चित-जमा किया हुआ
सदातन-विष्णु
सद्विवेकी-सद् विवेकवाला
समत्वभाव-समताका भाव
सन्निविष्ट-उत्तम रूपसे एकाग्र
समाहर-समुच्चय, समूह
समाहित-संयमित, व्यवस्थित
सम्बन्धविशिष्ट-सम्बन्धवाला
सम्मत-सहमत, एक मत
समन्वित-संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध
सम्यक्-भलीभाँति, अच्छी तरह
सर्वतन्त्र-समस्त सिद्धान्त
सर्वतोभावेन-सम्पूर्ण रूपसे
सर्वभूतात्मा-सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा
सर्वभुक्-सब कुछ खा जानेवाला
सर्वात्मकत्व-सर्वात्मकता
सहस्र-हजार
साम-सामवेद
सामर्थ्यविशिष्ट-सामर्थ्यवान्
साम्यलक्षण-समानताका लक्षण
सारगर्भित-तत्त्वपूर्ण
| 305

[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ
एक ही लोकमें वास करना
साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर,
हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय,
वचन और मन)
सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला
सुदुराचारी—अति दुराचारी
सुधा—अमृत
सुरस—रसयुक्त
सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह
सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट
सौम्य—सुन्दर, कोमल
स्खलित—गिरा हुआ
स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता
स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता
स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना
स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा
स्फुरण—व्यक्त होना
स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी
स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी
स्थायित्व—स्थिरता
स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी
स्वच्छन्द—स्वतन्त्र
स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित
स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न
स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण
ह
हत—मरा हुआ
हतभागा—भाग्यहीन
हन्त—मारना
हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा
हेयता—तुच्छता
हृदगत—हृदय-सम्बन्धी
306 ।

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ-
ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
मध्यलीला [प्रथम भाग (अध्याय 1-14)]
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर-
ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित
अमृतप्रवाह-भाष्य,
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ-
श्रीब्रह्ममाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक-
ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित
श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला
अनुभाष्य
एवं
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी कृत
‘अमृतानुकणा’, विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद
अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित ‘अमृतानुकणिका’
भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन
श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके-
आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा
अनुवादित और सम्पादित
प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य,
अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका सहित प्रकाशित
प्रथम संस्करण - श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजकी
7वीं विरह तिथि, 12 दिसम्बर, 2017
1000 प्रतियाँ
卐 卐 卐 卐 卐
ग्रन्थ प्राप्ति स्थान
★ श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ B-3, म्यूजिकल फाँउन्टेन पार्कके निकट,
जनकपुरी, नई दिल्ली
✆ 9810192540, 8285211049
★ श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.)
✆ 0565-2502334
★ श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.)
✆ 9456828001
★ श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.)
✆ 0565-2815668
★ श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.)
✆ 9153125442
★ श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 162, सैक्टर-16A, फरीदाबाद (हरियाणा)
✆ 9911283869
★ जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा)
✆ 9776238328
★ श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ D-5, सैक्टर-55, नोएडा, (उ.प्र.)
✆ 9910400878
★ खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.)
✆ 0565-2443101

विषय-सूची
उद्धृत ग्रन्थ । i-iii
अध्याय विवरण । iv-vi
अध्याय 1 | मध्यलीला-सूत्रवर्णन । 3-48
अध्याय 2 | अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन । 51-79
अध्याय 3 | संन्यास ग्रहण करनेके बाद श्रीअद्वैत-गृहमें भोजन-विलास-वर्णन । 81-110
अध्याय 4 | श्रीमाधवेन्द्रपुरी-चरितामृतास्वादन । 113-139
अध्याय 5 | साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णन । 141-159
अध्याय 6 | सार्वभौम-उद्धार । 161-209
अध्याय 7 | दक्षिणयात्रामें 'वासुदेव-उद्धार' । 211-230
अध्याय 8 | रामानन्दराय-सङ्गोत्सव । 233-337
अध्याय 9 | दक्षिणदेश-तीर्थ-भ्रमण । 339-402
अध्याय 10 | वैष्णवमिलन । 405-431
अध्याय 11 | 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णन । 433-463

अध्याय 12 गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन । । । । । । । 465-494
अध्याय 13 रथके आगे नृत्य । । । । । । । । 497-527
अध्याय 14 ‘हेरा-पञ्चमी’-यात्रा-दर्शन । । । । । । 529-562
श्लोक सूची । । । । । । । । । । 563-566
पद्य सूची । । । । । । । । । । । 567-582
शब्दकोश । । । । । । । । । । 583-590
साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची
अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला
उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद
छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद
नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता
बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला
मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु
भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण
श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः — हरिभक्तिविलास

निवेदन
हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी महाराजजीकी अपार कृपासे गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं
सहित हिन्दी भाषामें श्रीचैतन्यचरितामृतकी दो भागोंमें आदिला प्रकाशित करनेके पश्चात्
अब 'मध्यलीला प्रथम भाग' का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ है। यह कार्य उनकी आज्ञा
एवं उनके द्वारा प्रदत्त शक्तिसे ही सम्पादित हुआ है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने
श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा,
अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने
अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। "मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता", श्रील
कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें
समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा
सरल होनेपर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन
गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके
प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये
बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है।
उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर
प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस
महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि
श्रीचैतन्यचरितामृतका 'मध्यलीला प्रथम भाग' भी अब प्रकाशित हो गया है और
श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए
परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं।
इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता
उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी
पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे।
प्रकाशन मण्डली
इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP)

प्रकाशन-मण्डली
अनुवाद और विन्यास (Translation & Layout) :-
श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास
शोधकार्य (Research) :-
श्रीमती जानकी दासी / श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास
टङ्कण (Typing) :-
श्रीमती ऐश्वर्य दासी / श्रीमती प्रज्ञा दासी
संस्कृत-हिन्दी अनुवाद :-
श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०)
प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) :-
श्रीमती कुन्दलता दासी
मुखपृष्ठ चित्र :-
श्रीमान् अनुज
रेखा चित्र :-
श्रीमान् गुलशन / श्रीमान् राधेश्याम
प्रकाशक :-
श्रीपाद रामचन्द्र दास
इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स