श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 831, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसङ्कीर्त्तन-सुन्दर ]
स
सङ्कीर्त्तन करि' वैसे श्रमयुक्त 17/79
सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे 17/221
संक्षेपे करिये किछु से 10/123
संक्षेपे कहिये, कहा ना 13/53
संक्षेपे कहिल जन्मलीला 14/4
संक्षेपे कहिल महाप्रभुर 10/163
संक्षेपे कहिलाङ एइ 11/60
संक्षेपे कहिलुँ अति, —ना 17/329
संक्षेपे लिखिये सम्यक् 13/51
सङ्गे चलि' आइसे काजी 17/224
सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर 17/273
संन्यास करह तुमि' 15/18
संन्यास करिया तीर्थ करिवारे 15/12
संन्यास करिया यबे प्रभु 17/55
संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत 17/265
संन्यासी-बुद्धये मोरे 8/11
“संसार-सुख तोमार हउक 17/63
स-कलङ्क चन्द्रे आर 13/91
सकल पण्डित जिनि' करे 17/6
सकल भरिया आछे प्रेम 10/161
सकल शाखार सेइ स्कन्ध 9/12
सख्य, दास्य, —दुइ भाव 17/299
सगणे सचेले गया कैल 17/74
सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वेर' 17/320
सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ 17/327
सप्त मिश्र ताँर पुत्र—सप्त 13/57
सत्यराज आदि—ताँर 10/48
स्थावर-जङ्गम हैल 13/97
सदा नाम लइबे, यथा 17/30
सदाशिव-पण्डित याँर 10/34
सन्ध्याकाले कर सबे नगर 17/133
सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल 17/134
सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' 17/120
“सब देश भ्रष्ट कैल एकला 17/255
सबाके खाओयाल आगे 17/84
सबार अध्यक्ष-प्रभुर मर्म 10/124
सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय 13/5
सबार सम्मान-कर्त्ता, करेन 8/56
सबारे कहे श्रीवास हासिया 17/41
सबारे निषेधिल, —“इहार 17/73
सबेइ चैतन्यभृत्य, —चैतन्य 10/81
'सबे घरे याह, आमि 17/214
सबे मिलि' नृत्य करे 17/119
सबे मेलि' करे तबे 17/254
समग्र बलिते नारे 'सहस्र 10/163
समस्त भक्तरे दिल इष्ट 17/70
समासे गौण हैल, शब्दार्थ 16/59
सरस्वती याहा बलाय, सेइ 16/94
सरस्वती रात्रे ताँरे उपदेश 16/106
सर्व अङ्ग-सुनिर्माण 13/116
सर्वज्ञ कहे, —“आमि ताहा 17/112
सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार 17/259
सर्व त्यजि' कैल प्रभुर 10/91
सर्वत्र करेन कृष्णनामेर अ28
सर्वत्र लओयाइल प्रभु 13/27
सर्वप्राणीर उपकार हय 9/45
सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य 12/57
सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर 11/41
सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर 17/212
सर्वलोके करिबे एइ धारण 14/19
सर्वलोके मत्त कैला आपन 9/52
सर्व वैष्णवगण हरिध्वनि 8/76
सर्वशाखागणेर यैछे फल 17/323
सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र 11/56
सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर 13/65
सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय 16/6
सर्वस्व दण्डिया तार जाति 17/128
सर्वाङ्ग बेडिल कीटे, काटे 17/46
सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे 17/45
सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे 16/110
सर्वोत्तम हइलेओ तारे 8/12
सवंशे करेन याँरा चैतन्येर 10/11
सवंशे तोमारे आर यवन 17/185
सहजे यवन-शास्त्रे अदृढ़ 17/171
सहस्र दण्डवत् करे, लय 10/99
सहस्र-मुखे याँर गुण 10/41
सहस्र-वदने सेवा ना 8/53
सहस्र-वदने तँहो 13/45
'सहस्र वदने' यार दिते 10/162
सहस्र सेवक सेवा करे 8/53
'साक्षात्', 'आवेश' आर 10/56
साक्षात् ईश्वर करि' प्रभुरे 16/106
साक्षात् ईश्वर तँहो, —नाहिक 16/13
'साक्षाते' सकल भक्ते देखे 10/57
साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय 16/11
सात सात पुत्र हबे—चिरायु 14/55
सार्द्ध सप्त प्रहर करे 10/102
सालङ्कार हैले अर्थ करे 16/86
सावित्री, गौरी, सरस्वती 13/105
साहजिक प्रीति दुँहार 14/64
सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट 10/149
सिंह-राशि, सिंह-लग्न 13/90
सिन्दूर, हरिद्रा, तैल 13/110
सुखी हइया लोक मोर 9/40
सुन्दर शरीर यैछे भूषणे 16/70
सुन्दरानन्द—नित्यानन्देर शाखा 11/23
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