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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें निमग्न रहता था और वे निरन्तर श्रीकृष्णके साथ बाल्यलीला करते थे॥३८-३९॥

अनुभाष्य—'सदाशिव कविराज और नागर पुरुषोत्तम'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
"सदाशिव कविराज महाभाग्यवान्।
यॉर पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास नाम॥741॥
बाह्य नाहि पुरुषोत्तम दासेर शरीरे।
नित्यानन्दचन्द्र यॉर हृदये विहरे॥742॥"

"महाभाग्यवान् सदाशिव कविराजके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास थे। श्रीपुरुषोत्तम दासको अपने बाह्य शरीरका ज्ञान नहीं रहता था, क्योंकि उनके हृदयमें सदा श्रीनित्यानन्द प्रभु विहार करते थे।” गौरगणोद्देशदीपिका 156 श्लोकमें—
"पुरा चन्द्रावली यासीद्व्रजे कृष्णप्रिया परा।
अधुना गौड़देशे सा कविराजः सदाशिवः॥156॥"

"ब्रजमें जो पहले श्रीकृष्णकी परमप्रिया चन्द्रावली थीं, वे अब गौड़देशमें सदाशिव कविराज हैं।” गौरगणोद्देशदीपिका 131 श्लोकमें—
"सदाशिवसुतो नाम्ना नागरः पुरुषोत्तमः।
वैद्यवंशोद्भवो नाम्ना दामा योबल्लवो ब्रजे॥131॥"

"ब्रजमें 'दाम' नामक गोप सखा अब वैद्यवंशमें उत्पन्न सदाशिवके पुत्र नागर-पुरुषोत्तम हैं।”

सदाशिव कविराजके पिता कंसारि सेन श्रीकृष्णलीलामें ब्रजकी 'रत्नावली' सखी हैं। कोई-कोई कहते हैं कि कंसारि सेनका निवास गुप्तिपाड़ामें हैं, परन्तु अब इसका कोई चिह्न वहाँ नहीं दिखायी देता। जो भी हो, इन सबकी भाँति चार पुरुष-परम्परा (श्रीकंसारिसेन, उनके पुत्र श्रीसदाशिव कविराज, उनके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास और उनके पुत्र श्रीकानु ठाकुर) से सिद्ध गौरभक्त अन्यत्र विरले ही हैं।

श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरका श्रीपाट पहले चाकदह और सुखसागरमें था। पहले बेलेडाङ्गा गाँवके ध्वंस हो जानेसे श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके सभी श्रीविग्रह सुखसागरमें लाये गये। परन्तु बादमें सुखसागरके भी गङ्गाके गर्भमें समा जानेसे, उस स्थानपर श्रीजाह्नवा-माताकी जो गद्दी थी, उस गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके भी श्रीविग्रह साहेबडाङ्गा बेड़ीग्राममें आये। बेड़ीग्राम ध्वंस होनेपर जाह्नवा-माताके गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके श्रीविग्रह प्राय पचास वर्ष तक नदीया जिलाके अन्तर्गत चान्दुड़े-गाँवमें विराजमान थे। प्राचीन सुखसागर नदीगर्भमें समा जानेके कारण नवीन सुखसागर इस चांदुड़े-गाँवसे 3-4 मीलकी दूरीपर कालीगञ्जके दक्षिणमें अवस्थित है।

श्रीनित्यानन्द प्रभुके दामाद (श्रीमती गङ्गादेवीके पतिदेव) जिराट्-निवासी श्रीमाधवाचार्य (माधव चट्टोपाध्याय) किसी-किसीके मतानुसार श्रीनित्यानन्द प्रभुके और किसी-किसीके मतानुसार श्रीजाह्नवादेवीके तथा किसी-किसीके मतानुसार इन श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके शिष्य थे। 'वैष्णव-वन्दना' के लेखक श्रीदेवकीनन्दन दास इन्हींके ही शिष्य थे, इस बातका वैष्णव वन्दनामें स्पष्ट उल्लेख है।

वर्तमान मन्दिर मिट्टीकी दीवारोंपर फूसकी छतसे बना घर है। मन्दिरगृहमें श्रीजगन्नाथ, श्रीबलराम, सुभद्रा, निताइ-गौर-दो-दो विग्रह, गोपीनाथ, जाह्नवा-माता, बालगोपाल, राधागोविन्द-पाँचयुगल; रेवती और श्रीबलराम, एवं शालग्राम विराजित हैं। किसी-किसीका ऐसा कहना है कि इनमेंसे कुछ श्रीमूर्तियाँ पुरुषोत्तम ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित हैं एवं शेष श्रीमूर्तियाँ जाह्नवा-देवीकी गद्दीकी हैं। यह श्रीपाट 'वसु-जाह्नवाका श्रीपाट' के नामसे भी विख्यात है। निम्नलिखित सेवायेत महान्तगणोंके नाम चादुंड़े-श्रीपाटमें मिलते है,—(1) गोपालदास महान्त, (2) रामकृष्ण, (3) बिहारीदास, (4) रामदास, (5) गोपालदास और (6) सीतानाथ दास॥38-39॥

(25) कानु ठाकुर :-
तॉर पुत्र-महाशय श्रीकानु ठाकुर।
यॉर देहे रहे कृष्ण-प्रेमामृतपूर॥40॥

अनुवाद—श्रीपुरुषोत्तमदासके पुत्र श्रीकानु ठाकुर हैं,

ग्यारहवाँ अध्याय | 113

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जिनके देहमें श्रीकृष्णप्रेमका अमृत सदा परिपूर्ण रहता
है॥ 40 ॥
अनुभाष्य - 'कानु ठाकुर' - कोई-कोई इन्हें
द्वादशगोपालोंमें अन्यतम कहते हैं। इनका निवास
बोधखाना है।
ठाकुर कानाइके पूर्वजोंमें चतुर्थ पुरुष (चार पीढ़ी
पूर्व-पितामहके पितामह) श्रीकंसारि सेनका नाम 'सम्बरारि'
है। देवकीनन्दनने वैष्णव-वन्दनामें ठाकुर कानाइके
पूर्वज चार पुरुषोंका नाम उल्लेख किया है,-
“श्रीकंसारि सेन वन्दों सेन श्रीवल्लभ।
सदाशिव कविराज वन्दों एक मने।
निरन्तर प्रेमोन्माद, बाह्य नाहि जाने।
इष्टदेव वन्दों श्रीपुरुषोत्तम नाम।
के कहिते पारे ताँर गुण अनुपाम॥”
“सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम ठाकुर हैं और पुरुषोत्तम
ठाकुरके पुत्र ही कानुठाकुर हैं। कानुठाकुरके वंशज
पुरुषोत्तम ठाकुरको 'नागर पुरुषोत्तम' से पृथक् मानते
हैं। उनका कहना है कि 'दास पुरुषोत्तम' के रूपमें
जिनका नाम गौरगणोद्देशमें उल्लिखित है, एवं ब्रजलीलामें
जो स्तोक-कृष्ण हैं, वही कानु ठाकुरके पिता हैं, परन्तु
गौरगणोद्देशमें वैद्यवंशमें आविर्भूत सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम
ही 'नागर पुरुषोत्तम' के रूपमें उल्लिखित हैं। वे 'नागर
पुरुषोत्तम' ब्रजलीलामें 'दाम' नामक सखा हैं। कानुठाकुरके
वंशजोंमें एक किंवदन्ती प्रचलित है कि पुरुषोत्तम
ठाकुर गङ्गाके पूर्वीतटपर 'सुखसागर' नामक गाँवमें रहते
थे। पुरुषोत्तमकी पत्नीका नाम 'जाह्नवा' था। ठाकुर
कानाइके जन्मके बाद ही जाह्नवा अप्रकट हो गयीं।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने जब पुरुषोत्तम ठाकुरकी धर्मपत्नीके
वियोगकी बात सुनी, तब वे उनके घर आये और
बारह दिनके शिशु (कानु ठाकुर) को अपने भवन
खड़दह ले गये।
कानुठाकुरके वंशजोंके मतानुसार 1457 शकाब्दमें
(बङ्गाब्द 942 वर्ष) आषाढ़-मासकी शुक्ला-द्वितीय
बृहस्पतिवारको रथयात्राके दिन कानाइ ठाकुर आविर्भूत
हुये थे। बचपनसे ही ठाकुरमें कृष्णभक्ति-परायणताको
देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका नाम 'शिशुकृष्णदास'
रखा था।
शिशुकृष्णदास जब पाँच वर्षके थे, तब ईश्वरी
जाह्नवा-माताके साथ श्रीवृन्दावन-धाम गये थे। श्रीजीव
गोस्वामी आदि प्रमुख व्रजवासियोंने शिशुकृष्णदासके
भावादिको देखकर उन्हें 'ठाकुर कानाइ' नाम प्रदान
किया। जनश्रुति है कि ठाकुर कानाइ जब वृन्दावनमें
कीर्त्तनके आनन्दमें विह्वल होकर नृत्य कर रहे थे, तब
उनके दक्षिण पैरका एक नूपुर अन्तर्हित हो गया, तब
ठाकुर कानाइने कहा कि 'जिस स्थानपर यह नूपुर गिरा
है, मैं उसी स्थानपर निवास करूँगा।' सुननेमें आता है
कि यशोहर जिलाके 'बोधखाना' नामक गाँवमें यह नूपुर
गिरा था, तबसे ठाकुर कानाइ 'बोधखाना' में आकर
रहने लगे।
इनकी वंश-परम्परामें एक और जनश्रुति प्रचलित
है कि श्रीमन्महाप्रभुके आविर्भावके कुछ सौ वर्ष पूर्वसे
सदाशिवके किसी पूर्वजके द्वारा प्रतिष्ठित 'प्राणवल्लभ'
विग्रहकी सेवा चली आ रही थी। ये 'प्राणवल्लभ' अभी
भी बोधखानामें सेवित हो रहे हैं।
'साम्प्रदायिक दङ्गों' के समय ठाकुर कानाइके
ज्येष्ठ पुत्रकी सन्तानोंको छोड़कर वंशीवदन आदि
अन्यान्य पुत्र बोधखाना छोड़कर भाग गये एवं नदीया
जिलाके अन्तर्गत 'भाजनघाट' नामक गाँवमें जाकर रहने
लगे। ठाकुर कानाइके छोटे पुत्रोंमेंसे 'हरिकृष्ण गोस्वामी'
'साम्प्रदायिक दङ्गों' के मिट जानेके पश्चात् बोधखानामें
आये। इन्होंने 'प्राणवल्लभ' नामसे और एक नये
विग्रहकी प्रतिष्ठा की। अभी भी बोधखाना गाँवमें ठाकुर
कानाइके ज्येष्ठ पुत्रोंके वंशजोंके द्वारा प्राचीन 'श्रीप्राणवल्लभ'
की और कनिष्ठ पुत्रके वंशजोंके द्वारा नये प्रतिष्ठित
'प्राणवल्लभ' की सेवा हो रही है। भाजनघाटमें
'श्रीराधावल्लभ' विग्रह सेवित हो रहे हैं। प्रेमविलास-ग्रन्थमें
लिखा है कि कानु ठाकुर खेतरिके उत्सवके समय
श्रीजाह्नवा-देवी और श्रीवीरभद्रप्रभुके साथ वहाँ उपस्थित
थे।
114 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/40-41 ]
पुरुषोत्तम ठाकुर और कानु ठाकुरके अनेक
ब्राह्मण शिष्य थे। पुरुषोत्तम ठाकुरके ब्राह्मण शिष्योंमेंसे
प्रधान चारके नाम इस प्रकारसे वर्णित हैं—
“तस्य प्रियतमाः शिष्याश्चत्वारो ब्राह्मणोत्तमाः।
श्रीमुखो माधवाचार्यो यादवाचार्यो-पण्डित॥
देवकीनन्दन-दासः प्रख्यातो गौड़मण्डले।
येनैव रचिता पुस्ती श्रीमद्वैष्णव-वन्दना॥”
“श्रीमुख, श्रीमाधवाचार्य, श्रीयादवाचार्य और
श्रीदेवकीनन्दन दास उनके प्रिय चार उत्तम ब्राह्मण शिष्य
थे। गौड़मण्डलमें विख्यात श्रीदेवकीनन्दन दासने
श्रीमद्वैष्णव-वन्दना ग्रन्थकी रचना की थी।”
ये माधवाचार्य श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कन्या गङ्गादेवीके
पति हैं। सुखसागर गाँव ध्वंस हो जानेके पश्चात्
पुरुषोत्तमके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीविग्रह चादुड़ियाँमें लाये
गये। आजकल जिराट्के गङ्गा-वंशजोंकी देखरेखमें उनके
अन्यान्य विग्रहके साथ सेवित हो रहे हैं। पुरुषोत्तम
ठाकुरका श्रीपाट ‘वसु-जाह्नवाका’ श्रीपाट नामसे भी
कहा जाता है।
कानु ठाकुरके शिष्योंने मेदिनीपुर-जिलाके शिलावती
नदीके पास गड़वेता नामक गाँवमें वास किया। सामवेदीय
कौथुमी-शाखाके राढ़ीश्रेणीय “श्रीराम’ नामक एक ब्राह्मण
कानाइ ठाकुरके प्रसिद्ध शिष्य थे॥40॥
(26) उद्धारण ठाकुर (गोपाल-11) :—
महाभागवत-श्रेष्ठ दत्त उद्धारण।
सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर चरण॥41॥
अनुवाद—उद्धारण दत्त श्रेष्ठ महाभागवत थे। वे
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी सभी प्रकारसे सेवा करते
थे॥41॥
अनुभाष्य—‘उद्धारणदत्त’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 129वाँ
श्लोक)—
“सुबाहुर्यो ब्रजे गोपो दत्त उद्धारणाख्यकः॥129(क)॥”
“ब्रजके ‘सुबाहु’ नामक गोप अब उद्धारण दत्त
कहलाते हैं।” इनका निवास स्थान हुगली जिलाके
अन्तर्गत सप्तग्राममें हैं। पहले ‘सप्तग्राम’ कहनेसे
वासुदेवपुर, बाँशवेड़िया, कृष्णपुर, नित्यानन्दपुर, शिवपुर,
शङ्खनगर और सप्तग्रामको समझा जाता था। चैःभाः
अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“उद्धारण दत्त महावैष्णव उदार।
नित्यानन्द-सेवााय याँहार अधिकार॥743॥”
“उद्धारण दत्त महावैष्णव और परम उदार थे।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सेवामें उनका अधिकार था।”
चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“कतदिन थाकि’ नित्यानन्द खड़दहे।
सप्तग्राम आइलेन सर्वगण सहे॥443॥
उद्धारण दत्त भाग्यवन्तरे मन्दिरे।
रहिलेन प्रभुवर त्रिवेणीर तीरे॥449॥
कायमनोवाक्ये नित्यानन्देर चरण।
भजिलेन अकैतवे दत्त उद्धारण॥450॥
यतेक वणिककुल उद्धारण हैते।
पवित्र हइल, द्विधा नाहिक इहाते॥453॥”
“खड़दहमें कुछ दिन रहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सभी
परिकरोंके साथ सप्तग्राममें पधारे। त्रिवेणीके तटपर
स्थित सप्तग्राममें उद्धारण दत्तके घरमें प्रभु ठहरे।
उद्धारण दत्तने निष्कपट भावसे काय-मन-वाक्यके द्वारा
श्रीनित्यानन्दके चरणोंकी सेवा की। वहाँ जितने भी
वणिक कुल थे, सभी उद्धारण दत्तके कारण पवित्र हो
गये, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।” उद्धारण दत्त
शौक्रसुवर्णवणिक (सोनेके व्यापारी) कुलमें आविर्भूत
हुये थे।
सप्तग्राममें श्रीउद्धारण ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित और
उनके हाथोंसे सेवित महाप्रभुकी षड्भुज मूर्ति है। उनके
दायीं ओर श्रीनित्यानन्द प्रभु और बायीं ओर श्रीगदाधर
विराजमान हैं। श्रीराधागोविन्द मूर्ति, श्रीशालग्राम और
सिंहासन-बेदीके नीचे श्रीउद्धारण ठाकुर महाशयका
चित्रपट अर्चित होता है। वर्तमान श्रीमन्दिरके सामने
एक बड़ा नाट्य-मन्दिर है। नाट्य-मन्दिरके प्रत्येक
ग्यारहवाँ अध्याय | 115

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स्तम्भपर स्मृतिरक्षक पत्थरके पटलोंपर मन्दिरके निर्माता
और श्रीपाटके संस्कार करवानेवालोंके नाम खुदे हुए
हैं। नाट्यमन्दिरके सामने ही एक सुशीतल छायापूर्ण
माधवी-मण्डप है। माधवी-मण्डपके दोनों ओर दो
स्तम्भ हैं, एकमें उद्धारण ठाकुर महाशयका चित्रपट
और दूसरेमें पत्थरके पटलपर चतुर्युगके चार
तारक-ब्रह्मनाम खुदे हुए हैं।
1283 (बङ्गाब्द) वर्षमें निताइदास बाबाजी नामक
एक भिक्षुने श्रीपाटके लिये बारह बीघा भूमि संग्रह की
थी। तत्पश्चात् किसी-किसीकी विशेष चेष्टासे श्रीपाटकी
सेवा कुछ दिनोंतक चलनेपर भी धीरे-धीरे सेवामें कमी
होती गयी। तदुपरान्त 1306 (बङ्गाब्द) वर्षमें हुगलीके
भूतपूर्व सब-जज बलराम मल्लिक और कोलकाता-निवासी
अनेक धनी सुवर्ण-व्यापारियोंकी एकजुट चेष्टासे पुनः
श्रीपाटकी सेवामें कुछ परिपाटी दिखाई देने लगी।
1875 ईसवीके लगभग पहले एक टूटी-फूटी
कुटियामें हुगली-वालि-निवासी परलोकगत जगमोहन
दत्तके द्वारा प्रतिष्ठित श्रील उद्धारण ठाकुरकी एक
दारुमयी (लकड़ीकी) श्रीमूर्त्ति विराजित थी। वह श्रीमूर्त्ति
अब सप्तग्राम-श्रीपाटमें नहीं है। उनका चित्रपट ही अब
पूजित हो रहा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व अनुसन्धानसे
सुना गया था कि उद्धारण ठाकुरकी वह श्रीमूर्त्ति तब
हुगली-वालि-निवासी श्रीमदन दत्त महोदयके घरमें और
ठाकुरके द्वारा सेवित श्रीशालग्राम उसी गाँवमें श्रीनाथ
दत्तके घरमें विराजमान थे।
ठाकुर उद्धारण काटोयासे डेढ़ मील उत्तरी दिशाकी
ओर 'नैहाटी'-गाँवमें राजाके दीवान थे। दाँइहाट स्टेशनके
निकट अभी भी राजवंशके लोगोंके महलोंके भग्नावशेष
दिखायी देते हैं। ठाकुर राजकार्यके उपलक्ष्यमें जिस
स्थानपर वास करते थे, उस स्थानका नाम 'उद्धारण-पुर'
है। कहा जाता है कि ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित यहाँके
श्रीनिताइगौर-विग्रह वनओयारीबादकी राजधानीसे लाये
गये थे। इस स्थानपर स्थित मन्दिरके पश्चिम ओर
(और किसी-किसीके मतानुसार, वृन्दावनमें) ठाकुरकी
समाधि वर्तमान है। किसीके मतानुसार, ठाकुरके पिताका
नाम श्रीकर, माताका नाम भद्रावती और पुत्रका नाम
श्रीनिवास है॥41॥
(27) वैष्णवानन्द आचार्य :-
आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति-अधिकारी।
पूर्वे नाम छिल याँर 'रघुनाथ पुरी' ॥ 42 ॥
अनुवाद-आचार्य वैष्णवानन्द परम भक्त थे और
उनका पहले नाम रघुनाथपुरी था॥42॥
अनुभाष्य-'वैष्णवानन्द आचार्य'-चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय-
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार।
पूर्वे 'रघुनाथपुरी'-नाम ख्याति याँर ॥ 746 ॥ ”
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार थे। पहले ये
रघुनाथपुरीके नामसे विख्यात थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
96-97वाँ श्लोक)-
“वृन्दावने याः प्रागासन्नणिमाद्याष्टसिद्धयः।
ता एवाष्टौ भक्तरूपा भूता गौड़े च ते यथा॥96॥
अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः।
कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ।
पुर्युपाधिक्रमाज्ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः॥97॥”
“पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि
अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें
जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस
प्रकार हैं, यथा-अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ,
कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों 'पुरी'
उपाधिसे युक्त थे॥”42॥
(28) विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास-तीन भाई :-
विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास,-तिन भाइ।
पूर्वे याँर घरे छिला ठाकुर निताइ ॥ 43 ॥
अनुवाद-विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास-ये तीन
भाई थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आनेपर पहले इनके
घरमें आकर रहे थे॥43॥

116 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/43-46 ]
अनुभाष्य—'विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास'—ये
तीनों भाई नवद्वीपवासी भट्टाचार्य हैं। विष्णुदास और
गङ्गादास कुछ दिनोंके लिये नीलाचलमें महाप्रभुके पास
रहे थे (चैःचः आदिलीला, 10/151 संख्या)। नन्दनाचार्यके
घरमें महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य छिपे थे। श्रीनित्यानन्द
प्रभुने भी नवद्वीपमें आकर कुछ दिन इनके घरमें वास
किया था। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“चतुर्भुज पण्डित-नन्दन गङ्गादास।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर विलास॥ 745॥”
“चतुर्भुज पण्डितके पुत्र गङ्गादासके घर किसी एक
समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था॥”43॥
(29) परमानन्द उपाध्याय, (30) जीव पण्डित :-
नित्यानन्दभृत्य—परमानन्द उपाध्याय।
श्रीजीव पण्डित नित्यानन्द-गुण गाय॥ 44॥
अनुवाद—परमानन्द उपाध्याय श्रीनित्यानन्द प्रभुके
सेवक थे और श्रीजीव पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुका
गुणगान करते थे॥ 44॥
अनुभाष्य—'परमानन्द उपाध्याय'—चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय—
“परमानन्द उपाध्याय—वैष्णव एकान्त॥ 744॥”
“परमानन्द उपाध्याय ऐकान्तिक वैष्णव थे।”
'श्रीजीव पण्डित'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके पिता श्रीहाड़ाइ
ओझाके बाल्यकालके मित्र रत्नगर्भ आचार्यके मंझले
पुत्र हैं। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“महाभाग्यवन्त जीवपण्डित उदार।
याँर घरे नित्यानन्दचन्द्रेर विहार॥ 751॥”
“जीव पण्डित उदार और महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि
उनके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था।”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 169वाँ श्लोक)—
“इन्दिरा जीवपण्डितः॥ 169(ख)॥”
“श्रीजीव पण्डित व्रजकी इन्दिरा हैं॥”44॥
(31) परमानन्द गुप्त :-
परमानन्द गुप्त—कृष्णभक्त महामति।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर वसति॥ 45॥
अनुवाद—परमानन्द गुप्त बहुत बुद्धिमान और श्रीकृष्ण
भक्त थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके घरमें भी रहे
थे॥ 45॥
अनुभाष्य—'परमानन्द गुप्त'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशय।
पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर आलय॥ 747॥”
“प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशयके घरमें श्रीनित्यानन्द
प्रभुका अवस्थान था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं
199वाँ श्लोक)—
“मालती चन्द्रलतिका 'मञ्जुमेधा' वराङ्गदा॥ 194(क)॥
'परमानन्दगुप्तो' यत्कृता कृष्णस्तवकवली॥ 199(ख)॥”
“व्रजकी मञ्जुमेधा वही परमानन्द गुप्त हैं, जिन्होंने
श्रीकृष्ण 'स्तवावली' की रचना की है॥”45॥
(32) नारायण, (33) कृष्णदास,
(34) मनोहर, (35) देवानन्द :-
नारायण, कृष्णदास, आर मनोहर।
देवानन्द—चारि भाइ निताइ-किङ्कर॥ 46॥
अनुवाद—नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द—ये
चारों भाई श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे॥ 46॥
अनुभाष्य—'नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द'—
चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय—
“कृष्णदास, देवानन्द—दुइ शुद्धमति॥ 749(क)॥
नित्यानन्दप्रिय 'मनोहर', नारायण'।
'कृष्णदास', 'देवानन्द'—एइ चारिजन॥ 752॥”
“कृष्णदास और देवानन्द, ये दोनों शुद्धमति थे।
मनोहर, नारायण, कृष्णदास और देवानन्द—ये चारों
श्रीनित्यानन्द प्रभुके अति प्रिय थे॥”46॥
ग्यारहवाँ अध्याय | 117

[ 11/47-51
(36) होड़ कृष्णदास :-
होड़ कृष्णदास-नित्यानन्दप्रभु-प्राण।
श्रीनित्यानन्द-पद बिना नाहि जाने आन॥ 47॥
अनुवाद—होड़ कृष्णदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्राण
थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंके अतिरिक्त कुछ नहीं
जानते थे॥ 47॥
अनुभाष्य—'होड़ कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“बड़गाछि-निवासी सुकृति कृष्णदास।
याँहार मन्दिरे नित्यानन्देर विलास॥ 748॥”
“बड़गाछिमें निवास करनेवाले कृष्णदास बड़े सुकृतिवान्
थे, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके घरमें विलास
किया था।” बड़गाछिके माहात्म्यके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय और (नवनी होड़) पयार संख्या 50
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 47॥
(37) नकड़ि, (38) मुकुन्द, (39) सूर्य,
(40) माधव, (41) श्रीधर (गोपाल-12),
(42) रामानन्द, (43) जगन्नाथ, (44) महीधर :-
नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर।
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर॥ 48॥
(45) श्रीमन्त, (46) गोकुलदास, (47) हरिहरानन्द,
(48) शिवाइ, (49) नन्दाइ, (50) परमानन्द :-
श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द।
शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द॥ 49॥
(51) वसन्त, (52) नवनी, (53) गोपाल, (54) सनातन,
(55) विष्णाइ, (56) कृष्णानन्द, (57) सुलोचन :-
वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन।
विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द, सुलोचन॥ 50॥
अनुवाद—नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर,
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर, श्रीमन्त, गोकुलदास,
हरिहरानन्द, शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द, वसन्त,
नवनी होड़, गोपाल, सनातन, विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द
और सुलोचन—ये सभी श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास
थे॥ 48-50॥
अनुभाष्य—'नवनी होड़'—बड़गाछि-निवासी हरि होड़के
पुत्र राजा कृष्णदास होड़ थे। बड़गाछि (बहिरगाछि) के
निकट शालिग्राममें राजा कृष्णदासके प्रयाससे श्रीनित्यानन्द
प्रभुका विवाह हुआ (भक्तिरत्नाकर 12 तरङ्ग)। नवनी
होड़ राजा कृष्णदासके पुत्र थे। इनकी वंशावली अब
'रुकुणपुर' में है। रुकुणपुर बहिरगाछिसे कुछ दूरीपर है।
ये सब जन्मसे शौक्रदक्षिण राढ़ीय कायस्थ थे, परन्तु
उनमें ब्राह्मण-संस्कार होनेके कारण सभी वर्णोंको दीक्षा
प्रदान करते थे। पहले बड़गाछिमें गङ्गा प्रवाहित होती
थी, अब वह 'काल्शिकी नहर' नामसे प्रसिद्ध है।
'कृष्णानन्द'—35 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48-50॥
(58) कंसारि, (59) रामसेन, (60) रामचन्द्र,
(61) गोविन्द, (62) श्रीरङ्ग, (63) मुकुन्द :-
कंसारि सेन, रामसेन, रामचन्द्र कविराज।
गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द, तिन कविराज॥ 51॥
अनुवाद—कंसारि सेन, रामसेन और रामचन्द्र
कविराज श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे। तीन
कविराज—गोविन्द, श्रीरङ्ग और मुकुन्द भी श्रीनित्यानन्द
प्रभुके किङ्कर थे॥ 51॥
अनुभाष्य—'कंसारि सेन'—गौरगणोद्देशदीपिका 194 और
200 श्लोक—
'रत्नावली' च कमला गुणचूडा सुकेशिनी॥ 194(ख)॥
'कंसारिसेनः' सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः॥ 200(ख)॥
“ये व्रजकी 'रत्नावली' हैं।”
'सदाशिव कविराज'— (चैः चः आदिलीला, 11/38)
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है।
'रामचन्द्र कविराज'—खण्डवासी चिरञ्जीव और
सुनन्दाके पुत्र एवं श्रीनिवासाचार्यके शिष्य तथा ठाकुर
नरोत्तमके प्रियबन्धु हैं। नरोत्तम ठाकुरने प्रत्येक जन्ममें
इनके सङ्गकी प्रार्थना की है। गोविन्द कविराज इनके
छोटे भाई हैं। इनकी कृष्णभक्तिको देखकर श्रीजीवगोस्वामी
प्रभुने वृन्दावनमें इन्हें 'कविराज' नाम प्रदान किया था।
ये जन्मसे ही संसारसे विरक्त थे। ये श्रीनरोत्तम ठाकुर
118 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/51–56 ]
और श्रीनिवासाचार्य प्रभुके प्रचार और भजनके प्रधान
एवं प्रियतम सङ्गी थे। इन्होंने पहले श्रीखण्डमें और
बादमें भागीरथीके तटपर ‘कुमारनगर’ में आकर वास
किया (भक्तिरत्नाकर द्रष्टव्य है)।
‘गोविन्द कविराज’—खण्डवासी चिरञ्जीवके कनिष्ठ
पुत्र एवं रामचन्द्र कविराजके भाई है। ये पहले शाक्त
थे और बादमें श्रीनिवासाचार्य प्रभुके दीक्षित शिष्य हुए।
इन्होंने पहले श्रीखण्ड में, बादमें कुमारनगर में, तत्पश्चात्
पद्मानदीके दक्षिण तटपर ‘तेलिया बुधरि’ गाँवमें आकर
वास किया। इनकी काव्य-प्रतिभाको देखकर श्रीजीव
गोस्वामी प्रभुने इन्हें भी ‘कविराज’ नाम प्रदान किया
था। ये ‘सङ्गीत-माधव’ नाटक और ‘गीतामृत’ आदि
ग्रन्थोंके रचयिता हैं (भक्तिरत्नाकर नवम तरङ्ग द्रष्टव्य
है)॥51॥
(64) पीताम्बर, (65) माधवाचार्य, (66) दामोदर, (67)
शङ्कर, (68) मुकुन्द, (69) ज्ञानदास, (70) मनोहर :—
पीताम्बर, माधवाचार्य, दास दामोदर।
शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर ॥ 52 ॥
(71) गोपाल, (72) रामभद्र, (73) गौराङ्गदास,
(74) नृसिंह-चैतन्य, (75) मीनकेतन :—
नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास।
नृसिंहचैतन्य, मीनकेतन रामदास ॥ 53 ॥
अनुवाद—पीताम्बर, माधवाचार्य, दामोदरदास, शङ्कर,
मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर, नर्त्तक गोपाल, रामभद्र,
गौराङ्गदास, नृसिंह-चैतन्य और मीनकेतन रामदास, ये
भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्य दास थे॥52-53॥
अनुभाष्य—‘मीनकेतन रामदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
68वाँ श्लोक)—
“मीनकेतन-रामादिव्यूहः सङ्कर्षणोऽपरः॥68(ख)॥”
“मीनकेतन रामदास (श्रीकृष्णके) आदिव्यूह-श्रीबलदेवके
अन्य रूप सङ्कर्षण (अर्थात् श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अभिन्न
विग्रह) हैं॥”53॥
(76) श्रीठाकुर वृन्दावनदास :—
वृन्दावनदास—नारायणीर नन्दन।
‘चैतन्य-मङ्गल’ येंहो करिल रचन ॥ 54 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक अन्य प्रमुख
दास नारायणीदेवीके पुत्र श्रीवृन्दावनदास थे, जिन्होंने
चैतन्य-मङ्गलकी रचना की थी॥54॥
अनुभाष्य—‘वृन्दावनदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 109वाँ
श्लोक)—
“वेदव्यासो य एवासीद्वासो वृन्दावनोऽधुना।
सखा यः कुसुमापीडः कार्यतस्तं समाविशत्॥109॥”
“श्रीवेदव्यास ही अब श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं।
व्रजके कुसुमापीड नामक सखा भी कार्यवशतः इनमें
प्रविष्ट हुए हैं।” ये श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणीदेवीके
पुत्र और चैतन्यभागवतके लेखक हैं। भाष्यकार-कृत
चैतन्यभागवतकी भूमिकामें ‘ठाकुरकी जीवनी’ शीर्षक
प्रबन्ध द्रष्टव्य है॥54॥
इति अनुभाष्ये एकादश परिच्छेद।
ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
व्यासदेवके द्वारा श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णलीला और
श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीगौरलीलाका वर्णन :—
भागवते कृष्णलीला वर्णिला वेदव्यास।
चैतन्य-लीलाते व्यास—वृन्दावनदास ॥ 55 ॥
अनुवाद—जिस प्रकार वेदव्यासजीने भागवतमें
श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके व्यास वृन्दावनदास हैं॥55॥
वीरभद्रगोसाई-शाखा—सर्वश्रेष्ठ :—
सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र गोसाञि।
ताँर उपशाखा यत, तार अन्त नाइ ॥ 56 ॥
अनुवाद—वीरभद्र गोसाईं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सर्वश्रेष्ठ
शाखा हैं और उनकी अनन्त उपशाखाएँ हैं॥56॥
ग्यारहवाँ अध्याय | 119

[ 11/57-61
असंख्य श्रीनित्यानन्दगण :-
अनन्त नित्यानन्दगण—के करु गणन।
आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ कत जन॥ 57॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके असंख्य भक्त हैं, जिनकी गणना कौन कर सकता है? मैंने तो केवल स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे कुछ भक्तोंका यहाँ उल्लेख किया है॥ 57॥
इन सबके श्रीकृष्णप्रेमदानसे जगत्का उद्धार :-
एइ सर्वशाखा पूर्ण-पक्व प्रेमफले।
यारे देखे, तारे दिया भासाइल सकले॥ 58॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी परिकर पके हुए प्रेमफलसे पूर्ण थे। श्रीनित्यानन्दके भक्त जिसपर भी दृष्टिपात करते थे, उसे प्रेममें डुबो देते थे॥ 58॥
इन सबकी निरन्तर श्रीकृष्णप्रीति-चेष्टा :-
अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल।
प्रेम दिते, कृष्ण दिते सबे धरे महाबल॥ 59॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंमें प्रचुर प्रेम था और उसे वितरण करनेमें उन्हें कोई भी बाधा नहीं आती थी। उनमें इतना बल था कि वे किसीको भी श्रीकृष्णप्रेम और स्वयं श्रीकृष्णको भी प्रदान करनेमें सक्षम थे॥ 59॥
संक्षेपे कहिलाङ एइ नित्यानन्दगण।
याँहार अवधि ना पाय 'सहस्रवदन' ॥ 60॥
अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, अनन्त-शेष भी अपने हजारों मुखोंसे वर्णन करके भी जिनका अन्त नहीं पाते हैं॥ 60॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 61॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे नित्यानन्द-स्कन्ध-शाखावर्णनं नाम एकादश-परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 61॥
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीनित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाओंका वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

बारहवाँ अध्याय

चित्र 5

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:

बारहवाँ अध्याय
बारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें
श्रीअद्वैतप्रभुकी सभी शाखाओंका वर्णन करके उनमेंसे
श्रीअच्युतानन्दके मतानुयायी वैष्णवोंको 'सारग्राही' और
अन्य सभीको 'असार' कहकर निर्देश किया गया है।
अन्तमें श्रीगदाधर पण्डित-गोस्वामीकी शाखाका वर्णन
करके इस अध्यायको समाप्त किया है। इस अध्यायके
मध्यमें श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र गोपाल मिश्र और श्रीअद्वैताचार्यके
सेवक कमलाकान्त विश्वासके दो उपाख्यानोंका वर्णन
हुआ है। छोटी आयुमें श्रीगोपालका गुण्डिचा-मन्दिर
मार्जनके समय प्रेम-मूर्च्छाको प्राप्त होना और श्रीमन्महाप्रभुकी
कृपासे उनकी मूर्च्छा भङ्ग होनेका प्रसङ्ग वर्णित है।
आचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासने राजा प्रतापरुद्रसे
श्रीअद्वैतप्रभुके तीन सौ मुद्राओंके ऋणशोधनकी भिक्षाके
लिये पत्र लिखा और महाप्रभुको यह पता लगनेपर उस
पागल विश्वासको दण्ड प्रदान किया और श्रीअद्वैताचार्यके
अनुरोधपर उसका शोधन किया। (अमृतप्रवाह भाष्य)
सारग्राही और असारग्राही-भेदसे
दो प्रकारके श्रीअद्वैतदास :—
अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गांस्तान् सारासारभृतोऽखिलान्।
हित्वाऽसारान् सारभृतो नौमि चैतन्यजीवनान्॥१॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभुके अनुगतजन दो
प्रकारके हैं—'सारग्राही' और 'असारग्राही'। इन दोनोंमेंसे
असारवाहियोंका परित्यागकर समस्त सारग्राही चैतन्यदासोंको
मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥
अनुभाष्य—सारासारभृतः (सारः अद्वैतानुगो गौरहरिजनः,
असारः तदनुगाभिमानी गौरहरि-विमुखजनः, तौ विभ्रतीति तान्)
अखिलान् (सर्वान्) अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गान् (अद्वैतस्य अङ्घ्री एव
अब्जे तयोः भृङ्गान् भ्रमरान् अद्वैतसेवकान्) [मत्वा] असारवान्
(तदनुप्रयान् शुद्धभक्तिरहितान् मायावादिनः) हित्वा (त्यक्त्वा)
चैतन्यजीवनान् (चैतन्य एव जीवनं येषां तान् गौरप्राणान्)
सारभूतः (सारग्राहिणः भागवतान्) नौमि (नमस्करोमि)।
श्लोक भावानुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके दो प्रकारके
अनुगतजन हैं—श्रीअद्वैतानुग जो श्रीगौरहरिको समर्पित
हैं, वे सारग्राही हैं और जो अपनेमें केवल श्रीअद्वैतानुग
होनेका अभिमान करते हैं, परन्तु श्रीगौरहरिके विमुख
हैं, वे असारग्राही है। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके चरणकमलोंके
समस्त भ्रमरोंमेंसे असारग्राहियोंको छोड़कर शेष जिनका
जीवन ही चैतन्य महाप्रभु हैं, ऐसे गौरगतप्राण सारग्राही
भक्तोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥
जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥२॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो; धन्य
श्रीअद्वैत प्रभुकी जय हो॥२॥
गौरभक्त सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंकी वन्दना :—
श्रीचैतन्यामरतरौर्द्वितीयस्कन्धरूपिणः।
श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् गणान्नुमः॥३॥
अनुवाद—अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥३॥
अनुभाष्य—श्रीचैतन्यामरतरोः (गौरामरवृक्षस्य) द्वितीय
स्कन्धरूपिणः श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् (वृक्षशाखातुल्यान्) गणान्
(आश्रितजनान्) [वयं] नुमः (नमस्कुर्मः)।
श्लोक भावानुवाद—श्रीचैतन्य कल्पवृक्षके दूसरे
स्कन्धरूप श्रीमद्-अद्वैतचन्द्रकी शाखारूप उनके
आश्रितजनोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥३॥
वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध—आचार्य गोसाञि।
ताँर यत शाखा हइल, तार लेखा नाञि॥४॥

[ 12/4-17
श्रीगौर-कृपासे सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंका ही विस्तार :-
चैतन्य-मालीर कृपाजलेर सेचने।
सेइ जले पुष्ट स्कन्ध बाड़े दिने दिने॥5॥
सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल उपजिल।
सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् भरिल॥6॥
सेइ जले स्कन्धे करे शाखाते सञ्चार।
फले-फुले बाड़े,-शाखा हइल विस्तार॥7॥
धान्यराशि मापे यैछे पात्‌ना सहिते।
पश्चाते पात्‌ना उड़ाञा संस्कार करिते॥12॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥8-12॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पहले श्रीअद्वैतप्रभुके समस्त
अनुगतजन एकमत थे, बादमें कुछ लोग दैववशतः
पृथक् मतके हो गये। आचार्यके निजमतसे जो चले, वे
शुद्ध-वैष्णव हैं और जिन्होंने दैववशतः आचार्यके
बतलाये मतसे स्वतन्त्र किसी प्रकार अपने मतकी
कल्पना की, वे असार हैं। जिस प्रकार धानको छिलके
सहित ही तोला जाता है और साफ करते समय
छिलकेको उड़ाकर केवल सार चावलको ही ग्रहण
किया जाता है; उसी प्रकार असार व्यक्तियोंके नामोंसे
हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, तो भी सारग्राही वैष्णवोंसे
असारवाहियोंको पृथक् रखनेके अभिप्रायसे उनकी एक
साथ गणना की है।
चावलसे रहित असार धानको 'पात्‌ना' कहते
हैं॥8-12॥
अनुवाद-वृक्षके दूसरे स्कन्ध श्रीअद्वैताचार्य हैं।
उनकी जितनी शाखाएँ हुई हैं, उनकी कोई गणना नहीं
हो सकती। श्रीचैतन्य-महाप्रभु मालीके कृपारूपी जलके
सिञ्चनसे पुष्ट होकर यह स्कन्ध दिन-प्रतिदिन बढ़ता
गया। उस स्कन्धपर जितने प्रेमफल उत्पन्न हुए, सारा
जगत् उन श्रीकृष्णप्रेमरूपी फलोंसे परिपूर्ण हो गया।
स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) ने उस महाप्रभुके कृपारूपी
जलका अपनी शाखाओंमें सञ्चार किया, जिससे उनपर
फूल और फलोंके बढ़नेसे शाखाओंका बहुत विस्तार
हुआ॥4-7॥
(1) अच्युतानन्द-शाखा :-
अच्युतानन्द-बड़ शाखा, आचार्य-नन्दन।
आजन्म सेविला तें'हो चैतन्य-चरण॥13॥
अच्युतके गुणोंका वर्णन :-
“चैतन्य गोसाञिर गुरु-केशव भारती।”
एइ पितार वाक्य शुनि' दुःख पाइल अति॥14॥
“जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश।
तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश॥15॥
चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य-गोसाञि।
ताँर गुरु-अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ॥”16॥
पञ्चम वर्षे बालक कहे सिद्धान्तेर सार।
शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार॥17॥
श्रीअद्वैतदासोंके दो पृथक् मत :-
प्रथमे त' आचार्येर एकमत गण।
पाछे दुइमत हैल दैवेर कारण॥8॥
सारग्राहियोंकी श्रीअद्वैतके आनुगत्यमें गौरभक्ति,
असारगणोंके द्वारा स्वतन्त्रभावमें गौरविरोध :-
केह त' आचार्येर आज्ञाय, केह त' स्वतन्त्र।
स्वमत कल्पना करे दैव-परतन्त्र॥9॥
आचार्यका अनुगत्य ही सार, अन्यथा असार :-
आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार।
ताँर आज्ञा लङ्घि' चले, सेइ त' असार॥10॥
श्रीअद्वैत-दासाभिमानी अभक्तोंके
उल्लेखका कारण और दृष्टान्त :-
असारेर नामे इँहा नाहि प्रयोजन।
भेद जानिवारे करि एकत्र गणन॥11॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द एक बड़ी
शाखा हैं, जिन्होंने सारा जीवन श्रीचैतन्य महाप्रभुके
124 | श्रीचैतन्यचरितामृत

चरणोंकी सेवा की है। अपने पिताके मुखसे यह वाक्य
सुनकर कि केशव भारती श्रीचैतन्य महाप्रभुके गुरु हैं,
उन्हें अपार दुःख हुआ। उन्होंने अपने पिताजीसे कहा
कि जगद्गुरु (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के विषयमें आप ऐसा
उपदेश कर रहे हैं, (लोग उन्हें भगवान् नहीं मानकर
साधारण जीव मान लेंगे) जिसके कारण सारे देशका
विनाश हो जायेगा। चैतन्य महाप्रभु तो चौदह भुवनोंके
गुरु हैं और किसी भी शास्त्रमें ऐसा वर्णन नहीं है कि
कोई अन्य उनका गुरु है। अच्युतानन्द उस समय
केवलमात्र पाँच वर्षके बालक थे। उनके मुखसे यह
सिद्धान्त-सार सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको परम आनन्द
हुआ॥ 13-17॥
अनुभाष्य - 'अच्युतानन्द' - श्रीचैतन्यभागवतके
अन्त्यखण्डके आठवें अध्यायमें लिखा है-
“अद्वैतेर ज्येष्ठपुत्र श्रीअच्युतानन्द ॥ 60(क)॥”
“अच्युतानन्द श्रीअद्वैतप्रभुके ज्येष्ठ पुत्र हैं।”
संस्कृत भाषाके ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में लिखा है-
“अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च।
रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्।
आचार्यतनयेष्ठेते त्रयो गौरगणाः स्मृताः॥
चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः।
षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥”
“अच्युत, कृष्णमिश्र और गोपाल-ये सीतादेवीके
गर्भसमुद्रसे उत्पन्न तीन रत्न कहलाते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके
पुत्रोंमेंसे ये तीन गौरजन कहलाते हैं। चौथे पुत्र
श्रीबलराम, पाँचवें पुत्र स्वरूप और छठे पुत्र जगदीश
हैं- इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं।”
श्रीअद्वैतप्रभुके गौरभक्त तीनों पुत्रोंमें श्रीअच्युतानन्द
ही ज्येष्ठ हैं। श्रीअद्वैतप्रभुका विवाह पन्द्रहवीं शक-शताब्दीके
प्रारम्भमें ही हुआ था। श्रीमन्महाप्रभुने जिस वर्ष नीलाचलसे
रामकेलि होते हुए वृन्दावन जानेका मन बनाया था,
उसी वर्ष 1433-34 शकाब्दमें अच्युतानन्द केवल पाँच
वर्षके थे। चैःभाः अन्त्यखण्डके चतुर्थ अध्यायमें “पञ्चवर्ष
वयस मधुर दिगम्बर” के रूपमें उनका वर्णन है।
इसलिये अच्युतानन्दका जन्म 1428 शकाब्दमें हुआ
था। अच्युतानन्दके जन्मसे पहले महाप्रभुके जन्मके
समय श्रीअद्वैतपत्नी सीतादेवी महाप्रभुके जन्मके उपरान्त
(1407 शकाब्दमें) उन्हें देखनेके लिये आयी थीं,
इसलिये इन 21 वर्षोंमें उनके और भी तीन पुत्र होनेकी
असम्भावना नहीं है। 'श्रीनित्यानन्द-दायिनी' पत्रिकामें
1792 शकाब्दमें छपी प्राकृत सहजिया सखीभेखी-दलके
लोकनाथदास नामक एक व्यक्तिने 'सीताद्वैतचरित' नामक
एक बङ्गला कविता-ग्रन्थमें अच्युतानन्दको महाप्रभुके
सहपाठीके रूपमें वर्णित किया है; यह बात चैतन्यभागवतके
विरुद्ध है। महाप्रभु जिस वर्ष संन्यास ग्रहणकर शान्तिपुरमें
श्रीअद्वैतके भवनमें आये, तब 1431 शकाब्द था, उस
समय अच्युतानन्द तीन वर्षके बालक थे- (चैःभाः
अन्त्यखण्ड प्रथम अध्याय)-
“दिगम्बर शिशुरूप अद्वैत-तनय ॥213(क)॥
आसिया पड़िल गौरचन्द्र-पदतले।
धूलार सहित प्रभु लइलेन कोले॥216॥
प्रभु बोले,- अच्युत, आचार्य मोर पिता।
से-सम्बन्धे तोमाय आमाय (हइ) दुइ भ्राता ॥217॥”
“श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र शिशुरूपमें दिगम्बर (वस्त्रहीन)
वेशमें थे। वे आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े।
महाप्रभुने धूल-धूसरित उन शिशुको उठाकर अपनी
गोदमें ले लिया और कहने लगे, अच्युत! (श्रीअद्वैत)
आचार्य मेरे पिता हैं, इस सम्बन्धसे तुम और मैं-दोनों
भाई हैं।” श्रीमन्महाप्रभुने श्रीनवद्वीपमें अपने महाप्रकाशसे
पहले श्रीअद्वैताचार्यको लानेके लिये श्रीराम पण्डितको
शान्तिपुर भेजा था। उस समय अच्युतानन्द भी पिता-माताके
साथ आनन्द-क्रन्दनमें डूब गये थे। चैःभाः मध्यखण्ड
छठा अध्याय-
“अद्वैतेर तनय 'अच्युतानन्द'-नाम।
परमबालक, सेहो कान्दे अविराम ॥41॥”
और जब श्रीअद्वैताचार्य भक्तिके विरुद्ध ज्ञानकी
व्याख्या कर रहे थे और महाप्रभुने उनपर प्रहार किया
था, तब भी अच्युतानन्द वहाँ उपस्थित थे। ये सारी
बारहवाँ अध्याय | 125

[ 12/13-18

घटनाएँ महाप्रभुके संन्यासके दो-तीन वर्ष पहले हुईं—ऐसा स्वीकार करना पड़ेगा। चैःभाः मध्यखण्ड उन्तीसवाँ अध्याय—

“अच्युत प्रणाम करे अद्वैत-तनय॥ 128(ख)॥”

श्रीअच्युत बाल्यकालसे ही श्रीमन्महाप्रभुके भक्त थे। इन्होंने पत्नी ग्रहणकर कभी संसार धर्मका पालन किया, ऐसी कोई भी बात नहीं सुनी जाती है। श्रीअद्वैत-शाखाके वर्णनमें इनका नाम शिष्योंमें अग्रणी है। श्रीयदुनन्दनदासके द्वारा रचित श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी ‘शाखा-निर्णयामृत’ ग्रन्थके अनुसार अच्युतानन्द श्रीगदाधर पण्डितके शिष्य और शाखा हैं—

“महारसामृतानन्दमच्युतानन्द-नामकम्।
गदाधर-प्रियतमं श्रीमदद्वैतनन्दनम्॥”

“जिनका नाम अच्युतानन्द है, वे महारसामृतानन्द हैं। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगदाधर पण्डितके अति प्रिय शिष्य हैं।” (चैःचः आदिलीला, 10/150)—

“अच्युतानन्द—अद्वैत आचार्य-तनय।
नीलाचले रहे प्रभुर चरण-आश्रय॥”

अच्युतानन्दने नीलाचलमें महाप्रभुका चरणाश्रय करके भजन किया था। श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने अपना शेष जीवन महाप्रभुके निकट नीलाचलमें व्यतीत किया था, इसी कारणसे यह देखनेमें आता है कि अच्युतानन्दादि श्रीअद्वैतप्रभुके वास्तविक सेवक-मण्डलियोंमेंसे अनेकोंने ही श्रीगदाधरका चरणाश्रय किया था। अच्युतानन्दकी श्रीमन्महाप्रभुके प्रति अति बाल्यकालसे ही प्रबल भक्तिका प्रमाण देखा जाता है। (चैःचः मध्यलीला, 13/45)—

“शान्तिपुर-आचार्येर एक सम्प्रदाय।
अच्युतानन्द नाचे ताँहा, आर सब गाय॥”

प्रत्येक वर्ष जगन्नाथ रथके सामने (महाप्रभुके) नृत्य-कीर्तनके समय भी हम महाप्रभुके प्रिय अच्युतानन्दका वर्णन सर्वत्र देखते हैं। उस समय बालककी आयु केवल 6 वर्षकी थी। श्रीकविकर्णपूर-प्रणीत गौरगणोद्देश-दीपिकामें अच्युतानन्दको ‘श्रीगदाधरके शिष्य एवं श्रीकृष्णचैतन्यके प्रिय’ के रूपमें कहा गया है—

“तस्य पुत्रोऽच्युतानन्दः कृष्णचैतन्यवल्लभः।
श्रीमत्पण्डित-गोस्वामि-शिष्यः प्रिय इति श्रुतम्॥ 87॥
यः कार्त्तिकेयः प्रागासीदिति जल्‍पन्ति केचन।
केचिदाहू रसविदोऽच्युतानाम्नी तु गोपिका।
उभयन्तु समीचीनं द्वयोरेकत्र सङ्गतात्॥ 88॥”

“श्रीअच्युतानन्द श्रीकृष्णचैतन्यके अतिशय प्रिय, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य तथा श्रीअद्वैताचार्यके प्रिय पुत्रके रूपमें प्रसिद्ध हैं। किसी-किसीका कहना है कि कार्त्तिकेय ही अच्युतानन्द हैं, परन्तु अन्यान्य किन्हीं रसविदोंका कहना है कि ब्रजकी अच्युता नामक गोपी ही अब अच्युतानन्द हैं। ये दोनों ही विचार ठीक हैं, क्योंकि कार्त्तिकेय और अच्युता नामक गोपी मिलकर ही श्रीअच्युतानन्द हुए हैं।”

श्रीनरहरिदासके द्वारा रचित ‘नरोत्तमविलास’ ग्रन्थमें खेतरि-महोत्सवके समय अच्युतानन्दके आगमन एवं योगदानकी कथा सविस्तार वर्णित है। जननी श्रीसीता और श्रीजाह्नवाके अनुरोधसे नितान्त असमर्थ होनेपर भी उन्होंने महोत्सवके समय योगदान दिया था। इन्हीं नरहरिदासके मतानुसार जीवनके अन्तिम समय उन्होंने शान्तिपुरके भवनमें वास किया था; परन्तु ऐसा जाना जाता है कि श्रीमहाप्रभुके प्रकटकालमें उन्होंने महाप्रभुके साथ और बादमें श्रीगदाधरके निकट पुरीमें वास किया था। विवाह न करनेके कारण उनकी कोई सन्तानादि नहीं थी॥ 13-17॥

(2) कृष्णमिश्र :-
कृष्णमिश्र-नाम आर आचार्य-तनय।
चैतन्य-गोसाञि कैसे याँहार हृदय॥18॥

अनुवाद— कृष्णमिश्र नामक श्रीअद्वैताचार्यके एक और पुत्र थे, जिनके हृदयमें सदा श्रीचैतन्य महाप्रभु निवास करते थे॥ 18॥

अनुभाष्य— 'कृष्णमिश्र'—संस्कृतभाषाके ग्रन्थ ‘अद्वैतचरित’ में—


126 | श्रीचैतन्यचरितामृत

“अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च।
रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्।”
“श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्रोंमेंसे 'अच्युत, कृष्णमिश्र
और गोपाल'-ये तीनों भाई श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके दास्यके
रूपमें नियुक्त थे।” गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 88–
“कार्तिकेयः कृष्णमिश्रस्तत् साम्यादिति केचन॥88॥”
“कार्तिकेय और श्रीकृष्णमिश्रमें समानताके कारण
कोई-कोई श्रीकृष्णमिश्रको भी कार्तिकेय कहते हैं।”
कृष्णमिश्रके दो पुत्र थे—(1) रघुनाथ चक्रवर्त्ती, (2)
दोलगोविन्द। इनमेंसे रघुनाथके वंशज शान्तिपुरके
मदनगोपालके मोहल्ला, गणकर, मृजापुर और कुमारखालिमें
वर्तमान है। दोलगोविन्दके तीन पुत्र थे—(1) चाँद, (2)
कन्दर्प, (3) गोपीनाथ। कन्दर्पके वंशज मालदह, जिकावाड़ीमें
हैं। गोपीनाथके तीन पुत्र— (1) श्रीवल्लभ, (2)
प्राणवल्लभ और (3) केशव थे। श्रीवल्लभके वंशज
मशियाडारा (महिषडेरा ?), दामुकदिया और चण्डीपुर
आदि स्थानोंपर हैं। श्रीवल्लभके ज्येष्ठपुत्र गङ्गानारायणसे
मशियाडाराकी वंश-धारा एवं कनिष्ठ पुत्र रामगोपालसे
दामुकदिया, चण्डीपुर, शोलमारि आदि गाँवोंकी वंश-धारा
है। प्राणवल्लभ और केशवके वंशज उथलीमें वास
करते हैं। प्राणवल्लभके पुत्र रत्नेश्वर, उनके पुत्र
कृष्णराम, उनके छोटे पुत्र लक्ष्मीनारायण, उनके पुत्र
नवकिशोर, उनके द्वितीय पुत्र राममोहनके बड़े पुत्र
'जगबन्धु' और तृतीय पुत्र 'वीरचन्द्र' ने भिक्षुका श्रम
स्वीकार करके काटोयामें श्रीमन्महाप्रभुके विग्रहकी स्थापना
की। लोग इन्हें 'बड़ेप्रभु' और 'छोटेप्रभु' कहते थे।
इन्होंने ही नवद्वीपधाम-परिक्रमाका प्रवर्त्तन किया था।
कृष्णमिश्रकी पूर्ण वंशातालिकाके बारेमें वैष्णवमञ्जूषाके
चतुर्थ संख्यामें “अद्वैत-वंश' द्रष्टव्य है॥18॥
(3) गोपालका बाल-चरित्र :–
श्रीगोपाल-नामे आर आचार्येर सुत।
ताँहार चरित्र, शुन, अत्यन्त अद्भुत॥19॥


12/18–26 ]
गुण्डिचा-मन्दिरे महाप्रभुर सन्मुखे।
कीर्त्तने नर्त्तन करे बड़ प्रेमसुखे॥20॥
नाना-भावोद्गम देहे अद्भुत नर्त्तन।
दुइ गोसाञि 'हरि' बले आनन्दित मन॥21॥
नाचते नाचते गोपाल हइल मूर्च्छित।
भूमेते पड़िल, देहे नाहिक सम्बित॥22॥
दुःखित हइला आचार्य पुत्र कोले लञा।
रक्षा करे नृसिंहरे मन्त्र पड़िया॥23॥
नाना मन्त्र पड़ेन आचार्य, ना हय चेतन।
आचार्येर दुःखे वैष्णव करेन क्रन्दन॥24॥
तबे महाप्रभु ताँर हृदे हस्त धरि'।
“उठह, गोपाल-बल, बल 'हरि' 'हरि'॥”25॥
उठिल गोपाल प्रभुर स्पर्श-ध्वनि शुनि'।
आनन्दित हञा सबे करे हरिध्वनि॥26॥
अनुवाद—श्रीगोपाल नामक एक और श्रीअद्वैताचार्यके
पुत्र थे। उनके अद्भुत चरित्रके विषयमें सुनो। वे एक
बार महाप्रभुके सामने गुण्डिचा मन्दिरमें प्रेममें डूबकर
बड़े आनन्दसे नृत्य कर रहे थे। उनके शरीरमें नाना
प्रकारके भावोंका उद्गम हो रहा था और वे अद्भुत
नृत्य कर रहे थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द
प्रभु दोनों आनन्दित मनसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे।
नाचते-नाचते गोपाल मूर्च्छित हो गये और उनकी देहमें
कोई चेतना नहीं रही। श्रीअद्वैताचार्य बहुत दुःखी हो
गये और अपने पुत्रको उन्होंने अपनी गोदमें ले लिया।
उसकी रक्षाके लिये उन्होंने नृसिंह-मन्त्र पढ़ा। उसके
बाद उन्होंने अनेक मन्त्र पढ़े, परन्तु फिर भी गोपालकी
चेतना लौटकर नहीं आयी। श्रीअद्वैताचार्यके दुःखको
देखकर सभी वैष्णव क्रन्दन करने लगे। तब महाप्रभुने
अपना हाथ गोपालके हृदयपर रखा और कहा—“गोपाल!
उठो और 'हरि' 'हरि' बोलो।” महाप्रभुके स्पर्श और
ध्वनिको सुनकर गोपाल उठकर बैठ गये। इसे देखकर


बारहवाँ अध्याय | 127

[ 12/19-31

सभीका मन आनन्दित हो गया और सभी 'हरि' 'हरि'
ध्वनि करने लगे ॥ 19-26 ॥
अनुभाष्य—'गोपाल'—श्रीअद्वैताचार्यके तीन वैष्णव
पुत्रोंमें अन्यतम हैं। चैःचः मध्यलीला, 12/143-149
संख्या द्रष्टव्य है। सम्बित् अर्थात् सम्विद् अथवा
ज्ञान ॥ 19-26 ॥
आचार्येर आर पुत्र—श्रीबलराम।
आर पुत्र—'स्वरूप'-शाखा, 'जगदीश' नाम ॥ 27 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके अन्य पुत्र श्रीबलराम, स्वरूप
और जगदीश हैं ॥ 27 ॥
अनुभाष्य—'बलराम, स्वरूप और जगदीश'—संस्कृतके
ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में कहा गया है—
“चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः।
षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥”
“श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं, जिनमें बलराम चौथे,
स्वरूप पाँचवें और जगदीश छठे पुत्र हैं।” ये तीनों गौर
विमुख स्मार्त्त अथवा मायावादी हैं, अतः अवैष्णव हैं।
बलरामकी तीन पत्नियोंके गर्भसे नौ पुत्रोंका जन्म
हुआ। प्रथम पत्नीकी कनिष्ठ सन्तान मधुसूदनने 'गोसाईं
भट्टाचार्य' नामसे विख्यात होकर स्मार्त्तधर्मको स्वीकार
किया। इनके पुत्र राधारमणने 'गोस्वामी भट्टाचार्य' नाम
ग्रहण करके गृहत्यागीके योग्य पदवी 'गोस्वामी' शब्दका
अपमान किया। और इन्होंने स्मार्त्त रघुनन्दनके आनुगत्यमें
श्रीअद्वैताचार्यकी 'कुश-पुत्तलिका' का दहन करके प्रेत
या राक्षस श्राद्ध-कार्य करके श्रीहरिभक्तिविलासादिमें
वर्णित विष्णु-भक्तिपरक श्राद्धकी विधिके विरुद्ध आचरण
करके मूर्खता एवं महाअपराधका प्रदर्शन किया। उन्होंने
शुद्धभक्त ना होते हुए भी कुछ नये ग्रन्थों और कुछ
प्राचीन ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना की—ये सब शुद्धभक्तोंके
लिये आदरणीय नहीं है। बलरामकी वंशतालिका
वैष्णवमञ्जूषा (चतुर्थ संख्या में) द्रष्टव्य है ॥ 27 ॥

(4) कमलाकान्त :—
'कमलाकान्त विश्वास'—नाम आचार्य-किङ्कर।
आचार्य-व्यवहार सब—ताँहार गोचर ॥ 28 ॥
अनुवाद—कमलाकान्त विश्वास नामक एक
श्रीअद्वैताचार्यके दास थे, जो उनके सभी सांसारिक
कार्यकलापोंको देखते थे ॥ 28 ॥
अनुभाष्य—'कमलाकान्त विश्वास'—चैःचः आदिलीला,
10/119 संख्यामें वर्णित भक्तोंमें 'कमलाकान्त' ही
कमलाकान्त विश्वास हैं। चैःचः आदिलीला, 10/149
संख्यामें वर्णित 'कमलानन्द' और मध्यलीला, 10/94
संख्यामें लिखित 'द्विज कमलाकान्त' सम्भवतः एक ही
व्यक्ति हैं। कमलाकान्त-ब्राह्मण महाप्रभुके निजगण हैं
और कमलाकान्त विश्वास श्रीअद्वैतप्रभुके सेवक हैं।
चैःचः मध्यलीला, 10/94—
“प्रभुर एक भक्त—'द्विज कमलाकान्त' नाम।
ताँरे लञा नीलाचले करिला प्रयाण॥”
“श्रीपरमानन्दपुरी नवद्वीपसे नीलाचल आते समय
नवद्वीपवासी महाप्रभुके भक्त 'ब्राह्मण-कमलाकान्त' को
अथवा कमलानन्दको साथ लेकर नीलाचल आये॥” 28 ॥

कमलाकान्तका चरित्र :—
नीलाचले तेंहो एक पत्रिका लिखिया।
प्रतापरुद्रेर स्थाने दिल पाठाइया ॥ 29 ॥
सेइ पत्रीर कथा आचार्य नाहि जाने।
कोन पाके सेइ पत्री आइल प्रभुस्थाने ॥ 30 ॥
अनुवाद—उन्होंने नीलाचलमें एक पत्र लिखकर
किसीके हाथों राजा प्रतापरुद्रके पास भिजवाया। उस
पत्रके विषयमें श्रीअद्वैताचार्यको कुछ पता नहीं था।
किसी कारणसे वह पत्र महाप्रभुके पास पहुँच
गया ॥ 29-30 ॥

कमलाकान्तके पत्रमें पागल-मत :—
से पत्रीते लेखा आछे—एइ त' लिखन।
ईश्वरत्वे आचार्येरे करियाछे स्थापन ॥ 31 ॥

128 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/31-43 ]
किन्तु ताँर दैवे किछु हइयाछे ऋण।
ऋण शोधिबारे चाहि मुद्रा शत-तिन ॥ 32 ॥
पत्र पड़िया प्रभुर मने हैल दुःख।
बाहिरे हासिया किछु बोले चाँदमुख ॥ 33 ॥
“आचार्येरे स्थापियाछे करिया ईश्वर।
इथे दोष नाहि, आचार्य-दैवत ईश्वर ॥ 34 ॥
षडैश्वर्यशाली नारायणको जीव समझकर दरिद्रबुद्धि
करना ही मायावाद अथवा पागल-मत :-
ईश्वरेर दैन्य करि' करियाछे भिक्षा।
अतएव दण्ड करि' कराइब शिक्षा ॥" 35 ॥
अनुवाद—उस पत्रमें उन्होंने यह लिखा कि
श्रीअद्वैताचार्य स्वयं ईश्वर हैं, परन्तु दैववशतः उनपर
कुछ ऋण हो गया है। ऋणके शोधनके लिये उन्हें तीन
सौ मुद्राओंकी आवश्यकता है। पत्र पढ़कर महाप्रभुके
मनमें दुःख हुआ, परन्तु बाहरसे हँसते हुए चन्द्रवदन
महाप्रभुने कहा—“इसने आचार्यको ईश्वर कहा है, इसमें
कोई भी दोष नहीं है, क्योंकि वे वास्तवमें ईश्वर हैं।
परन्तु ईश्वरको दीन बनाकर इसने जो भिक्षा माँगी है,
उसके लिये इसे मैं दण्ड देकर शिक्षा दूँगा ॥” 31-35 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'दैवत ईश्वर'—वास्तवमें
ईश्वर ॥ 34 ॥
अनुभाष्य—'ईश्वरेर दैन्य करि'—ईश्वरको दीन
बनाकर ॥ 35 ॥
पागलको दण्ड :-
गोविन्देरे आज्ञा दिल,—“इँहा आजि हैते।
बाउलिया 'विश्वासें' एथा ना दिबे आसिते ॥" 36 ॥
दण्ड शुनि' 'विश्वास' हइल परम दुःखित।
शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य हर्षित ॥ 37 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी—“आजसे
इस पागल 'विश्वास' को यहाँपर आने मत देना।”
दण्डको सुनकर 'विश्वास' बड़े दुःखी हो गये, परन्तु
श्रीअद्वैताचार्य सुनकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ 36-37 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'बाउलिया विश्वास'—कमलाकान्त
विश्वासके सिद्धान्तको बाउलके (पागलके) जैसा कहकर
उसको 'बाउलिया विश्वास' कहा है ॥ 36 ॥
अनुभाष्य—'विश्वासे'—अर्थात् कमलाकान्त
विश्वासको ॥ 36 ॥
श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा उसको सान्त्वना-दान :-
विश्वासेरे कहे,—“तुमि बड़ भाग्यवान्।
तोमारे करिल दण्ड प्रभु भगवान् ॥ 38 ॥
पूर्वे महाप्रभु मोरे करेन सम्मान।
दुःख पाइ' मने आमि कैलुँ अनुमान ॥ 39 ॥
मुक्ति-श्रेष्ठ करि' कैनु वशिष्ठ व्याख्यान।
क्रु
दण्ड पाञा हैल मोर परम आनन्द।
ये दण्ड पाइल भाग्यवान् मुकुन्द ॥ 41 ॥
ये दण्ड पाइल श्रीशची भाग्यवती।
से दण्डप्रसाद आर लोके पाबे कति ॥" 42 ॥
एत कहि आचार्य ताँरे करिया आश्वास।
आनन्दित हइया आइल महाप्रभु-पाश ॥ 43 ॥
अनुवाद—कमलकान्त विश्वासको दुःखी देखकर
श्रीअद्वैताचार्यने कहा—“तुम बड़े भाग्यशाली हो कि तुम्हें
महाप्रभुने दण्ड प्रदान किया है, अर्थात् अपना माना है।
पहले महाप्रभु मेरा सम्मान करते थे, जिससे मुझे बहुत
दुःख होता था। तब मैंने मनमें विचार करके
योग-वाशिष्ठकी व्याख्या करते हुए मुक्तिको भक्तिसे
श्रेष्ठ बतलाना आरम्भ किया। इसे सुनकर महाप्रभुने
क्रोधित होकर मुझपर शासन किया। उस दण्डको
पाकर मुझे परम आनन्द हुआ। ऐसा ही दण्ड महाप्रभुने
मुकुन्दको दिया था। शची माताको भी ऐसा दण्ड मिला
बारहवाँ अध्याय | 129

[ 12/38-43
था, जिस दण्ड (कृपा) को पानेवाला उनसे अधिक
भाग्यशाली जगत्में और कौन है?" यह कहकर
श्रीअद्वैताचार्यने उसे आश्वासन दिया और वे आनन्दित
होकर महाप्रभुके पास आये॥ 38-43 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—योगवाशिष्ठकी व्याख्या करते
करते किसी छलसे श्रीअद्वैतप्रभुने भक्तिकी अपेक्षा
मुक्तिको श्रेष्ठ बतलाया ॥ 40 ॥
अनुभाष्य—'वशिष्ठ' अर्थात् योगवाशिष्ठ रामायण।
यह ग्रन्थ विष्णुभक्ति विरोधी मायावादका प्रतिपादक है,
इसलिये शुद्धभक्तोंको इसे नहीं पढ़ना चाहिये। अद्वैतदण्डके
लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, उन्नीसवाँ अध्याय), मुकुन्ददण्डके
लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय) और शचीमाताके
दण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, बाइसवाँ अध्याय)
द्रष्टव्य है॥ 40-42 ॥
अमृताणुकणिका—'श्रीअद्वैत-दण्ड'—नवद्वीपमें महाप्रभु
विश्वम्भरने जो क्रीड़ा की, उसे सभी लोग नहीं देख
पाते थे। वे श्रीनित्यानन्द और श्रीगदाधरको साथ लेकर
अपने भक्तोंके घर-घरमें विहार करने लगे। महाप्रभुको
आनन्दमें मग्न देखकर भागवतगण भी परिपूर्ण आनन्दमें
डूब गये। सभीने देखा कि सम्पूर्ण भुवन श्रीकृष्णसे
परिपूर्ण हैं। निरन्तर भावावेशमें रहनेके कारण किसीको
भी बाहरी दुनियाकी सुधबुध न रही। एक सङ्कीर्तनके
अतिरिक्त उनके लिये और कोई कार्य नहीं रह गया
था। सबसे अधिक मत्त थे—आचार्य गोसाईं। ऐसा कोई
नहीं था जो उनके अगाध चरित्रको समझ सके।
श्रीचैतन्यकी कृपासे केवल कोई-कोई ही उन्हें जान
पाये थे कि अद्वैताचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके महाभक्त
हैं। बाह्य जगत्का बोध होनेपर विश्वम्भर सभी वैष्णवोंके
प्रति, विशेष करके श्रीअद्वैतके प्रति महाभक्ति प्रदर्शित
करते थे। इससे श्रीअद्वैताचार्यको बड़ा ही दुःख होता
था। वे मन-ही-मन चिन्तन करने लगे,—"निरन्तर ये
चोर (गौराङ्ग महाप्रभु) मुझे विडम्बनामें डालते रहते हैं।
प्रभुताको छोड़कर वे मेरे चरण पकड़ते हैं। महाबली
प्रभुके साथ शक्तिसे मैं निपट नहीं सकता हूँ, मुझे
पकड़कर भी वे बलात् मेरे चरणोंकी धूल ले लेते हैं।
बस, एक ही उपाय है, और वह है मेरा भक्तिबल।
क्योंकि, भक्तिके बिना विश्वम्भरको पहचानना सम्भव
नहीं है। मायाको जब मैं पूरी तरहसे मिटा पाऊँगा,
तभी लोगोंको पता चलेगा कि मैं सचमुच ही 'अद्वैत-सिंह'
हूँ। भृगुको जीतकर 'चोर' का साहस बढ़ गया है,
अर्थात् भृगुकी लात खाकर भी उन्होंने क्रोधके स्थानपर
दैन्य प्रकाश किया था। भृगु-जैसे मेरे सैकड़ों शिष्य हैं।
प्रभुके शरीरमें ऐसा क्रोध उत्पन्न करूँगा कि प्रभु अपने
ही हाथोंसे मुझे दण्ड प्रदान करेंगे। जिस भक्तिके
प्रचारके लिये प्रभुका अवतार हुआ है, मैं उस भक्तिको
स्वीकार नहीं करूँगा—बस, यही सार सिद्धान्त है।
भक्तिको न माननेसे प्रभु क्रोधित होकर अपने आपको
भूल जायेंगे और मेरे केश पकड़कर मुझे दण्ड प्रदान
करेंगे।" ऐसा सोचकर अद्वैताचार्य प्रभुने हरिदासके साथ
आनन्द-सहित महाप्रभुसे विदा ली।
वे अपने घर शान्तिपुर आये और आकर सभीको
'ज्ञान' की प्रधानता-प्रकाश-पूर्वक वाशिष्ठ-शास्त्रकी व्याख्या
करने लगे,—"बिना 'ज्ञान' के विष्णु-भक्तिमें कोई शक्ति
है क्या? इसलिये ज्ञान ही सबका प्राणस्वरूप है, ज्ञानमें
ही सर्वशक्ति है। इस ज्ञानको बिना समझे कोई-कोई
व्यक्ति अपने घरमें ही निज धनको खोकर वन-वनमें
ढूँढता रहते हैं। विष्णु-भक्ति दर्पण-स्वरूप होती है और
नेत्र होते हैं—'ज्ञान'। बिना नेत्रोंके दर्पण किस कामका?
सभी शास्त्रोंका मैंने आदिसे अन्त तक अध्ययन किया
है और देखा है कि केवल 'ज्ञान' ही इन सबका
एकमात्र अभिप्राय है।"
उधर महाप्रभु विश्वम्भर बारम्बार हुँकार करने लगे
और कहने लगे,—"मैं वही हूँ, मैं वही हूँ। नींदसे
उठाकर मुझे नाड़ा यहाँ ले आया है, और अब यहाँ
भक्तिको छिपाकर वह 'ज्ञान' की व्याख्या कर रहा है।
देख लेना, इसी कारण आज मैं उसे प्रत्यक्षरूपसे दण्ड
130 | श्रीचैतन्यचरितामृत

प्रदान करूँगा। मैं देखना चाहता हूँ कि आज कैसे वह
ज्ञानयोगको बचाये रखता है?”
श्रीअद्वैताचार्यने जब यह जाना कि 'क्रोधित होकर
महाप्रभु आ रहे हैं, तब वे और अधिक मत्त होकर
ज्ञानयोगकी व्याख्या करने लगे। चैतन्य-भक्तकी लीला
कौन समझ सकता है? क्रु
साथ जाकर देखा कि श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानचर्चाके आनन्दमें
झूम रहे हैं। महाप्रभुको देखकर हरिदासने दण्डवत्
प्रणाम किया, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतने भी प्रणाम
किया। श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नीने मन-ही-मन उन्हें नमस्कार
किया और महाप्रभुको क्रोधित देखकर वे हृदयमें
चिन्तित हो गयीं। कोटि-सूर्यकी भाँति महाप्रभुका तेज
प्रकाशित हो रहा था। यह देखकर सभीके चित्तमें भय
छा गया। महाप्रभु क्रोधित होकर बोले,—“अरे! अरे
नाड़ा! बताओ ज्ञान और भक्तिमें कौन श्रेष्ठ है?”
उत्तरमें श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ज्ञान सब समय श्रेष्ठ है।
जिनको ज्ञान नहीं है, उन्हें भक्तिसे क्या प्रयोजन?”
'ज्ञान श्रेष्ठ हैं',—श्रीअद्वैताचार्यके ये वचन सुनकर क्रोधके
कारण शचीनन्दन बाहरी सुधबुध भूल गये। श्रीअद्वैताचार्य
अपने चबूतरेपर बैठे हुए थे। महाप्रभुने उन्हें वहाँसे
उठाया और आँगनमें ले आये। फिर आँगनमें नीचे
गिराकर वे अपने हाथोंसे उन्हें मारने लगे।
जगन्माता-स्वरूपिणी श्रीअद्वैताचार्यकी पतिव्रता गृहिणी
सब तत्त्व जानते हुए भी व्याकुल हो गयीं और कहने
लगीं,—“यह वृद्ध ब्राह्मण है, यह वृद्ध ब्राह्मण है, इनके
प्राणोंकी रक्षा कीजिये। किसके सिखानेसे आप इनका
इतना अपमान कर रहे हैं? इतने बूढ़े ब्राह्मणके साथ
और क्या-क्या करेंगे?” पतिव्रता पत्नीकी बात सुनकर
श्रीनित्यानन्द प्रभु हँसने लगे और हरिदास ठाकुर भयके
कारण श्रीकृष्णका स्मरण करने लगे। क्रोधमें महाप्रभुने
पतिव्रताकी बातको नहीं सुना। दम्भ प्रकाश करते हुए
महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यके प्रति तर्जन-गर्जन करते रहे।
महाप्रभुने कहा,—“अरे नाड़ा, मैं तो क्षीरसागरमें सो रहा
था। तुमने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी। तुमने भक्तिको
प्रकाशित करनेके लिये मुझे यहाँ बुला लिया। अब
भक्तिको छिपाकर ज्ञानकी व्याख्या कर रहे हो। यदि
तुम्हारे मनमें भक्तिको छिपाये रखनेकी इच्छा थी, तो
किस प्रयोजनके लिये तुमने मुझे प्रकाशित किया?
तुम्हारे सङ्कल्पको मैं कभी व्यर्थ नहीं होने देता, परन्तु
तुम मुझे सदैव विडम्बनामें डालते रहते हो।” इसके
बाद श्रीअद्वैताचार्यको छोड़कर महाप्रभु द्वारमें आकर
बैठ गये और हुँकार करते हुये निज तत्त्वको प्रकाश
करने लगे। महाप्रभुने कहा,—“अरे अरे! जिसने कंसको
मारा था, मैं वही हूँ। अरे ओ नाड़ा! तुम सब जानते
हो, देख लो। अज, भव, शेष, रमा—ये सब मेरी सेवा
करते हैं। मेरे सुदर्शन चक्रने शृगाल-वासुदेव (पौण्ड्र
को मार गिराया था। मेरे सुदर्शन चक्रने सारे वाराणसी
नगरको जला डाला था। मेरे बाणोंने महाबली रावणका
संहार किया था। मेरे चक्रने बाणासुरकी भुजाओंको
काटा था। मेरे चक्रने नरकासुरका वध किया था। बाँये
हाथपर मैंने ही (गोवर्धन) पर्वतको धारण किया था।
स्वर्गसे पारिजात भी मैं ही लाया था। मैंने ही बलिको
छला था, फिर उसपर कृपा भी मैंने ही की थी। मैंने
हिरण्यकशिपुको मारकर प्रह्लादको बचाया था।” इस
प्रकारसे महाप्रभु अपना ऐश्वर्य प्रकाशित करते रहे
और उसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य प्रेमसागरमें बहते रहे।
दण्ड प्राप्त करके श्रीअद्वैताचार्य परम आनन्दित हुये
और हाथोंसे ताली बजा-बजाकर विनीतभावसे नृत्य
करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य बोले,—“अपराधके अनुरूप
ही मुझे दण्ड मिला है। हे प्रभु! इससे भृत्यके हृदयमें
बल मिला है।” इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्य आनन्दसे
नृत्य करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य सारे आङ्गनमें आनन्द-सहित
नृत्य कर रहे थे और भौंवें नचा-नचाकर महाप्रभुके
चरणोंमें निवेदन कर रहे थे,—“मेरे प्रति आपकी वह
स्तुति अब कहाँ गयी? कहाँ गये अब आपके वे सारे
ढङ्ग? मैं दुर्वासा नहीं हूँ, जिसका आप तिरस्कार कर
देंगे, जिनके अवशिष्ट अन्नका आप सारे शरीरमें लेपन
कर लेंगे। मैं भृगुमुनि भी नहीं हूँ, जिनकी पदधूलिको

[ 12/38-43
वक्षपर धारण करके आप आनन्द-सहित 'श्रीवत्स' बन
जायेंगे। मेरा नाम अद्वैत है—मैं आपका शुद्ध दास हूँ।
मैं जन्म-जन्मान्तरसे आपकी जूठन (प्रसादी) पानेके
लिये अभिलाषी हूँ। आपकी 'जूठन' के प्रभावसे मुझे
आपकी मायाकी भी परवाह नहीं है। मुझे आप सजा
तो दे चुके हैं, अब कृपया चरणोंकी छाया प्रदान
कीजिये।” इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्य भक्तिपूर्वक महाप्रभुके
चरणकमलोंमें माथा लगाकर पड़ गये। सम्भ्रम-सहित
उठकर महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको अपनी गोदमें ले
लिया और खूब रोये। श्रीअद्वैताचार्यकी भक्तिको देखकर
श्रीनित्यानन्द रायने ऐसा रोदन किया, मानों नदी बह
रही हो। हरिदास ठाकुर भूमिपर गिरकर रोने लगे,
श्रीअद्वैताचार्यकी गृहिणी रो रही थी, जितने भी दास थे,
वे सभी रो रहे थे। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द भी
क्रन्दन कर रहे थे। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यका भवन
कृष्ण-प्रेममय हो गया। श्रीअद्वैताचार्यपर प्रहार करनेके
बाद महाप्रभु बड़े लज्जित हुए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक
श्रीअद्वैताचार्यको वर प्रदान किया। महाप्रभुने कहा, — “आधे
पलके लिये भी जो तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेगा, वह
चाहे पशु हो, कीट हो, पक्षी हो, पतङ्गा हो—चाहे कोई
भी हो, यदि मेरे प्रति उसने सौ अपराध भी किये हों,
तब भी मैं उसपर कृपा करूँगा।” महाभाग्यवान् श्रीअद्वैताचार्य
ऐसा वर सुनकर क्रन्दन करने लगे और चरण
पकड़कर विनयपूर्वक बोले, - “हे प्रभो! आपने जो कुछ
कहा, वह कभी मिथ्या नहीं है। हे महाशय ! मेरी भी
एक प्रतिज्ञा है, कृपया सुन लीजिये। यदि कोई आपको
आदर न देकर मेरे प्रति भक्ति करेगा, तो उसकी वह
भक्ति उसका संहार करने वाली होगी। जो आपके
चरणकमलोंका भजन नहीं करता है, जो आपको नहीं
मानता है, वह कभी मेरा भक्त नहीं हो सकता। हे
प्रभु ! जो आपका भजन करता है, वह मेरा जीवन है।
आपका उल्लङ्घन किया जाना मैं सहन नहीं कर
सकता। भले ही मेरा पुत्र हो, अथवा मेरा किङ्कर हो,
यदि वह वैष्णवोंके चरणोंमें अपराधी हो जाय, तो मैं
उसका मुख भी देखना नहीं चाहता।”
'शचीमाताका दण्ड'—एक दिन महाप्रभु श्रीगौराङ्गसुन्दर
विष्णुके सिंहासनपर बैठ गये। अपनी शिलामयी मूर्तियोंको
अपनी गोदमें लेते हुए गौरचन्द्र आनन्दके साथ अपने
स्वरूपको प्रकाशित करने लगे। महाप्रभु कहने
लगे— “कलियुगमें मैं कृष्ण हूँ, मैं नारायण हूँ, मैंने
रामके रूपमें सागरको बाँधा था। मैं क्षीरसागरमें सो रहा
था। नाड़ाकी हुँकारने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी।
प्रेमभक्तिका वितरण करनेके लिये मेरा प्राकट्य हुआ
है। अरे नाड़ा, 'माँग लो' ! 'माँग लो' ! श्रीनिवास, तुम
भी माँग लो।” महान् प्रकाशको देखकर श्रीनित्यानन्दरायने
उसी क्षण महाप्रभुके मस्तकपर छत्र धारण कर लिया।
बायीं ओरसे श्रीगदाधरने ताम्बूल प्रदान किया और चारों
ओर भक्तजन चामर-व्यजन करने लगे। महेश्वर गौराङ्ग
महाप्रभु भक्तियोगका वितरण कर रहे थे। सभी लोग
अपना-अपना मनचाहा वर महाप्रभुसे माँग रहे थे।
किसीने कहा, — “मेरे पिता बहुत ही दुष्टमतिके हैं, यदि
उनका चित्त अच्छा हो जाय, तो मेरी रक्षा हो जाय।”
इसी प्रकार किसीने गुरुके लिये, किसीने शिष्यके लिये,
किसीने पुत्रके लिये और किसीने पत्नीके लिये
अपनी-अपनी रतिके अनुसार वर माँगा। महाप्रभु विश्वम्भर
भक्तोंके वचनोंको सत्य करने वाले हैं। उन्होंने हँसकर
सभीको प्रेम-भक्तिका वर प्रदान किया। श्रीनिवास
महाशयने कहा- “प्रभो! हम सब चाहते हैं कि आइ
(शचीमाता) को भी प्रेमभक्तिका वर मिल जाये।”
महाप्रभु बोले, — “ऐसा मत कहना श्रीनिवास। उन्हें मैं
प्रेमभक्तिका विलास प्रदान नहीं करूँगा। उन्होंने वैष्णवके
चरणोंमें अपराध किया है; अतएव, उन्हें प्रेमभक्ति
मिलनेमें बाधा है।” श्रीनिवासने और एक बार कहा, — “हे
प्रभो! आपकी इस बातसे हमारा देह त्याग होगा।
जिनके गर्भसे आप जैसे पुत्रका अवतार हुआ हो, क्या
132 | श्रीचैतन्यचरितामृत