श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 652, कुल 2549 में से
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स्तम्भपर स्मृतिरक्षक पत्थरके पटलोंपर मन्दिरके निर्माता
और श्रीपाटके संस्कार करवानेवालोंके नाम खुदे हुए
हैं। नाट्यमन्दिरके सामने ही एक सुशीतल छायापूर्ण
माधवी-मण्डप है। माधवी-मण्डपके दोनों ओर दो
स्तम्भ हैं, एकमें उद्धारण ठाकुर महाशयका चित्रपट
और दूसरेमें पत्थरके पटलपर चतुर्युगके चार
तारक-ब्रह्मनाम खुदे हुए हैं।
1283 (बङ्गाब्द) वर्षमें निताइदास बाबाजी नामक
एक भिक्षुने श्रीपाटके लिये बारह बीघा भूमि संग्रह की
थी। तत्पश्चात् किसी-किसीकी विशेष चेष्टासे श्रीपाटकी
सेवा कुछ दिनोंतक चलनेपर भी धीरे-धीरे सेवामें कमी
होती गयी। तदुपरान्त 1306 (बङ्गाब्द) वर्षमें हुगलीके
भूतपूर्व सब-जज बलराम मल्लिक और कोलकाता-निवासी
अनेक धनी सुवर्ण-व्यापारियोंकी एकजुट चेष्टासे पुनः
श्रीपाटकी सेवामें कुछ परिपाटी दिखाई देने लगी।
1875 ईसवीके लगभग पहले एक टूटी-फूटी
कुटियामें हुगली-वालि-निवासी परलोकगत जगमोहन
दत्तके द्वारा प्रतिष्ठित श्रील उद्धारण ठाकुरकी एक
दारुमयी (लकड़ीकी) श्रीमूर्त्ति विराजित थी। वह श्रीमूर्त्ति
अब सप्तग्राम-श्रीपाटमें नहीं है। उनका चित्रपट ही अब
पूजित हो रहा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व अनुसन्धानसे
सुना गया था कि उद्धारण ठाकुरकी वह श्रीमूर्त्ति तब
हुगली-वालि-निवासी श्रीमदन दत्त महोदयके घरमें और
ठाकुरके द्वारा सेवित श्रीशालग्राम उसी गाँवमें श्रीनाथ
दत्तके घरमें विराजमान थे।
ठाकुर उद्धारण काटोयासे डेढ़ मील उत्तरी दिशाकी
ओर 'नैहाटी'-गाँवमें राजाके दीवान थे। दाँइहाट स्टेशनके
निकट अभी भी राजवंशके लोगोंके महलोंके भग्नावशेष
दिखायी देते हैं। ठाकुर राजकार्यके उपलक्ष्यमें जिस
स्थानपर वास करते थे, उस स्थानका नाम 'उद्धारण-पुर'
है। कहा जाता है कि ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित यहाँके
श्रीनिताइगौर-विग्रह वनओयारीबादकी राजधानीसे लाये
गये थे। इस स्थानपर स्थित मन्दिरके पश्चिम ओर
(और किसी-किसीके मतानुसार, वृन्दावनमें) ठाकुरकी
समाधि वर्तमान है। किसीके मतानुसार, ठाकुरके पिताका
नाम श्रीकर, माताका नाम भद्रावती और पुत्रका नाम
श्रीनिवास है॥41॥
(27) वैष्णवानन्द आचार्य :-
आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति-अधिकारी।
पूर्वे नाम छिल याँर 'रघुनाथ पुरी' ॥ 42 ॥
अनुवाद-आचार्य वैष्णवानन्द परम भक्त थे और
उनका पहले नाम रघुनाथपुरी था॥42॥
अनुभाष्य-'वैष्णवानन्द आचार्य'-चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय-
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार।
पूर्वे 'रघुनाथपुरी'-नाम ख्याति याँर ॥ 746 ॥ ”
“आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार थे। पहले ये
रघुनाथपुरीके नामसे विख्यात थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
96-97वाँ श्लोक)-
“वृन्दावने याः प्रागासन्नणिमाद्याष्टसिद्धयः।
ता एवाष्टौ भक्तरूपा भूता गौड़े च ते यथा॥96॥
अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः।
कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ।
पुर्युपाधिक्रमाज्ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः॥97॥”
“पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि
अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें
जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस
प्रकार हैं, यथा-अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ,
कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों 'पुरी'
उपाधिसे युक्त थे॥”42॥
(28) विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास-तीन भाई :-
विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास,-तिन भाइ।
पूर्वे याँर घरे छिला ठाकुर निताइ ॥ 43 ॥
अनुवाद-विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास-ये तीन
भाई थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आनेपर पहले इनके
घरमें आकर रहे थे॥43॥
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