सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 654

[ 11/47-51
(36) होड़ कृष्णदास :-
होड़ कृष्णदास-नित्यानन्दप्रभु-प्राण।
श्रीनित्यानन्द-पद बिना नाहि जाने आन॥ 47॥
अनुवाद—होड़ कृष्णदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्राण
थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंके अतिरिक्त कुछ नहीं
जानते थे॥ 47॥
अनुभाष्य—'होड़ कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय—
“बड़गाछि-निवासी सुकृति कृष्णदास।
याँहार मन्दिरे नित्यानन्देर विलास॥ 748॥”
“बड़गाछिमें निवास करनेवाले कृष्णदास बड़े सुकृतिवान्
थे, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके घरमें विलास
किया था।” बड़गाछिके माहात्म्यके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड
पाँचवाँ अध्याय और (नवनी होड़) पयार संख्या 50
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 47॥
(37) नकड़ि, (38) मुकुन्द, (39) सूर्य,
(40) माधव, (41) श्रीधर (गोपाल-12),
(42) रामानन्द, (43) जगन्नाथ, (44) महीधर :-
नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर।
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर॥ 48॥
(45) श्रीमन्त, (46) गोकुलदास, (47) हरिहरानन्द,
(48) शिवाइ, (49) नन्दाइ, (50) परमानन्द :-
श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द।
शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द॥ 49॥
(51) वसन्त, (52) नवनी, (53) गोपाल, (54) सनातन,
(55) विष्णाइ, (56) कृष्णानन्द, (57) सुलोचन :-
वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन।
विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द, सुलोचन॥ 50॥
अनुवाद—नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर,
रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर, श्रीमन्त, गोकुलदास,
हरिहरानन्द, शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द, वसन्त,
नवनी होड़, गोपाल, सनातन, विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द
और सुलोचन—ये सभी श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास
थे॥ 48-50॥
अनुभाष्य—'नवनी होड़'—बड़गाछि-निवासी हरि होड़के
पुत्र राजा कृष्णदास होड़ थे। बड़गाछि (बहिरगाछि) के
निकट शालिग्राममें राजा कृष्णदासके प्रयाससे श्रीनित्यानन्द
प्रभुका विवाह हुआ (भक्तिरत्नाकर 12 तरङ्ग)। नवनी
होड़ राजा कृष्णदासके पुत्र थे। इनकी वंशावली अब
'रुकुणपुर' में है। रुकुणपुर बहिरगाछिसे कुछ दूरीपर है।
ये सब जन्मसे शौक्रदक्षिण राढ़ीय कायस्थ थे, परन्तु
उनमें ब्राह्मण-संस्कार होनेके कारण सभी वर्णोंको दीक्षा
प्रदान करते थे। पहले बड़गाछिमें गङ्गा प्रवाहित होती
थी, अब वह 'काल्शिकी नहर' नामसे प्रसिद्ध है।
'कृष्णानन्द'—35 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48-50॥
(58) कंसारि, (59) रामसेन, (60) रामचन्द्र,
(61) गोविन्द, (62) श्रीरङ्ग, (63) मुकुन्द :-
कंसारि सेन, रामसेन, रामचन्द्र कविराज।
गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द, तिन कविराज॥ 51॥
अनुवाद—कंसारि सेन, रामसेन और रामचन्द्र
कविराज श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे। तीन
कविराज—गोविन्द, श्रीरङ्ग और मुकुन्द भी श्रीनित्यानन्द
प्रभुके किङ्कर थे॥ 51॥
अनुभाष्य—'कंसारि सेन'—गौरगणोद्देशदीपिका 194 और
200 श्लोक—
'रत्नावली' च कमला गुणचूडा सुकेशिनी॥ 194(ख)॥
'कंसारिसेनः' सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः॥ 200(ख)॥
“ये व्रजकी 'रत्नावली' हैं।”
'सदाशिव कविराज'— (चैः चः आदिलीला, 11/38)
का अनुभाष्य द्रष्टव्य है।
'रामचन्द्र कविराज'—खण्डवासी चिरञ्जीव और
सुनन्दाके पुत्र एवं श्रीनिवासाचार्यके शिष्य तथा ठाकुर
नरोत्तमके प्रियबन्धु हैं। नरोत्तम ठाकुरने प्रत्येक जन्ममें
इनके सङ्गकी प्रार्थना की है। गोविन्द कविराज इनके
छोटे भाई हैं। इनकी कृष्णभक्तिको देखकर श्रीजीवगोस्वामी
प्रभुने वृन्दावनमें इन्हें 'कविराज' नाम प्रदान किया था।
ये जन्मसे ही संसारसे विरक्त थे। ये श्रीनरोत्तम ठाकुर
118 | श्रीचैतन्यचरितामृत