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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 20/40-47 बीसवाँ अध्याय 485
दिन नहीं बीतते। एक-एक क्षणका समय भी एक-एक
युगके समान प्रतीत होता है। जैसे मेघोंसे वर्षा होती
है, वैसे ही मेरे नेत्रोंसे निरन्तर आँसुओंकी वर्षा हो रही
है। गोविन्दके विरहमें सारा संसार शून्य-सा प्रतीत हो
रहा है। इस तुषानलरूपी (भूसीमें लगी अग्निके समान)
विरहाग्निमें सदा-सर्वदा शरीर जल रहा है, परन्तु प्राण
नहीं निकल रहे हैं॥ 40-41 ॥
कृष्ण उदासीन हैला करिते परीक्षण।
सखी सब कहे, – 'कृष्णे कर उपेक्षण ॥' 42 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरी परीक्षा लेनेके लिये मुझसे
उदासीन हो गये हैं। समस्त सखियाँ कह रही हैं, – 'तुम
भी कृष्णकी उपेक्षा करो॥' 42 ॥
एतेक चिन्तिते राधार निर्मल हृदय।
स्वाभाविक प्रेमार स्वभाव करिल उदय ॥ 43 ॥
एकान्त श्रीकृष्णपरतन्त्रा-शिरोमणि
श्रीराधाभावमय महाप्रभु :-
हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि, विनय।
एतभाव एक-ठानि करिल उदय ॥ 44 ॥
एतभावे राधार मन अस्थिर हैला।
सखीगण-आगे प्रौढ़ि-श्लोक ये पड़िला ॥ 45 ॥
अनुवाद—इस प्रकारके चिन्तनने श्रीराधाके निर्मल
हृदयमें स्वाभाविक प्रेमके स्वभावका उदय करवाया।
उनमें हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि और विनय-इतने
भाव एक साथ उदित हो गये। इन भावोंके एक साथ
उदित होनेसे श्रीराधाका मन अस्थिर हो गया। उन्होंने
सखियोंके समक्ष प्रौढ़ि (परिपक्व)-श्लोकका उच्चारण
किया॥ 43-45 ॥
सेइ भावे प्रभु सेइ श्लोक उच्चारिला।
श्लोक उच्चारिते तद्रूप आपने हइला ॥ 46 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके उसी भावमें विभावित होकर
महाप्रभुने उस श्लोकका उच्चारण किया। वे श्लोकका
उच्चारण करते ही स्वयं भी श्रीराधाके समान हो
गये॥ 46 ॥
सिद्धि अथवा साध्यभक्तिकी निष्ठा अर्थात्
एकान्त श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :-
पद्यावलीके 134वें अंकमें उद्धृत
शिक्षाष्टकका आठवाँ श्लोक-
“आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु
मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो
मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अपने चरणोंकी सेवामें अनुरक्त
मुझ दासीको कृष्ण प्रगाढ़ आलिङ्गन करें अथवा पैरोंके
तले रौंद डालें अथवा अदर्शनके द्वारा मर्माहत ही करें,
वे-लम्पट पुरुष, मेरे प्रति जिस प्रकारका भी विधान
क्यों नहीं करें, [तथापि] वे अन्य कोई नहीं, मेरे ही
प्राणनाथ हैं॥ 47 ॥
अनुभाष्य-
सः पादरतां (चरण-सेवैकपरायणां किङ्करीं) मां (राधाम्)
आश्लिष्य (गाढ़तरं समालिंग्य) वा पिनष्टु (आत्मसात् करोतु)
वा अदर्शनात् (विच्छेदात्) मां मर्महतां (मर्मसुप्रपीड़ितां) करोतु
वा, सः लम्पटः (निजेन्द्रियतर्पणसुखाभिनिविष्टः) यथा तथा
विदधातु (यदृच्छया अन्याभिः वल्लभाभिः सह विहरतु वा) तु
(तथापि) सः (कृष्णः) एव मत्प्राणनाथः (मद्दयितः एव),
अपरः न।
श्लोक-भावानुवाद—कृष्ण चरण-सेवापरायण दासी
मुझ राधाको प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा आत्मसात् करें
अथवा विच्छेदके द्वारा मेरे हृदयको सुप्रीड़ित करें,
अथवा वे (निजेन्द्रियतर्पणके सुखमें अभिनिविष्ट) लम्पट
स्वेच्छासे अन्य प्रियतमाओंके साथ विहार करें, तथापि
कृष्ण मेरे प्राणप्रियतम ही हैं, अन्य कोई नहीं ॥ 47 ॥

486 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/48-52 ]
श्लोकके अर्थकी व्याख्या ; “मैं आपकी हूँ, आप मेरे हैं,
अन्य किसी वस्तुकी क्या आवश्यकता है?” :-
आमि—कृष्णपद-दासी, तेंहो—रससुखराशि,
आलिङ्गिया करे आत्मसाथ।
किवा ना देय दरशन, ना जाने मोर तनु-मन,
तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥48॥
अनुवाद—सखि! मैं तो श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी
दासी हूँ और वे रसिकशेखर सुखके सागर हैं। वे
प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा मुझे आत्मसात् करें अथवा
अपने दर्शन न देकर मर्मान्तिक पीड़ा प्रदान करें,
तथापि वे मेरे प्राणनाथ ही हैं॥48॥
सखि हे, शुन मोर मनेर निश्चय।
किवा अनुराग करे, किवा दुख दिया मारे,
मोर प्राणेश्वर—कृष्ण, अन्य नय॥49॥
अनुवाद—हे सखि, मेरे मनके निश्चयको सुनो।
श्रीकृष्ण मेरे प्रति अपने अनुरागको प्रकट करें अथवा
मुझे दुःख देकर मार डालें, तथापि श्रीकृष्ण ही मेरे
प्राणेश्वर हैं, अन्य कोई नहीं॥49॥
मदीयत्व और तदीयत्व-स्नेह, अथवा मधु और घृत
स्नेह-माधुर्य-वैचित्र्य-वर्णन; उनके साथ मेरे सुखकालमें
भी कृष्णेन्द्रिय-तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :-
छाड़ि' अन्य नारीगण, मोर वश तनुमन,
मोर सौभाग्य प्रकट करिया।
ता-सबारे देय पीड़ा, आमा-सने करे क्रीड़ा,
सेइ नारीगणे देखाञा॥50॥
उनके विरहमें मेरे दुःखकालमें भी श्रीकृष्णकी
इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :-
किवा तेंहो लम्पट, शठ, धृष्ट, सकपट,
अन्य नारीगण करि' साथ।
मोरे दिते मनःपीड़ा, मोर आगे करे क्रीड़ा,
तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥51॥
अनुवाद—मेरे सौभाग्यको प्रकटकर यदि श्रीकृष्ण
अन्य रमणियोंको त्यागकर मेरे तन और मनके
सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होवें और उन रमणियोंको
दिखला-दिखलाकर उनके सामने मेरे साथ क्रीड़ा करके
उन सबको पीड़ा दें अथवा वे लम्पट, शठ, धृष्ट,
कपटी श्रीकृष्ण अन्य रमणियोंको अपने साथ लेकर मेरे
मनको पीड़ा प्रदान करनेके लिये मेरे समक्ष उनके साथ
क्रीड़ा करें, तब भी वे ही मेरे प्राणनाथ हैं॥50-51॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मोरे वश तनुमन',—काय और
मनके एकान्त बाध्य॥50॥
एकान्तिकी कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा—'तुम्हारी सेवा करनेमें
जितना भी दुःख मिले, वही परम सुख हैं' :-
ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख,
ताँर सुख—आमार तात्पर्य।
मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महासुख,
सेइ दुःख—मोर सुखवर्य॥52॥
अनुवाद—मुझे अपने कष्टोंकी तनिक भी चिन्ता
नहीं है, मैं सदा-सर्वदा श्रीकृष्णके सुखकी कामना
करती हूँ। उन्हें सर्वप्रकारसे सुखी रखना ही मेरे
जीवनका मूल उद्देश्य है। यदि मुझे दुःख देनेसे उन्हें
सुख मिले, तो वह दुःख ही मेरे लिये परम सुख
है॥52॥
अनुभाष्य—भक्त अपने सुख-दुःखको नहीं गिनता;
जिससे श्रीकृष्णके सुखका उदय होता है, वह उसके
लिये ही अखिल चेष्टायुक्त रहता है। श्रीकृष्णके सुखके
उदयके अतिरिक्त भक्तका अपना स्वतन्त्र सुख अन्य
कुछ भी नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा भक्तको दुःख देकर
महासुखी होनेपर, भक्त उस प्रकारके दुःखको ही
सर्वोत्तम निज-सुख मानता है। प्राकृत रसिकाभिमानी
अतत्त्वज्ञ सहजिया-सम्प्रदायमें कोई-कोई अपने सुखकी
अभिलाषाको ही इच्छित फल मानते हैं, कोई प्राकृतसुखकी
अपेक्षा कृष्णसेवाके उपलक्षमें 'स्वयं ही अधिकतर
सुखभोग करूँगा',—आदि नाना प्रकारके स्वसुखभोग-

[ 20/52 बीसवाँ अध्याय 487
तात्पर्यमय कर्मकाण्डको ही अपनी भजन-चेष्टाका
'फल' मानते हैं। वास्तवमें उनकी इस प्रकारकी चेष्टा
और कल्पना-शुद्धभजनके विषयमें कपटतामूलक
अनभिज्ञताका ही फलमात्र है॥ 52 ॥
अमृतानुकणिका-श्रीजीव गोस्वामीने प्रीति-सन्दर्भमें
प्रीतिके तीन लक्षण बतलाये हैं-

  1. स्वरूप-लक्षण-'विषयानुकूल्यात्मक'-प्रीतिके विषय
    श्रीकृष्णके अनुकूल जो उन्हें सुखकर हो अथवा
    श्रीकृष्णको प्रीतिकर हो जिसके द्वारा कृष्ण प्रसन्न हों,
    भक्तका यही एकमात्र ध्येय होता है।
  2. तटस्थ-लक्षण (क)-'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा
    अर्थात् भक्तकी जितनी भी स्पृहाएँ होती हैं, वे
    श्रीकृष्णके सुखके लिये होती हैं।
  3. तटस्थ-लक्षण (ख)-'तदनुभव-हेतुकोल्लास'-ज्ञान।
    जैसे यशोदाजी कृष्णको गोदीमें लेकर प्यार कर रही
    हैं। शिशु कृष्णके अभी दो दाँत ही निकले हैं और
    वे मुस्कुराने लगे। कृष्णको मुस्कराते देखकर यशोदाजीकी
    प्रीति और वर्धित हो गयी और उनका मन उल्लाससे
    भर गया। कृष्णको प्रसन्न देख करके यशोदाजीको जो
    प्रसन्नता होती है, उसको अनुभव-हेतुकोल्लासमय ज्ञान
    कहते हैं।
    'विषयानुकूल्यात्मक'-श्रीकृष्ण-प्रीतिके आश्रय भक्तोंकी
    अनुकूल भावसे श्रीकृष्णैक-सुखतात्पर्यमयी चेष्टाएँ होती
    हैं, उसके विरोधमें उनका कोई भी कार्य नहीं होता।
    साधकको भी कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जो
    श्रीकृष्ण, गुरु अथवा वैष्णवोंके लिये प्रीतिकर नहीं हो।
    यशोदाजीका कृष्णके प्रति अनुकूल भाव है। किन्तु
    कभी वे कृष्णके लिये ही उनको छोड़कर दूधकी रक्षा
    अथवा रसोईकी व्यवस्था करने चली जाती हैं। यद्यपि
    उनके ऐसे कार्यसे कृष्ण रोने लगते हैं, तथापि यह
    प्रतिकूल भाव नहीं है। यशोदाजी यह समझती हैं कि
    कृष्ण अभी अबोध बालक है, उसको पूरा ज्ञान नहीं
    है। वे ये सब कार्य भी कृष्णके अनुकूल भावसे ही
    करती हैं। कभी राधाजी कृष्णको छोड़कर चली जा
    रही हैं और कृष्ण उन्हें रोकनेका प्रयास कर रहे हैं,
    परन्तु वे रुक नहीं रहीं। यह भी कृष्णके सुखके लिये
    है। यह राधाजीका जो वक्र भाव है जिसे 'मान' कहते
    हैं, यह प्रेमका ही विकार है। अनुकूल भावसे ही
    कृष्णसेवा उनके प्राण-स्वरूप है, यह प्रीतिका स्वरूप-
    लक्षण है।
    'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा अर्थात् भक्तमें कृष्णको पानेकी
    इच्छा होती है जिसके द्वारा वह श्रीकृष्णकी सेवा करके
    उनको प्रसन्न कर सके। इसलिये श्रीकृष्णसे मिलनेकी
    लालसा उत्पन्न होना एक तटस्थ लक्षण है।
    जैसे श्रीकृष्ण द्वारकामें हैं और गोपियाँ उनसे बहुत
    दूर वृन्दावनमें हैं। उनको श्रीकृष्णसे मिलने की लालसा
    क्यों होती है? द्वारकामें श्रीकृष्णने सोलह हजार
    महिषियोंके साथ विवाह किया है और यदि वे बहुत
    आनन्दसे उनके साथमें रह रहे हैं, तो गोपियाँ उनसे
    मिलनेके लिये क्यों इतनी आतुर हैं? यद्यपि राधाजी
    कहती हैं-'ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर
    सुख',-तो श्रीकृष्ण द्वारकामें आनन्दसे रहें। तथापि
    राधाजीकी सब समय श्रीकृष्णसे मिलनेकी स्पृहा है।
    यदि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जीवन द्वारकामें ही सुखसे रहें
    और गोपियोंसे कभी भी न मिलें, तो क्या गोपियाँ या
    राधाजी प्रसन्न होंगी? उनका क्या ऐसा विचार होगा कि
    श्रीकृष्णका द्वारकामें सब समय सुखमय जीवन हो और
    हमको उनका विरह हो, क्योंकि विप्रलम्भ रस सबसे
    श्रेष्ठ है? तो क्या ऐसा विप्रलम्भ भाव भक्तोंको और
    व्रजवासियोंको चाहिये कि भले ही श्रीकृष्ण हमको न
    मिले और वे सदा ही द्वारकामें रहें, हम उनसे मिलना
    नहीं चाहते, वे सदा वहीं प्रसन्न रहें? नहीं। इसलिये
    प्रियताका 'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा तटस्थ लक्षण भी
    अवश्य उसके साथ रहेगा। राधाजी और व्रजवासियोंकी
    श्रीकृष्णसे मिलनेकी उत्कण्ठा सदा रहेगी और मिलना
    चाहते हैं, किसलिये? इसलिये कि वे श्रीकृष्णकी सेवा
    कर सकें और उनको प्रसन्न कर सकें।

488 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/52 ]

श्रीकृष्ण यदि दूर हैं, तो वे कैसे प्रसन्न करेंगे? यदि
श्रीकृष्ण सब समय ही यशोदाजी से दूर रहें, तो वे
कैसे उनकी सेवा करेंगी? यशोदाजी कृष्णको अपनी
गोदमें लेकर प्यार करना चाहती हैं। कभी-कभी उनके
लिये इसलिये रोती हैं कि वह मक्खन नहीं चुराता, मैं
उसकी कमर नहीं बाँधती। विरहमें रोते समय कहती
हैं,-'अहो! कृष्ण कितना चञ्चल था। उसकी यह
चञ्चलता कितनी प्यारी लगती थी। मेरी सखियाँ
आकर उलाहना देती थीं कि कृष्ण हमारे घरमें आकर
मक्खन चोरी करता है और मक्खन नहीं मिलता तो
मटकी फोड़ देता है, कभी बछड़ोंको असमयमें खोल
देता है। मुझे और रोहिणीको दिनभर व्यस्त रखता था।
कभी इधर जाता था, कभी उधर जाता था, कभी
बन्दरको पकड़ लेता था, कभी किसी साँडके सींगको
पकड़ लेता था और कभी लटकती हुई तलवारको
पकड़ लेता था। मैं इधर आती थी, तो वह उधर कुछ
उत्पात करता था।' तो यशोदाजी को यह अच्छा लगता
था या बुरा? उनको बहुत अच्छा लगता था। वे कभी
थोड़ा क्रोध करती थीं कि मैं दिन भर तुम्हारे कारण
व्यस्त रहती हूँ, कुछ देर शान्त नहीं बैठ सकते हो?
और जब श्रीकृष्ण द्वारका चले गये, तब यशोदाजी उन
सब लीलाओंका चिन्तन करके कितने दुःखसे रोती हैं
कि वह सब समय हमको व्यस्त रखता था। परन्तु जब
तक श्रीकृष्ण निकट नहीं रहेंगे, तब तक सेवा नहीं
होगी।
श्रीकृष्ण दूर रहें अथवा निकट रहें-उनको प्रसन्न
करनेकी जो क्रिया होती है-यह प्रियताका स्वरूप
लक्षण है। उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा किसलिये
होती है? इसलिये कि उसके द्वारा उनकी अनुकूल
रूपसे सेवा करनेका सुयोग मिलता है-यह प्रियताका
तटस्थ लक्षण है। यदि किसी व्यक्तिके अन्दरमें
श्रीकृष्णको पानेका भाव नहीं है कि वे दूर रहें या कहीं
भी रहें, वे प्रसन्न रहें, तो ऐसे व्यक्तिमें कभी भी
प्रेमाभक्ति या सेवाका भाव नहीं होता।
भगवान् हमें मिलें या न मिलें, जब वे प्रसन्न होंगे
तो आ जायेंगे। हम लोगोंको कोई चिन्ता करने अथवा
साधन-भजन करनेकी आवश्यकता नहीं हैं, केवल वे
प्रसन्न रहें-ऐसा ब्रह्मवादी लोगोंका विचार होता है।
किन्तु प्रियजनके प्रतिकूल या अपने सुखके लिये
उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा भी प्रियताके प्रतिकूल
है। जैसे ध्रुव महाराजको भगवान्‌को प्राप्त करनेकी
लालसा हुई, किन्तु केवल विशाल राज्यकी प्राप्तिके
लिये, उनकी सेवा करनेके भावसे नहीं। यह प्रियता
नहीं है।
यदि प्रियजनको मिलनेसे उनके सुखमें कोई बाधा
होती है, तब उस अवस्थामें साधक या कोई भी व्यक्ति
उनसे मिलना नहीं चाहता, यह प्रियताका प्रतिकूल भाव
है।
इस विषयमें एक और भी विचार है-यदि श्रीकृष्ण
अथवा गुरुके मिलनेसे हमारे सुखमें बाधा आ जाय, तो
उस समय उनसे मिलनेकी लालसा नहीं होती। जैसे
किसी शिष्यकी लोग प्रशंसा कर रहे हैं, उसको उपहार
दे रहे है और उस समय वहाँ गुरुजी आयें, तो
शिष्यको छोड़कर सभी गुरुजीको प्रणाम करके उनका
सम्मान करेंगे। तब उस शिष्यके मनमें यह भावना
आयेगी कि गुरुजी नहीं आते तो अच्छा होता। जैसे
सभामें बृहस्पतिजीके आनेपर इन्द्रने किया था। (भाः
6/7/7-8)-
स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह।
नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥ 7 ॥
वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्।
नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागताम् ॥ 8 ॥
[अर्थात् “इसी समय देवताओंके और स्वयं देवराज
इन्द्रके परमगुरु एवं सुर-असुर सभीके पूजनीय मुनिश्रेष्ठ
बृहस्पति सभामण्डलमें उपस्थित हुए। अपने सम्मुख
देवगुरु बृहस्पति को आया देखकर भी देवराज इन्द्र
अपने सिंहासनसे नहीं उठे और न ही उन्हें आसनादि
प्रदान करके उनका अभिनन्दन किया। यहाँ तक कि

[ 20/52–55
बीसवाँ अध्याय
489
गुरुके प्रति गौरव प्रदर्शनके लिये किञ्चित्मात्र भी
हिले-डुले नहीं।”]
किन्तु जब श्रीकृष्णके आनेपर उनकी सेवामें बाधा
होगी, तब शुद्धभक्तोंमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी लालसा नहीं
होती। यदि श्रीकृष्ण द्वारकासे वृन्दावन आयें और एक
कुञ्जमें बैठकर शोक कर रहे हों कि मैं माता-पिताको
(देवकी-वसुदेवको), सोलह हजार महिषियों आदि
निजजनोंको छोड़कर यहाँ क्यों आया? तब वृन्दावनवासी
भक्तजनोंके हृदयमें ऐसी भावना आयेगी कि यदि हमारी
सेवाके द्वारा अथवा हमसे मिलनेमें आपको कोई क्लेश
है, तो आप द्वारकामें चले जाइये। इसलिये राधाजी कह
रही हैं,—‘ना गणि----सेई दुख मोर सुखवर्य'—आपके
विरहका दुःख हमारे लिये परम सुख है। राधाजीका
भाव यही है कि किसी भी प्रकारसे श्रीकृष्णको प्रसन्नता
होनी चाहिये।
राधाजीने उद्धवजीको कहा था,—'यदि कृष्ण हमें
छोड़ सकते है, तो हम उनको क्यों नहीं छोड़ सकती
हैं? हमने भी उनको छोड़ दिया। आप मथुरामें जाकर
उनसे कहना कि गोपियाँ व्रजमें बहुत आनन्दसे रह रही
हैं। हे उद्धव, मैं जानती हूँ कि आपने यहाँ जो हमारी
दशा देखी है, उसे कृष्णसे कहोगे। किन्तु उनको यह
सब एक बारमें ही मत कहना। एक दिन थोड़ीसी बात
कहना, पुनः कुछ-कुछ दिनोंके बाद थोड़ीसी अन्य-अन्य
बातें कहना। पुराना कपड़ा पानीमें भीगनेपर निचोड़नेसे
फट जाता है, इसलिये एक साथमें सब कुछ मत
कहना। कृष्णका हृदय बड़े दुःखसे जर्जर हो चुका है।
यदि वे दुःख पायेंगे तो उनका हृदय टूट जायेगा।'
राधाजीका श्रीकृष्णके प्रति इतना उन्नत प्रेम है, उद्धवजीकी
ऐसी धारणा ही नहीं थी।
इसलिये यदि प्रियतमको या हमारे विषय श्रीकृष्णको
हमसे मिलनेसे कष्ट होगा, तो हमें ऐसी अभिलाषा नहीं
है और यदि उनको सुख है, तो हम उनसे मिलेंगे।
प्रियतामें प्रथम लक्षण है—श्रीकृष्णको सुख हो, ऐसी
क्रिया। द्वितीय लक्षण है—उनसे मिलनेकी लालसा,
जिसके द्वारा उनकी सेवा कर सकें और तृतीय लक्षण
है—उनकी सेवाके लिये चिन्ता करनेमें परम उल्लास
हो। प्रथम लक्षण मूल लक्षण है और अन्य दो तटस्थ
लक्षण हैं। इनके सम्मिलनसे प्रियता होती है।—“श्रील
भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 52 ॥
निरन्तर श्रीकृष्णेन्द्रिय-तर्पण अथवा
श्रीकृष्ण-सुखवर्धन चेष्टा :-
ये नारीरे वाञ्छे कृष्ण, तार रूपे सतृष्ण,
तारे ना पाञा हय दुःखी।
मुइ तार पाये पड़ि', लञा याङ हाते धरि',
क्रीड़ा कराञा ताँरे करौं सुखी ॥ 53 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण जिस नारीके रूपके प्रति सतृष्ण
होकर उसकी अभिलाषा करते हैं, परन्तु उसे प्राप्त
नहीं कर पानेके कारण दुःखी होते हैं, मैं उस नारीके
चरणोंमें पड़कर उसके हाथोंको पकड़कर श्रीकृष्णके
पास ले जाऊँगी और श्रीकृष्णकी उसके साथ क्रीड़ा
करवाकर मैं उन्हें प्रसन्न करूँगी ॥ 53 ॥
कान्ता कृष्णे करे रोष, कृष्ण पाय सन्तोष,
सुख पाय ताड़न-भर्त्सने।
यथायोग्य करे मान, कृष्ण ताते सुख पान,
छाड़े मान अल्प-साधने ॥ 54 ॥
श्रीकृष्णकी सम्भोग-कामिनीका तिरस्कार :-
सेइ नारी जीये केने, कृष्ण-मर्म नाहि जाने,
तबु कृष्णे करे गाढ़ रोष।
निज-सुखे माने लाभ, पड़ुक तार शिरे बाज,
कृष्णेर मात्र चाहिये सन्तोष ॥ 55 ॥
अनुवाद—कान्ता यदि श्रीकृष्णके प्रति रोष प्रदर्शित
करती है, तो श्रीकृष्ण उससे सन्तुष्ट होते हैं। वे
कान्ताके द्वारा डाँट-फटकार और तिरस्कार करनेपर
प्रसन्न होते हैं। जब कान्ता यथायोग्य मान करती है,
तब श्रीकृष्णको सुख प्राप्त होता और उनके थोड़े
प्रयाससे ही कान्ता अपने मानको छोड़ देती है। किन्तु

490 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/54-58 ]
जो नारी कृष्णके मर्मको नहीं जानकर कृष्णके प्रति
गाढ़ रोष करती है, वह जीवित ही क्यों रहती है? जो
अपने सुखमें ही लाभ मानती है, उसके सिरपर तो वज्र
पड़ना ही चाहिये। मैं तो केवल श्रीकृष्णका ही सन्तोष
चाहती हूँ॥ 54-55॥
अनुभाष्य-जो भक्त अपने सुखमें अपनेको कृतार्थ
मानता है, उसका सर्वनाश हो जाता है, वह प्राकृत
सम्भोग-परायण सहजिया 'अभक्त' हो जाता है॥ 54-55॥
श्रीकृष्णका सुख विधान करनेवाली अपने
प्रतिकूल श्रीकृष्णसेविकाका भी आदर :-
ये-गोपी मोर करे द्वेषे, कृष्णेरे करे सन्तोषे,
कृष्ण यारे करे अभिलाष।
मुइ तार घरे याञा, तारे सेवों दासी हञा,
तबे मोर सुखेर उल्लास॥ 56॥
अनुवाद-जो गोपी श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करती है
और श्रीकृष्ण भी उसकी अभिलाषा करते हैं, किन्तु
वह मुझसे द्वेष करती है, तथापि मैं उस गोपीके घरमें
जाकर उसकी दासी बनकर उसकी सेवा करूँगी, तभी
मेरा सुख वर्धित होगा॥ 56॥
कोढ़-रोगी ब्राह्मणकी पत्नीके पतिव्रता-धर्मका वर्णन :-
कुष्ठी-विप्रेर रमणी, पतिव्रता-शिरोमणि,
पति लागि' कैल वेश्यार सेवा।
स्तम्भिल सूर्येर गति, जीवाइल मृत पति,
तुष्ट कैल मुख्य तिन देवा॥ 57॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कहा जाता है कि किसी
कोढ़से ग्रस्त ब्राह्मणकी पतिव्रता स्त्रीने पतिकी सन्तुष्टिके
लिये पतिकी प्रिया वेश्याकी सेवा की थी; पतिकी
मृत्युके समय पातिव्रत्यके बलसे उसने सूर्यकी गतिको
रोककर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर-इन तीन देवताओंको
सन्तुष्ट करके अपने मृत पतिको जीवित किया था।
तात्पर्य यह है कि कृष्णके प्रति दृढ़-पातिव्रत्य ही
जीवका शृङ्गाररससे उत्पन्न उत्तम धर्म है॥ 57॥
अनुभाष्य-आदित्य-पुराणमें और मार्कण्डेय-पुराण
(15/19)में एवं पद्मपुराणमें उल्लिखित है कि किसी
कोढ़ी ब्राह्मणकी पतिव्रता-शिरोमणि पत्नीने अपने अयोग्य
कोढ़ी पतिकी वासनाकी परितृप्तिके लिये पापके वासस्थान
वेश्याके भवनको शुद्ध करके वेश्याके साथ अपने
निकम्मे कामुक पतिके सम्मिलनका प्रयास किया था।
वेश्याके द्वारा उसकी बातको मान लेनेपर पतिव्रता
ब्राह्मणी अपने कोढ़ी पतिको उसकी इच्छानुसार वेश्यालयमें
ले गयी। वह कोढ़ी पापी नाममात्रका ब्राह्मण पतिव्रता
पत्नीकी निष्ठाको देखकर अन्तमें पापसे सम्पूर्ण रूपसे
निवृत्त होकर जब रात्रिमें अपने घर लौट रहा था, तब
माण्डव्य-ऋषिके शरीरसे उसके पैरके स्पर्श होनेपर
ऋषिने उसे अभिशाप दिया। पतिव्रता ब्राह्मणीने जब
सुना कि उसके पतिके अनजानेमें किये गये कर्मसे
समाधिके भङ्ग होनेके कारण ऋषिने क्रोधित होकर
'सूर्योदयके बाद ही उसके प्राण छूट जायेंगे' ऐसा
कहकर अभिशाप दिया है एवं उसके फलस्वरूप
पतिव्रता होनेपर भी उसका विधवा बनना अवश्यम्भावी
है, तब उसके निवारणके लिये उसने सूर्योदयको स्थगित
करनेकी प्रतिज्ञा की। उसके इस प्रयासको देखकर
ब्रह्मा, विष्णु और शिव,-इन प्रधान तीन देवोंने उसके
पास आकर पतिव्रताकी पति-परायणतासे सन्तुष्ट होकर
उसके पतिके पुनः स्वस्थ होने और नवजीवन प्राप्तिकी
व्यवस्था कर दी। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार अपने
स्वार्थसे रहित होकर केवल पातिव्रत्य ही (केवल-सेव्यके
सुखकी वाञ्छा ही) शुद्धभक्तजनोंके लिये उचित है॥ 57॥
“कृष्णप्रेमभावित-चित्त-इन्द्रियकाया” :-
कृष्ण-मोर जीवन, कृष्ण-मोर प्राणधन,
कृष्ण-मोर प्राणेर पराण।
हृदय-उपरे धरौं, सेवा करि' सुखी करौं,
एइ मोर सदा रहे ध्यान॥ 58॥

[ 20/58-64 बीसवाँ अध्याय 491

अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरे जीवन स्वरूप हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणधन हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणोंके भी प्राण हैं। मैं श्रीकृष्णको सदा अपने हृदयमें धारण करती हूँ, उनकी सेवा करके उन्हें सुखी करूँ, यह बात ही सदा मेरे ध्यानमें रहती है॥58॥

अनुवाद—श्रीराधाके ये वचन विशुद्ध प्रेमके लक्षण प्रकाशित करनेवाले हैं, श्रीगौरसुन्दर उन्हींका आस्वादन कर रहे थे। श्रीराधाकी भावावस्थामें होनेके कारण उनका मन अस्थिर हो गया, उनके सम्पूर्ण शरीरमें सात्त्विक भाव प्रकट हो गये और वे अपने मन एवं देहको धारण नहीं कर पा रहे थे॥61॥

समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसुखका विधान और निरन्तर श्रीकृष्ण-किङ्करी होनेका अभिमान :—

मोर सुख—सेवने, कृष्णेर सुख—सङ्गमे,
अतएव देह देङ दान।
कृष्ण मोरे ‘कान्ता’ करि’, कहे मोरे ‘प्राणेश्वरी’,
मोर हय ‘दासी’-अभिमान॥59॥

श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छामें आत्मेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छाका अभाव; स्वभजन-विप्रलम्भ-प्रयोजनावतार महावदान्य श्रीगौरका शिक्षाष्टकके द्वारा जीवको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक श्रीमद्भागवतके फलके सारका वितरण :—

व्रजेश्वर-शुद्धप्रेम,— येन जाम्बुनद-हेम,
आत्मसुखेर याँहा नाहि गन्ध।
स्व-प्रेम जानांते लोके, प्रभु कैला एड् श्लोके,
पद कैला अर्थेर निर्बन्ध॥62॥

अनुवाद—मेरा सुख श्रीकृष्णकी सेवा करनेमें है और श्रीकृष्णका सुख मुझसे मिलनेमें है, इसलिये मैं श्रीकृष्णको अपनी देह समर्पित करती हूँ। कृष्ण मुझे अपनी कान्ता मानकर अपनी प्राणेश्वरी कहते हैं, किन्तु मैं स्वयंको उनकी दासी ही मानती हूँ॥59॥

अनुवाद—श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति विशुद्धप्रेम जाम्बुनदीके सोनेकी भाँति है, उसमें आत्म-सुखकी गन्ध तक भी नहीं है। अपने उसी प्रेमका इस जगत्में प्रचार करनेके लिये महाप्रभुने (शिक्षाष्टकके) आठवें श्लोककी रचना की और उसके गूढ़ अर्थको प्रकाशित करनेवाले पदोंकी रचना की॥62॥

सम्भोगकी अपेक्षा सेवामें ही सेविकाकी असीम प्रीति :—

कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर,
ताते साक्षी—लक्ष्मी ठाकुराणी।
नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति,
सेवा करे ‘दासी’-अभिमानी॥"60॥

अनुभाष्य—पाठान्तरमें, 'व्रजेर विशुद्धप्रेम' (व्रजका विशुद्ध प्रेम), पाठान्तरमें, 'से-प्रेम' (वह-प्रेम)॥62॥

एइमत महाप्रभु भावाविष्ट हञा।
प्रलाप करिला किछु श्लोक पड़िया॥63॥

अनुवाद—कान्त-सेवा सुखकी पूर्ण अवधि है, सेवा-सुख सङ्गमसे भी अधिक मधुर है, इसकी साक्षी लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि वे नारायणके हृदयमें स्थित रहती हैं, तथापि नारायणकी चरणसेवा ही उनकी अभिलाषा है। इसलिये वे स्वयंको नारायणकी दासी मानकर उनकी सेवा करती हैं॥"60॥

अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भावमें आविष्ट हो गये। उन्होंने प्रलाप करते हुए कुछ श्लोक पढ़े॥63॥

इस शिक्षाष्टकके स्वयं ही आस्वादक और स्वयं ही प्रचारक :—

श्रीराधा-भावमय महाप्रभुके द्वारा केवल प्रेम-आस्वादन :—

एइ राधार वचन, शुद्ध प्रेम-लक्षण,
आस्वादये श्रीगौर-राय।
भावे मन नहे स्थिर, सात्त्विके व्यापे शरीर,
मन-देह धारण ना याय॥61॥

पूर्वे अष्ट-श्लोक करि’ लोके शिक्षा दिला।
सेइ अष्ट-श्लोक आपने आस्वादिला॥64॥

492 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/64-72 ]
अनुवाद-पहले महाप्रभुने आठ श्लोकोंकी रचना करके लोगोंको उसकी शिक्षा प्रदान की। और फिर उन्होंने स्वयं भी उन आठ श्लोकोंकी व्याख्या करके उनका आस्वादन किया॥ 64॥
'श्रीशिक्षाष्टक'के श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
प्रभुर् 'शिक्षाष्टक'-श्लोक येइ पड़े, शुने।
कृष्णे प्रेमभक्ति तांर बाड़े दिने दिने ॥ 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा रचित 'शिक्षाष्टक'के श्लोकोंको जो व्यक्ति पढ़ता और सुनता है, उसके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेमभक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है॥ 65॥
पूर्णचन्द्रके उदित होनेपर समुद्रके उफननेके समान अतुल गम्भीरता होनेपर भी विप्रलम्भसे उत्पन्न दिव्योन्माद-महाभावमें महाप्रभुकी सदैव अस्थिरता :-
यद्यपि प्रभु-कोटिसमुद्र-गम्भीर।
नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन अस्थिर ॥ 66 ॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु करोड़ों समुद्रोंसे भी अधिक गम्भीर थे, तथापि अनेक भावरूपी चन्द्रमाओंके उदित होनेपर वे अस्थिर हो जाते थे॥ 66॥
महाभागवत, मुक्त, परमहंसगणोंके नित्य आस्वाद्य और विप्रलम्भ भावमें आविष्ट महाप्रभुकी प्रिय ग्रन्थावली :-
येइ येइ श्लोक जयदेव, भागवते।
रायेर नाटके, येइ आर कर्णामृते ॥ 67 ॥
सेइ सेइ भावे श्लोक करिया पठने।
सेइ सेइ भावावेशे करेन आस्वादने ॥ 68 ॥
अनुवाद-जो-जो श्लोक श्रीजयदेवके गीत-गोविन्दमें, श्रीमद्भागवतमें, श्रीरायरामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटकमें और श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर कृत श्रीकृष्णकर्णामृतमें वर्णित हैं, महाप्रभु उन-उन भावोंके अनुरूप श्लोकोंका पाठ करके उन-उन भावोंके आवेशमें उनका आस्वादन करते थे॥ 67-68॥
अनुभाष्य— 'जयदेव,'-अर्थात् उनके द्वारा रचित अष्टपदी अथवा गीतगोविन्द ॥ 67 ॥
अन्तिम बारह वर्षोंकी अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमका आस्वादन :-
द्वादश वत्सर ऐछे दशा-रात्रि-दिने।
कृष्णरस आस्वाद्ये दुइबन्धु-सने ॥ 69 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी बारह वर्षों तक रात-दिन ऐसी ही दशा थी। वे अपने दो बन्धुओंके (श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामStore/रामानन्दके) साथ कृष्णरसका आस्वादन करते थे॥ 69॥
साक्षात् भगवान् शेष-विष्णुकी भी महाप्रभुकी श्रीकृष्णप्रेम-दशाके वर्णनमें असमर्थता :-
सेइ रस-लीला सब आपने अनन्त।
सहस्र-वदने वर्णि' नाहि पांन अन्त ॥ 70 ॥
महासुकृतिके फलसे जीव उस सागरकी एक बूँदके स्पर्शसे धन्य :-
जीव क्षुद्रबुद्धि कोन् ताहा पारे वर्णिते?
तार एक कणा स्पर्शि आपना शोधिते ॥ 71 ॥
ग्रन्थके बड़े हो जानेके भयसे महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विश्राम :-
यत चेष्टा, यत प्रलाप,-नाहि पारावार।
से-सब वर्णिते ग्रन्थ हय सुविस्तार ॥ 72 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी उन लीलाओंके रसका स्वयं अनन्त भी अपने सहस्र मुखोंके द्वारा वर्णन करके अन्त नहीं पाते। तब फिर क्षुद्रबुद्धिवाला कोई जीव कैसे उस लीला-रसका वर्णन कर सकता है? मैं तो स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे ही उसके एक कणका स्पर्श कर रहा हूँ। महाप्रभुकी जितनी चेष्टाएँ और जितने प्रलाप हैं, उनका कोई अन्त नहीं है। उन सबका वर्णन करनेसे ग्रन्थका बहुत विस्तार हो जायेगा॥ 70-72॥

[ 20/73-83 बीसवाँ अध्याय 493
चैतन्यभागवतमें विस्तृत वर्णन-हेतु इस ग्रन्थमें संक्षेपमें
वर्णित, वहाँ संक्षेपमें वर्णन-हेतु यहाँपर विस्तृत वर्णित :-
वृन्दावन-दास प्रथम ये लीला वर्णिल।
सेइसब लीलार आमि सूत्रमात्र कैल॥ 73 ॥
ताँर त्यक्त 'अवशेष' संक्षेपे कहिल।
लीलार बाहुल्ये ग्रन्थ तथापि बाड़िल ॥ 74 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने पहले जिन
लीलाओंका श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है,
मैंने उन समस्त लीलाओंको केवल सूत्ररूपमें ही लिखा
है। मैंने उनके द्वारा बची हुई महाप्रभुकी लीलाओंका
संक्षेपमें वर्णन किया है, तथापि लीलाओंके आधिक्यके
कारण ग्रन्थका विस्तार हो गया है॥ 73-74 ॥
अतएव सेइसब लीला ना पारि वर्णिवारे।
समाप्त करिलुँ लीला करि' नमस्कारे ॥ 75 ॥
ये किछु कहिलुँ एइ दिग्दर्शन।
एइ अनुसारे हवे तार आस्वादन ॥ 76 ॥
स्वयं श्रीचैतन्यकी इच्छासे परिचालित होनेपर भी
ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
प्रभुर गम्भीर लीला ना पारि बुझिते।
बुद्धि-प्रवेश नाहि, ताते ना पारि वर्णिते ॥ 77 ॥
अनुवाद-अतएव मेरे लिये महाप्रभुकी समस्त
लीलाओंका वर्णन करना सम्भव नहीं है, इसलिये मैं
उनकी लीलाओंको नमस्कार करके इस ग्रन्थको समाप्त
कर रहा हूँ। मैंने अभी तक जो कुछ वर्णन किया
है, वह उन लीलाओंका दिग्दर्शन मात्र है, इसके
अनुसार ही भक्तगण उन लीलाओंका आस्वादन करेंगे।
मैं महाप्रभुकी गम्भीर लीलाओंको नहीं समझ पाया, मेरी
बुद्धिका उन लीलाओंमें प्रवेश नहीं है, इसलिये मैं
उनका वर्णन नहीं कर पाया॥ 75-77 ॥
मानद ग्रन्थकारके द्वारा श्रोतृवर्गकी वन्दना :-
सब श्रोता-वैष्णवेर वन्दिया चरण।
चैतन्यचरित्र-वर्णन कैलुँ समापन ॥ 78 ॥
अनुवाद-मैं समस्त श्रोता-वैष्णवोंके चरणोंकी वन्दना
करके चैतन्यचरित्रका वर्णन समाप्त कर रहा हूँ॥ 78 ॥
अलौकिक अधोक्षज श्रीगौरलीला-सिन्धु-बद्धजीवके स्पर्शसे
परे, जीवके अभिमानमें दैन्यसे भरकर ग्रन्थकारके द्वारा
उसके बिन्दुको स्पर्श करनेकी चेष्टा-मात्र :-
आकाश-अनन्त, ताते यैछे पक्षीगण।
यार यत शक्ति, तत करे आरोहण ॥ 79 ॥
ऐछे महाप्रभुर लीला नाहि ओर-पार।
'जीव' हञा केबा सम्यक् पारे वर्णिवार ? ॥ 80 ॥
अनुवाद-आकाश अनन्त है और जिस पक्षीकी
जितनी शक्ति होती है, वह आकाशमें उतनी ऊँचाई
तक उड़ता है। ऐसे ही महाप्रभुकी लीलाओंका भी
ओर-छोर नहीं है, तब साधारण जीव कैसे उसका
सम्पूर्ण रूपसे वर्णन कर सकता है? 79-80 ॥
अनुभाष्य-भा: 1/18/23 श्लोक देखें॥ 79 ॥
यावत् बुद्धिर गति, ततेक वर्णिलुँ।
समुद्रर मध्ये येन एक कण छुँइलुँ ॥ 81 ॥
अनुवाद-मेरी बुद्धिकी जहाँ तक गति है, मैंने
महाप्रभुकी लीलाओंका वहाँ तक वर्णन किया है, मानो
मैंने समुद्रके एक कणको ही स्पर्श किया हो ॥ 81 ॥
श्रीठाकुर वृन्दावनका माहात्म्य और श्रीगौरलीला :-
नित्यानन्द-कृपापात्र-वृन्दावन-दास।
चैतन्यलीलाय तेंहो हयेन 'आदिव्यास' ॥ 82 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावन-दास ठाकुर श्रीनित्यानन्द प्रभुके
कृपापात्र हैं और वे चैतन्यलीलाके 'आदिव्यास' हैं॥ 82 ॥
अनुभाष्य-कोई-कोई कहते हैं कि,-परवर्ती शुद्ध
गौरलीला-लेखक आचार्यगण भी 'आदिव्यास' श्रीवृन्दावनदास
ठाकुरके आनुगत्यमें उनके अभिन्न अङ्ग अथवा
'प्रकाश-व्यास'-कहलाये जा सकते हैं॥ 82 ॥
ताँर आगे यद्यपि सब लीलार भाण्डार।
तथापि अल्प वर्णिया छाड़िलेन आर ॥ 83 ॥

494 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/83-91 ]
ये किछु वर्णिलुँ, सेह संक्षेप करिया।
लिखिते ना पारेन, तबु राखियाछेन लिखिया ॥ 84 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके समक्ष
महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका भण्डार था, तथापि
उन्होंने उसमें-से अल्प लीलाओंका वर्णन करके अन्य
सबको छोड़ दिया। यद्यपि उन्होंने जिन लीलाओंका
वर्णन नहीं करके छोड़ दिया था, तथापि उन लीलाओंको
उन्होंने संक्षेपमें लिखकर रखा है॥ 83-84 ॥
विष्णु, वैष्णव और शुद्धविष्णुभक्तिके सम्बन्धमें चूड़ान्त
(सर्वोत्तम) ग्रन्थ चैतन्यभागवत ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण :-
चैतन्य-मङ्गले तँहो लिखियाछे स्थाने स्थाने।
सेइ वचन शुन, सेइ परम-प्रमाणे ॥ 85 ॥
“संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय कथने।
विस्तारिया वेदव्यास करिबेन वर्णने ॥” 86 ॥
चैतन्यमङ्गले इहा लिखियाछे स्थाने-स्थाने।
सत कहेन, —'आगे व्यास करिला वर्णने ॥' 87 ॥
अनुवाद—उन्होंने चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें)
स्थान-स्थानपर लिखा है, उस वचनको आप सुनिये,
वही सर्वोत्तम प्रमाण है, —“मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका
संक्षेपमें ही वर्णन किया है, विस्तारपूर्वक उसका वर्णन
नहीं किया जा सकता। विस्तारपूर्वक वेदव्यास उसका
वर्णन करेंगे।” चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें) उन्होंने
स्थान-स्थानपर यही लिखा है। उन्होंने सत्य ही कहा
है,—'आगे व्यासने वर्णन किया है॥ '85-87 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें, —'आगे व्यास करिबेन वर्णने
(आगे व्यास वर्णन करेंगे)' अर्थात् चैतन्यभागवतके
आदिखण्डके (1/180) में -
“शेषखण्डे चैतन्येर अनन्त विलास।
विस्तारिया वर्णिते आछेन वेदव्यास ॥”
[अर्थात् “शेषखण्डमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अनन्त
विलास हैं, जिन्हें वेदव्यास विस्तारसे वर्णन करेंगे।”]
आदि बहुतसे वचन श्रील कविराज गोस्वामी प्रमुख
परवर्ती गौरलीला-लेखक शुद्धवैष्णवाचार्योंको उद्देश्य
करके ही लिखे गये हैं, —कोई-कोई इस प्रकारकी
व्याख्या भी करते हैं॥ 87 ॥
अमानी और मानद ग्रन्थकारके द्वारा स्वयंको
ठाकुर-वृन्दावनका उच्छिष्ट भोजी समझना :-
चैतन्यलीलामृत-सिन्धु-दुग्धाब्धि-समान।
तृष्णानुरूप झारी भरि' तँहो कैला पान॥ 88 ॥
ताँर झारी-शेषामृत किछु मोरे दिला।
ततेके भरिल पेट, तृष्णा मोर गेला ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्यलीलामृत-सिन्धु दुग्धके सागरके
समान है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उस सिन्धुसे मटकी
भरकर उसमें-से अपनी प्यासके अनुरूप पान किया।
उन्होंने उस मटकीमें बचे हुए अमृतमें-से कुछ मुझे
दिया, उतनेसे ही मेरा पेट भर गया। अब मेरी तृष्णा
मिट गयी है॥ 88-89 ॥
पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :-
आमि-अति क्षुद्र जीव, पक्षी राङ्गाटूनि।
से यैछे तृष्णाय पिये समुद्रेर पानी ॥ 90 ॥
तैछे आमि एक कण छुइँलुँ लीलार।
एइ दृष्टान्ते जानिह प्रभुर लीलार विस्तार ॥ 91 ॥
अनुवाद—मैं बया पक्षीकी भाँति अति क्षुद्र जीव
हूँ। वह बया जैसे प्यास बुझानेके लिये समुद्रका
बिन्दुमात्र पानी पीती है, वैसे मैंने भी महाप्रभुकी
लीलाके एक कणका ही स्पर्श किया है। इस दृष्टान्तसे
महाप्रभुकी लीलाके विस्तारको समझा जा सकता
है॥ 90-91 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'राङ्गाटूनि', —छोटीसी बया
पक्षी॥ 90 ॥
प्राकृत कवि और साहित्यिककी भाँति अप्राकृत कविसम्राट
ग्रन्थकार अहङ्कार विमूढात्मा नहीं होकर सम्पूर्ण रूपसे
श्रीकृष्णके परतन्त्र और श्रीचैतन्य-इच्छासे परिचालित :-

[ 20/92–101 बीसवाँ अध्याय 495
'आमि लिखि',—इह मिथ्या करि अनुमान।
आमार शरीर—काष्ठपुतली-समान ॥ 92 ॥
अनुवाद—'मैंने चैतन्यलीलाको लिखा है'—मेरा ऐसा
मानना मिथ्या विचार है। मेरा शरीर तो कठपुतलीके
समान है ॥ 92 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कठपुतलीके समान कार्य
करनेमें असमर्थ हूँ; मैंने यह ग्रन्थ लिखा है—ऐसा
विचार करना व्यर्थ है। तात्पर्य यह है, भगवान् और
भक्तगण ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं ॥ 92 ॥
स्वयंको यन्त्र-मानकर अपनी अयोग्यताका वर्णन :—
वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध, बधिर।
हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे मोर स्थिर ॥ 93 ॥
अनुवाद—मैं वृद्ध और जर्जरित हूँ, मैं प्राय अन्धा
और बहरा हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं और मेरा मन और
बुद्धि भी स्थिर नहीं है ॥ 93 ॥
नाना-रोगग्रस्त,—चलिते बसिते ना पारि।
पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि-दिने मरि ॥ 94 ॥
अनुवाद—मैं अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हूँ—मैं न
तो चल पाता हूँ और न ही बैठ पाता हूँ। मैं पाँचों
इन्द्रियोंके रोगोंकी पीड़ासे दुःखित रहता हूँ, रात्रि अथवा
दिनमें मैं कभी भी शरीर त्याग कर सकता हूँ ॥ 94 ॥
पूर्वे ग्रन्थे इहा करियाछि निवेदन।
तथापि लिखिये, शुन इहार कारण ॥ 95 ॥
अनुवाद—यद्यपि इस बातको मैंने पहले भी इसी
ग्रन्थमें लिखा है, तथापि मैं कैसे लिखता जा रहा हूँ,
इसका कारण सुनिये ॥ 95 ॥
अपने उपास्य-विग्रहोंका वर्णन :—
श्रीगोविन्द, श्रीचैतन्य, श्रीनित्यानन्द।
श्रीअद्वैत, श्रीभक्त, आर श्रीश्रोतृवृन्द ॥ 96 ॥
श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन।
श्रीरघुनाथ-दास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण ॥ 97 ॥
मदनमोहन-कृपा लाभरूपी अपने सौभाग्यका वर्णन :—
इँहा-सबार चरण-कृपाय लेखाय आमारे।
आर एक हय—तँहो अतिकृपा करे ॥ 98 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्ददेव, श्रीचैतन्यदेव, श्रीनित्यानन्द
प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीभक्तगण और समस्त श्रीश्रोतागण,
श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीगुरुदेव—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी—इन
सबके चरणकमलोंकी कृपा ही मुझसे लिखवाती है।
इनके अतिरिक्त एक और भी हैं, जो मुझपर बहुत
अधिक कृपा करते हैं ॥ 96–98 ॥
अनुभाष्य—'श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु'—ग्रन्थकार श्रीकविराज
गोस्वामी प्रभुके भजन-शिक्षा गुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ
श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं। परवर्ती 145 संख्या और
आदिलीलाके पहले अध्यायके प्रारम्भमें अनुभाष्यमें
श्रीरूपानुग-आम्नाय अथवा गुरु-परम्परा देखें ॥ 97 ॥
श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय आज्ञा करि'।
कहिते ना युयाय, तबु रहिते ना पारि ॥ 99 ॥
अनुवाद—श्रीमदनगोपाल मुझे आदेश प्रदान करके
मुझसे लिखवा रहे हैं। यद्यपि यह सब कहना उचित
नहीं है, तथापि मैं कहे बिना रह नहीं पा रहा हूँ ॥ 99 ॥
ना कहिले हय मोर कृतघ्नता-दोष।
दम्भ करि' बलि, श्रोता, ना करिह रोष ॥ 100 ॥
श्रोताओंकी वन्दना :—
तोमा-सबार चरण-धूलि करिनु वन्दन।
ताते चैतन्य-लीला हैल ये किछु लिखन ॥ 101 ॥
अनुवाद—मैं अभिमान करके यह कह रहा हूँ, हे
श्रोताओं! ऐसा मानकर आप मेरे प्रति रोष मत करना,
क्योंकि ऐसा नहीं कहनेपर मुझपर कृतघ्नताका दोष
लगेगा। मैंने आप सबके चरणोंकी धूलिकी वन्दना की

496 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/100-112 ]
है, मैं जो कुछ भी चैतन्य-लीलाको लिख पाया हूँ, यह
उसीका फल है॥ 100-101 ॥
भागवतमें वर्णित व्यासकी रीतिके अनुसरणसे संक्षेपमें
अन्त्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनरावृत्ति :-
एबे अन्त्यलीलागणेर करि अनुवाद।
'अनुवाद' कैले पाइ लीलार 'आस्वाद' ॥ 102 ॥
अनुवाद-अब मैं अन्त्यलीलाके अध्यायोंका संक्षेपमें
पुनः वर्णन करता हूँ, संक्षेपमें वर्णन करनेसे लीलाओंका
पुनः आस्वादन हो जायेगा ॥ 102 ॥
प्रथम परिच्छेदे-रूपेर द्वितीय-मिलन।
तार मध्ये दुइ नाटकेर विधान-श्रवण ॥ 103 ॥
तार मध्ये शिवानन्द-सङ्गे कुक्कुर आइला।
प्रभु तारे कृष्ण कहाञा मुक्त करिला ॥ 104 ॥
अनुवाद-पहले अध्यायमें श्रीरूप गोस्वामीका महाप्रभुके
साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीके
द्वारा रचित दो नाटकोंका (विदग्ध-माधव और
ललित-माधवका) श्रवण, एक कुत्तेका श्रीशिवानन्द
सेनके साथ नीलाचल आना और महाप्रभुके द्वारा
उसके मुखसे कृष्ण कहलवाकर उसे मुक्त कर देना-ये
प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 103-104 ॥
द्वितीये-छोट हरिदासे कराइला शिक्षण।
तार मध्ये शिवानन्देर आश्चर्य दर्शन ॥ 105 ॥
अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा छोटे
हरिदासको शिक्षा प्रदान करना और श्रीशिवानन्द सेनके
आश्चर्यचकित हो जानेका वर्णन है ॥ 105 ॥
तृतीये-हरिदासेर महिमा प्रचण्ड।
दामोदर-पण्डित कैला प्रभुरे वाक्यदण्ड ॥ 106 ॥
प्रभु 'नाम' दिया कैला ब्रह्माण्ड-मोचन।
हरिदास करिला नामेर महिमा-स्थापन ॥ 107 ॥
अनुवाद-तीसरे अध्यायमें श्रीहरिदास ठाकुरकी
प्रभावशाली महिमा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा महाप्रभुको
दिया गया वाक्यदण्ड, महाप्रभुके द्वारा 'नाम' प्रदान
करके ब्रह्माण्डका उद्धार और श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा
नामकी महिमाको स्थापित करना-ये प्रसङ्ग वर्णित हुए
हैं॥ 106-107 ॥
चतुर्थे-श्रीसनातनेर द्वितीय-मिलन।
देहत्याग हैते ताँर करिला रक्षण ॥ 108 ॥
ज्येष्ठ-मासे प्रभु ताँरे कैला परीक्षण।
शक्ति सञ्चारिया पुनः पाठाइला वृन्दावन ॥ 109 ॥
अनुवाद-चौथे अध्यायमें श्रीसनातन गोस्वामीके
महाप्रभुके साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी
देह त्याग करनेसे रक्षा करना और ज्येष्ठ मासमें
उनकी परीक्षा एवं उनमें शक्ति सञ्चारित करके उन्हें
पुनः वृन्दावन भेजना-इन सबका वर्णन हुआ
है॥ 108-109 ॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - "ज्येष्ठमासे धूपे ताँरे।" अर्थात्
'ज्येष्ठ मासमें धूपमें उनकी ॥' 109 ॥
पञ्चमे-प्रद्युम्नमिश्रे प्रभु कृपा करिला।
राय-द्वारा कृष्णकथा ताँरे शुनाइला ॥ 110 ॥
तार मध्ये 'बाङ्गाल'-कविर नाटक-उपेक्षण।
स्वरूप-गोसाञि कैला विग्रहेर महिमा-स्थापन ॥ 111 ॥
अनुवाद-पाँचवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीप्रद्युम्न
मिश्रपर कृपा करके उन्हें श्रीरामानन्द रायसे कृष्णकथाका
श्रवण करवाना, श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा बङ्गालके
कविके द्वारा रचित नाटककी उपेक्षा और विग्रहकी
महिमाको स्थापित करनेके प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 110-111 ॥
षष्ठे-रघुनाथ-दास प्रभुरे मिलिला।
नित्यानन्द-आज्ञाय चिड़ा-महोत्सव कैला ॥ 112 ॥

[ 20/112-123 बीसवाँ अध्याय 497
दामोदर-स्वरूप ठाञि ताँरे समर्पिल।
'गोवर्धन-शिला', 'गुञ्जामाळा' ताँरे दिल॥113॥
अनुवाद—छठे अध्यायमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका महाप्रभुसे [शान्तिपुरमें] मिलन, बादमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे उनके द्वारा किया गया दही-चिड़ा महोत्सव, उनके पुरीमें महाप्रभुके पास आनेपर महाप्रभुके द्वारा उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके निकट समर्पित करना और उन्हें गोवर्धन शिला एवं गुञ्जामाला प्रदान करना—ये प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥112-113॥
सप्तम-परिच्छेदे—वल्लभ-भट्टेरे मिलन।
नाना-मते कैला ताँर गर्व-खण्डन॥114॥
अनुवाद—सातवें अध्यायमें श्रीवल्लभ भट्टका महाप्रभुके साथ मिलन और महाप्रभुके द्वारा अनेक प्रकारसे उनके गर्वके खण्डनका वर्णन हुआ है॥114॥
अष्टमे—रामचन्द्रपुरीर आगमन।
ताँर भये कैला प्रभु भिक्षा-सङ्कोचन॥115॥
अनुवाद—आठवें अध्यायमें रामचन्द्रपुरीका जगन्नाथ पुरीमें आगमन और उनके भयसे महाप्रभुके द्वारा भोजनको कम करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥115॥
नवमे—गोपीनाथ पट्टनायक-मोचन।
त्रिजगते लोक प्रभुर पाइल दरशन॥116॥
अनुवाद—नौवें अध्यायमें गोपीनाथ पट्टनायकका उद्धार और त्रिभुवनके लोगोंके द्वारा आकर महाप्रभुके दर्शन प्राप्त करनेके प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥116॥
दशमे—कहिलुँ भक्तदत्त-आस्वादन।
राघव-पण्डितेर ताँहा झालिर साजन॥117॥
तार मध्ये गोविन्देर कैला परीक्षण!
तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्येरे वर्णन॥118॥
अनुवाद—दसवें अध्यायमें मैंने वर्णन किया है कि कैसे महाप्रभुने भक्तोंके द्वारा प्रदान की गयी खाद्य वस्तुओंका आस्वादन किया, श्रीराघव पण्डितके द्वारा झोलीमें लायी गयी खाद्य सामग्रीका वर्णन, महाप्रभुने कैसे श्रीगोविन्दकी परीक्षा ली और महाप्रभुके द्वारा किये गये परिमुण्डा-नृत्यका भी वर्णन किया है॥117-118॥
एकादशे—हरिदास-ठाकुरेर निर्याण।
भक्त-वात्सल्य याँहा देखाइला गौर-भगवान्॥119॥
अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीहरिदास ठाकुरके अप्रकट होनेका वर्णन हुआ है जिसमें श्रीगौर-भगवान्ने अपने भक्त-वात्सल्यका दर्शन करवाया॥119॥
द्वादशे—जगदानन्देर तैल-भञ्जन।
नित्यानन्द कैला शिवानन्देरे ताड़न॥120॥
अनुवाद—बारहवें अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारा तेलकी मटकीको फोड़ने और श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्द सेनको लात मारने एवं शाप देनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥120॥
त्रयोदशे—जगदानन्द मथुरा याइ' आइला।
महाप्रभु देवदासीर गीत शुनिला॥121॥
रघुनाथ-भट्टाचार्येर ताँहाइ मिलन।
प्रभु ताँरे कृपा करि' पाठाइल वृन्दावन॥122॥
अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके मथुरामें जाकर लौट आनेका, महाप्रभुके द्वारा देवदासीके गीतको सुननेका, श्रीरघुनाथ-भट्टका महाप्रभुसे मिलनका और महाप्रभुके द्वारा कृपा करके उन्हें वृन्दावन भेजनेका वर्णन हुआ है॥121-122॥
चतुर्दशे—दिव्योन्माद-आरम्भ वर्णन।
'शरीर' एथा प्रभुर, मन गेला वृन्दावन॥123॥

498 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/123-135 ]
तार मध्ये प्रभुर सिंहद्वारे पतन।
अस्थि-सन्धि-त्याग, अनुभावेर उद्गम ॥ 124 ॥
चटक-पर्वत देखि' प्रभुर धावन।
तार मध्ये प्रभुर किछु प्रलाप-वर्णन ॥ 125 ॥
अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें महाप्रभुमें दिव्योन्मादके आरम्भका वर्णन हुआ है, जिसमें उनका शरीर तो जगन्नाथपुरीमें था, किन्तु उनका मन वृन्दावन चला गया। इसी अध्यायमें महाप्रभुका सिंहद्वारपर पड़े मिलना, उनकी अस्थियोंके जोड़ोंका खुलना और अनुभावके उदित होनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। इसी अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा चटक पर्वतको देखकर दौड़ना और उनके द्वारा किये गये कुछ प्रलापका वर्णन हुआ है॥ 123-125 ॥
पञ्चदश-परिच्छेदे-उद्यान-विलासे।
वृन्दावनभ्रमे याँहा करिला प्रवेशे ॥ 126 ॥
तार मध्ये प्रभुर पञ्चेन्द्रिय-आकर्षण।
तार मध्ये करिला रासे कृष्ण-अन्वेषण ॥ 127 ॥
अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें उद्यान-विलासका वर्णन है, जिसमें महाप्रभु वृन्दावनके भ्रमसे प्रवेश कर गये थे। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णके द्वारा महाप्रभुकी पाँचों इन्द्रियोंका आकर्षण और महाप्रभुके द्वारा रासलीलामें श्रीकृष्णको ढूँढ़नेका प्रयास वर्णित हुआ है॥ 126-127 ॥
षोडशे-कालिदासे प्रभु कृपा करिला।
वैष्णवोच्छिष्ट खाइबार फल देखाइला ॥ 128 ॥
शिवानन्देर बालके श्लोक कराइला।
सिंहद्वारेर द्वारी प्रभुरे कृष्ण देखाइला ॥ 129 ॥
महाप्रसादेर ताँहा महिमा वर्णिला।
कृष्णाधरामृतेर फल-श्लोक आस्वादिला ॥ 130 ॥
अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें श्रीकालिदासके द्वारा वैष्णवके उच्छिष्ट खानेके फलस्वरूप महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति, महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्द सेनके पुत्रके द्वारा श्लोककी रचना करवाना, सिंहद्वारके द्वारपालके द्वारा महाप्रभुको श्रीकृष्णको दिखलाना, महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादकी महिमाको बतलाना और श्रीकृष्णके अधरामृतके फलके श्लोकके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 128-130 ॥
सप्तदशे-गाभी-मध्ये प्रभुर पतन।
कूर्माकार-अनुभावेर ताँहाइ उद्गम ॥ 131 ॥
कृष्णेर शब्दगुणे प्रभुर मन आकर्षिला।
'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकेर अर्थ आवेशे करिला ॥ 132 ॥
भाव-शाबल्ये पुनः कैला प्रलापन।
कर्णामृत-श्लोकेर अर्थ कैला विवरण ॥ 133 ॥
अनुवाद—सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुका गैयाओंके बीचमें पड़े मिलना और कूर्माकार-अनुभावका वहींपर प्रकाशित होना, श्रीकृष्णके शब्द-गुणके द्वारा महाप्रभुके मनको आकर्षित करनेपर महाप्रभुके द्वारा आवेशमें 'कास्त्र्यङ्ग ते' श्लोकके अर्थका वर्णन करना और उनके द्वारा भाव-शाबल्यमें पुनः प्रलाप करना एवं कर्णामृतके श्लोकके अर्थका विवरण दिया गया है॥ 131-133 ॥
अष्टादश-परिच्छेदे-समुद्रे पतन।
कृष्ण-गोपी-जलकेलि ताँहा दरशन ॥ 134 ॥
ताँहाइ देखिला कृष्णेर वन्यभोजन।
जालिया उठाइल, प्रभु आइला स्व-भवन ॥ 135 ॥
अनुवाद—अठारहवें अध्यायमें महाप्रभुका समुद्रमें जा गिरना और श्रीकृष्ण एवं गोपियोंके द्वारा की जानेवाली जलक्रीड़ाका दर्शन, महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके द्वारा किये जाने वाले वन्य-भोजनका दर्शन, मछुवारेके द्वारा महाप्रभुको समुद्रसे निकालना एवं महाप्रभुके अपने वास-स्थानपर आना—ये सब प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 134-135 ॥

[ 20/136-146 बीसवाँ अध्याय 499
ऊनविंशे—भित्ये प्रभुर मुखसङ्घर्षण।
कृष्णेर विरह-स्फूर्त्ति-प्रलाप-वर्णन ॥ 136 ॥
वसन्त-रजनीते पुष्पोद्याने विहरण।
कृष्णेर सौरभ्य-श्लोकेर अर्थ-विवरण ॥ 137 ॥
अनुवाद—उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा दीवारोंपर
अपने मुखको घिसना, श्रीकृष्णविरहमें उनका स्फूर्त्ति-प्रलाप,
उनके द्वारा वसन्तकी रात्रिमें पुष्पोद्यानमें विहार करना
और श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धका वर्णन करनेवाले
श्लोकके अर्थको प्रकाशित करना—ये प्रसङ्ग वर्णित हुए
हैं॥ 136-137॥
विंशति-परिच्छेदे—निज 'शिक्षाष्टक' पड़िया।
तार अर्थ आस्वादिला आविष्ट हञा ॥ 138 ॥
भक्ते शिखाइते येइ शिक्षाष्टक कहिला।
सेइ श्लोकाष्टकेर अर्थ पुनः आस्वादिला ॥ 139 ॥
अनुवाद—बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा स्वरचित
शिक्षाष्टकके श्लोकोंका पाठ और प्रेमाविष्ट होकर
उनके अर्थोंका आस्वादन करना, भक्तोंको सिखलानेके
लिये महाप्रभुके द्वारा शिक्षाष्टकके श्लोकोंको कहना
और उसके द्वारा पुनः स्वयं उनका आस्वादन करना—ये
सब प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 138-139॥
अनुवाद, पुनः चर्चा अथवा पुनरावृत्तिके
फलस्वरूप लीलाके स्मरणका उदय :-
मुख्य-मुख्य-लीलार अर्थ करिलुँ कथन।
'अनुवाद' हैते स्मरे ग्रन्थ-विवरण ॥ 140 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने विभिन्न अध्यायोंमें वर्णित
मुख्य-मुख्य लीलाओं और उनके अर्थको प्रकाशित
किया है, संक्षेपमें पुनः वर्णन करनेसे ग्रन्थके विवरणका
स्मरण होता है॥ 140 ॥
ग्रन्थ-विस्तारके भयसे प्रधान प्रधान घटनामात्र वर्णित :-
एक एक परिच्छेदेर कथा—अनेक प्रकार।
मुख्य-मुख्य कहिलुँ, कथा ना याय विस्तार ॥ 141 ॥
अनुवाद—यद्यपि एक-एक अध्यायमें ही अनेक
प्रकारकी कथाएँ वर्णित हुई हैं, तथापि मैंने अभी
मुख्य-मुख्य कथाओंके विषयमें ही बतलाया है, यहाँपर
विस्तारसे उसका वर्णन सम्भवपर नहीं है॥ 141 ॥
ग्रन्थकारके अपने उपास्य-विग्रह सम्बन्ध-
अभिधेय-प्रयोजनके अधिदेव गौड़ीयेश्वर
श्रीराधा-मदनमोहन-गोविन्द-गोपीनाथ :-
श्रीराधा-सह 'श्रीमदनमोहन'।
श्रीराधा-सह 'श्रीगोविन्द'-चरण ॥ 142 ॥
श्रीराधा-सह श्रील 'श्रीगोपीनाथ'।
एइ तिन ठाकुर हय 'गौड़ीयार नाथ' ॥ 143 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके साथ श्रीमदनमोहन, श्रीराधाके
साथ श्रीगोविन्द, श्रीराधाके साथ श्रीगोपीनाथ—ये तीनों
ठाकुर गौड़ीय भक्तोंके नाथ हैं॥ 142-143 ॥
सपरिकर श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीयुक्त, नित्यानन्द।
श्रीअद्वैत-आचार्य, श्रीगौरभक्तवृन्द ॥ 144 ॥
ग्रन्थकारका श्रीगौरशक्तिस्वरूप गुरुवर्गोंको प्रणाम :-
श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन।
गुरु श्रीरघुनाथ, श्रीजीवचरण ॥ 145 ॥
उनको नमस्कारसे ही अभीष्ट सिद्धि :-
निज-शिरे धरि' एइ सबार चरण।
याहा हैते हय सब वाञ्छित-पूरण ॥ 146 ॥
अनुवाद—मैं श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु, श्रीयुक्त नित्यानन्द
प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीगौरभक्तवृन्द, श्रीस्वरूप दामोदर,
श्रीरूप, श्रीसनातन, गुरु श्रीरघुनाथ और श्रीजीव गोस्वामी
पाद—इन सबके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण
करता हूँ, जिससे समस्त प्रकारकी वाञ्छाएँ पूर्ण हो
जाती हैं॥ 144-146 ॥

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

500 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/147-154 ]
चैतन्यमयी नित्यानन्द-कृपाके आनुगत्यमें ही जिह्वा अथवा
वचनोंका श्रीचैतन्यलीलाके कीर्तनका सामर्थ्य :-
सबार चरण-कृपा-गुरु 'उपाध्यायी'।
तार वाणी-शिष्या, तारे बहुत नाचाइ ॥ 147 ॥
अनुवाद-इन सभीके चरणोंकी कृपा ही गुरुकी
उपाधिसे युक्त है और उनकी वाणी उस कृपाकी शिष्या
है, कृपारूपी गुरुने वाणीरूपी शिष्याको बहुत नचाया
है ॥ 147 ॥
अनुभाष्य - 'उपाध्यायी',-
'उपेत्य अधीयते अस्मात्';
'एकदेशस्तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते॥'
[अर्थात् 'निकट जाकर जिनसे अध्ययन किया
जाता है।' मनुसंहिता - 'जो जीवनधारणके लिये वेदके
एकदेश, पुनः वेदोंके छह अङ्गोंका (शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिषका) अध्यापन
करते हैं, वे उपाध्याय कहलाते हैं।']
उपाध्याय अर्थात् कलाविद्या-शिक्षक। पाठान्तरमें-'मोर
वाणी शिष्या' अर्थात् मेरी वाणी शिष्या है ॥ 147 ॥
शिष्यार श्रम देखि' गुरु नाचान राखिला।
'कृपा' ना नाचाय, 'वाणी' बसिया रहिला ॥ 148 ॥
अनिपुणा वाणी आपने नाचिते ना जाने।
यत नाचाइला, नाचि' करिला विश्रामे ॥ 149 ॥
अनुवाद-शिष्याका परिश्रम देखकर गुरुने शिष्याके
नचानेको स्थगित कर दिया। कृपाके नहीं नचानेपर
वाणी शान्त होकर बैठ गयी है। अनिपुण वाणी स्वयं
नाचना नहीं जानती, उसे गुरुने जितना नचाया, वह
उतना नाचकर विश्राम करने लगी ॥ 148-149 ॥
श्रोताओंकी वन्दना और कृपा-प्रार्थना :-
सब श्रोतागणेर करि चरण-वन्दन।
याँ-सबार चरण-कृपा-शुभेरे कारण ॥ 150 ॥
अनुवाद-मैं समस्त श्रोताओंके चरणकमलोंकी वन्दना
करता हूँ, जिनके चरणकमलोंकी कृपा समस्त शुभका
कारण है ॥ 150 ॥
चैतन्यचरितामृत येइ जन सुने।
ताँर चरण धुञा करों मुञि पाने ॥ 151 ॥
श्रोतार पदरेणु करों मस्तक-भूषण।
तोमरा ए-अमृत पिले सफल हैल श्रम ॥ 152 ॥
अनुवाद-जो भी व्यक्ति चैतन्यचरितामृतका श्रवण
करता है, मैं उसके चरणोंको धोकर उनके चरणामृतका
पान करता हूँ। मैं श्रोताओंके चरणकमलोंकी धूलिको
अपने मस्तकके आभूषणके रूपमें धारण करता हूँ,
आपके इस चैतन्यचरित्ररूपी अमृतका पान करनेसे मेरा
परिश्रम सफल हुआ है ॥ 151-152 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 153 ॥
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 153 ॥
ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
चरितममृतमेतच्छ्रीलचैतन्यविष्णोः
शुभदमशुभनाशि श्रद्धयास्वादयेद् यः।
तदमलपदपद्मे भृङ्गतामेत्य सोऽयं
रसयति रसमुच्चैः प्रेममाध्वीकपूरम् ॥ 154 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो श्रद्धापूर्वक भगवान्
श्रीचैतन्यदेवके इस अमृतके समान शुभ प्रदान करनेवाले
एवं अशुभका नाश करनेवाले चरित्रका आस्वादन
करते हैं, ये लेखक (ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी)
उनके अमल चरणकमलोंके भ्रमर बनकर प्रेमरूपी
मदिरासे पूर्ण रसका अतिशय आस्वादन करते हैं ॥ 154 ॥

[ 20/154-158 बीसवाँ अध्याय 501
अनुभाष्य-
यः श्रद्धया श्रीलचैतन्यविष्णोः एतत् अशुभनाशि शुभदं चरितम् आस्वादयेत्, सः अयं तदमलपदपद्मे भृङ्गाताम् एत्य (प्राप्य) प्रेममाध्वीकपूरं (प्रेममदिरापूर्णं) रसम् उच्चैः (अतिशयेन) रसयति (आस्वादयति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 154॥
श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये श्रीचैतन्यके प्रति इस ग्रन्थरूपी अमृतका अर्पण :-
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये।
चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 155॥
अनुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 155॥
अनुभाष्य-
श्रीमन्मदनगोपाल-श्रीगोविन्ददेव-तुष्टये एतत् चैतन्यचरितामृतं ग्रन्थं चैतन्यार्पितं (श्रीचैतन्ये समर्पितम्) अस्तु।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 155॥
अमृतानुकणा-श्रीराधाके साथ श्रीमन्मदनगोपाल और श्रीगोविन्ददेवकी प्रसन्नता विधान करनेके लिये यह श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थ श्रीचैतन्यदेवको समर्पित हो॥ 155॥
श्रीकृष्णचरणकमल ही अप्राकृत अनन्त-रसके आधार :-
परिमलवासितभुवनं स्वरसोन्मादित-रसिकालम्बम्।
गिरिधरचरणाम्भोजं कः खलु रसिकः समीहते हातुम्॥ 156॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 156॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके जो चरणकमल सुगन्धके द्वारा भुवनको सुगन्धित करके अपने रसमें उन्मादित करके रसिकोंके आश्रय स्वरूप हुए हैं, उन्हें कौन रसिक व्यक्ति परित्याग करनेकी चेष्टा करता है? 156॥
अनुभाष्य-
कः रसिकः (रसज्ञः कृष्णभजनशीलः) परिमलवासितभुवनं (सुगन्धेन सुरभितं भुवनं येन तं) स्वरसोन्मादित-रसिकालम्बं (शृङ्गाररसोन्मादित-रसिकावलम्बनं) गिरिधरचरणाम्भोजं हातुं (परित्यक्तुं) समीहते (संवेष्टते)?
श्लोक-भावानुवाद-कौन रसज्ञ कृष्णभजनशील व्यक्ति समस्त जगत्को सुगन्धित करनेवाले और शृङ्गाररसमें उन्मादित रसिकोंके आश्रयस्वरूप श्रीगिरिधरके चरणकमलोंका परित्याग करनेकी चेष्टा करता है॥ 156॥
अपने अभीष्टदेव श्रीराधागोविन्दके प्रति शरणागति :-
मत्प्राणसर्वस्वपदाम्बजेरेणो-र्मदीश्वरी-श्रीयुतराधिकायाः।
प्राणोरुसर्वस्वपदाम्बजरेणुं श्रीश्रील-गोविन्दमहं प्रपद्ये॥ 157॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 157॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अपने प्राण-सर्वस्वके चरणकमलोंकी रेणुके बलसे मैं अपनी ईश्वरी श्रीमती राधिकाके प्राणोंसे अधिक और सर्वस्वरूप चरणकमलोंकी रेणुका ध्यान करते हुए श्रीश्रीगोविन्ददेवके शरणागत होता हूँ॥ 157॥
ग्रन्थ समाप्तिके कालका निर्देश :-
शाके सिन्ध्वग्निबाणेन्दौ ज्येष्ठे वृन्दावनान्तरे।
सूर्यहिङ्सितपञ्चम्यां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः॥ 158॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे शिक्षा-श्लोकार्थास्वादनं नाम विंश परिच्छेदः।
॥ इति अन्त्यलीला समाप्ता॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158॥
अमृतप्रवाह भाष्य-1537 शकाब्दके ज्येष्ठ मासकी कृष्ण-पञ्चमी तिथि रविवारको श्रीवृन्दावनमें यह ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ।
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें शिक्षाश्लोक-अर्थ-आस्वादन नामक बीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

502 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/158 ]
विपिनविहारी हरि, ताँर शक्ति अवतरि',
विपिनविहारी प्रभुवर।
श्रीगुरुगोस्वामि-रूपे, देखि' मोरे भवकूपे,
उद्धारिल आपन-किङ्कर ॥
[विपिनविहारी श्रीहरिकी शक्ति मेरे प्रभुवर (गुरु)
श्रीविपिनविहारीके रूपमें अवतरित हुई। श्रीहरिने मेरे
श्रीगुरुदेव श्रीविपिनविहारी गोस्वामीके रूपमें मुझे भवकूपमें
पड़ा देखकर मुझे अपना किङ्कर जानकर मेरा उद्धार
किया।]
तदाज्ञा-पालनकामे, 'अमृतप्रवाह'-नामे,
चैतन्यचरितामृत-अर्थ।
रचिलाम सयतने, अर्पिलाम भक्तगणे,
पाठ करि' घुचाओ अनर्थ ॥
[उनकी (गुरुदेव श्रीविपिन-विहारी गोस्वामीकी) आज्ञाका
पालन करनेकी कामनासे मैंने अमृतप्रवाहके नामसे
श्रीचैतन्यचरितामृतके अर्थकी यत्नपूर्वक रचना करके
उसे भक्तोंको अर्पित किया है। हे भक्तों! आप उसका
पाठ करके अपने अनर्थोंको दूर करो।]
ये-सब आत्मज मम, करियाछे परिश्रम,
एइ ग्रन्थ प्रस्तुत-कारणे।
निर्विघ्न-जीवने सबे, साधुसङ्ग-महोत्सवे,
करूक भक्ति श्रीहरिचरणे ॥
[मेरे जिन सब पुत्रोंने इस श्रीचैतन्यचरितामृत
नामक ग्रन्थको प्रस्तुत करनेमें परिश्रम किया है, (मेरा
उनके लिये आशीर्वाद है कि) वे निर्विघ्न अपने सम्पूर्ण
जीवनमें साधुसङ्ग महोत्सवमें श्रीहरिके चरणोंकी भक्ति
करें।]
वैष्णव-चरणे धरि', सदैव प्रार्थना करि,
ए दासेर जीवनावशेषे।
श्रीगोद्रुमे साधुसङ्गे, चिदानन्द-रसरङ्गे,
याय दिन कृष्णनामावेशे ॥
[मैं वैष्णवोंके चरणोंको धारण करके दीनतापूर्वक
उनसे प्रार्थना करता हूँ कि इस दासके जीवनके शेष
दिन श्रीगोद्रुममें साधु-सङ्गमें चिदानन्द-रसके आनन्दमें
कृष्णनामके आवेशमें व्यतीत हों।]
ए संसार-सारहीन, एते मजे अर्वाचीन,
इहाते विरक्त महाशय।
साधुसङ्गे कृष्णे भजे, राधाकृष्णे सेवे व्रजे,
निरन्तर कृष्णनामाश्रय ॥
[यह संसार सारहीन है। अज्ञानी व्यक्ति ही इसमें
निमज्जित होता है। इस संसारसे विरक्त महाशय
साधुसङ्गमें रहकर निरन्तर कृष्णनामका आश्रय ग्रहण
करके बाह्यदेहके द्वारा भजन करते हैं और अपनी
अन्तश्चिन्तित देहसे व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते
हैं।]
गौर चारिशत-दशे, मेष-शुक्ल-एकादशे,
श्रीसुरभिकुञ्ज-वनान्तरे।
सम्पूर्ण हइल भाष्य, इहाते पुरिल दास्य,
दोष-क्षमा मागि' अतःपरे ॥
[चार सौ दस गौराब्दमें मेष-शुक्ल एकादशीके दिन
श्रीसुरभिकुञ्ज-वनमें अमृतप्रवाह भाष्य सम्पूर्ण हुआ।
इससे ही मेरा दास्य पूर्ण हुआ। इस अमृतप्रवाह भाष्यमें
हुई किसी दोष-त्रुटिके लिये क्षमा माँगता हूँ।] ॥ 158 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
अयं (श्रीचैतन्यचरितामृताख्यः) ग्रन्थः वृन्दावनान्तरे ज्येष्ठे
असितपञ्चम्यां (कृष्णपञ्चम्यां) सूर्याहे (रविवारी) सिन्ध्वग्निव्वाणेन्दौ
('अङ्कस्य वामा गतिः' इति न्यायेन, 1537 शकावनीपतेरतीताब्दे)
पूर्णतां गतः।
156 से 158 तकके श्लोक अनेक प्रकाशनोंमें
दिखायी नहीं देते।
चारिशत ऊनत्रिंशे, ज्येष्ठे दिन एकत्रिंशे,
चैतन्याब्दे, मास-त्रिविक्रम।
श्रीव्रजपत्तने थाकि', 'गौरहरि' बलि' डाकि,
दथितदासिया नराधम ॥ 1 ॥
नवद्वीप-मायापुरे, प्रभुगृह नातिदूरे,
अनुभाष्य कैल समापन।
श्रीगौरकिशोर-दास, सम्प्रति कुलिया वास,
याँर भृत्य-एइ अभाजन ॥ 2 ॥

[ 20/158 बीसवाँ अध्याय 503

[चार सौ उनतीस चैतन्याब्द त्रिविक्रम मासमें
ज्येष्ठके इकतीसवें दिन, श्रीनवद्वीप मण्डलके अन्तर्गत
मायापुरमें श्रीशचीनन्दन गौरहरिके जन्मस्थानके निकट
श्रीव्रजपत्तन (मूलमठ श्रीचैतन्य मठ)में रहकर 'गौरहरि'
बोलते हुए इस समय कुलियामें वास कर रहे
श्रीगौरकिशोर दास बाबाजी महाराजके अयोग्य दास इस
दयितदास नामक नराधमने श्रीचैतन्यचरितामृतके 'अनुभाष्य'के
लेखनको सम्पूर्ण किया है।]

आजि एइ सुख-दिने, भकतिविनोद बिने,
सुखवार्त्ता जानाब काहारे?
'अनुभाष्य' शुनि' येइ, परम प्रफुल्ल हइ'
उरुकृपा वितरिल मोरे॥३॥

[आज इस परम सुखके दिनमें श्रीभक्तिविनोद
ठाकुरके प्रकट रूपमें विद्यमान नहीं रहनेके कारण मैं
इस सुखवार्त्ताको किसको कहूँ? (आंशिक) 'अनुभाष्य'को
सुनकर वे परम आनन्दित हुए थे और उन्होंने मुझपर
प्रचुर कृपाका वितरण किया था।]

ताँहार करुणा-कथा, माधव-भजन-प्रथा,
तुलना नाहिक त्रिभुवने।
ताँर सम अन्य केह, धरिया ए नरदेह,
नाहि दिल कृष्णप्रेमधने॥४॥

[उनकी करुणाकी बात और उनके माधव-भजनकी
प्रथाकी इन तीनों लोकोंमें तुलना नहीं है। उनके समान
अन्य किसीने भी इस मनुष्य देहको धारणकर श्रीकृष्णप्रेम
रूपी धनका वितरण नहीं किया है।]

सेइ प्रभु-शक्ति पाइ', एबे 'अनुभाष्य' गाइ,
इहाते आमार किछु नाइ।
यावत् जीवन रबे, तावत् स्मरिब भवे,
नित्यकाल सेइ पद चाइ॥५॥

[उन प्रभुसे शक्तिको प्राप्तकर ही मैंने अब
'अनुभाष्य'का लेखन कार्य किया है, इसमें मेरी कुछ
भी योग्यता नहीं है। जब तक जीवन रहेगा, तब तक
मैं भावमें विभोर होकर उनका स्मरण करूँगा और
नित्यकालके लिये मैं उन श्रीचरणकमलोंको चाहता हूँ।]

गदाधर-मित्रवर, श्रीस्वरूप-दामोदर,
सदा काल गौर-कृष्ण यजे।
जगतेर देखि' क्लेश, धरिया भिक्षुक-वेश,
अहरहः कृष्णनाम भजे॥६॥

[श्रीगदाधर पण्डितके मित्रवर श्रीस्वरूप दामोदर सब
समय श्रीगौर-कृष्णका यजन करते हैं। वे जगत्के
जीवोंके क्लेशोंको देखकर भिक्षुक-वेश धारण करके
दिन-रात श्रीकृष्णनामका भजन करते हैं।]

श्रीगौर-इच्छाय दुइ, महिमा कि कब मुइ,
अप्राकृत-पारिषद-कथा।
प्रकट हइया सेवे, कृष्ण-गौराभिन्न-देवे,
अप्रकाश्य कथा यथा तथा॥७॥

[श्रीगदाधर पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदर-इन
दोनों अप्राकृत-पार्षदोंकी महिमाका मैं क्या वर्णन करूँ?
श्रीगौरसुन्दरकी इच्छासे ये दोनों इस जगत्में प्रकटित
होकर श्रीकृष्णसे अभिन्न भगवान् श्रीगौरसुन्दरके निगूढ़
चरित्रको यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकाशित कर रहे हैं।]

श्रीगौराङ्ग-निजजन, भकतिविनोद-गण,
अप्राकृत-भावे याँर स्थिति।
'अनुभाष्य' सयतने, पाठ कर भक्त-सने,
लाभ कर युगल-पीरिति॥८॥

[श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके निजजन श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके
गणोंकी अप्राकृत-भावमें स्थिति है। हे पाठको!
श्रीचैतन्यचरितामृतके अनुभाष्यका ध्यानपूर्वक भक्तोंके
सङ्गमें पाठ करके श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलके प्रेमको प्राप्त
करो।] ॥ 158 ॥

श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थका अनुभाष्य समाप्त।

॥ अन्त्यलीला समाप्त ॥

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