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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2511

494 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/83-91 ]
ये किछु वर्णिलुँ, सेह संक्षेप करिया।
लिखिते ना पारेन, तबु राखियाछेन लिखिया ॥ 84 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके समक्ष
महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका भण्डार था, तथापि
उन्होंने उसमें-से अल्प लीलाओंका वर्णन करके अन्य
सबको छोड़ दिया। यद्यपि उन्होंने जिन लीलाओंका
वर्णन नहीं करके छोड़ दिया था, तथापि उन लीलाओंको
उन्होंने संक्षेपमें लिखकर रखा है॥ 83-84 ॥
विष्णु, वैष्णव और शुद्धविष्णुभक्तिके सम्बन्धमें चूड़ान्त
(सर्वोत्तम) ग्रन्थ चैतन्यभागवत ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण :-
चैतन्य-मङ्गले तँहो लिखियाछे स्थाने स्थाने।
सेइ वचन शुन, सेइ परम-प्रमाणे ॥ 85 ॥
“संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय कथने।
विस्तारिया वेदव्यास करिबेन वर्णने ॥” 86 ॥
चैतन्यमङ्गले इहा लिखियाछे स्थाने-स्थाने।
सत कहेन, —'आगे व्यास करिला वर्णने ॥' 87 ॥
अनुवाद—उन्होंने चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें)
स्थान-स्थानपर लिखा है, उस वचनको आप सुनिये,
वही सर्वोत्तम प्रमाण है, —“मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका
संक्षेपमें ही वर्णन किया है, विस्तारपूर्वक उसका वर्णन
नहीं किया जा सकता। विस्तारपूर्वक वेदव्यास उसका
वर्णन करेंगे।” चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें) उन्होंने
स्थान-स्थानपर यही लिखा है। उन्होंने सत्य ही कहा
है,—'आगे व्यासने वर्णन किया है॥ '85-87 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें, —'आगे व्यास करिबेन वर्णने
(आगे व्यास वर्णन करेंगे)' अर्थात् चैतन्यभागवतके
आदिखण्डके (1/180) में -
“शेषखण्डे चैतन्येर अनन्त विलास।
विस्तारिया वर्णिते आछेन वेदव्यास ॥”
[अर्थात् “शेषखण्डमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अनन्त
विलास हैं, जिन्हें वेदव्यास विस्तारसे वर्णन करेंगे।”]
आदि बहुतसे वचन श्रील कविराज गोस्वामी प्रमुख
परवर्ती गौरलीला-लेखक शुद्धवैष्णवाचार्योंको उद्देश्य
करके ही लिखे गये हैं, —कोई-कोई इस प्रकारकी
व्याख्या भी करते हैं॥ 87 ॥
अमानी और मानद ग्रन्थकारके द्वारा स्वयंको
ठाकुर-वृन्दावनका उच्छिष्ट भोजी समझना :-
चैतन्यलीलामृत-सिन्धु-दुग्धाब्धि-समान।
तृष्णानुरूप झारी भरि' तँहो कैला पान॥ 88 ॥
ताँर झारी-शेषामृत किछु मोरे दिला।
ततेके भरिल पेट, तृष्णा मोर गेला ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्यलीलामृत-सिन्धु दुग्धके सागरके
समान है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उस सिन्धुसे मटकी
भरकर उसमें-से अपनी प्यासके अनुरूप पान किया।
उन्होंने उस मटकीमें बचे हुए अमृतमें-से कुछ मुझे
दिया, उतनेसे ही मेरा पेट भर गया। अब मेरी तृष्णा
मिट गयी है॥ 88-89 ॥
पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :-
आमि-अति क्षुद्र जीव, पक्षी राङ्गाटूनि।
से यैछे तृष्णाय पिये समुद्रेर पानी ॥ 90 ॥
तैछे आमि एक कण छुइँलुँ लीलार।
एइ दृष्टान्ते जानिह प्रभुर लीलार विस्तार ॥ 91 ॥
अनुवाद—मैं बया पक्षीकी भाँति अति क्षुद्र जीव
हूँ। वह बया जैसे प्यास बुझानेके लिये समुद्रका
बिन्दुमात्र पानी पीती है, वैसे मैंने भी महाप्रभुकी
लीलाके एक कणका ही स्पर्श किया है। इस दृष्टान्तसे
महाप्रभुकी लीलाके विस्तारको समझा जा सकता
है॥ 90-91 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'राङ्गाटूनि', —छोटीसी बया
पक्षी॥ 90 ॥
प्राकृत कवि और साहित्यिककी भाँति अप्राकृत कविसम्राट
ग्रन्थकार अहङ्कार विमूढात्मा नहीं होकर सम्पूर्ण रूपसे
श्रीकृष्णके परतन्त्र और श्रीचैतन्य-इच्छासे परिचालित :-