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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2502, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2502

[ 20/40-47 बीसवाँ अध्याय 485
दिन नहीं बीतते। एक-एक क्षणका समय भी एक-एक
युगके समान प्रतीत होता है। जैसे मेघोंसे वर्षा होती
है, वैसे ही मेरे नेत्रोंसे निरन्तर आँसुओंकी वर्षा हो रही
है। गोविन्दके विरहमें सारा संसार शून्य-सा प्रतीत हो
रहा है। इस तुषानलरूपी (भूसीमें लगी अग्निके समान)
विरहाग्निमें सदा-सर्वदा शरीर जल रहा है, परन्तु प्राण
नहीं निकल रहे हैं॥ 40-41 ॥
कृष्ण उदासीन हैला करिते परीक्षण।
सखी सब कहे, – 'कृष्णे कर उपेक्षण ॥' 42 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरी परीक्षा लेनेके लिये मुझसे
उदासीन हो गये हैं। समस्त सखियाँ कह रही हैं, – 'तुम
भी कृष्णकी उपेक्षा करो॥' 42 ॥
एतेक चिन्तिते राधार निर्मल हृदय।
स्वाभाविक प्रेमार स्वभाव करिल उदय ॥ 43 ॥
एकान्त श्रीकृष्णपरतन्त्रा-शिरोमणि
श्रीराधाभावमय महाप्रभु :-
हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि, विनय।
एतभाव एक-ठानि करिल उदय ॥ 44 ॥
एतभावे राधार मन अस्थिर हैला।
सखीगण-आगे प्रौढ़ि-श्लोक ये पड़िला ॥ 45 ॥
अनुवाद—इस प्रकारके चिन्तनने श्रीराधाके निर्मल
हृदयमें स्वाभाविक प्रेमके स्वभावका उदय करवाया।
उनमें हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि और विनय-इतने
भाव एक साथ उदित हो गये। इन भावोंके एक साथ
उदित होनेसे श्रीराधाका मन अस्थिर हो गया। उन्होंने
सखियोंके समक्ष प्रौढ़ि (परिपक्व)-श्लोकका उच्चारण
किया॥ 43-45 ॥
सेइ भावे प्रभु सेइ श्लोक उच्चारिला।
श्लोक उच्चारिते तद्रूप आपने हइला ॥ 46 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके उसी भावमें विभावित होकर
महाप्रभुने उस श्लोकका उच्चारण किया। वे श्लोकका
उच्चारण करते ही स्वयं भी श्रीराधाके समान हो
गये॥ 46 ॥
सिद्धि अथवा साध्यभक्तिकी निष्ठा अर्थात्
एकान्त श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :-
पद्यावलीके 134वें अंकमें उद्धृत
शिक्षाष्टकका आठवाँ श्लोक-
“आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु
मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो
मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अपने चरणोंकी सेवामें अनुरक्त
मुझ दासीको कृष्ण प्रगाढ़ आलिङ्गन करें अथवा पैरोंके
तले रौंद डालें अथवा अदर्शनके द्वारा मर्माहत ही करें,
वे-लम्पट पुरुष, मेरे प्रति जिस प्रकारका भी विधान
क्यों नहीं करें, [तथापि] वे अन्य कोई नहीं, मेरे ही
प्राणनाथ हैं॥ 47 ॥
अनुभाष्य-
सः पादरतां (चरण-सेवैकपरायणां किङ्करीं) मां (राधाम्)
आश्लिष्य (गाढ़तरं समालिंग्य) वा पिनष्टु (आत्मसात् करोतु)
वा अदर्शनात् (विच्छेदात्) मां मर्महतां (मर्मसुप्रपीड़ितां) करोतु
वा, सः लम्पटः (निजेन्द्रियतर्पणसुखाभिनिविष्टः) यथा तथा
विदधातु (यदृच्छया अन्याभिः वल्लभाभिः सह विहरतु वा) तु
(तथापि) सः (कृष्णः) एव मत्प्राणनाथः (मद्दयितः एव),
अपरः न।
श्लोक-भावानुवाद—कृष्ण चरण-सेवापरायण दासी
मुझ राधाको प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा आत्मसात् करें
अथवा विच्छेदके द्वारा मेरे हृदयको सुप्रीड़ित करें,
अथवा वे (निजेन्द्रियतर्पणके सुखमें अभिनिविष्ट) लम्पट
स्वेच्छासे अन्य प्रियतमाओंके साथ विहार करें, तथापि
कृष्ण मेरे प्राणप्रियतम ही हैं, अन्य कोई नहीं ॥ 47 ॥