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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पचीसवाँ अध्याय 25/220-229 ]
अनुवाद - श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती
उनके गुरुके गुरु-भ्राता थे, इसलिये महाप्रभुने उनके
चरणकमलोंकी वन्दना की। उन दोनोंने महाप्रभुका
प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 220 ॥
दामोदर-स्वरूप, पण्डित गदाधर।
जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द, वक्रेश्वर ॥ 221 ॥
काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, पण्डित-दामोदर।
हरिदास ठाकुर, आर पण्डित-शङ्कर ॥ 222 ॥
भक्त और भगवान्‌के मिलनसे
दोनोंमें ही प्रेमका आवेश :-
आर सब भक्त प्रभुर चरणे पड़िला।
सबा आलिङ्गिया प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ॥ 223 ॥
अनुवाद - श्रीस्वरूप-दामोदर गोस्वामी, श्रीगदाधर-पण्डित,
श्रीजगदानन्द-पण्डित, श्रीकाशीश्वर-पण्डित, श्रीगोविन्द,
श्रीवक्रेश्वर-पण्डित, श्रीकाशी-मिश्र, श्रीप्रद्युम्न-मिश्र,
श्रीदामोदर-पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीशङ्कर-पण्डित
तथा अन्य सब भक्त महाप्रभुके श्रीचरणोंमें पड़ गये, उन
सब भक्तोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट
हो गये ॥ 221-223 ॥
सभीको साथ लेकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :-
आनन्द-समुद्रे भासे सब भक्तगणे।
सबा लञा चले प्रभु जगन्नाथ-दरशने ॥ 224 ॥
अनुवाद-सभी भक्त आनन्दके समुद्रमें डूब गये।
महाप्रभु उन सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके
दर्शनके लिये चल पड़े ॥ 224 ॥
महाप्रभुका प्रेमावेश और नृत्यगीत :-
जगन्नाथ देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हैला।
भक्तसङ्गे बहुक्षण नृत्य-गीत कैला ॥ 225 ॥
अनुवाद - श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके महाप्रभु
प्रेमाविष्ट हो गये। बहुत देर तक वे भक्तोंके साथ नृत्य
और कीर्तन करते रहे ॥ 225 ॥
श्रीजगन्नाथकी प्रसादी-मालाकी प्राप्ति,
पड़िछाओंके द्वारा प्रणाम :-
जगन्नाथ-सेवक आनि' माला-प्रसाद दिला।
तुलसी पड़िछा आसि' चरण वन्दिला ॥ 226 ॥
अनुवाद- श्रीजगन्नाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुको
प्रसादी माला पहनायी। तुलसी-पड़िछाने आकर उनके
श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 226 ॥
चारों ओर महाप्रभुके आगमनके संवादका विस्तार,
कटकसे श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके द्वारा
आकर महाप्रभुका दर्शन :-
'महाप्रभु आइला'-ग्रामे कोलाहल हैल।
सार्वभौम, रामानन्द, वाणीनाथ मिलिल ॥ 227 ॥
अनुवाद-'महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं'-सर्वत्र
यह बात फैल गयी। कटकसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य,
श्रीरामानन्द राय और श्रीद्विज-वाणीनाथने आकर महाप्रभुसे
भेंट की ॥ 227 ॥
महाप्रभुका काशीमिश्रके गृहमें वास
और सार्वभौमका निमन्त्रण :-
सबा सङ्गे लञा प्रभु मिश्र-वासा आइला।
सार्वभौम-पण्डित गोसाञिरे निमन्त्रण कैला ॥ 228 ॥
भक्तोंके साथ प्रसादके सेवनकी इच्छाके लिये प्रसाद
लानेका आदेश :-
प्रभु कहे,-"महाप्रसाद आन' एइ स्थाने।
सबा-सङ्गे इँहा आजि करिमु भोजने ॥ " 229 ॥
अनुवाद-महाप्रभु सभीको अपने साथ लेकर
श्रीकाशीमिश्रके घरपर आ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
और श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको भोजनके लिये
निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको स्वीकार
करके उन दोनोंसे कहा, - "महाप्रसाद यहाँपर ही ले
आइये। आज मैं सबके साथ बैठकर यहींपर ही भोजन
करूँगा ॥ " 228-229 ॥
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[ 25/230-239
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :-
तबे दुँहे जगन्नाथप्रसाद आनिला।
सबा-सङ्गे महाप्रभु भोजन करिला ॥ 230 ॥
अनुवाद-तब वे दोनों श्रीजगन्नाथके प्रसादको लेकर आये और महाप्रभुने सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ 230 ॥
वृन्दावनसे पुरी-आगमनकी यात्रा वर्णित :-
एइ त' कहिलुँ, - प्रभु देखि' वृन्दावन।
पुनः करिलेन यैछे नीलाद्रि-गमन ॥ 231 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने (कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके वृन्दावनके दर्शन और पुनः वृन्दावनसे पुरी आगमनके विषयमें बतलाया है ॥ 231 ॥
श्रवण करनेवालोंको चिद्-वृत्तिकी
स्फूर्त्ति और श्रीकृष्ण प्राप्ति :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
अचिरात् पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥ 232 ॥
अनुवाद-जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 232 ॥
मध्यलीलाका दिग्दर्शन और चौबीस वर्षोंमेंसे छः वर्ष भारतमें नामप्रेमके प्रचारके उद्देश्यसे भ्रमण :-
मध्यलीलार करिलुँ एइ दिग्दर्शन।
छय वत्सर कैला यैछे गमनागमन ॥ 233 ॥
अनुवाद-छः वर्षों तक महाप्रभुने जिस प्रकार नीलाचलसे भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें आना-जाना किया, मैंने मध्यलीलामें उसका केवल दिग्दर्शनमात्र कराया है ॥ 233 ॥
बाकीके अठारह वर्ष पुरीमें भक्तोंके साथ कीर्तन-उल्लास :-
शेष अष्टादश वत्सर नीलाचले वास।
भक्तगण-सङ्गे करे कीर्त्तन-विलास ॥ 234 ॥
अनुवाद-अन्तिम अठारह वर्षों तक महाप्रभुने नीलाचलमें ही वास किया। वहाँपर उन्होंने भक्तोंके साथ कीर्तन-विलास किया ॥ 234 ॥
भागवतमें श्रीव्यासकी रीतिका अनुसरण करते हुए संक्षेपमें मध्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनः चर्चा :-
मध्यलीलार क्रम एबे करि अनुवाद।
अनुवाद कैले हय कथार आस्वाद ॥ 235 ॥
अनुवाद-अब मैं मध्यलीलाके अध्यायोंमें वर्णित विषयोंका क्रमसे पुनः वर्णन करूँगा। पुनः उल्लेख करनेसे उन विषयोंका आस्वादन होता है ॥ 235 ॥
प्रथम परिच्छेदे-शेषलीलार सूत्रगण।
तथि-मध्ये कोन भागेर विस्तार वर्णन ॥ 236 ॥
अनुवाद-पहले अध्यायमें शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और उसीमें ही किसी-किसी भागका विस्तारपूर्वक भी वर्णन किया है ॥ 236 ॥
द्वितीय परिच्छेदे-प्रभुर प्रलाप-वर्णन।
तथि-मध्ये नाना-भावेर दिगदरशन ॥ 237 ॥
अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रलापका वर्णन हुआ है। उसके बीचमें महाप्रभुमें प्रकाशित अनेक-भावोंका दिग्दर्शन भी कराया है ॥ 237 ॥
तृतीय परिच्छेदे-प्रभुर कहिलुँ संन्यास।
आचार्येर घरे यैछे करिला विलास ॥ 238 ॥
अनुवाद-तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके संन्यासका वर्णन किया गया है और श्रीअद्वैताचार्यके घरपर महाप्रभुके विलासका वर्णन है ॥ 238 ॥
चतुर्थे-माधवपुरीर चरित्र-आस्वादन।
गोपाल-स्थापन, क्षीरचुरिर वर्णन ॥ 239 ॥
अनुवाद-चौथे अध्यायमें महाप्रभु और भक्तोंके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्रका आस्वादन, उनके द्वारा
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पचीसवाँ अध्याय 25/239-249 ]
श्रीगोपालके विग्रहकी स्थापना और श्रीगोपीनाथके खीर-
चोरी करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥ 239 ॥
पञ्चमे—साक्षिगोपाल-चरित्र वर्णन।
नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥ 240 ॥
अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा
साक्षी गोपालके चरित्रका वर्णन और महाप्रभुके द्वारा
उसके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 240 ॥
षष्ठे—सार्वभौमेर करिला उद्धार।
सप्तमे—तीर्थयात्रा, वासुदेव-निस्तार ॥ 241 ॥
अनुवाद—छठे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके उद्धारका वर्णन हुआ है। सातवें अध्यायमें
महाप्रभुकी तीर्थयात्रा और उनके द्वारा श्रीवासुदेव-विप्रके
उद्धारका वर्णन हुआ है॥ 241 ॥
अष्टमे—रामानन्द-संवाद विस्तार।
आपने शुनिला 'सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥ 242 ॥
अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीराम force/रामानन्द-संवादका
वर्णन हुआ है। स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके
मुखसे सभी सिद्धान्तोंके सारका श्रवण किया॥ 242 ॥
नवमे—कहिलुँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण।
दशमे—कहिलुँ सर्व वैष्णव-मिलन ॥ 243 ॥
अनुवाद—नौवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुके द्वारा किये
गये दक्षिण भारतके तीर्थोंके भ्रमणका वर्णन किया है।
दसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ सभी वैष्णवोंके मिलनका
वर्णन हुआ है॥ 243 ॥
एकादशे—श्रीमन्दिरे 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'।
द्वादशे—गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥ 244 ॥
अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें
हुए 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'का (परिक्रमा करते हुए कीर्त्तनका)
वर्णन हुआ है। बारहवें अध्यायमें गुण्डिचा-मन्दिरकी
सफाई-धुलाईका वर्णन हुआ है॥ 244 ॥
त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्त्तन।
चतुर्दशे—'हेरापञ्चमी'-यात्रा-दरशन ॥ 245 ॥
तार मध्ये व्रजदेवीर् भावेर श्रवण।
स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥ 246 ॥
अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें रथके आगे महाप्रभुके
द्वारा किये गये नृत्यका वर्णन हुआ है। चौदहवें
अध्यायमें 'हेरा-पञ्चमी' यात्राके दर्शनका वर्णन हुआ है
और महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे व्रजदेवियोंके भावोंको
सुनकर उसका आस्वादन किया॥ 245-246 ॥
पञ्चदशे—भक्तेर गुण आपने कहिल।
सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥ 247 ॥
अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा अपने
भक्तोंके गुणोंका वर्णन, उनके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
घरपर भिक्षा करने और अमोघके उद्धारका भी वर्णन
हुआ है॥ 247 ॥
षोडशे—वृन्दावन-यात्रा गौड़देशे-पथे।
पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥ 248 ॥
अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें महाप्रभुकी गौड़देश
(बङ्गाल)से होते हुए वृन्दावनके लिये जानेका वर्णन
है। किन्तु वे वृन्दावन न जाकर कानाइ-नाटशालासे
ही नीलाचल लौट आये॥ 248 ॥
सप्तदशे—वनपथे मथुरा-गमन।
अष्टादशे—वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥ 249 ॥
अनुवाद—सत्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके झारिखण्डके
वनके मार्गसे मथुरा जानेका और अठारहवें अध्यायमें
महाप्रभुके वृन्दावन-विहारका वर्णन हुआ है॥ 249 ॥
। 513

[ 25/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ऊनविंशे-मथुरा हैते प्रयाग-गमन।
तार मध्ये श्रीरूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥ 250 ॥
अनुवाद-उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके मथुरासे प्रयाग
लौटनेका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके
द्वारा श्रीरूप गोस्वामीमें शक्ति-सञ्चार करनेका वर्णन भी
है॥ 250 ॥
विंशति परिच्छेदे-सनातनरे मिलन।
तार मध्ये भगवानरे स्वरूप-वर्णन ॥ 251 ॥
अनुवाद-बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ श्रीसनातन
गोस्वामीके मिलनका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें
महाप्रभुके द्वारा भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन भी लिखा
है॥ 251 ॥
एकविंशे-कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन।
द्वाविंशे-द्विविध साधनभक्तिर विवरण ॥ 252 ॥
अनुवाद-इक्कीसवें अध्यायमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य
और माधुर्यका वर्णन और बाइसवें अध्यायमें दो
प्रकारकी साधनभक्तिका विवरण दिया गया है ॥ 252 ॥
त्रयोविंशे-प्रेमभक्तिरसेर कथन।
चतुर्विंशे-'आत्मारामा'-श्लोकार्थ-वर्णन ॥ 253 ॥
अनुवाद-तेइसवें अध्यायमें प्रेमभक्तिरसका वर्णन
और चौबीसवें अध्यायमें 'आत्मारामा:' श्लोकके अर्थोंका
वर्णन हुआ है॥ 253 ॥
पञ्चविंशे-काशीवासीरे वैष्णवकरण।
काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥ 254 ॥
अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा
काशीवासियोंको वैष्णव बनाने और महाप्रभुके काशीसे
पुनः नीलाचल आनेका वर्णन हुआ है॥ 254 ॥
पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलुँ अनुवाद।
याहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥ 255 ॥
अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें मैंने सम्पूर्ण मध्यलीलाका
क्रमशः पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे
सम्पूर्ण ग्रन्थके तात्पर्यको जाना जा सकता है ॥ 255 ॥
संक्षेपमें मध्यलीला वर्णित :-
संक्षेपे कहिलुँ एइ मध्यलीलार सार।
कोटिग्रन्थे वर्णन ना याय इहार विस्तार ॥ 256 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेपमें मध्यलीलाके
सारका वर्णन किया है, विस्तारसे तो इसका करोड़ों
ग्रन्थोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 256 ॥
जीवोंके उद्धारके लिये महाप्रभुका सम्पूर्ण भारत-भ्रमण
और स्वयं आचरण करके प्रचार :-
जीव निस्तारिते प्रभु भ्रामला देशे-देशे।
आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥ 257 ॥
अनुवाद-जीवोंका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने
देश-देशमें भ्रमण किया। स्वयं भक्तिका आस्वादन करते
हुए उन्होंने भक्तिका प्रचार किया ॥ 257 ॥
महाप्रभुके द्वारा प्रचारित विषय-समूह :-
कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व आर।
भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार ॥ 258 ॥
श्रीभागवत-तत्त्वरस करिला प्रचारे।
कृष्णतुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥ 259 ॥
कभी तो श्रोतारूपमें, और कभी
वक्तारूपमें शुद्धभक्तिका प्रचार :-
भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने।
काँहा भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥ 260 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकृष्ण-तत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व,
भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार और श्रीभागवतके
तत्त्व एवं रसका प्रचार किया। उन्होंने संसारमें इस
बातको प्रकाशित किया कि श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्ण
अभिन्न हैं, श्रीभागवत श्रीकृष्णका वाङ्मय अवतार है।
कभी तो महाप्रभुने भक्तोंके लिये स्वयं अपने मुखसे
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Here is the complete transcription of the text from the image:

पचीसवाँ अध्याय [25/258-266 ]
भागवतके तत्त्वोंका वर्णन किया और कभी उन्होंने
भक्तोंमें शक्ति सञ्चरित करके उनके मुखसे स्वयं
उसका श्रवण किया ॥ 258-260 ॥
अनुपम भक्तवत्सल, अद्वितीय और
अहैतुकी कृपाके सागर :-
श्रीचैतन्यसम आर कृपालु, वदान्य।
भक्तवत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥ 261 ॥
अनुवाद—तीनों लोकोंमें मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके
समान कोई कृपालु, वदान्य और भक्तवत्सलको नहीं
देखता हूँ॥ 261 ॥
अन्धविश्वास छोड़कर वास्तव-वस्तुमें दृढ़-विश्वासके
फलस्वरूप ही परतत्त्व श्रीचैतन्य-कृष्णकी प्राप्ति :-
श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्तगण।
इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥ 262 ॥
इहार प्रसादे पाइबा कृष्णतत्त्वसार।
सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा पाइबा पार ॥ 263 ॥
अनुवाद—हे भक्तों! श्रद्धापूर्वक इन लीलाओंका
श्रवण करो, इनकी कृपासे आपको श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी। इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक
श्रवण करनेसे आप श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझ सकोगे।
श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझनेपर सभी शास्त्र-सिद्धान्तोंका
स्वतः ही पूर्ण ज्ञान हो जाता है ॥ 262-263 ॥
श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यलीला-अभिन्न अमृतकी नदी,
वह केवलमात्र शुद्धचित्त भक्तके द्वारा ही आस्वाद्य :-
कृष्णलीला अमृत-सार, तार शत शत धार,
दशदिके बहे याहा हैते।
से चैतन्यलीला हय, सरोवर अक्षय,
मनोहंस चराह' ताहाते ॥ 264 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण-लीलाएँ अमृतका सार हैं। इनकी
सैकड़ों धाराएँ दसों दिशाओंमें बहती हैं। श्रीकृष्ण-
लीलाओंसे अभिन्न श्रीचैतन्य-लीलाएँ अक्षय सरोवर हैं,
हे भक्तों! अपने मनरूपी हंसको उसमें विहार
कराओ॥ 264 ॥
ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक प्रार्थना :-
भक्तगण, शुन मोर दैन्य-वचन।
तोमा-सबार पदधूलि, अङ्गे विभूषण करि',
किछु मुञि करों निवेदन ॥ 265 ॥ ध्रु. ॥
अनुवाद—हे भक्तों! आप मेरी विनती सुनो। आप
सबके चरणकमलोंकी धूलिको अपने अङ्गोंका विभूषण
बनाकर मैं कुछ निवेदन कर रहा हूँ॥ 265 ॥
भक्तिसिद्धान्तसमूह और श्रीकृष्णप्रेमरसके
आस्वादनके लिये भक्तोंसे अनुरोध :-
कृष्णभक्तिसिद्धान्तगण, याते प्रफुल्ल पद्मवन,
तार मधु करि' आस्वादन।
प्रेमरस-कुमुदवने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने,
ताते चराओ मनोभृङ्गगण ॥ 266 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिसिद्धान्त-समूह प्रफुल्लित
कमलोंके वन सदृश्य है, कृपा करके आप उन
कमलोंके मकरन्दका आस्वादन कीजिये। इस सरोवरमें
प्रेमरसरूपी कुमुदवन रात-दिन प्रफुल्लित हो रहा है,
हे भक्तों! उसमें अपने मनरूपी भ्रमरको विहार
कराओ॥ 266 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला ही 'अमृत-सार वस्तु' है;
उसके अतिरिक्त, —सब कुछ ही 'असार' है।
श्रीकृष्णलीलामृत सारकी सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ
श्रीकृष्णलीलामृतसे दसों दिशाओंमें प्रवाहित होती हैं।
श्रीकृष्णलीलामृत-सार ही श्रीचैतन्यलीला है।
श्रीचैतन्यलीलाको श्रीकृष्णलीलासे पृथक् मानकर वर्तमान
कालमें नयी-नयी कल्पनाओंके प्रभावसे उत्पन्न “नदीया
और गौरनागरी लीला” आदि नये मतवादोंकी सृष्टि
करनेकी चेष्टा चल रही है। थियसफिस्ट दलके कई
लोग और अन्यान्य भक्ति-विरोधी प्राकृत बाउल और
। 515

[ 25/264-269 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सहजिया दलके कई व्यक्ति अपनी-अपनी उच्छृङ्खल
प्राकृत-वृत्तिके साँचेमें ढालकर अर्थात् अपनी वृत्तिके
अनुसार ही श्रीगौराङ्गको भी कोई राजनैतिक-नेता
अथवा कोई शक्तिके उपासक अथवा कोई अवैध
नागरीका लम्पट माननेकी धारणा रखते हैं। गोलोककी
नित्यलीला ही प्रकटकालमें प्रपञ्चमें उदित होती है।
महाप्रभुकी प्रकटलीलामें उस समय श्रीरूपादि श्रीगौरलीलाके
पार्षदवर्गमेंसे किसीने भी उस लीलामें गौरनागर-लीलाको
नहीं देखा अथवा समझा, इसलिये तथाकथित गौरनागर-लीला
निश्चय ही चैतन्यलीला नहीं है। श्रीरुपानुग वैष्णव-गुरुके
चरणचिह्नोंका अनुसरण करके श्रीगौरभक्ति करना ही
कर्त्तव्य है। कल्पनाके सरोवरमें अवगाहन करके
'नवगोरार दल' बनाकर कोई भी फल नहीं मिलेगा।
'चैतन्यलीला'-अक्षय सरोवर है; श्रीकृष्णभक्ति-
सिद्धान्त-समूह-उस सरोवरके कमलके वन हैं;
प्रेमरस-कुमुदवन है; और भक्तोंका मन-भँवरोंका
समूह है॥ 264-266॥
श्रीकृष्णलीलाका वैचित्र्य-समूह ही भक्तोंका जीवन :-
नाना-भावेर भक्तजन, हंस-चक्रवाकगण,
याते बसि' करेन विहार।
कृष्णकेलि-मृणाल, याहा पाइ सर्वकाल,
भक्त-हंस करये आहार ॥ 267 ॥
अनुवाद— अनेक भावोंके हंस, चक्रवाकादि रूपी
भक्तगण इस (श्रीचैतन्यलीलारूपी) अक्षय सरोवरमें
सदैव विहार करते हैं। इस सरोवरमें श्रीकृष्णलीलारूपी
मृणाल (कमलनाल) सदा उपलब्ध है और भक्तरूपी
हंस सदैव उस कमलनालका आहार करते हैं॥ 267॥
अनुभाष्य— श्रीकृष्णकेलिरूपी कमलनाल ही भक्त
रूपी हंसका 'आहार' है। नित्यसम्भोगरस-विग्रह
श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न-तनु
नित्यविप्रलम्भरसविग्रह श्रीगौरसुन्दरके आश्रित नित्यसेवक
भक्तोंकी आहार योग्य वस्तु है॥ 267॥
वैसे आस्वादनसे ही प्रेमोल्लासकी वृद्धि :-
सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हञा,
सदा ताँहा करह विलास।
खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख,
अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥ 268 ॥
अनुवाद— हे श्रीगौरभक्तों! आप भी हंस, चक्रवाक
बनकर उस सरोवरमें जाकर सदैव वहीं विलास करो।
इससे आपके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे और आपको
परम सुखकी प्राप्ति होगी और अनायास ही प्रेमोल्लास
उत्पन्न होगा ॥ 268 ॥
अनुभाष्य— हे श्रीगौरभक्तों, श्रीचैतन्यलीलाके सरोवरमें
अवगाहन करके नित्यकाल श्रीगौरपदाश्रित हंस-चक्रवाकके
रूपमें श्रीकृष्णका भजन करते-करते श्रीगौर-उपासनारूपी
सरोवरमें विलास करो। ऐसा करनेपर नदीया-नागरीकी
भाँति श्रीगौराङ्गको कोई भोग्य-जड़वस्तुके रूपमें कल्पना
करके श्रीकृष्णसे इतर सेवारूपी 'दुःख'से बच जाओगे
और श्रीकृष्णसेवारूपी परमसुखको प्राप्त करके (तुम)
श्रीकृष्णप्रेमके उल्लासमें मत्त हो जाओगे ॥ 268 ॥
शुद्धभक्तोंके द्वारा विश्ववासियोंमें
श्रीगौरकृष्णलीलामृतका वितरण :-
एइ अमृत अनुक्षण, साधु-महान्त-मेघगण,
विश्वोद्याने करे वरीषण।
ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर,
तार प्रेमे जीये जगजन ॥ 269 ॥
अनुवाद— साधु-महान्त पुरुष ही मेघ बनकर
विश्वरूपी उद्यानमें इस लीलारूपी अमृतका निरन्तर
वर्षण करते हैं। उस वर्षणके फलस्वरूप प्रेमरूपी
अमृत-फल फलता है। भक्तगण उसको निरन्तर खाते
हैं और जगत्वासी उन भक्तोंके उच्छिष्टको खाकर
सुखपूर्वक जीवित रहते हैं॥ 269 ॥
अनुभाष्य— श्रीगौरपदाश्रित साधु-महान्त ही मेघसमूह
हैं। वे सदैव जगत्रूपी उद्यानमें श्रीकृष्णलीलामृतका
516 |

पचीसवाँ अध्याय 25/269–272 ]
वर्षण करते हैं। इस जलधाराके सींचनेके प्रभावसे
प्रेमामृत-फलके फलनेपर भक्तगण उसे निरन्तर खाते हैं
और उनके प्रेमसे विश्ववासी जीवन धारण करते
हैं॥ 269 ॥
श्रीगौरलीला—घने दूधका पूर (सागर), उसमें
श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर, श्रौत-पन्थामें हरि-गुरु-वैष्णवकी
कृपासे उसके आस्वादनकी सम्भावना :—
चैतन्यलीला—अमृतपूर, कृष्णलीला—सुकर्पूर,
दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य।
साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे,
सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥ 270 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्यलीला उस प्रेमामृतके सागर सदृश
है और श्रीकृष्णलीला-सुकर्पूरके समान है। दोनों
लीलाएँ मिलनेपर अत्यधिक मधुर और आस्वादनीय हो
जाती हैं। साधु-गुरुकी कृपासे ही जो कोई उसका
आस्वादन करता है, वही माधुर्यकी चरमसीमाको जान
पाता है॥ 270 ॥
अनुभाष्य—चैतन्यलीलामृत—उस प्रेमामृतके 'सागर'के
समान है और श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर-तुल्य है; इन
दोनों लीलामृतका एक साथ मिलना ही सुमाधुर्य है।
श्रीकृष्णलीला-माधुर्य श्रीचैतन्यलीलामृतके सहयोगसे
पुष्ट होकर सुमाधुर्यमय हो गया है। श्रीगौर-विरोधी
असुरदल श्रीगौरलीला अथवा श्रीगौर-मन्त्रको स्वीकार
नहीं करता, इसलिये उनके द्वारा श्रीकृष्णलीला-माधुर्यका
आस्वादन करना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर,
श्रीकृष्णविरोधी दैत्यदल श्रीकृष्णलीलामृतसे उदासीन
होकर नदीया-नागरीके अनुगत नागरी-अभिमानसे
विप्रलम्भरसविग्रह श्रीराधाकृष्ण-अभिन्न-तनु श्रीगौरको
श्रीकृष्णसे अलग करके अर्थात् सम्भोगरसविग्रह मानकर
श्रीगौरलीलाके वैचित्र्यके माधुर्यका समूल विनाश करते
हैं। श्रीरूपानुग-साधु-गुरु-कृपाके द्वारा अर्थात्
श्रीरूपानुगत्यमें श्रीगौरलीलामृत और श्रीकृष्णलीलामृतको
परस्पर 'अभिन्न' जाननेपर दोनों लीलाओंके एक साथ
सम्मिलनसे ही केवल प्रचुर माधुर्यका आस्वादन होता
है। श्रीरूपानुग व्यक्ति केवलमात्र इसीपर ही दृढ़भावसे
विश्वास करते हैं॥ 270 ॥
ये दोनों लीलामृत ही भक्तोंका आहार, इसके अतिरिक्त
अन्नग्रहण करनेपर भी भक्त-जीवनकी अपुष्टि :—
ये लीला-अमृत बिने, खाय यदि अन्नपाने,
तबे भक्तेर दुर्बल जीवन।
यार एकबिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनुमने,
हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 271 ॥
अनुवाद—इस लीलामृतके बिना भक्त अन्नादि
खानेपर भी वास्तवमें दुर्बल रहता है। परन्तु इस
लीलामृतकी एक बिन्दुका पान करनेसे ही वह तन-
मनसे अत्यन्त प्रफुल्लित होकर हँसता, गाता और नृत्य
करता है॥ 271 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य अन्न खानेसे पुष्ट होता
है। बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति अन्न खानेपर भी यदि
भक्तगण श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यलीलामृतका पान
नहीं करते हैं, तो वे भी बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति
(परमार्थ-पथके लिये) दुर्बल हो जाते हैं॥ 271 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरे—'खाय यदि अनुपाने।'॥ 271 ॥
तर्कपन्याससे यह अमृत दुर्लभ :—
ए अमृत कर पान, यार सम नाहि आन,
चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास।
ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते, अमेध्य-कर्कश-आवर्त्ते,
याते पड़िले हय सर्वनाश ॥ 272 ॥
अनुवाद—हे भक्तों! चित्तमें ऐसा सुदृढ़ विश्वास
रखकर कि इसके समान अन्य कुछ भी नहीं है, इस
अमृतका पान करो। साथ ही इस बातसे बहुत सावधान
रहना कि कहीं कुतर्करूपी गड्ढे अथवा अपवित्र
दुर्गन्धयुक्त कठोर बवण्डरमें मत उलझ जाओ, उसमें
फँसनेसे सर्वनाश हो जाता है॥ 272 ॥
। 517

[ 25/272-276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाको परस्पर
भिन्न समझकर कुतर्कके आधारपर अपवित्र कर्कश
घूमनेवाली वायुके द्वारा चलायमान होकर श्रीकृष्णभजन
छोड़कर श्रीगौरभजन करने अथवा श्रीगौरसेवाको
छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करनेपर, मूढ़-जीवका सर्वनाश
होता है॥ 272 ॥
पञ्चतत्त्वको और श्रोताओंको प्रणाम :—
श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, श्रीअद्वैत, भक्तवृन्द,
आर यत श्रोता भक्तगण।
तोमा-सबार श्रीचरण, करि शिरे भूषण,
याहा हैते अभीष्ट-पूरण ॥ 273 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु,
श्रीअद्वैताचार्य, समस्त गौरभक्तवृन्द और जितने श्रोता
भक्तवृन्द हैं, मैं आप सबके श्रीचरणकमलोंको अपने
सिरका विभूषण बनाता हूँ, उसीसे ही मेरी अभीष्ट-पूर्ति
होगी॥ 273 ॥
अभीष्ट आराध्यको प्रणाम :—
श्रीरूप-सनातन- रघुनाथ-जीव-चरण,
शिरे धरि,—यार करि आश।
कृष्णलीलामृतान्वित, चैतन्यचरितामृत,
कहे किछु दीन कृष्णदास ॥ 274 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके
श्रीचरणकमलोंको सिरपर धारण करके उनकी कृपाकी
मैं सदैव आशा करता हूँ। मैं, कृष्णदास, श्रीकृष्णलीलासे
युक्त श्रीचैतन्यचरितामृतका दीनतापूर्वक कुछ वर्णन
करनेका प्रयास कर रहा हूँ॥ 274 ॥
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये।
चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 275 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्द-
देवकी तुष्टिके लिये यह चैतन्यचरितामृत ग्रन्थ श्रीकृष्ण-
चैतन्य महाप्रभुको समर्पित हो॥ 275 ॥
अनुभाष्य—
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये (श्रीमन्मदनगोपालः गोविन्ददेवः
च तयोः तुष्टये प्रीत्यै) एतत् चैतन्यचरितामृतं चैतन्यार्पितमस्तु
(श्रीकृष्णचैतन्याय समर्पयामि)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥
अभक्तोंकी निन्दा-प्रशंसाके प्रति निरपेक्ष ग्रन्थकारका
भक्तोंके सुखसे ही स्वयंको कृतार्थ मानना :—
तदिदमतिरहस्यं गौरलीलामृतं यत्
खलु समुदय-लोकैर्नादृतं तैरलभ्यम्।
क्षतिरियमिह का मे स्वादितं यत् समन्तात्
सहृदय-सुमनोभिर्मोदमेषां तनोति ॥ 276 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे काशीवासि-वैष्णवकरणं
पुनर्नीलाचल-गमनञ्च पञ्चविंशः परिच्छेदः।
इति मध्यलीला समाप्ता
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 276 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यह अति रहस्यमय श्रीगौर-
लीलामृत भक्तोंका प्राणधन होनेपर भी अनधिकारी लोग
निश्चय ही इसका आदर नहीं करेंगे, इसमें मेरी कोई
हानि नहीं है, परन्तु यह लीलामृत जिन सब सहृदय
साधुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे आस्वादित होगा, यह ग्रन्थ
उन महात्माओंके आनन्दका विस्तार करे॥ 276 ॥
पचीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें काशीवासियोंका
वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन नामक पचीसवें
अध्यायका अनुवाद समाप्त।
अनुभाष्य—
अतिरहस्यं (परमगोपनीयं) तत् गौरलीलामृतम् (इदं ग्रन्थरत्नं)
खलु (निश्चितं) समुदयलोकैः (असद्भिरनधिकारिभिः सर्वैः) न
518

पचीसवाँ अध्याय 25/276 ]
आदृतं, यतः [इदं] तैः (असद्भिः) अलभ्यं (लब्धुमशक्यम्); श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 276 ॥
इह (अत्र) मे (मम) इयं का क्षतिः (हानिः)?- यत् (यत्र) पचीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
सहृदयसुमनोभिः (निष्कपटैः सुधीभिः ऐकान्तिकचित्तैः) समन्तात्
(सर्वतः) स्वादितं (सत्) एषां (सुमनसां) मोदं तनोति मध्यलीला समाप्त
(विस्तारयति)।
। 519

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
520 ।

श्लोक सूची

[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]


अ
अअन्यथा विश्वमोहोऽपि 17/216अहं त्वां सर्वपापेभ्यो 22/91
अक्रूरस्त्वभिवन्दने 22/132अन्ये च संस्कृतात्मानो 20/173अहं वेद्मि शुको वेत्ति 24/314
अक्ष्णोः फलं त्वादृश 20/61अन्वय–व्यतिरेकाभ्यां 25/121अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः 24/183
अगजगदोकसामखिल 15/180अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य 20/262अहमिह नन्दं वन्दे 19/96
अगत्येकगतिं नत्वा 21/1अपरिकलितपूर्वः 20/182अहमेवासमेवाग्रे 24/72, 25/111
अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे 15/1अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो 19/143अहैतुक्यव्यवहिता या 19/172
अचिरादेव सर्वार्थः 20/106, 24/164अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं 20/116अहो धन्योऽसि देवर्षे 24/272
अजनि च यन्मयं 19/143अपि सम्भावना–प्रश्न 24/64अहो बकी यं स्तन– 22/95
अजातशत्रवः शान्ताः 22/78अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं 19/75अहो बत श्वपचोऽतो 19/72
अजानता महिमानं तवेदं 19/199अप्राप्तातीत–नष्टार्था 24/175अहो महात्मन् 24/120
अटति यद्भवानहि काननं 21/124अवजानन्ति मां मूढा 25/38आ
अत आत्यन्तिकं क्षेमं 22/82अवतारावलीबीजं हतारि 23/77आकर्ण्य वेणुरणितं 17/36
अतः श्रीकृष्णनामादि न 17/136अवतारा ह्यसंख्येया 20/249आकृतिः कृतचेतसां 15/110
अतुल्यमधुरप्रेम–मण्डित 23/78अवरुह्य गिरेः कृष्णो 18/25आततत्वाच्च 24/68, 74
अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन 23/74अविचिन्त्यमहाशक्तिः 23/76आत्मनिक्षेप–कार्पण्ये 22/97
अथ वृन्दावनेश्वर्य्याः कीर्त्यन्ते 23/82अविद्या–कर्मसंज्ञान्या 20/112, 24/303आत्मा देहमनोब्रह्म 24/12
अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च 23/76अभयं सर्वदा तस्मै 22/34आत्मानञ्च तदालोकाद् 18/1
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः 23/101अमृतं शाश्वतं 21/51, 21/88आत्मावास्यामिदं विश्वं 25/99
अध्यात्ममहदाख्यानं नित्यं 24/112अयं नेता सुरम्याङ्गः 23/66आत्मारामगणाकर्षीत्यमी 23/77
अनन्यममता विष्णौ ममता 23/8अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य 20/182आत्मारामतया मे वृथा 24/123
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष 23/104अर्च्ययामेव हरये पूजां 22/71आत्मारामश्च 17/140, 24/5, 25/152
अनादिरादिर्गोविन्दः 20/154, 21/35अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां 25/137आत्मारामेति पद्यार्कस्य 24/1
अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै 18/25अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च 24/294आदौ श्रद्धा ततः साधु 23/14
अनिकेतः स्थिरमतिः 23/107असमानोर्ध्वरूपश्री 23/79आद्योऽवतारः पुरुषः 20/267
अन्तर्गतः स्वविवरेण 17/142, 24/45, 24/110, 25/151असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः 20/398आधत्त वीर्यं साऽसूत 20/274
अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा 23/36अस्पन्दनं गतिमतां पुलक 24/201आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः 22/97
अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो 24/343अस्माभिर्यदनुष्ठेयं 15/269आपामरं यो विततार 23/1
अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ 24/123आपाययति गोविन्दपाद 24/209

। 521

[ आयु-क्षति ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

आयुः श्रियं यशो धर्मं 25/82उरुक्रमे एव भक्तिमेव 24/300कालवृत्त्यात्ममायायां 20/275
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म 24/153ऋकालेन वृन्दावनकेलि 19/119, 24/345
आरुह्य कृच्छ्रे 24/126, 136, 25/32ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 25/117कालेन येर्वा विमिताः 21/11
आरुह्य ये द्रुमभुजान् 24/170ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता 19/165का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृत 24/52
आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी 24/89एकिं विधत्ते किमाचष्टे 20/147
आलिलिङ्ग परिघायत 24/344एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना 20/110किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा 24/173
आशाबन्धः समुत्कण्ठा नाम 23/18एकन्तुः महतः स्रष्टृकीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त 20/342
आसक्तिस्तद्गुणाख्याने 23/19एतावदेव जिज्ञास्यं 25/121कीर्त्त्यमानं यशो यस्य 24/93
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य 20/331एतावान् सर्ववेदार्थः 20/148कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च 21/124
इएतेऽलिनस्तव यशोऽखिल 24/171कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वर 22/19
इति मत्वा भजन्ते मां 24/183एते चांशकलाः पुंसः कृष्ण 20/156कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा 23/61
इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्द 19/229एते न ह्यद्भूता व्याध 22/143, 24/267कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति 17/140, 24/5, 25/152
इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्द 23/80एतौ हि विश्वस्य 20/262कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते 19/197
इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो 20/147एवं गुणाश्रतुर्भेदाः 23/80कृतिसाध्या भवेत् साध्य 22/102
इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभाव 23/19एवंव्रतः स्वप्रियनाम 23/37, 25/135कृते यद्ध्यायतो विष्णुं 20/343
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं 20/156एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धं 19/208कृपामृतेनाभिषिषेच 19/119, 24/345
इष्टे स्वारसिकी रागः 22/146ककृष्णं स्मरन् जनश्चास्य 22/156
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो 22/57कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं 22/93कृष्णप्रियावलीमुख्या 23/86
ईकदाहं यमुनातीरे नामानि 23/33कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं 20/340
ईश्वरः परमः कृष्णः 20/154, 21/35कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति 19/98कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानं 20/162
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु 22/70करुणानिकुरम्बकोमले 21/45कृष्णस्य पूर्णतमता 20/399
उकरौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु 22/133कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्य 20/97
उक्तार्थानामप्रयोगः 24/293कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे 24/209कृष्णादिभिर्विभावाद्यैः 23/93
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव 15/237कर्माणि निर्दहति किन्तु 15/170कृष्णाय कृष्णचैतन्याम्ने 19/53
उत्सृज्यैतानथ यदुपते 22/16कलावप्यतिगूढेयं भक्तियेन 22/1कृष्णे स्वधामोपगते 24/316
उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय 24/115कलिं सभाजयन्त्यार्या 20/345केचित् स्वेद्धान्तर्हृदयावकाशे 24/150
उदरमुपासते य 24/160, 207कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति 20/342केशाग्रशतभागस्य 19/140
उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी- 20/181कलौ नष्टदृशामेषः 24/316को वेत्ति भूमन् भगवन् 21/9
उद्वाष्पः पुण्डरीकाक्ष 23/33कस्यान्सुभावोऽस्य न देव 24/51क्रमः शक्तौ परिपाट्यां 24/24
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं 19/203काचं विचिन्वन्नपि 22/42, 24/213क्रीडाकन्दुकतां येन नीतो 18/38
उवाह भगवान् कृष्णः 19/205कामश्च दास्ये न तु 22/135क्व वा कथं वा कति 21/9
कामादीनां कति न 22/16क्षतिरियमिह का मे 25/276

522 |

श्लोक सूची क्षान्ति-तर्को ]
क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं 23/18 | चतुर्भुजं कअरथाङ्गशङ्ख 24/150 | तं सनातनमुपागतमक्षणोदृष्टि 24/344
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव 25/39 | चत्वारो जज्ञिरे वर्णा 22/27, 108 | तज्जोषणादाश्वपवर्ग 22/83, 23/16
क्षीरं यथा दधि विकार 20/310 | चत्वारो वासुदेवाद्या नारायण 20/242 | तत्कर्णिकारं तद्धाम तदनन्तांश 20/258
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः 24/304 | चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता 24/21 | तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं 22/156
क्षेमं न विन्दन्ति बिना 22/20 | चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे 24/63 | तत्तद्देवावगच्छ त्वं मम 20/373
ख | चारु-सौभाग्यरेखाढ्या 23/83 | तत्तद्भावादिमाधुर्य्ये श्रुते 22/151
ख इव रजांसि वान्ति 21/15 | चित्रं बतौतदेकेन वपुषा 20/170 | तत् किं करोमि विरलं 23/29
ग | चिराद्दत्तं निज-गुप्तवित्तं 23/1 | तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः 23/95
| चीराणि किं पथि न सन्ति 23/109 | तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते 22/98
गच्छन् वृन्दावनं गौरो 17/1 | चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं 20/181 | तत उद्गादनन्त तव 24/160, 207
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः 19/209 | चैतन्यार्पितमस्तु 25/275 | ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा 19/208
गा गोपकैरनुवनं नयतोख्दार 24/201 | ज | ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् 23/14
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ 25/137 | जगत्तमो जहाराव्यात् स 24/1 | ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता 19/207
गायन् गुणान् दशशतानन 21/13 | जगद्धिताय सोऽप्यत्र 20/162 | तत्त्वं सनातनार्येशः 20/97
गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता 25/128 | जगृहे पौरुषं रूपं 20/266 | तथाऽविदांसिनः कूल्याः सरसः 20/249
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् 21/11 | जन्माद्यस्य यतः 20/357, 25/141 | तथा मद्भिक्षया भक्तिरुद्धवैनांसि 24/57
गुणालिसम्पत् कविता च 17/212 | जय जय जह्याजामजित 15/180 | तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते 25/107
गुर्वीर्पातगुरुस्नेहा सखीप्रणयिता 23/86 | जयति व्रजराजनन्दने न 21/45 | तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो 22/100
गृहीतचेता राजर्षे 24/46, 25/150 | जहौ युवैव मलवदुत्तमः 23/24 | तदिदमतिरहस्यं गौरलीला 25/276
गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय 20/170 | जानन्त एव जानन्तु 21/27, 83 | तदीयेतितशेषु भक्तैर्जितत्वं 19/229
गोकुलप्रेमवसतिर्जगच्छ् | जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं 20/61 | तद्वा इदं भुवनमङ्गल 25/37
गोपति-तनयाकुञ्जे गोपवधूट्टी 19/98 | जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं 19/140 | तद्विद्यादात्मनो मायां 25/117
गोपीकोलूखले दाम्ना बबन्ध 19/204 | जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्ति 23/91 | तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तं 20/160
गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य 21/112 | जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति 25/74 | तद्भावलिप्सुना कार्या 22/154
गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले 21/49 | जीवभूतां महाबाहो ययेदं 20/116 | तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र 25/139
गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिः 24/343 | जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु 23/73 | तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां 19/211
गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् 16/1 | ज्ञानं मे परमगुह्यं यद्विज्ञान 25/103 | तन्मयी या भवेद्भक्तिः 22/146
ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः 25/137 | ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो 20/371 | तन्माययातो बुध 20/119, 24/132
ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे 24/18 | ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा 24/82 | तपस्विनो दानपरा यशस्विनो 22/20
घ | त | तव मधुरस्वरकण्ठी गायति 23/30
घ्राणश्च तत्पादसरोजसौरभे 22/134 | त आवेशा निगद्यन्ते जीवा 20/371 | तवास्मीति वदन् वाचा तथैव 22/98
च | तं मत्वात्मजमव्यक्तं 19/204 | तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः 20/115
चतुर्विधा भजन्ते मां 24/89 | तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा 23/21 | तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो 17/186, 25/56
। 523

[ तल्लभ्यते-नारायण श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं 24/163
तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान् 22/107
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो 22/142
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं 20/58
तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् 24/67
तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम 25/37
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे 19/134
तस्याः पारे परव्योम 21/51, 88
तस्याः सुदुःखभय-शोक 19/201
तस्यारविन्दनयनस्य 17/142, 24/45, 24/110, 25/151
तस्यैव हेतोः प्रयतेत 24/163
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु 25/39
तावत् कर्माणि कुर्वीत 22/61
तावद्भक्तिसुखस्यात्र 19/176
तितिक्षवः कारुणिकाः 22/78
तितिक्षा दुःखसंमर्षो 19/212
तीव्रेण भक्तियोगेन 22/36, 24/85, 24/191
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः 20/57
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं 22/55
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो 23/107
तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि 20/251
तेजोवारिमृदां यथा 20/357, 25/141
ते ते प्रभावानिचया विहिताश्च 21/49
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा 25/99
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते 18/65
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया 19/72
ते वै विदन्त्यतितरन्ति 24/184
तेषां सततयुक्तानां 24/167, 186
तेषामसौ क्लेशल 22/22, 24/135, 25/31
तेष्वशान्तेषु मूढ़ेषु 22/86
तैस्तैरतुल्यातिशयैः 20/353
त्रय्या चोपनिषद्भिश्च 19/203
त्रिजगन्मानसार्कर्षि-मुरली 23/79
त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य 24/52
त्वं पासि नस्त्रिभुवनञ्च 20/299
त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतं 23/29
त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद 24/37
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्ध 15/237
द
दक्षिणो विनयी हीमान् 23/70
दत्ताभयश्च भुजदण्डयुगं 24/48
ददामि बुद्धियोगं तं 24/167, 186
दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय 20/151
दीपाच्चिरेव हि दशान्तरं 20/316
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना 19/173
दुरूहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा 22/129
दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं 21/112
देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय 19/197
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां 22/137
देवी कृष्णमयी प्रोक्ता 23/64
देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः 23/68
देहश्च विक्लवधियः सहसैव 19/201
दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां 20/274
दैवी ह्येषा गुणमयी 20/121, 22/23, 24/133
द्युपतय एव ते न 21/15
द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि 20/267
द्वापरे परिचर्यायां कलौ 20/343
द्वापरे भगवान् श्यामः 20/335
द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको 23/21
ध
धन्यस्यायं नवप्रेमा 23/36
धन्यः स्म मूढ़मतयोपि 17/36
धन्येयमद्य धरणी तृण 24/200
धर्मः प्रोज्झित-कैतव 24/95, 25/142
धर्मस्य तत्त्वं निहितं 17/186, 25/56
धर्मी किशोर एवात्र नित्य 20/378
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद् 16/145
धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं 24/175
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञै 20/344
न
न कर्हिचिन्मत्पराः 22/158
न च्छन्दसा नैव जलाग्नि 22/52
न ज्ञानं न च वैराग्यं 22/142
न तथास्य भवेन्मोहो 22/87
न तद्भक्तेषु चान्येषु स 22/71
नद्योऽद्रयः खगमृगाः 24/200
न निर्विण्णो नातिसक्तो 22/50
न पारयेऽहं चलितुं नय 19/207
न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि 23/27
न भजन्त्यवजानन्ति 22/28
नमस्ते वासुदेवाय नमः 20/336
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः 19/50
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेम 19/53
न यत्र माया किमुतापरे 20/270
न शौरिचिन्ताविमुख 22/88
न साधयति मां योगो 20/137
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 20/137
नातः परं परम यद्भवतः 25/36
नात्र शास्त्रं न युक्तिञ्च 22/151
नान्तं विदाम्यहममी 21/13
नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य 17/133
नामसङ्कीर्त्तनं श्रीमन्मथुराण्डले 22/128
नायं सुखापो भगवान् देहिनां 24/82
नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु 23/63
नारायण-कलाः शान्ता 24/118
524 ।

श्लोक सूची [नारायण-महता]
| नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन 19/215 | प्रकाशिताखिलगुणः स्मृतः 20/398 | भक्त्या भागवतं ग्राह्यं 24/314 |
| नारीगण-मनोहारी सर्वाराध्यः 23/71 | प्रणयरसनया धृताङ्घ्रि 25/126 | भक्त्या संजातया भक्त्या 25/134 |
| निगमकल्पतरोर्गलितं 25/144 | प्रतापी कीर्त्तिमान् रक्त 23/71 | भक्त्याहमेकया 20/138, 25/132 |
| निजानुरूपे प्रभुरेकरूपे 19/121 | प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं 20/336 | भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां 22/55 |
| नित्यसिद्धस्य भावस्य 22/102 | प्रधान-परमव्योम्नोरन्तरे 21/50 | भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः 19/75 |
| नित्योत्सवं न तत्पुष्टैर्ऋषिभिः 21/123 | प्रवर्त्तते यत्र रजस्तम 20/270 | भवद्विधा भागवतास्तीर्थ 20/57 |
| निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः 24/130 | प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा 25/124 | भवन्ति तपतां श्रेष्ठ 20/113 |
| निर्निश्चये निष्क्रमार्थं 24/18 | प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां 22/63 | भवापवर्गो भ्रमतो यदा 22/46, 81 |
| निर्ममो निरहङ्कारः 23/101 | प्रायो अमी मुनिगणा 24/171 | भयं द्वितीयाभिनिवेशतः 20/119, 24/132 |
| नीचोऽपि यत्प्रसादात् 20/1 | प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा 24/170 | भयानकः स वीभत्स 19/186 |
| नीचोऽप्युत्पुलको लेभे 24/272 | प्रियस्वरूपे दयितस्वरूपे 19/121 | भर्त्तुर्मिथः सुयशसः 24/83 |
| नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः 24/177 | प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः 22/70 | भागो जीवः स विज्ञेय 19/141 |
| नैवोपयन्त्यपचितिं 22/48 | प्रेमान्तरङ्गभूतानि 23/91 | भावः स एव सान्द्रात्मा 23/7 |
| नैषां मतिस्तावदुरुक्रम 22/53, 25/83 | प्रेमालापैर्दृढतरपरिष्वङ्गरङ्गैः 19/120 | भास्वान् यथाश्मशकलेषु 20/304 |
| नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं 22/19 | प्रेमास्मिन् बत राधिकेव 18/12 | भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि 23/26 |
| नो दीक्षां न च सत्क्रियां 15/110 | प्रेमोन्मत्तान् सहोनृत्यन् 17/1 | भूतानि भगवत्यात्म 22/69, 25/127 |
| | प्रौढानन्दश्चमत्कार 23/93 | भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं 25/75 |
| प | ब | म |
| पतिश्च पतितं त्यजेत् 15/265 | | |
| पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृ 22/159 | बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः 21/33 | मत्कथाश्रवणादौ वा 22/61 |
| पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान 19/209 | बालाग्रशतभागस्य शतधा 19/141 | मत्स्याश्व-कच्छप-नृसिंह 20/299 |
| पप्रच्छुराकाशवदन्तरं 25/128 | बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च 24/67 | मद्गुण श्रुतिमात्रेण मयि 19/171 |
| परं भावमजानन्तः 25/38 | ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा 24/127, 25/148 | मधुगन्धि-मृदुस्मितमेतदहो 21/136, 23/32 |
| परस्य ब्रह्मणः शक्तिः 20/110 | ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य 20/306 | |
| परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य 24/46, 25/150 | ब्रह्मा य एष जगदण्ड 20/304 | मधुरं मधुरं वपुरस्य 21/136, 23/32 |
| परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव 23/73 | ब्रह्मेति परमात्मेति 20/158, 24/70, 24/77, 25/130 | मधुरेयं नववयाः 23/82 |
| पश्चादहं यदेतच्च 24/72, 25/111 | | मनसो वपुषो वाचो 21/27, 83 |
| पश्यामि विश्वसृजमेकम् 25/36 | ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे 24/315 | मनोगतिरविच्छिन्ना यथा 19/171 |
| पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणे 2/135 | भ | मन्मना भव मद्भक्तो 22/58 |
| पिबत भागवतं रसमालयं 25/144 | भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः 23/23 | मन्ये तदर्पित-मनः 20/59 |
| पुराणाद्या ये वा सहज 22/6 | भक्तानां हृदि राजन्ती 23/92 | मय्यार्पितमनोबुद्धियों 23/102 |
| पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त 20/275 | भक्तिः पुनाति 20/138, 25/132 | मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्त 22/100 |
| पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तो 17/133 | भक्तिनिर्धूत-दोषाणां 23/90 | महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते 22/79 |
| पूर्णता पूर्णतरता द्वारका 20/399 | भक्तिरित्युच्यते भीष्म 23/8 | महता हि प्रयत्नेन 15/269 |
। 525

[ महान्त-वयन्तु श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

| महान्तस्ते समचित्ताः 22/79 | यत्र स्वल्पोऽपि 22/129, 24/189 | येऽन्ये च पापाः 24/173, 203 |
| महीयसां पादरजो 22/53, 25/83 | यथाग्निः सुसमृद्धार्च्चिः 24/57 | येषामहं प्रिय आत्मा 22/158 |
| मां विधत्तेऽभिधत्ते मां 20/148 | यथा तरोर्मूलनिषेचनेन 22/63 | योऽज्ञानमत्तं भुवनं 19/54 |
| मा द्राक्षीः क्षीणपुण्यान् 22/89 | यथा महान्ति भूतानि 25/124 | योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं 22/48 |
| मानं तनोति सह-गोगणयोः 18/34 | यथा राधा प्रिया विष्णो 18/8 | योगारूढ़स्य तस्यैव शमः 24/153 |
| मामेव ये प्रपद्यन्ते 20/121, 22/23, 24/133 | यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं 20/373 | यो दुस्त्यजान् दारसुतान् 23/24 |
| | यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो 17/178 | यो न हृष्यति न द्वेष्टि 23/105 |
| मामेवैष्यसि सत्यं ते 22/58 | यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ 20/344 | योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो 22/87 |
| मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य 20/148 | यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न 24/154 | |
| मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने 22/134 | यदृच्छया मत्कथादौ जात 22/50 | र |
| मुक्ता अपि लीलया 24/107, 138, 25/149 | यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ 25/74 | रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे 22/97 |
| | यद्यद्भुतक्रमपरायण-शील 24/184 | रतिरानन्दरूपैव नीयमाना 23/92 |
| मुक्तानामपि सिद्धानां 19/150, 25/81 | यद्वाञ्छया श्रीर्ललना 24/51 | रहूगणैतत्तपसा न याति 22/52 |
| मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं 24/130 | यन्नामधेयश्रवणानुकीर्त्तनात् 16/186, 18/125 | रागात्मिकामनुसृता या सा 22/150 |
| मुखबाहूरूपादेभ्यः 22/27, 108 | | राधा-सङ्गे यदा भाति 17/216 |
| मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा 24/118 | यन्मर्त्त्यलीलोपयिकं 21/100 | रामश्च रामश्च रामश्च रामा 24/145 |
| मूकं करोति वाचालं पङ्गुं 17/80 | यस्ताद्गगेव हि च 20/316 | रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् 23/66 |
| मैवं ममाधमस्यापि 22/44 | यस्तु नारायणं देवं 18/116 | रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति 23/109 |
| य | यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो 15/170 | रूपं दृशां दृशिमतां 24/49 |
| य एषां पुरुषं साक्षात् 22/28 | यस्मान्नोद्विजते लोको 23/103 | रोदनबिन्दुमकरन्दस्यन्दि 23/30 |
| यः प्रागेव प्रियगुणगणैः 19/120 | यस्य प्रभा प्रभवतो 20/160 | |
| यः शम्भुतामपि तथा 20/310 | यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिल 20/306 | ल |
| यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृष 24/83 | यस्यान्नं मकरकुण्डल 21/123 | लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य 19/172 |
| यच्छ्र | यस्यावतारा ज्ञायन्ते 20/353 | लज्जाशीला सुमर्र्यादा धैर्य 23/84 |
| यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति 20/340 | यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना 22/73 | लीला-प्रेम्णा प्रियाधिक्यं 23/80 |
| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द 17/80 | यस्यैक-निश्वसित 20/281, 21/41 | लेभे गतिं धातृचितां 22/95 |
| यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं 18/65 | यावत् प्रेम्णां मधुरिपु 19/165 | व |
| यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना 24/211 | यावानहं यथाभावो 25/107 | वंशीधारी जगन्नारी-चित्तहारी 17/214 |
| यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु 20/113 | येऽन्येऽरविन्दाक्ष 22/30, 24/126, 136, 25/32 | वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं 20/158 |
| यत्नान्तरे तथा 24/63 | | वदान्यो धार्मिकः शूरः 23/69 |
| यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते 23/63 | ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं 23/108 | वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीचैतन्य 20/1 |
| यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् 17/39 | ये ध्यायन्ति सदोद्युक्ताः 22/159 | वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यदेवं तं 22/1 |
| यत्र सङ्कीर्त्तनेनैव 20/345 | येनातिव्रज्य त्रिगुणं 19/174 | वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य 19/106 |
| | | वयन्तु न वितृप्याम उत्तम 25/145 |

526 ।

श्लोक सूची वयमिव-स यत् ]
वयमिव सखि कच्चिद्गाढ 23/61
वयसो विविधत्वेऽपि 20/378
वरं हुतवहज्वाला- 22/88
वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्याः 23/72
वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा 23/23
वावदूकः सुपाण्डित्यो 23/67
वामस्तामरसाक्षस्य भुजदण्डः 18/38
विकर्म यच्चोत्पतितं 22/140
विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः 23/68
विनीता करुणापूर्णा 23/84
विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्द 20/59
विविधाद्भुतभाषावित् 23/67
विभूतिर्मायिकी सर्वा 21/56
विमोहिता विकत्थन्ते मम 22/32
विराजन्तीमभिव्यक्तां 22/150
विलज्जमानया यस्य 22/32
विश्वं पुरुषरूपेण 20/318, 21/37
विष्टभ्याहमिदं 20/163, 374
विष्णुर्महान् स 20/281, 21/41
विष्णुशक्तिः परा 20/112, 24/303
विष्णोर्नु वीर्यगणनां 24/21
विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि 20/251
विसृजति हृदयं न 25/126
विस्मापनं स्वस्य च 21/100
विहारी गोपनारीभिः 17/214
वीक्ष्यालकावृतमुखं तव 24/48
वृन्दावनीयां रसकेलिवार्त्तां 19/1
वृषभं भद्रसेनश्च प्रलम्बो 19/205
वेदाङ्गस्वेदजनितैस्तोयैः 21/50
वैकारिकस्तैजसश्च तामस 20/312
वैष्णवीकृत्य संन्यासिमुखान् 25/1
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्व 17/138
व्यामोहाय चराचरस्य जगतस्ते 20/145
श
शक्तयः सर्वभावानाम् 20/113
शठेन केनापि वयं हठेन 24/128
शमो दमो भगश्चेति 22/85
शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति 19/211
शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम 19/212
शिवः शक्तियुक्तः शश्वत् 20/312
शीतोष्णसुखदुःखेषु 23/106
शीलं सर्वजनानुरञ्जनम् 17/210
शुक्लो रक्तस्तथा पीत 20/331
शुचिः सद्भाक्तिदीप्ताग्निः 19/74
शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम 23/5
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् 23/105
श्याममेव परं रूपं पुरी 19/106
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्ते 23/108
श्रद्धा विशेषतः प्रीतिः 22/128
श्रीकृष्णाख्यं परं धाम 20/151
श्रीचैतन्यं लिखाम्यस्य 21/1
श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च 20/335
श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षित् 22/132
श्रीभागवतरक्तानां 23/90
श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादे 22/127
श्रीमद्भागवते महामुनि 24/95, 25/142
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्द 25/275
श्रीराधिकायाः प्रियता स्वरूपता 17/212
श्रीराधेव हरेस्तदीय-सरसी 18/12
श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये 19/96
श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति 22/6
श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर 24/49
श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य 22/22, 24/135
25/31
श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये 20/397
श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च 22/107
श्वपाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो 19/74
श्वादोऽपि सद्यः 16/186, 18/125
स
स एव धैर्यमाप्नोति 24/178
स एव भक्तियोगाख्य 19/174
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र 20/114
संसारेऽस्मिन् क्षणाद्धोऽपि 22/82
सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति 22/34
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं 19/199
सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु 22/86
सङ्गीतप्रसराभिज्ञा रम्यवाक् 23/83
सञ्चार्य रूपे व्यतनोत् पुनः 19/1
सजातीयाशये स्निग्धे 22/127
सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन 24/120
सत्सङ्गमो यदि तदैव 22/46, 81
सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो 24/93
सतां प्रसङ्गान्मम 22/83, 23/16
सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो 24/98, 193
सत्यं शौचं दया मौनं 22/85
सदा स्वरूपसंप्राप्तः सर्वज्ञो 23/74
सद्धर्मस्यावबोधाय 20/106, 24/164
सद्यः क्षिणोत्यन्वहमैधती 24/211
सनातनं सुसंस्कृत्य प्रभुः 25/1
सन्तुष्टः सततं योगी 23/102
स वै भगवतः श्रीमत्पाद 25/75
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो 22/133
समः शत्रौ च मित्रे च 23/106
समः सर्वेषु भूतेषु 24/127, 25/148
समत्वेनैव वीक्षेत 18/116, 25/78
समुद्रा इव पश्चात् 23/72
सम्भूतं षोड़शकलमादौ 20/266
सम्यक्मसृणितस्वान्तो 23/7
स यत्प्रमाणं कुरुते 17/178
527

[ सरसि-ह्लादिन्या श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सरसि सारसहंसविहङ्गाः 24/172 | सिद्धान्ते पुनरेक एव 20/145 | स्वाविद्या-संवृतो जीवः 18/114
सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण 25/103 | सुखानि गोषदायन्ते 24/37 | ह
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे 22/57 | सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः 23/70 |
सर्वगोपीषु सैवैका 18/8 | सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा 19/150, 25/81 | हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो 18/34
सर्वथैव दुरूहॊऽयमभक्तैः 23/95 | सुविलासा महाभाव 23/85 | हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि 15/270
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | सूक्ष्माणामप्यहं जीवः 19/142 | हयग्रीवो वराहश्च ब्रह्मा 20/242
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं 22/91 | सृजामि तन्नियुक्तोऽहं 20/318, 21/37 | हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा 22/73
सर्ववेदान्तसारं हि 25/139 | सेवा साधकरूपेण 22/154 | हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः 20/397
सर्व-वेदेतिहासानां सारं 25/138 | सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ 17/136 | हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा 24/166
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन 20/115 | सौन्दर्य ललनालिधैर्यदलनं 17/210 | हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये 22/143, 24/267
सर्वभूतेषु यः पश्येत् 22/69, 25/127 | स्थानाभिलाषी तपसि 22/42, 24/213 | हरिमुपासत ते यतचित्ता 24/172
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः 23/64 | स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो 23/69 | हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् 20/313
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी 24/154 | स्मरन्तः स्मारयन्तश्च 25/134 | हरि हरये नमः कृष्ण 25/63
सर्वात्मना यः शरणं 22/137 | स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो 22/110 | हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् 24/112
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीला 23/78 | स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृत 16/145 | हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां 23/26
सर्वान् ददाति सुहृदः 22/93 | स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य 22/140 | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः 23/103
सर्वारम्भपरित्यागी यो 23/104 | स्वप्रेमसम्पत्सुधयाद्भुतेहं 19/54 | हसत्यथो रोदिति रौति 23/37, 25/135
सर्वे विधिनिषेधाः 22/110 | स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् 23/75 | हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः 19/186
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं 19/170 | स्वयं विधत्ते भजताम् 22/40, 24/98, | हित्वा गोपीः कामयाना 19/206
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | 24/193 | हीनार्थाधिकसाधके त्वयि 23/27
सहस्रपत्रं कमलं गोकुल 20/258 | स्वरितजितः कर्त्तृभिप्राये 24/26 | हृदि यस्य प्रेरणया 19/134
साधकानामयं प्रेम्णः 23/15 | स्वरूपाणामेकशेष 24/145, 293 | हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं 19/170
साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या 24/166 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 19/215 | हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य 24/178
सार्वभौमगृहे भुञ्जन् 15/1 | स्वसुखनिभृतचेताः 17/138 | ह्रियमाणः कालनद्या 22/44
सालोक्यसार्टिसारूप्य 19/173 | स्वां काष्ठामधुनोपेते 24/315 | ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः 18/114
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प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]

अ 'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल 18/187 अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा 19/168 अधम-काकेरे कैला गरुड़ 17/79 अन्यावतार शास्त्रद्वारा 20/350
अकरणे दोष, कैले भक्तिर 24/337 अधम यवनकुले केने 16/181 अपराध नाहि तब, लओ 15/285 अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम 24/84 अधिरूढ़-महाभाव-दुइ 23/54 अपराध-हस्तीर यैछे ना हय 19/157
अकिञ्चन हञा लय 22/90 अनन्त अवतार कृष्णेर 20/248 'अवज्ञा'ते नाम लय, शुनि' 17/127 अचिरात् कृष्ण तोमाय 16/239 अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर 15/175 अवतार नाहि कहे 20/352
अचिरात् पाइबारे चैतन्य 19/5 अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि 23/65 अवतार हय कृष्णेर 20/245 अजागलस्तन-न्याय अन्य 24/88 अनन्त गुण श्रीराधिकारे 23/81 अवैष्णव-सङ्ग-त्याग 22/115
अज्ञाने वा हय यदि 22/139 अनन्त-वैकुण्ठ-परव्योम 21/7 अभिधेय-नाम-'भक्ति' 20/125 अतएव आकर्षय आत्मारामे 17/139 अनन्तशक्ति-मध्ये कृष्णेर 20/252 'अभिधेय बलि' तारे 20/139
अतएव आपने सूत्रार्थ 25/90 अनन्त स्वरूप कृष्णेर 20/402 अमृत छाड़ि' विष मागे 22/38 अतएव कृष्णेर 'नाम', 17/134 अनर्गल प्रेमभक्ति करिह 15/42 अम्बरीषादि भक्तेर 'बहु' 22/131
अतएव ब्रह्मसूत्रेर भाष्य 25/98 अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 23/11 अरिष्टे राधाकुण्ड-वार्त्ता 18/4 अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्त्ये 20/139 अनिकेत दुँहे, वने यत 19/127 अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये 20/359
अतएव भागवत-सूत्रेर 25/136 अनिवेदित-त्याग, वैष्णव 24/333 अलक्षिते रहिं तोमार 15/44 अतएव भागवत करह 25/146 अनिरुद्धेर विलास-हरि 20/206 अलातचक्रप्राय सेइ लीला 20/391
अतएव मधुर-रसेर हय 19/231 अनिरुद्धेर मूर्त्ति-हृषीकेश 20/197 अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ 15/25 अतएव माया तारे देय 20/117 अनुपम मल्लिक, ताँर नाम 19/36 अलौकिक 'प्रकृति' तोमार 18/120
अतएव याँर मुखे एक 15/111 'अनुभाव'-स्मित, नृत्य 23/47 अलौकिक लीला करे 16/201 अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त 19/213 अनुषङ्ग-फले करे संसारेर 15/109 अलौकिक-लीला प्रभुर 18/225
अतएव शुद्धभक्तिर कहिये 19/166 'अन्तःपुर'-गोलोक 21/43 अलौकिक शक्ति-गुणे 24/39 अतएव सख्य-रसेर 19/223, 19/224 अन्तरे निष्ठा कर, बाह्ये 16/239 अलौकिक शक्ति तोमार 8/124
अतएव सब शास्त्र करये 25/47 अन्तरे सुख माने तैहो 15/65 अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले 17/145 अतएव हरि भजे बुद्धिमान् 24/88 अन्न खाबे, पीठे बसिते 15/235 अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारि 19/130
अति क्षुद्र जीव मुञि 20/349 अन्न, पीठ,—समान 15/235 असत्सङ्गत्याग, —एइ वैष्णव 22/84 अति क्षुद्र, ताते तोमार 21/84 अन्यकामी यदि करे कृष्णेर 22/37 'असत्ये सत्य भ्रम' 18/98
अद्यापिह ताँहार सेवा 17/168 अन्य त्यजि' भजे, ताते 22/94 असमर्थ नहे, कृष्ण 15/168 अद्वयज्ञान-तत्त्व, व्रजे 20/152 अन्यदेव, अन्यशास्त्र निन्दा ना 22/116 अस्त्रधृति-भेद-नाम 20/221
`` अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना 24/69 अन्य-देशे प्रेम उछले 17/228 अस्त्रभेदे नाम-भेद 20/191

`` | 529

[ अस्वा-एइ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अस्वास्थ्येर छद्म करि' 19/15 | आपनारे 'पालक' ज्ञान, कृष्णे 19/227 | इष्टे 'आविष्टा'—तटस्थ 22/147
अहङ्कारेर अधिष्ठाता 20/256 | आपने ईश्वर तबे अंशो 20/305 | इँहा कर गोपीनाथ 16/132
“अहमेव”—श्लोके 'अहम्' 25/112 | आपने करिल प्रभुर पाद 19/85 | इहाते दृष्टान्त—यैछे 20/127
अहिंस-यम-नियमादि 22/141 | आपने भट्ट करेन प्रभुर 19/90 | इहा नाहि जानि—केमने 20/102
आ | आवेशे तार गाये प्रभुर 17/28 | इँहा माली सेचे नित्य 19/155
आकार-वर्ण-अस्त्रभेदे 20/172 | आमाते ये 'प्रीति', सेइ 25/122 | इहार घरेर आय-व्यय 15/96
आकाशादि गुण येन 19/232 | आमा वइ जगते आर 21/65 | इहार प्रसादे पाइबा 25/263
आकाशेर 'शब्द'-गुण येन 19/216 | आमार उद्धार-हेतु तोमार 20/64 | इहार श्रवणे भक्त जानेन 24/348
आकृति, प्रकृति, स्वरूप 20/355 | आमार कृपाय एइ सब 25/106 | इहा हैते पाबे सूत्र 25/146
'आकृत्ये' तोमारे देखि' 18/118 | आमार प्राण रक्षा कर 20/32 | इँहो ना स्पर्शिह, इँहो 19/69
आ-चण्डाल आदि कृष्णभक्ति 15/41 | आमार शपथ, यदि आर 16/141 | ई
आचार्य 'कल्पना' करे 25/26 | आमा सबार कृष्णभक्ति 15/116 | ईश्वरज्ञान, सम्भ्रम-गौरव 19/219
आचार्य-कल्पित अर्थ 25/27 | आमा-हेन येबा केह 24/318 | ईश्वर-स्वभाव' तोमार 18/119
आचार्य हइल सेइ, तारिल 18/122 | आमि त' बाउल, आन 21/146 | ईश्वरेर शक्त्ये सृष्टि 20/261
आजि-कालि करि' उठाय 16/10 | 'आमि—बड़ ज्ञानी'—एइ 18/203 | उ
आज्ञा देह', याइ' करि 18/99 | आमि—विज्ञ, एइ मूर्खे 22/39 | उच्छृङ्खल-लोक-सङ्गे 17/121
आत्मार 'आत्मा' हन 20/161 | आमि बोझा बहिमु, तोमा 25/163 | 'उत्तम-अधिकारी' सेइ 22/65
आत्मारामेर मन हरे तुलसीर 17/141 | आमि—'सम्बन्ध'-तत्त्व 25/101 | 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ' 22/64
'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण 24/73 | आर कृष्णनाम लैते कृष्ण 25/193 | 'उत्तम हञा हीन करि' 16/264
'आत्मा'-शब्दे कहे 24/279 | आर तिनयुगे ध्यानादिते 20/341 | उत्तर ना आइसे मुखे 18/188
'आत्मा'-शब्दे कहे 24/302 | आर 'नाम' लइते कृष्ण 25/192 | 'उत्तरे' खुदिले आछे 20/134
'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म 24/11 | आर यत मत, सेइ 25/44 | 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' 23/55
'आत्मा' शब्दे 'मन' 24/159 | आर सब स्वरूप—'पूर्णतर' 20/400 | उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा 23/57
'आत्मा'-शब्दे 'बुद्धि' 24/180 | आर्त्त, अर्थार्थी,—दुइ सकाम 24/90 | उदार महती याँर सर्वोत्तमा 24/190
आदि-चतुर्व्यूह-केह 20/189 | आर्य, सरल तुमि—वृद्ध 17/165 | उपजिय़ा बाड़े लता ब्रह्माण्ड 19/153
'आद्य एव परो रसः'—कहे 19/104 | आसक्ति हैते चित्ते जन्मे 23/12 | उपदेश लञा करे कृष्ण 25/21
आद्योपान्त चैतन्यलीला 18/226 | इ | उपाड़े वा छिण्डे, तार 19/156
आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे 22/13 | इच्छा-ज्ञान-क्रिया बिना 20/254 | उपाध्याय, श्रेष्ठ मान' 19/101
आन कथा ना सुने काण 21/144 | 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति' 20/252 | 'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ 24/19
आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्ण 19/168 | इच्छाशक्ति-प्रधान कृष्ण 20/253 | ए
आनेर वैभव-सत्ता 21/120 | 'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ 24/36 | ए अन्य गोविन्द—नहे 20/196
आपन-'प्रारब्धे' वसि वाराणसी 17/95 | इन्द्रगण आइला लक्ष 21/68 | एइ अमृत अनुक्षण 25/269
आपनार हिताहित किछुइ 20/100 | इष्टे 'गाढ़-तृष्णा'—रागेर 22/147 |
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