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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1974, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1974

[ सरसि-ह्लादिन्या श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सरसि सारसहंसविहङ्गाः 24/172 | सिद्धान्ते पुनरेक एव 20/145 | स्वाविद्या-संवृतो जीवः 18/114
सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण 25/103 | सुखानि गोषदायन्ते 24/37 | ह
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे 22/57 | सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः 23/70 |
सर्वगोपीषु सैवैका 18/8 | सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा 19/150, 25/81 | हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो 18/34
सर्वथैव दुरूहॊऽयमभक्तैः 23/95 | सुविलासा महाभाव 23/85 | हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि 15/270
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | सूक्ष्माणामप्यहं जीवः 19/142 | हयग्रीवो वराहश्च ब्रह्मा 20/242
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं 22/91 | सृजामि तन्नियुक्तोऽहं 20/318, 21/37 | हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा 22/73
सर्ववेदान्तसारं हि 25/139 | सेवा साधकरूपेण 22/154 | हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः 20/397
सर्व-वेदेतिहासानां सारं 25/138 | सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ 17/136 | हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा 24/166
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन 20/115 | सौन्दर्य ललनालिधैर्यदलनं 17/210 | हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये 22/143, 24/267
सर्वभूतेषु यः पश्येत् 22/69, 25/127 | स्थानाभिलाषी तपसि 22/42, 24/213 | हरिमुपासत ते यतचित्ता 24/172
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः 23/64 | स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो 23/69 | हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् 20/313
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी 24/154 | स्मरन्तः स्मारयन्तश्च 25/134 | हरि हरये नमः कृष्ण 25/63
सर्वात्मना यः शरणं 22/137 | स्मर्त्तव्य सततं विष्णुर्विस्मर्त्तव्यो 22/110 | हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् 24/112
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीला 23/78 | स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृत 16/145 | हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां 23/26
सर्वान् ददाति सुहृदः 22/93 | स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य 22/140 | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः 23/103
सर्वारम्भपरित्यागी यो 23/104 | स्वप्रेमसम्पत्सुधयाद्भुतेहं 19/54 | हसत्यथो रोदिति रौति 23/37, 25/135
सर्वे विधिनिषेधाः 22/110 | स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् 23/75 | हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः 19/186
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं 19/170 | स्वयं विधत्ते भजताम् 22/40, 24/98, | हित्वा गोपीः कामयाना 19/206
स सर्वदृगुपद्रष्टा तं 20/313 | 24/193 | हीनार्थाधिकसाधके त्वयि 23/27
सहस्रपत्रं कमलं गोकुल 20/258 | स्वरितजितः कर्त्तृभिप्राये 24/26 | हृदि यस्य प्रेरणया 19/134
साधकानामयं प्रेम्णः 23/15 | स्वरूपाणामेकशेष 24/145, 293 | हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं 19/170
साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या 24/166 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 19/215 | हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य 24/178
सार्वभौमगृहे भुञ्जन् 15/1 | स्वसुखनिभृतचेताः 17/138 | ह्रियमाणः कालनद्या 22/44
सालोक्यसार्टिसारूप्य 19/173 | स्वां काष्ठामधुनोपेते 24/315 | ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः 18/114
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