श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :-
तबे दुँहे जगन्नाथप्रसाद आनिला।
सबा-सङ्गे महाप्रभु भोजन करिला ॥ 230 ॥
अनुवाद-तब वे दोनों श्रीजगन्नाथके प्रसादको लेकर आये और महाप्रभुने सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ 230 ॥
वृन्दावनसे पुरी-आगमनकी यात्रा वर्णित :-
एइ त' कहिलुँ, - प्रभु देखि' वृन्दावन।
पुनः करिलेन यैछे नीलाद्रि-गमन ॥ 231 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने (कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके वृन्दावनके दर्शन और पुनः वृन्दावनसे पुरी आगमनके विषयमें बतलाया है ॥ 231 ॥
श्रवण करनेवालोंको चिद्-वृत्तिकी
स्फूर्त्ति और श्रीकृष्ण प्राप्ति :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
अचिरात् पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥ 232 ॥
अनुवाद-जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 232 ॥
मध्यलीलाका दिग्दर्शन और चौबीस वर्षोंमेंसे छः वर्ष भारतमें नामप्रेमके प्रचारके उद्देश्यसे भ्रमण :-
मध्यलीलार करिलुँ एइ दिग्दर्शन।
छय वत्सर कैला यैछे गमनागमन ॥ 233 ॥
अनुवाद-छः वर्षों तक महाप्रभुने जिस प्रकार नीलाचलसे भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें आना-जाना किया, मैंने मध्यलीलामें उसका केवल दिग्दर्शनमात्र कराया है ॥ 233 ॥
बाकीके अठारह वर्ष पुरीमें भक्तोंके साथ कीर्तन-उल्लास :-
शेष अष्टादश वत्सर नीलाचले वास।
भक्तगण-सङ्गे करे कीर्त्तन-विलास ॥ 234 ॥
अनुवाद-अन्तिम अठारह वर्षों तक महाप्रभुने नीलाचलमें ही वास किया। वहाँपर उन्होंने भक्तोंके साथ कीर्तन-विलास किया ॥ 234 ॥
भागवतमें श्रीव्यासकी रीतिका अनुसरण करते हुए संक्षेपमें मध्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनः चर्चा :-
मध्यलीलार क्रम एबे करि अनुवाद।
अनुवाद कैले हय कथार आस्वाद ॥ 235 ॥
अनुवाद-अब मैं मध्यलीलाके अध्यायोंमें वर्णित विषयोंका क्रमसे पुनः वर्णन करूँगा। पुनः उल्लेख करनेसे उन विषयोंका आस्वादन होता है ॥ 235 ॥
प्रथम परिच्छेदे-शेषलीलार सूत्रगण।
तथि-मध्ये कोन भागेर विस्तार वर्णन ॥ 236 ॥
अनुवाद-पहले अध्यायमें शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और उसीमें ही किसी-किसी भागका विस्तारपूर्वक भी वर्णन किया है ॥ 236 ॥
द्वितीय परिच्छेदे-प्रभुर प्रलाप-वर्णन।
तथि-मध्ये नाना-भावेर दिगदरशन ॥ 237 ॥
अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रलापका वर्णन हुआ है। उसके बीचमें महाप्रभुमें प्रकाशित अनेक-भावोंका दिग्दर्शन भी कराया है ॥ 237 ॥
तृतीय परिच्छेदे-प्रभुर कहिलुँ संन्यास।
आचार्येर घरे यैछे करिला विलास ॥ 238 ॥
अनुवाद-तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके संन्यासका वर्णन किया गया है और श्रीअद्वैताचार्यके घरपर महाप्रभुके विलासका वर्णन है ॥ 238 ॥
चतुर्थे-माधवपुरीर चरित्र-आस्वादन।
गोपाल-स्थापन, क्षीरचुरिर वर्णन ॥ 239 ॥
अनुवाद-चौथे अध्यायमें महाप्रभु और भक्तोंके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्रका आस्वादन, उनके द्वारा
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