श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पचीसवाँ अध्याय 25/171-181 ]
अनुवाद—रात्रिके समय उठकर जब महाप्रभु जाने
लगे, तब श्रीतपन मिश्र, श्रीरघुनाथ भट्ट, महाराष्ट्र
ब्राह्मण, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और कीर्तनीया परमानन्द—ये
पाँच भक्त भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ 171-172 ॥
सभीकी ही महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरी जानेकी इच्छा होनेपर
भी महाप्रभुके द्वारा उन्हें विदायी देना :—
सबे चाहे प्रभु-सङ्गे नीलाचल याइते।
सबारे विदाय दिला प्रभु यत्न-सहिते ॥ 173 ॥
अकेले झारिखण्डके मार्गसे पुरी जानेकी इच्छा :—
"याँर इच्छा, पाछे आइस आमारे देखिते।
एबे आमि एका यामु झारिखण्ड-पथे॥" 174 ॥
अनुवाद—सभी महाप्रभुके साथ नीलाचल जाना
चाहते थे, किन्तु महाप्रभुने बड़े प्रेमसे उन्हें समझाकर
विदायी देते हुए कहा, —"जिनकी इच्छा हो, वे बादमें
मुझसे मिलनेके लिये पुरी आ जाँय। अभी तो मैं
अकेला ही झारिखण्डके पथसे जाऊँगा॥" 173-174 ॥
श्रीसनातनको वृन्दावनमें श्रीरूप-अनुपमके पास भेजना :—
सनातने कहिला, —"तुमि याह' वृन्दावन।
तोमार दुइ भाइ तथा करियाछे गमन ॥ 175 ॥
करुणासे विगलित स्वरसे भक्तवत्सल भगवान्का
अपने वृन्दावन-यात्री भक्तोंके सुख-विधानके
लिये श्रीसनातनको आदेश :—
काँथा-करङ्गिया मोर काङ्गाल भक्तगण।
वृन्दावने आइले ताँदेर करिह पालन॥" 176 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा, —
"तुम वृन्दावन जाओ। तुम्हारे दोनों भाई रूप और
अनुपम भी वहीं गये हैं। वृन्दावन जानेवाले मेरे
अधिकांश भक्त कंगाल (गरीब) होते हैं, उनके पास तो
केवल काँथा (फटे-पुराने कपड़ोंसे बने कम्बल) और
करोंया (जलके पात्र) होता है। वे जब वृन्दावन
आयेंगे, तब तुम उन सबको रहनेका स्थान देना और
उनका पालन करना॥" 175-176 ॥
सभीको आलिङ्गन करके निरपेक्ष महाप्रभुकी यात्रा,
भक्तोंका मूर्च्छित होना :—
एत बलि' चलिला प्रभु सबा आलिङ्गिया।
सबेइ पड़िला तथा मूर्च्छित हञा ॥ 177 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु सबका आलिङ्गन
करके वहाँसे चल पड़े। सभी भक्त मूर्च्छित होकर वहीं
गिर पड़े॥ 177 ॥
इन पाँच भक्तोंका काशीमें आगमन,
श्रीसनातनकी वृन्दावन यात्रा :—
कतक्षणे उठि' सबे दुःखे घरे आइला।
सनातन-गोसाञि वृन्दावनरे चलिला ॥ 178 ॥
अनुवाद—कुछ समयके बाद जब उनकी मूर्च्छा
दूर हुई, तब वे सभी भक्त दुःखी होकर घर लौट
आये। श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनकी ओर चल
दिये॥ 178 ॥
श्रीरूप-गोस्वामीके साथ श्रीसुबुद्धि रायका मिलन :—
एथा रूप-गोसाञि यबे मथुरा आइला।
ध्रुवघाटे ताँरे सुबुद्धिराय मिलिला ॥ 179 ॥
अनुवाद—इधर जब श्रीरूप गोस्वामी मथुरा पहुँचे,
तब वहाँ ध्रुवघाटपर उन्हें श्रीसुबुद्धिराय मिले॥ 179 ॥
पूर्वे यबे सुबुद्धि-राय छिला गौड़े 'अधिकारी'।
हुसेन-खाँ 'सैयद' करे ताहार चाकरी ॥ 180 ॥
अनुवाद—पहले जब श्रीसुबुद्धिराय गौड़देशके
अधिकारी थे, तब हुसेन-खाँ 'सैयद' उनका दास
था॥ 180 ॥
दीघि खोदाइते तारे 'मुन्सीफ' कैला।
छिद्र पाञा राय तारे चाबुक मारिला ॥ 181 ॥
अनुवाद—श्रीसुबुद्धिरायने हुसेन-खाँ सैयदको तालाब
खुदवानेके कार्यका दायित्व सौंपा। उस कार्यमें कुछ
त्रुटि देखनेपर श्रीसुबुद्धिरायने उसे चाबुकसे मारा॥ 181 ॥
। 505
[ 25/181-189 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुन्सीफ'-'इन्साफ' शब्दसे
'मुन्सीफ' शब्दकी उत्पत्ति हुई है; जो जिस विषयको
समझ लेता है, उसे 'मुन्सीफ' कहते हैं। 'छिद्र
पाञा'-दोष देखकर॥ 181॥
पाछे यबे हुसेन-खाँ गौड़े 'राजा' हइल।
सुबुद्धि-रायेर तिँहो बहु बाड़ाइल ॥ 182 ॥
अनुवाद-बादमें जब हुसेन-खाँ सैयद गौड़देशका
'राजा' बना, तब उसने श्रीसुबुद्धिरायके द्वारा पूर्व किये
गये उपकारोंके लिये उनकी सम्पत्तिमें बहुत वृद्धि
की॥ 182॥
तार स्त्री तार अङ्गे देखे मारणेर चिह्ने।
सुबुद्धि-रायरे मारिते कहे राजा-स्थाने ॥ 183 ॥
अनुवाद-हुसेन-खाँकी पत्नीने जब उनके शरीरपर
चाबुक मारनेके निशानको देखा, तो उसने हुसेन-खाँसे
श्रीसुबुद्धिरायको जानसे मारनेके लिये कहा॥ 183॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'तार स्त्री'-हुसेन-शाहकी बेगम;
'मारणेर चिह्ने'-श्रीसुबुद्धि-रायने जो चाबुक मारे थे,
उसके चिह्न॥ 183॥
राजा कहे, - "आमार पोष्टा राय हय 'पिता'।
ताहारे मारिमु आमि, - भाल নহে कथा॥" 184॥
स्त्री कहे, - जाति लह', यदि प्राणे ना मारिबे।
राजा कहे,-जाति निले इँहो नाहि जीवे॥ 185॥
स्त्री मरिते चाहे, राजा सङ्कटे पड़िल।
करौँ यार पानि तार मुखे देओयाइल ॥ 186 ॥
अनुवाद-राजा हुसेन-खाँने कहा,-"श्रीसुबुद्धिराय
मेरा पालन-पोषण करनेवाले होनेके कारण मेरे पिताके
समान है। मैं उन्हें मारूँ,-यह तो कोई अच्छी बात
नहीं है।" अन्तमें बेगमने कहा, - 'यदि तुम
सुबुद्धिरायको प्राणोंसे नहीं मारना चाहते हो, तो फिर
तुम उसे जातिसे भ्रष्ट कर दो।' राजाने कहा, - 'यदि
मैं उनको जातिसे भ्रष्ट कर दूँगा, तो वे जीवित नहीं
रहेंगे।' बेगमने कहा कि यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो
मैं मर जाऊँगी। उसकी बात सुनकर राजा धर्म-सङ्कटमें
फँस गया। अन्तमें उसने जलपात्रके जलको जिसे
मुसलमानने स्पर्श किया था, श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें
बलपूर्वक डलवा दिया॥ 184-186॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'करौँ यार पानि'-जिस पात्रमें
मुसलमानोंका जल रहता है, उसे 'करौँया' कहते हैं।
उस 'करौँया'से मुसलमानके द्वारा स्पर्श किया गया
जल श्रीसुबुद्धिरायके मुखमें दिया गया था॥ 186॥
श्रीसुबुद्धि-रायका अकेले काशीमें आगमन :-
तबे सुबुद्धि-राय सेइ 'छद्म' पाञा।
वाराणसी आइला, सब विषय छाड़िया॥ 187॥
अनुवाद-तब श्रीसुबुद्धि-राय इस सुयोगको प्राप्त
करके सब विषयोंको छोड़कर वाराणसी आ गये॥ 187॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'छद्म'-छल। श्रीसुबुद्धिरायकी
पहलेसे ही विषय-त्यागकी इच्छा थी; जातिनाशके
छलसे उन्होंने परिवारादि सम्बन्धियोंका त्याग कर
दिया॥ 187॥
स्मार्त्त पण्डितोंसे प्रायश्चितके विषयमें पूछनेपर अनेक
लोगोंके द्वारा अनेक विधान :-
प्रायश्चित्त पुछिला तिँहो पण्डितेर गणे।
ताँरा कहे, - तप्त-घृत खाञा छाड़' प्राणे॥ 188॥
अनुवाद-श्रीसुबुद्धिरायने वाराणसीके पण्डितोंसे
इसका प्रायश्चित पूछा। तब उन पण्डितोंने कहा, - गर्म
घी पीकर तुम अपने प्राण त्याग दो॥ 188॥
श्रीसुबुद्धि-रायको प्रायश्चितकी
व्यवस्थाओंके प्रति सन्देह :-
केह कहे, - एइ নহে, अल्प दोष हय।
शुनिया रहिला राय करिया संशय ॥ 189 ॥
506 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/189-194 ]
अनुवाद-किसी अन्य पण्डितने कहा, - ऐसा मत
करो, प्राण देनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह तो
छोटा सा दोष है। श्रीसुबुद्धिरायको पण्डितोंके अलग-
अलग विचारोंके कारण प्रायश्चितके विषयमें संशय हो
गया, इसलिये उन्होंने कुछ भी नहीं किया ॥ 189 ॥
महाप्रभुके काशी आनेपर, सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन करके
प्रायश्चितकी व्यवस्थाकी जिज्ञासा :-
तबे यदि महाप्रभु वाराणसी आइला।
ताँरे मिलि' राय आपन-वृत्तान्त कहिला ॥ 190 ॥
अनुवाद-फिर जब महाप्रभु वाराणसीमें आये, तब
श्रीसुबुद्धिरायने उनसे मिलकर उन्हें अपना सम्पूर्ण
वृत्तान्त कह सुनाया ॥ 190 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु मथुरा जानेसे पूर्व जब
वाराणसी आये थे, उस समय श्रीसुबुद्धिरायके साथ
उनका मिलन हुआ था ॥ 190 ॥
महाप्रभुके द्वारा सबसे उत्तम व्यवस्था और
श्रीसुबुद्धि रायको शिक्षा :-
प्रभु कहे, - "इँहा हैते याह' वृन्दावन।
निरन्तर कर कृष्णनामसङ्कीर्त्तन ॥ 191 ॥
नामाभास और शुद्धनामके फलका भेद :-
एक 'नामाभासे' तोमार पाप-दोष याबे।
आर 'नाम' लइते कृष्णचरण पाइबे ॥ 192 ॥
आर कृष्णनाम लैते कृष्णस्थाने स्थिति।
महापातकेर हय एइ प्रायश्चित्ति ॥”193 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसुबुद्धिरायसे कहा, - "तुम यहाँसे
वृन्दावन चले जाओ और निरन्तर श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन
करो। नाम करते हुए जब एक 'नामाभास' भी हो
जायेगा, तब उसके प्रभावसे ही तुम्हारे पापका दोष
चला जायेगा। और नाम करते हुए जब तुम्हारा
शुद्धनाम होगा, तब तुम श्रीकृष्णके श्रीचरणोंको प्राप्त
करोगे। श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें स्थान प्राप्त करनेपर फिर
कोई पाप-अपराध नहीं होता और नित्य सिद्धदेहसे
निरन्तर शुद्धनाम ही होता है। महापापी तकके लिये
भी यही प्रायश्चित है॥"191-193 ॥
अमृतानुक्रमणिका-विष्णुपुराण (2/6/36-40) में पापोंके
प्रायश्चितके विषयमें कहा है-
“यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः।
पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ॥ 36 ॥
पापानामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा।
तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ॥ 37 ॥
पापे गुरूणि गुरूणि स्वल्पान्यल्पे च तद्विदः।
प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादयः ॥ 38 ॥
प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्म्मात्मकानि वै।
यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥ 39 ॥
कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते।
प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम् ॥” 40 ॥
अर्थात् "जितने जीव स्वर्गमें हैं उतने ही नरकमें
हैं, जो पापी पुरुष (अपने पापका) प्रायश्चित नहीं
करते वे ही नरकमें जाते हैं। भिन्न-भिन्न पापोंके
अनुरूप जो-जो प्रायश्चित हैं उन्हीं-उन्हींको महर्षियोंने
वेदार्थका स्मरण करके बतलाया है। हे मैत्रेय !
स्वायम्भुवमनु आदि स्मृतिकारोंने महान् पापोंके लिये
महान् और अल्प पापोंके लिये अल्प प्रायश्चित्तोंकी
व्यवस्था की है। किन्तु जितने भी तपस्यात्मक और
कर्मात्मक प्रायश्चित हैं उन सबमें श्रीकृष्णस्मरण सर्वश्रेष्ठ
है। जिस पुरुषके चित्तमें पाप-कर्मके बाद पश्चाताप
होता है उसके लिये ही प्रायश्चित्तोंका विधान है, बिना
पश्चातापके प्रायश्चितसे पापोंका क्षय नहीं होता। किन्तु
यह हरिस्मरण तो एकमात्र स्वयं ही परम प्रायश्चित
है॥"191-193 ॥
अयोध्याके मार्गसे श्रीरायका नैमिषारण्यमें जाना
और कुछ दिन वहाँ वास :-
पाञा आज्ञा राय वृन्दावनरे चलिला।
प्रयाग, अयोध्या दिया नैमिषारण्ये आइला ॥ 194 ॥
। 507
[ 25/194-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके श्रीसुबुद्धिराय
वृन्दावनकी ओर चल दिये। वे प्रयाग और अयोध्यासे
होते हुए नैमिषारण्य आ पहुँचे ॥ 194 ॥
इसी बीच महाप्रभुका वृन्दावनसे लौटकर
पुनः प्रयागमें आगमन :-
कतक दिवस राय नैमिषारण्ये रहिला।
प्रभु वृन्दावन हैते प्रयाग आइला ॥ 195 ॥
अनुवाद—कुछ दिनों तक श्रीसुबुद्धिराय नैमिषारण्यमें
ही रहे। इसी बीच महाप्रभु वृन्दावनमें कुछ समय
रहकर वहाँसे प्रयाग चले गये ॥ 195 ॥
मथुरामें महाप्रभुका दर्शन नहीं पाकर श्रीरायको दुःख :-
मथुरा आसिया राय प्रभुवार्त्ता पाइल।
प्रभुर लाग् ना पाञा मने बड़ दुःख हैल ॥ 196 ॥
अनुवाद—मथुरामें आकर श्रीसुबुद्धिरायको महाप्रभुकी
यात्राका संवाद मिला। मथुरामें महाप्रभुके दर्शन नहीं
होनेसे उनको मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 196 ॥
रायका वैराग्य और दैन्य-आचरण :-
शुष्ककाष्ठ आनि' राय बेचे मथुराते।
पाँच छय पयसा हय एक एक बोझाते ॥ 197 ॥
आपने रहे एक पयसार चाना चाबाञा।
आर पयसा बाणिया-स्थाने राखेन धरिया ॥ 198 ॥
दुःखी वैष्णव देखि' ताँरे करान भोजन।
गौड़ीया आइले दधि, भात, तैल-मर्द्दन ॥ 199 ॥
अनुवाद—श्रीसुबुद्धिराय जङ्गलमें सूखी लकड़ियाँ
एकत्रित करके लाकर मथुरामें बेचने लगे। एक गट्ठर
लकड़ी बेचनेपर उन्हें पाँच-छः पैसे मिल जाते थे।
श्रीसुबुद्धिराय स्वयं तो एक पैसेका चना खाकर जीवन
यापन करते और बचे हुए पैसे वे बनियेके पास जमा
कर देते। वे किसी दुःखी वैष्णवको देखकर उसे भोजन
कराते थे। बङ्गालसे आये किसी भक्तको देखकर उसे
दही, चावल तथा शरीरपर लगानेके लिये तेल ले
देते ॥ 197-199 ॥
उन्हें लेकर श्रीरूपका वृन्दावनमें
द्वादश वनोंके दर्शन कराना :-
रूप-गोसाञि आसि' ताँरे बहु प्रीति कैला।
आपनसङ्गे लञा 'द्वादश वन' देखाइला ॥ 200 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके वृन्दावन आनेपर
श्रीसुबुद्धिरायने उनसे बहुत प्रीति की और उन्हें अपने
साथ ले जाकर द्वादश वनोंका दर्शन कराया ॥ 200 ॥
श्रीरूपका श्रीसनातनको ढूँढ़नेके उद्देश्यसे
वृन्दावनसे प्रयागमें आगमन :-
मासमात्र रूपगोसाञि रहिला वृन्दावने।
शीघ्र चलि' आइला सनातनानुसन्धाने ॥ 201 ॥
गङ्गातीर-पथे प्रभु प्रयागरे आइला।
ताहा शुनि' दुइभाइ से पथे चलिला ॥ 202 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी केवल एक मास तक
मथुरा और वृन्दावनमें रहे। वहाँसे श्रीसनातन गोस्वामीको
ढूँढ़नेके लिये चल पड़े। जब उन्होंने सुना कि महाप्रभु
गङ्गाके तटवाले मार्गसे प्रयाग गये थे, तब श्रीरूप
गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई भी उसी मार्गपर
चल दिये ॥ 201-202 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'ताहा शुनि'—रूप गोस्वामीने
मथुरामें सुना कि पहले महाप्रभु गङ्गाके तटके मार्गसे
मथुरा आये थे, अब उस मार्गको देखनेके उत्साहसे वे
अनुपमके साथ उस मार्गसे आये ॥ 202 ॥
इसी बीच श्रीसनातनका प्रयागसे मथुरामें आगमन :-
एथा सनातन गोसाञि प्रयागे आसिया।
मथुरा आइला सनातन राजपथे दिया ॥ 203 ॥
अनुवाद—इधर श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसीसे
चलकर प्रयाग आये। तब महाप्रभुके निर्देशानुसार वे
प्रयागसे राजमार्गपर चलते हुए मथुरा आये ॥ 203 ॥
508 |
पचीसवाँ अध्याय 25/204-211 ]
मथुरामें रायके साथ मिलन और
रूप-अनुपमके वृत्तान्तका श्रवण :-
मथुराते सुबुद्धिराय ताहारे मिलिला।
रूप-अनुपम-कथा सकलि कहिला ॥ 204 ॥
अनुवाद—मथुरामें जब श्रीसनातन गोस्वामीकी श्रीसुबुद्धिरायसे भेंट हुई, तब श्रीसुबुद्धिरायने उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी तथा श्रीअनुपमके विषयमें बतलाया॥ 204 ॥
तीनों भाइयोंके नहीं मिलनेका कारण :-
गङ्गापथे दुइभाइ, राजपथे सनातन।
अतएव ताँहा सने ना हैल मिलन ॥ 205 ॥
अनुवाद—(श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम) ये दोनों भाई तो गङ्गाके तटवाले मार्गसे मथुरासे प्रयाग गये और श्रीसनातन गोस्वामी राजमार्गसे प्रयागसे मथुरा आये, इसलिये उनकी आपसमें भेंट नहीं हुई ॥ 205 ॥
श्रीसनातनके प्रति रायका पूर्व-आश्रमोचित व्यवहार,
श्रीसनातनकी उसके प्रति अप्रीति अथवा उदासीनता :-
सुबुद्धि-राय बहु स्नेह करे सनातने।
व्यवहार-स्नेह सनातन नाहि माने ॥ 206 ॥
अनुवाद—श्रीसुबुद्धि राय श्रीसनातन गोस्वामीसे बहुत स्नेह करते थे, किन्तु श्रीसनातन गोस्वामीको वैसा सांसारिक-स्नेह अच्छा नहीं लगा ॥ 206 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'व्यवहार-स्नेह'—संसार-सम्बन्धी स्नेह ॥ 206 ॥
श्रीकृष्णको ढूँढ़नेवाले महावैरागी श्रीसनातन प्रभु :-
महा-विरक्त सनातन भ्रमेन वने वने।
प्रतिवृक्षे, प्रतिकुञ्जे रहे रात्रि-दिने ॥ 207 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी परम विरक्त थे। वे श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए वन-वनमें भ्रमण करते थे। वे एक-एक वृक्ष और एक-एक कुञ्जमें एक रात और एक दिन रहते थे ॥ 207 ॥
श्रीसनातनके द्वारा साम्प्रदायिक आचार्य-कार्यका सम्पादन :-
मथुरा-माहात्म्य-शास्त्र संग्रह करिया।
लुप्ततीर्थ प्रकट कैला वनेते भ्रमि या ॥ 208 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने मथुराके माहात्म्यका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका संग्रह किया। उन ग्रन्थोंके आधारपर उन्होंने वन-वनमें भ्रमण करके लुप्ततीर्थोंका उद्धार किया ॥ 208 ॥
श्रीसनातनका वृन्दावनमें और श्रीरूप और श्रीअनुपमका काशीमें अवस्थान :-
एइमत सनातन वृन्दावनेते रहिला।
रूप-गोसाञि दुइभाइ काशीते आइला ॥ 209 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी वृन्दावनमें रह गये और श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम—दोनों भाई काशीमें पहुँच गये ॥ 209 ॥
काशीमें तीन भक्तोंके साथ उनका मिलन :-
महाराष्ट्र
तिनजन सह रूप करिला मिलन ॥ 210 ॥
अनुवाद—वहाँ श्रीरूप गोस्वामीने महाराष्ट्र श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र—इन तीनोंसे भेंट की॥ 210 ॥
छोटे भाईके साथ श्रीरूपका भी श्रीशेखरके गृहमें रहना और श्रीतपनमिश्रके घर भिक्षा :-
शेखरेर घरे वासा, मिश्र-घरे भिक्षा।
मिश्रमुखे सुने, सनातने प्रभुर 'शिक्षा' ॥ 211 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी श्रीअनुपमके साथ श्रीचन्द्रशेखरके घरपर रहे और वे भिक्षा (भोजन) श्रीतपनमिश्रके घरपर ग्रहण करते। इस प्रकार उन्होंने श्रीतपनमिश्रके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन गोस्वामीको दी गयी 'शिक्षा'को श्रवण किया ॥ 211 ॥
। 509
[ 25/212–220 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
काशीमें महाप्रभुके द्वारा दी गयी सनातन-शिक्षा
और मायावादी संन्यासियोंके उद्धारके
वृत्तान्तको सुनकर आनन्द :-
काशीते प्रभुर चरित्र शुनि' तिनेर मुखे।
संन्यासीरे कृपा शुनि' पाइला बड़ सुखे ॥ 212 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने महाराष्ट्र
श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपनमिश्र—इन तीनोंके मुखसे
काशीमें महाप्रभुके चरित्रको सुना। और जब उन्होंने
मायावादी संन्यासियोंके प्रति महाप्रभुकी कृपाके विषयमें
सुना, तो वे बहुत आनन्दित हुए॥ 212 ॥
महाप्रभुके प्रति लोगोंके आनुगत्य-भावोंको देखकर और
कीर्त्तनके श्रवणसे श्रीरूपको सुखकी प्राप्ति :-
महाप्रभुर उपर लोकेर प्रणति देखिया।
सुखी हैला लोकमुखे कीर्त्तन शुनिया॥ 213 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रति लोगोंकी शरणागति
देखकर और उनके मुखसे महाप्रभुकी महिमाको सुनकर
श्रीरूप गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए॥ 213 ॥
दस दिन काशीमें रहनेके बाद श्रीरूपादिको गौड़-यात्रा :-
दिन दश राहि' रूप गौड़े यात्रा कैल।
सनातन-रूपेर एइ चरित्र कहिल ॥ 214 ॥
अनुवाद—दस दिन तक वाराणसीमें रहनेके बाद
श्रीरूप गोस्वामीने गौड़देशकी ओर यात्रा की। यहाँ तक
मैंने श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके विषयमें
बतलाया॥ 214 ॥
साथी बलभद्रके साथ महाप्रभुकी श्रीकृष्णको
ढूँढ़नेकी चेष्टा करते-करते पहलेकी भाँति
झारिखण्डके मार्गसे पुरीकी यात्रा :-
एथा महाप्रभु यदि नीलाद्रि चलिला।
निर्जन वनपथे याइते महासुख पाइला॥ 215 ॥
सुखे चलि' आइसे प्रभु बलभद्र-सङ्गे।
पूर्ववत् मृगादि-सङ्गे कैला नानारङ्गे॥ 216 ॥
अनुवाद—इधर जब महाप्रभु नीलाद्रिकी
(जगन्नाथपुरीकी) ओर जा रहे थे, तब निर्जन वनके
पथपर चलते हुए उन्हें बहुत सुख हुआ। आनन्दसे
महाप्रभु श्रीबलभद्र भट्टाचार्यके साथ चलते जा रहे थे
और झारिखण्डके वनमें पहलेकी भाँति उन्होंने पशुओंके
साथ अनेक प्रकारकी लीलाएँ कीं॥ 215-216 ॥
आठारनालामें आकर बलभद्रके द्वारा
पुरीमें स्थित भक्तोंका आह्वान :-
आठारनालाते आसि' भट्टाचार्य ब्राह्मणे।
पाठाञा बोलाइला निज-भक्तगणे॥ 217 ॥
अनुवाद—आठारनाला पहुँचकर महाप्रभुने श्रीबलभद्र
भट्टाचार्यको आगे भेजकर अपने भक्तोंको बुलवाया॥ 217 ॥
महाप्रभुके आगमनके विषयमें सुनकर भक्तोंको
मृत-सञ्जीवनी-मन्त्रकी प्राप्ति :-
शुनिया भक्तकेर गण येन पुनरपि जीला।
देहे प्राण आइल, येन इन्द्रिय उठिला॥ 218 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके आनेका संवाद सुनकर भक्त
मानो पुनः जीवित हो गये हों, उनकी देहमें प्राणोंका
सञ्चार हो गया और उनकी इन्द्रियोंमें शक्ति आ
गयी॥ 218 ॥
नरेन्द्र-सरोवरके निकट आकर सभीके
द्वारा महाप्रभुका दर्शन :-
आनन्दे विह्वल भक्तगण धाञा आइला।
नरेन्द्रे आसिया सबे प्रभुरे मिलिला॥ 219 ॥
अनुवाद—आनन्दमें विह्वल होकर भक्त दौड़ते हुए
आये और नरेन्द्र सरोवरपर आकर सभी महाप्रभुसे
मिले॥ 219 ॥
भक्तों और महाप्रभुका परस्परके प्रति
यथायोग्य प्रणाम और आलिङ्गनादि :-
पुरी, भारतीर प्रभु वन्दिलेन चरण।
दोंहे महाप्रभुरे कैला प्रेम-आलिङ्गन॥ 220 ॥
510 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/220-229 ]
अनुवाद - श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती
उनके गुरुके गुरु-भ्राता थे, इसलिये महाप्रभुने उनके
चरणकमलोंकी वन्दना की। उन दोनोंने महाप्रभुका
प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 220 ॥
दामोदर-स्वरूप, पण्डित गदाधर।
जगदानन्द, काशीश्वर, गोविन्द, वक्रेश्वर ॥ 221 ॥
काशी-मिश्र, प्रद्युम्न-मिश्र, पण्डित-दामोदर।
हरिदास ठाकुर, आर पण्डित-शङ्कर ॥ 222 ॥
भक्त और भगवान्के मिलनसे
दोनोंमें ही प्रेमका आवेश :-
आर सब भक्त प्रभुर चरणे पड़िला।
सबा आलिङ्गिया प्रभु प्रेमाविष्ट हैला ॥ 223 ॥
अनुवाद - श्रीस्वरूप-दामोदर गोस्वामी, श्रीगदाधर-पण्डित,
श्रीजगदानन्द-पण्डित, श्रीकाशीश्वर-पण्डित, श्रीगोविन्द,
श्रीवक्रेश्वर-पण्डित, श्रीकाशी-मिश्र, श्रीप्रद्युम्न-मिश्र,
श्रीदामोदर-पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीशङ्कर-पण्डित
तथा अन्य सब भक्त महाप्रभुके श्रीचरणोंमें पड़ गये, उन
सब भक्तोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट
हो गये ॥ 221-223 ॥
सभीको साथ लेकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :-
आनन्द-समुद्रे भासे सब भक्तगणे।
सबा लञा चले प्रभु जगन्नाथ-दरशने ॥ 224 ॥
अनुवाद-सभी भक्त आनन्दके समुद्रमें डूब गये।
महाप्रभु उन सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके
दर्शनके लिये चल पड़े ॥ 224 ॥
महाप्रभुका प्रेमावेश और नृत्यगीत :-
जगन्नाथ देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हैला।
भक्तसङ्गे बहुक्षण नृत्य-गीत कैला ॥ 225 ॥
अनुवाद - श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके महाप्रभु
प्रेमाविष्ट हो गये। बहुत देर तक वे भक्तोंके साथ नृत्य
और कीर्तन करते रहे ॥ 225 ॥
श्रीजगन्नाथकी प्रसादी-मालाकी प्राप्ति,
पड़िछाओंके द्वारा प्रणाम :-
जगन्नाथ-सेवक आनि' माला-प्रसाद दिला।
तुलसी पड़िछा आसि' चरण वन्दिला ॥ 226 ॥
अनुवाद- श्रीजगन्नाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुको
प्रसादी माला पहनायी। तुलसी-पड़िछाने आकर उनके
श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 226 ॥
चारों ओर महाप्रभुके आगमनके संवादका विस्तार,
कटकसे श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके द्वारा
आकर महाप्रभुका दर्शन :-
'महाप्रभु आइला'-ग्रामे कोलाहल हैल।
सार्वभौम, रामानन्द, वाणीनाथ मिलिल ॥ 227 ॥
अनुवाद-'महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं'-सर्वत्र
यह बात फैल गयी। कटकसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य,
श्रीरामानन्द राय और श्रीद्विज-वाणीनाथने आकर महाप्रभुसे
भेंट की ॥ 227 ॥
महाप्रभुका काशीमिश्रके गृहमें वास
और सार्वभौमका निमन्त्रण :-
सबा सङ्गे लञा प्रभु मिश्र-वासा आइला।
सार्वभौम-पण्डित गोसाञिरे निमन्त्रण कैला ॥ 228 ॥
भक्तोंके साथ प्रसादके सेवनकी इच्छाके लिये प्रसाद
लानेका आदेश :-
प्रभु कहे,-"महाप्रसाद आन' एइ स्थाने।
सबा-सङ्गे इँहा आजि करिमु भोजने ॥ " 229 ॥
अनुवाद-महाप्रभु सभीको अपने साथ लेकर
श्रीकाशीमिश्रके घरपर आ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
और श्रीगदाधर पण्डितने महाप्रभुको भोजनके लिये
निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको स्वीकार
करके उन दोनोंसे कहा, - "महाप्रसाद यहाँपर ही ले
आइये। आज मैं सबके साथ बैठकर यहींपर ही भोजन
करूँगा ॥ " 228-229 ॥
| 511
[ 25/230-239
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :-
तबे दुँहे जगन्नाथप्रसाद आनिला।
सबा-सङ्गे महाप्रभु भोजन करिला ॥ 230 ॥
अनुवाद-तब वे दोनों श्रीजगन्नाथके प्रसादको लेकर आये और महाप्रभुने सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ 230 ॥
वृन्दावनसे पुरी-आगमनकी यात्रा वर्णित :-
एइ त' कहिलुँ, - प्रभु देखि' वृन्दावन।
पुनः करिलेन यैछे नीलाद्रि-गमन ॥ 231 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने (कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके वृन्दावनके दर्शन और पुनः वृन्दावनसे पुरी आगमनके विषयमें बतलाया है ॥ 231 ॥
श्रवण करनेवालोंको चिद्-वृत्तिकी
स्फूर्त्ति और श्रीकृष्ण प्राप्ति :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
अचिरात् पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥ 232 ॥
अनुवाद-जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 232 ॥
मध्यलीलाका दिग्दर्शन और चौबीस वर्षोंमेंसे छः वर्ष भारतमें नामप्रेमके प्रचारके उद्देश्यसे भ्रमण :-
मध्यलीलार करिलुँ एइ दिग्दर्शन।
छय वत्सर कैला यैछे गमनागमन ॥ 233 ॥
अनुवाद-छः वर्षों तक महाप्रभुने जिस प्रकार नीलाचलसे भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें आना-जाना किया, मैंने मध्यलीलामें उसका केवल दिग्दर्शनमात्र कराया है ॥ 233 ॥
बाकीके अठारह वर्ष पुरीमें भक्तोंके साथ कीर्तन-उल्लास :-
शेष अष्टादश वत्सर नीलाचले वास।
भक्तगण-सङ्गे करे कीर्त्तन-विलास ॥ 234 ॥
अनुवाद-अन्तिम अठारह वर्षों तक महाप्रभुने नीलाचलमें ही वास किया। वहाँपर उन्होंने भक्तोंके साथ कीर्तन-विलास किया ॥ 234 ॥
भागवतमें श्रीव्यासकी रीतिका अनुसरण करते हुए संक्षेपमें मध्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनः चर्चा :-
मध्यलीलार क्रम एबे करि अनुवाद।
अनुवाद कैले हय कथार आस्वाद ॥ 235 ॥
अनुवाद-अब मैं मध्यलीलाके अध्यायोंमें वर्णित विषयोंका क्रमसे पुनः वर्णन करूँगा। पुनः उल्लेख करनेसे उन विषयोंका आस्वादन होता है ॥ 235 ॥
प्रथम परिच्छेदे-शेषलीलार सूत्रगण।
तथि-मध्ये कोन भागेर विस्तार वर्णन ॥ 236 ॥
अनुवाद-पहले अध्यायमें शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया है और उसीमें ही किसी-किसी भागका विस्तारपूर्वक भी वर्णन किया है ॥ 236 ॥
द्वितीय परिच्छेदे-प्रभुर प्रलाप-वर्णन।
तथि-मध्ये नाना-भावेर दिगदरशन ॥ 237 ॥
अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रलापका वर्णन हुआ है। उसके बीचमें महाप्रभुमें प्रकाशित अनेक-भावोंका दिग्दर्शन भी कराया है ॥ 237 ॥
तृतीय परिच्छेदे-प्रभुर कहिलुँ संन्यास।
आचार्येर घरे यैछे करिला विलास ॥ 238 ॥
अनुवाद-तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके संन्यासका वर्णन किया गया है और श्रीअद्वैताचार्यके घरपर महाप्रभुके विलासका वर्णन है ॥ 238 ॥
चतुर्थे-माधवपुरीर चरित्र-आस्वादन।
गोपाल-स्थापन, क्षीरचुरिर वर्णन ॥ 239 ॥
अनुवाद-चौथे अध्यायमें महाप्रभु और भक्तोंके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्रका आस्वादन, उनके द्वारा
512 |
पचीसवाँ अध्याय 25/239-249 ]
श्रीगोपालके विग्रहकी स्थापना और श्रीगोपीनाथके खीर-
चोरी करनेका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है॥ 239 ॥
पञ्चमे—साक्षिगोपाल-चरित्र वर्णन।
नित्यानन्द कहे, प्रभु करेन आस्वादन ॥ 240 ॥
अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा
साक्षी गोपालके चरित्रका वर्णन और महाप्रभुके द्वारा
उसके आस्वादनका वर्णन हुआ है॥ 240 ॥
षष्ठे—सार्वभौमेर करिला उद्धार।
सप्तमे—तीर्थयात्रा, वासुदेव-निस्तार ॥ 241 ॥
अनुवाद—छठे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके उद्धारका वर्णन हुआ है। सातवें अध्यायमें
महाप्रभुकी तीर्थयात्रा और उनके द्वारा श्रीवासुदेव-विप्रके
उद्धारका वर्णन हुआ है॥ 241 ॥
अष्टमे—रामानन्द-संवाद विस्तार।
आपने शुनिला 'सर्व-सिद्धान्तेर सार' ॥ 242 ॥
अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीराम force/रामानन्द-संवादका
वर्णन हुआ है। स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके
मुखसे सभी सिद्धान्तोंके सारका श्रवण किया॥ 242 ॥
नवमे—कहिलुँ दक्षिण-तीर्थ-भ्रमण।
दशमे—कहिलुँ सर्व वैष्णव-मिलन ॥ 243 ॥
अनुवाद—नौवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुके द्वारा किये
गये दक्षिण भारतके तीर्थोंके भ्रमणका वर्णन किया है।
दसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ सभी वैष्णवोंके मिलनका
वर्णन हुआ है॥ 243 ॥
एकादशे—श्रीमन्दिरे 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'।
द्वादशे—गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-क्षालन ॥ 244 ॥
अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें
हुए 'बेड़ा-सङ्कीर्त्तन'का (परिक्रमा करते हुए कीर्त्तनका)
वर्णन हुआ है। बारहवें अध्यायमें गुण्डिचा-मन्दिरकी
सफाई-धुलाईका वर्णन हुआ है॥ 244 ॥
त्रयोदशे—रथ-आगे प्रभुर नर्त्तन।
चतुर्दशे—'हेरापञ्चमी'-यात्रा-दरशन ॥ 245 ॥
तार मध्ये व्रजदेवीर् भावेर श्रवण।
स्वरूप कहिला, प्रभु कैला आस्वादन ॥ 246 ॥
अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें रथके आगे महाप्रभुके
द्वारा किये गये नृत्यका वर्णन हुआ है। चौदहवें
अध्यायमें 'हेरा-पञ्चमी' यात्राके दर्शनका वर्णन हुआ है
और महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे व्रजदेवियोंके भावोंको
सुनकर उसका आस्वादन किया॥ 245-246 ॥
पञ्चदशे—भक्तेर गुण आपने कहिल।
सार्वभौम-घरे भिक्षा, अमोघ तारिल ॥ 247 ॥
अनुवाद—पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा अपने
भक्तोंके गुणोंका वर्णन, उनके द्वारा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
घरपर भिक्षा करने और अमोघके उद्धारका भी वर्णन
हुआ है॥ 247 ॥
षोडशे—वृन्दावन-यात्रा गौड़देशे-पथे।
पुनः नीलाचले आइला, नाटशाला हैते ॥ 248 ॥
अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें महाप्रभुकी गौड़देश
(बङ्गाल)से होते हुए वृन्दावनके लिये जानेका वर्णन
है। किन्तु वे वृन्दावन न जाकर कानाइ-नाटशालासे
ही नीलाचल लौट आये॥ 248 ॥
सप्तदशे—वनपथे मथुरा-गमन।
अष्टादशे—वृन्दावन-विहार-वर्णन ॥ 249 ॥
अनुवाद—सत्रहवें अध्यायमें महाप्रभुके झारिखण्डके
वनके मार्गसे मथुरा जानेका और अठारहवें अध्यायमें
महाप्रभुके वृन्दावन-विहारका वर्णन हुआ है॥ 249 ॥
। 513
[ 25/250-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ऊनविंशे-मथुरा हैते प्रयाग-गमन।
तार मध्ये श्रीरूपेरे शक्ति-सञ्चारण ॥ 250 ॥
अनुवाद-उन्नीसवें अध्यायमें महाप्रभुके मथुरासे प्रयाग
लौटनेका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें महाप्रभुके
द्वारा श्रीरूप गोस्वामीमें शक्ति-सञ्चार करनेका वर्णन भी
है॥ 250 ॥
विंशति परिच्छेदे-सनातनरे मिलन।
तार मध्ये भगवानरे स्वरूप-वर्णन ॥ 251 ॥
अनुवाद-बीसवें अध्यायमें महाप्रभुके साथ श्रीसनातन
गोस्वामीके मिलनका वर्णन हुआ है। उसी अध्यायमें
महाप्रभुके द्वारा भगवान्के स्वरूपका वर्णन भी लिखा
है॥ 251 ॥
एकविंशे-कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन।
द्वाविंशे-द्विविध साधनभक्तिर विवरण ॥ 252 ॥
अनुवाद-इक्कीसवें अध्यायमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य
और माधुर्यका वर्णन और बाइसवें अध्यायमें दो
प्रकारकी साधनभक्तिका विवरण दिया गया है ॥ 252 ॥
त्रयोविंशे-प्रेमभक्तिरसेर कथन।
चतुर्विंशे-'आत्मारामा'-श्लोकार्थ-वर्णन ॥ 253 ॥
अनुवाद-तेइसवें अध्यायमें प्रेमभक्तिरसका वर्णन
और चौबीसवें अध्यायमें 'आत्मारामा:' श्लोकके अर्थोंका
वर्णन हुआ है॥ 253 ॥
पञ्चविंशे-काशीवासीरे वैष्णवकरण।
काशी हैते पुनः नीलाचले आगमन ॥ 254 ॥
अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा
काशीवासियोंको वैष्णव बनाने और महाप्रभुके काशीसे
पुनः नीलाचल आनेका वर्णन हुआ है॥ 254 ॥
पञ्चविंशति परिच्छेदे एइ कैलुँ अनुवाद।
याहार श्रवणे हय ग्रन्थार्थ-आस्वाद ॥ 255 ॥
अनुवाद-पचीसवें अध्यायमें मैंने सम्पूर्ण मध्यलीलाका
क्रमशः पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे
सम्पूर्ण ग्रन्थके तात्पर्यको जाना जा सकता है ॥ 255 ॥
संक्षेपमें मध्यलीला वर्णित :-
संक्षेपे कहिलुँ एइ मध्यलीलार सार।
कोटिग्रन्थे वर्णन ना याय इहार विस्तार ॥ 256 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने संक्षेपमें मध्यलीलाके
सारका वर्णन किया है, विस्तारसे तो इसका करोड़ों
ग्रन्थोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 256 ॥
जीवोंके उद्धारके लिये महाप्रभुका सम्पूर्ण भारत-भ्रमण
और स्वयं आचरण करके प्रचार :-
जीव निस्तारिते प्रभु भ्रामला देशे-देशे।
आपने आस्वादि' भक्ति करिला प्रकाशे ॥ 257 ॥
अनुवाद-जीवोंका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने
देश-देशमें भ्रमण किया। स्वयं भक्तिका आस्वादन करते
हुए उन्होंने भक्तिका प्रचार किया ॥ 257 ॥
महाप्रभुके द्वारा प्रचारित विषय-समूह :-
कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व आर।
भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार ॥ 258 ॥
श्रीभागवत-तत्त्वरस करिला प्रचारे।
कृष्णतुल्य भागवत, जानाइला संसारे ॥ 259 ॥
कभी तो श्रोतारूपमें, और कभी
वक्तारूपमें शुद्धभक्तिका प्रचार :-
भक्त लागि' विस्तारिला आपन-वदने।
काँहा भक्त-मुखे कहाइ शुनिला आपने ॥ 260 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकृष्ण-तत्त्व, भक्तितत्त्व, प्रेमतत्त्व,
भावतत्त्व, रसतत्त्व, लीलातत्त्व-सार और श्रीभागवतके
तत्त्व एवं रसका प्रचार किया। उन्होंने संसारमें इस
बातको प्रकाशित किया कि श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्ण
अभिन्न हैं, श्रीभागवत श्रीकृष्णका वाङ्मय अवतार है।
कभी तो महाप्रभुने भक्तोंके लिये स्वयं अपने मुखसे
514 |
Here is the complete transcription of the text from the image:
पचीसवाँ अध्याय [25/258-266 ]
भागवतके तत्त्वोंका वर्णन किया और कभी उन्होंने
भक्तोंमें शक्ति सञ्चरित करके उनके मुखसे स्वयं
उसका श्रवण किया ॥ 258-260 ॥
अनुपम भक्तवत्सल, अद्वितीय और
अहैतुकी कृपाके सागर :-
श्रीचैतन्यसम आर कृपालु, वदान्य।
भक्तवत्सल ना देखि त्रिजगते अन्य ॥ 261 ॥
अनुवाद—तीनों लोकोंमें मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके
समान कोई कृपालु, वदान्य और भक्तवत्सलको नहीं
देखता हूँ॥ 261 ॥
अन्धविश्वास छोड़कर वास्तव-वस्तुमें दृढ़-विश्वासके
फलस्वरूप ही परतत्त्व श्रीचैतन्य-कृष्णकी प्राप्ति :-
श्रद्धा करि' एइ लीला शुन, भक्तगण।
इहार प्रसादे पाइबा चैतन्य-चरण ॥ 262 ॥
इहार प्रसादे पाइबा कृष्णतत्त्वसार।
सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा पाइबा पार ॥ 263 ॥
अनुवाद—हे भक्तों! श्रद्धापूर्वक इन लीलाओंका
श्रवण करो, इनकी कृपासे आपको श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी। इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक
श्रवण करनेसे आप श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझ सकोगे।
श्रीकृष्णतत्त्व-सारको समझनेपर सभी शास्त्र-सिद्धान्तोंका
स्वतः ही पूर्ण ज्ञान हो जाता है ॥ 262-263 ॥
श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यलीला-अभिन्न अमृतकी नदी,
वह केवलमात्र शुद्धचित्त भक्तके द्वारा ही आस्वाद्य :-
कृष्णलीला अमृत-सार, तार शत शत धार,
दशदिके बहे याहा हैते।
से चैतन्यलीला हय, सरोवर अक्षय,
मनोहंस चराह' ताहाते ॥ 264 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण-लीलाएँ अमृतका सार हैं। इनकी
सैकड़ों धाराएँ दसों दिशाओंमें बहती हैं। श्रीकृष्ण-
लीलाओंसे अभिन्न श्रीचैतन्य-लीलाएँ अक्षय सरोवर हैं,
हे भक्तों! अपने मनरूपी हंसको उसमें विहार
कराओ॥ 264 ॥
ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक प्रार्थना :-
भक्तगण, शुन मोर दैन्य-वचन।
तोमा-सबार पदधूलि, अङ्गे विभूषण करि',
किछु मुञि करों निवेदन ॥ 265 ॥ ध्रु. ॥
अनुवाद—हे भक्तों! आप मेरी विनती सुनो। आप
सबके चरणकमलोंकी धूलिको अपने अङ्गोंका विभूषण
बनाकर मैं कुछ निवेदन कर रहा हूँ॥ 265 ॥
भक्तिसिद्धान्तसमूह और श्रीकृष्णप्रेमरसके
आस्वादनके लिये भक्तोंसे अनुरोध :-
कृष्णभक्तिसिद्धान्तगण, याते प्रफुल्ल पद्मवन,
तार मधु करि' आस्वादन।
प्रेमरस-कुमुदवने, प्रफुल्लित रात्रि-दिने,
ताते चराओ मनोभृङ्गगण ॥ 266 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिसिद्धान्त-समूह प्रफुल्लित
कमलोंके वन सदृश्य है, कृपा करके आप उन
कमलोंके मकरन्दका आस्वादन कीजिये। इस सरोवरमें
प्रेमरसरूपी कुमुदवन रात-दिन प्रफुल्लित हो रहा है,
हे भक्तों! उसमें अपने मनरूपी भ्रमरको विहार
कराओ॥ 266 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला ही 'अमृत-सार वस्तु' है;
उसके अतिरिक्त, —सब कुछ ही 'असार' है।
श्रीकृष्णलीलामृत सारकी सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ
श्रीकृष्णलीलामृतसे दसों दिशाओंमें प्रवाहित होती हैं।
श्रीकृष्णलीलामृत-सार ही श्रीचैतन्यलीला है।
श्रीचैतन्यलीलाको श्रीकृष्णलीलासे पृथक् मानकर वर्तमान
कालमें नयी-नयी कल्पनाओंके प्रभावसे उत्पन्न “नदीया
और गौरनागरी लीला” आदि नये मतवादोंकी सृष्टि
करनेकी चेष्टा चल रही है। थियसफिस्ट दलके कई
लोग और अन्यान्य भक्ति-विरोधी प्राकृत बाउल और
। 515
[ 25/264-269 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सहजिया दलके कई व्यक्ति अपनी-अपनी उच्छृङ्खल
प्राकृत-वृत्तिके साँचेमें ढालकर अर्थात् अपनी वृत्तिके
अनुसार ही श्रीगौराङ्गको भी कोई राजनैतिक-नेता
अथवा कोई शक्तिके उपासक अथवा कोई अवैध
नागरीका लम्पट माननेकी धारणा रखते हैं। गोलोककी
नित्यलीला ही प्रकटकालमें प्रपञ्चमें उदित होती है।
महाप्रभुकी प्रकटलीलामें उस समय श्रीरूपादि श्रीगौरलीलाके
पार्षदवर्गमेंसे किसीने भी उस लीलामें गौरनागर-लीलाको
नहीं देखा अथवा समझा, इसलिये तथाकथित गौरनागर-लीला
निश्चय ही चैतन्यलीला नहीं है। श्रीरुपानुग वैष्णव-गुरुके
चरणचिह्नोंका अनुसरण करके श्रीगौरभक्ति करना ही
कर्त्तव्य है। कल्पनाके सरोवरमें अवगाहन करके
'नवगोरार दल' बनाकर कोई भी फल नहीं मिलेगा।
'चैतन्यलीला'-अक्षय सरोवर है; श्रीकृष्णभक्ति-
सिद्धान्त-समूह-उस सरोवरके कमलके वन हैं;
प्रेमरस-कुमुदवन है; और भक्तोंका मन-भँवरोंका
समूह है॥ 264-266॥
श्रीकृष्णलीलाका वैचित्र्य-समूह ही भक्तोंका जीवन :-
नाना-भावेर भक्तजन, हंस-चक्रवाकगण,
याते बसि' करेन विहार।
कृष्णकेलि-मृणाल, याहा पाइ सर्वकाल,
भक्त-हंस करये आहार ॥ 267 ॥
अनुवाद— अनेक भावोंके हंस, चक्रवाकादि रूपी
भक्तगण इस (श्रीचैतन्यलीलारूपी) अक्षय सरोवरमें
सदैव विहार करते हैं। इस सरोवरमें श्रीकृष्णलीलारूपी
मृणाल (कमलनाल) सदा उपलब्ध है और भक्तरूपी
हंस सदैव उस कमलनालका आहार करते हैं॥ 267॥
अनुभाष्य— श्रीकृष्णकेलिरूपी कमलनाल ही भक्त
रूपी हंसका 'आहार' है। नित्यसम्भोगरस-विग्रह
श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न-तनु
नित्यविप्रलम्भरसविग्रह श्रीगौरसुन्दरके आश्रित नित्यसेवक
भक्तोंकी आहार योग्य वस्तु है॥ 267॥
वैसे आस्वादनसे ही प्रेमोल्लासकी वृद्धि :-
सेइ सरोवरे गिया, हंस-चक्रवाक हञा,
सदा ताँहा करह विलास।
खण्डिबे सकल दुःख, पाइबा परम सुख,
अनायासे हबे प्रेमोल्लास ॥ 268 ॥
अनुवाद— हे श्रीगौरभक्तों! आप भी हंस, चक्रवाक
बनकर उस सरोवरमें जाकर सदैव वहीं विलास करो।
इससे आपके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे और आपको
परम सुखकी प्राप्ति होगी और अनायास ही प्रेमोल्लास
उत्पन्न होगा ॥ 268 ॥
अनुभाष्य— हे श्रीगौरभक्तों, श्रीचैतन्यलीलाके सरोवरमें
अवगाहन करके नित्यकाल श्रीगौरपदाश्रित हंस-चक्रवाकके
रूपमें श्रीकृष्णका भजन करते-करते श्रीगौर-उपासनारूपी
सरोवरमें विलास करो। ऐसा करनेपर नदीया-नागरीकी
भाँति श्रीगौराङ्गको कोई भोग्य-जड़वस्तुके रूपमें कल्पना
करके श्रीकृष्णसे इतर सेवारूपी 'दुःख'से बच जाओगे
और श्रीकृष्णसेवारूपी परमसुखको प्राप्त करके (तुम)
श्रीकृष्णप्रेमके उल्लासमें मत्त हो जाओगे ॥ 268 ॥
शुद्धभक्तोंके द्वारा विश्ववासियोंमें
श्रीगौरकृष्णलीलामृतका वितरण :-
एइ अमृत अनुक्षण, साधु-महान्त-मेघगण,
विश्वोद्याने करे वरीषण।
ताते फले अमृत-फल, भक्त खाय निरन्तर,
तार प्रेमे जीये जगजन ॥ 269 ॥
अनुवाद— साधु-महान्त पुरुष ही मेघ बनकर
विश्वरूपी उद्यानमें इस लीलारूपी अमृतका निरन्तर
वर्षण करते हैं। उस वर्षणके फलस्वरूप प्रेमरूपी
अमृत-फल फलता है। भक्तगण उसको निरन्तर खाते
हैं और जगत्वासी उन भक्तोंके उच्छिष्टको खाकर
सुखपूर्वक जीवित रहते हैं॥ 269 ॥
अनुभाष्य— श्रीगौरपदाश्रित साधु-महान्त ही मेघसमूह
हैं। वे सदैव जगत्रूपी उद्यानमें श्रीकृष्णलीलामृतका
516 |
पचीसवाँ अध्याय 25/269–272 ]
वर्षण करते हैं। इस जलधाराके सींचनेके प्रभावसे
प्रेमामृत-फलके फलनेपर भक्तगण उसे निरन्तर खाते हैं
और उनके प्रेमसे विश्ववासी जीवन धारण करते
हैं॥ 269 ॥
श्रीगौरलीला—घने दूधका पूर (सागर), उसमें
श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर, श्रौत-पन्थामें हरि-गुरु-वैष्णवकी
कृपासे उसके आस्वादनकी सम्भावना :—
चैतन्यलीला—अमृतपूर, कृष्णलीला—सुकर्पूर,
दुहे मिलि' हय सुमाधुर्य।
साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा येइ आस्वादे,
सेइ जाने माधुर्य-प्राचुर्य ॥ 270 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्यलीला उस प्रेमामृतके सागर सदृश
है और श्रीकृष्णलीला-सुकर्पूरके समान है। दोनों
लीलाएँ मिलनेपर अत्यधिक मधुर और आस्वादनीय हो
जाती हैं। साधु-गुरुकी कृपासे ही जो कोई उसका
आस्वादन करता है, वही माधुर्यकी चरमसीमाको जान
पाता है॥ 270 ॥
अनुभाष्य—चैतन्यलीलामृत—उस प्रेमामृतके 'सागर'के
समान है और श्रीकृष्णलीला—सुकर्पूर-तुल्य है; इन
दोनों लीलामृतका एक साथ मिलना ही सुमाधुर्य है।
श्रीकृष्णलीला-माधुर्य श्रीचैतन्यलीलामृतके सहयोगसे
पुष्ट होकर सुमाधुर्यमय हो गया है। श्रीगौर-विरोधी
असुरदल श्रीगौरलीला अथवा श्रीगौर-मन्त्रको स्वीकार
नहीं करता, इसलिये उनके द्वारा श्रीकृष्णलीला-माधुर्यका
आस्वादन करना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर,
श्रीकृष्णविरोधी दैत्यदल श्रीकृष्णलीलामृतसे उदासीन
होकर नदीया-नागरीके अनुगत नागरी-अभिमानसे
विप्रलम्भरसविग्रह श्रीराधाकृष्ण-अभिन्न-तनु श्रीगौरको
श्रीकृष्णसे अलग करके अर्थात् सम्भोगरसविग्रह मानकर
श्रीगौरलीलाके वैचित्र्यके माधुर्यका समूल विनाश करते
हैं। श्रीरूपानुग-साधु-गुरु-कृपाके द्वारा अर्थात्
श्रीरूपानुगत्यमें श्रीगौरलीलामृत और श्रीकृष्णलीलामृतको
परस्पर 'अभिन्न' जाननेपर दोनों लीलाओंके एक साथ
सम्मिलनसे ही केवल प्रचुर माधुर्यका आस्वादन होता
है। श्रीरूपानुग व्यक्ति केवलमात्र इसीपर ही दृढ़भावसे
विश्वास करते हैं॥ 270 ॥
ये दोनों लीलामृत ही भक्तोंका आहार, इसके अतिरिक्त
अन्नग्रहण करनेपर भी भक्त-जीवनकी अपुष्टि :—
ये लीला-अमृत बिने, खाय यदि अन्नपाने,
तबे भक्तेर दुर्बल जीवन।
यार एकबिन्दु-पाने, उत्फुल्लित तनुमने,
हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 271 ॥
अनुवाद—इस लीलामृतके बिना भक्त अन्नादि
खानेपर भी वास्तवमें दुर्बल रहता है। परन्तु इस
लीलामृतकी एक बिन्दुका पान करनेसे ही वह तन-
मनसे अत्यन्त प्रफुल्लित होकर हँसता, गाता और नृत्य
करता है॥ 271 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य अन्न खानेसे पुष्ट होता
है। बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति अन्न खानेपर भी यदि
भक्तगण श्रीकृष्णलीलासे युक्त श्रीचैतन्यलीलामृतका पान
नहीं करते हैं, तो वे भी बहिर्मुख व्यक्तियोंकी भाँति
(परमार्थ-पथके लिये) दुर्बल हो जाते हैं॥ 271 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरे—'खाय यदि अनुपाने।'॥ 271 ॥
तर्कपन्याससे यह अमृत दुर्लभ :—
ए अमृत कर पान, यार सम नाहि आन,
चित्ते करि' सुदृढ़ विश्वास।
ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते, अमेध्य-कर्कश-आवर्त्ते,
याते पड़िले हय सर्वनाश ॥ 272 ॥
अनुवाद—हे भक्तों! चित्तमें ऐसा सुदृढ़ विश्वास
रखकर कि इसके समान अन्य कुछ भी नहीं है, इस
अमृतका पान करो। साथ ही इस बातसे बहुत सावधान
रहना कि कहीं कुतर्करूपी गड्ढे अथवा अपवित्र
दुर्गन्धयुक्त कठोर बवण्डरमें मत उलझ जाओ, उसमें
फँसनेसे सर्वनाश हो जाता है॥ 272 ॥
। 517
[ 25/272-276 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाको परस्पर
भिन्न समझकर कुतर्कके आधारपर अपवित्र कर्कश
घूमनेवाली वायुके द्वारा चलायमान होकर श्रीकृष्णभजन
छोड़कर श्रीगौरभजन करने अथवा श्रीगौरसेवाको
छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करनेपर, मूढ़-जीवका सर्वनाश
होता है॥ 272 ॥
पञ्चतत्त्वको और श्रोताओंको प्रणाम :—
श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, श्रीअद्वैत, भक्तवृन्द,
आर यत श्रोता भक्तगण।
तोमा-सबार श्रीचरण, करि शिरे भूषण,
याहा हैते अभीष्ट-पूरण ॥ 273 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु,
श्रीअद्वैताचार्य, समस्त गौरभक्तवृन्द और जितने श्रोता
भक्तवृन्द हैं, मैं आप सबके श्रीचरणकमलोंको अपने
सिरका विभूषण बनाता हूँ, उसीसे ही मेरी अभीष्ट-पूर्ति
होगी॥ 273 ॥
अभीष्ट आराध्यको प्रणाम :—
श्रीरूप-सनातन- रघुनाथ-जीव-चरण,
शिरे धरि,—यार करि आश।
कृष्णलीलामृतान्वित, चैतन्यचरितामृत,
कहे किछु दीन कृष्णदास ॥ 274 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामीके
श्रीचरणकमलोंको सिरपर धारण करके उनकी कृपाकी
मैं सदैव आशा करता हूँ। मैं, कृष्णदास, श्रीकृष्णलीलासे
युक्त श्रीचैतन्यचरितामृतका दीनतापूर्वक कुछ वर्णन
करनेका प्रयास कर रहा हूँ॥ 274 ॥
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये।
चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्यचरितामृतम्॥ 275 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्द-
देवकी तुष्टिके लिये यह चैतन्यचरितामृत ग्रन्थ श्रीकृष्ण-
चैतन्य महाप्रभुको समर्पित हो॥ 275 ॥
अनुभाष्य—
श्रीमन्मदनगोपाल-गोविन्ददेव-तुष्टये (श्रीमन्मदनगोपालः गोविन्ददेवः
च तयोः तुष्टये प्रीत्यै) एतत् चैतन्यचरितामृतं चैतन्यार्पितमस्तु
(श्रीकृष्णचैतन्याय समर्पयामि)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥
अभक्तोंकी निन्दा-प्रशंसाके प्रति निरपेक्ष ग्रन्थकारका
भक्तोंके सुखसे ही स्वयंको कृतार्थ मानना :—
तदिदमतिरहस्यं गौरलीलामृतं यत्
खलु समुदय-लोकैर्नादृतं तैरलभ्यम्।
क्षतिरियमिह का मे स्वादितं यत् समन्तात्
सहृदय-सुमनोभिर्मोदमेषां तनोति ॥ 276 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे काशीवासि-वैष्णवकरणं
पुनर्नीलाचल-गमनञ्च पञ्चविंशः परिच्छेदः।
इति मध्यलीला समाप्ता
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 276 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यह अति रहस्यमय श्रीगौर-
लीलामृत भक्तोंका प्राणधन होनेपर भी अनधिकारी लोग
निश्चय ही इसका आदर नहीं करेंगे, इसमें मेरी कोई
हानि नहीं है, परन्तु यह लीलामृत जिन सब सहृदय
साधुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे आस्वादित होगा, यह ग्रन्थ
उन महात्माओंके आनन्दका विस्तार करे॥ 276 ॥
पचीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें काशीवासियोंका
वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन नामक पचीसवें
अध्यायका अनुवाद समाप्त।
अनुभाष्य—
अतिरहस्यं (परमगोपनीयं) तत् गौरलीलामृतम् (इदं ग्रन्थरत्नं)
खलु (निश्चितं) समुदयलोकैः (असद्भिरनधिकारिभिः सर्वैः) न
518
पचीसवाँ अध्याय 25/276 ]
आदृतं, यतः [इदं] तैः (असद्भिः) अलभ्यं (लब्धुमशक्यम्); श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 276 ॥
इह (अत्र) मे (मम) इयं का क्षतिः (हानिः)?- यत् (यत्र) पचीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
सहृदयसुमनोभिः (निष्कपटैः सुधीभिः ऐकान्तिकचित्तैः) समन्तात्
(सर्वतः) स्वादितं (सत्) एषां (सुमनसां) मोदं तनोति मध्यलीला समाप्त
(विस्तारयति)।
। 519
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
520 ।
श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]
| अ | ||
|---|---|---|
| अ | अन्यथा विश्वमोहोऽपि 17/216 | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो 22/91 |
| अक्रूरस्त्वभिवन्दने 22/132 | अन्ये च संस्कृतात्मानो 20/173 | अहं वेद्मि शुको वेत्ति 24/314 |
| अक्ष्णोः फलं त्वादृश 20/61 | अन्वय–व्यतिरेकाभ्यां 25/121 | अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः 24/183 |
| अगजगदोकसामखिल 15/180 | अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य 20/262 | अहमिह नन्दं वन्दे 19/96 |
| अगत्येकगतिं नत्वा 21/1 | अपरिकलितपूर्वः 20/182 | अहमेवासमेवाग्रे 24/72, 25/111 |
| अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे 15/1 | अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो 19/143 | अहैतुक्यव्यवहिता या 19/172 |
| अचिरादेव सर्वार्थः 20/106, 24/164 | अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं 20/116 | अहो धन्योऽसि देवर्षे 24/272 |
| अजनि च यन्मयं 19/143 | अपि सम्भावना–प्रश्न 24/64 | अहो बकी यं स्तन– 22/95 |
| अजातशत्रवः शान्ताः 22/78 | अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं 19/75 | अहो बत श्वपचोऽतो 19/72 |
| अजानता महिमानं तवेदं 19/199 | अप्राप्तातीत–नष्टार्था 24/175 | अहो महात्मन् 24/120 |
| अटति यद्भवानहि काननं 21/124 | अवजानन्ति मां मूढा 25/38 | आ |
| अत आत्यन्तिकं क्षेमं 22/82 | अवतारावलीबीजं हतारि 23/77 | आकर्ण्य वेणुरणितं 17/36 |
| अतः श्रीकृष्णनामादि न 17/136 | अवतारा ह्यसंख्येया 20/249 | आकृतिः कृतचेतसां 15/110 |
| अतुल्यमधुरप्रेम–मण्डित 23/78 | अवरुह्य गिरेः कृष्णो 18/25 | आततत्वाच्च 24/68, 74 |
| अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन 23/74 | अविचिन्त्यमहाशक्तिः 23/76 | आत्मनिक्षेप–कार्पण्ये 22/97 |
| अथ वृन्दावनेश्वर्य्याः कीर्त्यन्ते 23/82 | अविद्या–कर्मसंज्ञान्या 20/112, 24/303 | आत्मा देहमनोब्रह्म 24/12 |
| अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च 23/76 | अभयं सर्वदा तस्मै 22/34 | आत्मानञ्च तदालोकाद् 18/1 |
| अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः 23/101 | अमृतं शाश्वतं 21/51, 21/88 | आत्मावास्यामिदं विश्वं 25/99 |
| अध्यात्ममहदाख्यानं नित्यं 24/112 | अयं नेता सुरम्याङ्गः 23/66 | आत्मारामगणाकर्षीत्यमी 23/77 |
| अनन्यममता विष्णौ ममता 23/8 | अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य 20/182 | आत्मारामतया मे वृथा 24/123 |
| अनपेक्षः शुचिर्दक्ष 23/104 | अर्च्ययामेव हरये पूजां 22/71 | आत्मारामश्च 17/140, 24/5, 25/152 |
| अनादिरादिर्गोविन्दः 20/154, 21/35 | अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां 25/137 | आत्मारामेति पद्यार्कस्य 24/1 |
| अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै 18/25 | अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च 24/294 | आदौ श्रद्धा ततः साधु 23/14 |
| अनिकेतः स्थिरमतिः 23/107 | असमानोर्ध्वरूपश्री 23/79 | आद्योऽवतारः पुरुषः 20/267 |
| अन्तर्गतः स्वविवरेण 17/142, 24/45, 24/110, 25/151 | असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः 20/398 | आधत्त वीर्यं साऽसूत 20/274 |
| अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा 23/36 | अस्पन्दनं गतिमतां पुलक 24/201 | आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः 22/97 |
| अन्तर्भक्तिरसेन पूर्णसरसो 24/343 | अस्माभिर्यदनुष्ठेयं 15/269 | आपामरं यो विततार 23/1 |
| अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ 24/123 | आपाययति गोविन्दपाद 24/209 |
। 521
[ आयु-क्षति ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
| आयुः श्रियं यशो धर्मं 25/82 | उरुक्रमे एव भक्तिमेव 24/300 | कालवृत्त्यात्ममायायां 20/275 |
| आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म 24/153 | ऋ | कालेन वृन्दावनकेलि 19/119, 24/345 |
| आरुह्य कृच्छ्रे 24/126, 136, 25/32 | ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 25/117 | कालेन येर्वा विमिताः 21/11 |
| आरुह्य ये द्रुमभुजान् 24/170 | ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता 19/165 | का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृत 24/52 |
| आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी 24/89 | ए | किं विधत्ते किमाचष्टे 20/147 |
| आलिलिङ्ग परिघायत 24/344 | एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना 20/110 | किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा 24/173 |
| आशाबन्धः समुत्कण्ठा नाम 23/18 | एकन्तुः महतः स्रष्टृ | कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त 20/342 |
| आसक्तिस्तद्गुणाख्याने 23/19 | एतावदेव जिज्ञास्यं 25/121 | कीर्त्त्यमानं यशो यस्य 24/93 |
| आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य 20/331 | एतावान् सर्ववेदार्थः 20/148 | कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च 21/124 |
| इ | एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल 24/171 | कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वर 22/19 |
| इति मत्वा भजन्ते मां 24/183 | एते चांशकलाः पुंसः कृष्ण 20/156 | कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा 23/61 |
| इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्द 19/229 | एते न ह्यद्भूता व्याध 22/143, 24/267 | कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति 17/140, 24/5, 25/152 |
| इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्द 23/80 | एतौ हि विश्वस्य 20/262 | कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते 19/197 |
| इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो 20/147 | एवं गुणाश्रतुर्भेदाः 23/80 | कृतिसाध्या भवेत् साध्य 22/102 |
| इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभाव 23/19 | एवंव्रतः स्वप्रियनाम 23/37, 25/135 | कृते यद्ध्यायतो विष्णुं 20/343 |
| इन्द्रारिव्याकुलं लोकं 20/156 | एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धं 19/208 | कृपामृतेनाभिषिषेच 19/119, 24/345 |
| इष्टे स्वारसिकी रागः 22/146 | क | कृष्णं स्मरन् जनश्चास्य 22/156 |
| इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो 22/57 | कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं 22/93 | कृष्णप्रियावलीमुख्या 23/86 |
| ई | कदाहं यमुनातीरे नामानि 23/33 | कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं 20/340 |
| ईश्वरः परमः कृष्णः 20/154, 21/35 | कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति 19/98 | कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानं 20/162 |
| ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु 22/70 | करुणानिकुरम्बकोमले 21/45 | कृष्णस्य पूर्णतमता 20/399 |
| उ | करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु 22/133 | कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्य 20/97 |
| उक्तार्थानामप्रयोगः 24/293 | कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे 24/209 | कृष्णादिभिर्विभावाद्यैः 23/93 |
| उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव 15/237 | कर्माणि निर्दहति किन्तु 15/170 | कृष्णाय कृष्णचैतन्याम्ने 19/53 |
| उत्सृज्यैतानथ यदुपते 22/16 | कलावप्यतिगूढेयं भक्तियेन 22/1 | कृष्णे स्वधामोपगते 24/316 |
| उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय 24/115 | कलिं सभाजयन्त्यार्या 20/345 | केचित् स्वेद्धान्तर्हृदयावकाशे 24/150 |
| उदरमुपासते य 24/160, 207 | कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति 20/342 | केशाग्रशतभागस्य 19/140 |
| उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी- 20/181 | कलौ नष्टदृशामेषः 24/316 | को वेत्ति भूमन् भगवन् 21/9 |
| उद्वाष्पः पुण्डरीकाक्ष 23/33 | कस्यान्सुभावोऽस्य न देव 24/51 | क्रमः शक्तौ परिपाट्यां 24/24 |
| उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं 19/203 | काचं विचिन्वन्नपि 22/42, 24/213 | क्रीडाकन्दुकतां येन नीतो 18/38 |
| उवाह भगवान् कृष्णः 19/205 | कामश्च दास्ये न तु 22/135 | क्व वा कथं वा कति 21/9 |
| कामादीनां कति न 22/16 | क्षतिरियमिह का मे 25/276 |
522 |
श्लोक सूची क्षान्ति-तर्को ]
क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं 23/18 | चतुर्भुजं कअरथाङ्गशङ्ख 24/150 | तं सनातनमुपागतमक्षणोदृष्टि 24/344
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव 25/39 | चत्वारो जज्ञिरे वर्णा 22/27, 108 | तज्जोषणादाश्वपवर्ग 22/83, 23/16
क्षीरं यथा दधि विकार 20/310 | चत्वारो वासुदेवाद्या नारायण 20/242 | तत्कर्णिकारं तद्धाम तदनन्तांश 20/258
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः 24/304 | चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता 24/21 | तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं 22/156
क्षेमं न विन्दन्ति बिना 22/20 | चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे 24/63 | तत्तद्देवावगच्छ त्वं मम 20/373
ख | चारु-सौभाग्यरेखाढ्या 23/83 | तत्तद्भावादिमाधुर्य्ये श्रुते 22/151
ख इव रजांसि वान्ति 21/15 | चित्रं बतौतदेकेन वपुषा 20/170 | तत् किं करोमि विरलं 23/29
ग | चिराद्दत्तं निज-गुप्तवित्तं 23/1 | तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः 23/95
| चीराणि किं पथि न सन्ति 23/109 | तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते 22/98
गच्छन् वृन्दावनं गौरो 17/1 | चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं 20/181 | तत उद्गादनन्त तव 24/160, 207
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः 19/209 | चैतन्यार्पितमस्तु 25/275 | ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा 19/208
गा गोपकैरनुवनं नयतोख्दार 24/201 | ज | ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् 23/14
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ 25/137 | जगत्तमो जहाराव्यात् स 24/1 | ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता 19/207
गायन् गुणान् दशशतानन 21/13 | जगद्धिताय सोऽप्यत्र 20/162 | तत्त्वं सनातनार्येशः 20/97
गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता 25/128 | जगृहे पौरुषं रूपं 20/266 | तथाऽविदांसिनः कूल्याः सरसः 20/249
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् 21/11 | जन्माद्यस्य यतः 20/357, 25/141 | तथा मद्भिक्षया भक्तिरुद्धवैनांसि 24/57
गुणालिसम्पत् कविता च 17/212 | जय जय जह्याजामजित 15/180 | तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते 25/107
गुर्वीर्पातगुरुस्नेहा सखीप्रणयिता 23/86 | जयति व्रजराजनन्दने न 21/45 | तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो 22/100
गृहीतचेता राजर्षे 24/46, 25/150 | जहौ युवैव मलवदुत्तमः 23/24 | तदिदमतिरहस्यं गौरलीला 25/276
गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय 20/170 | जानन्त एव जानन्तु 21/27, 83 | तदीयेतितशेषु भक्तैर्जितत्वं 19/229
गोकुलप्रेमवसतिर्जगच्छ् | जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं 20/61 | तद्वा इदं भुवनमङ्गल 25/37
गोपति-तनयाकुञ्जे गोपवधूट्टी 19/98 | जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं 19/140 | तद्विद्यादात्मनो मायां 25/117
गोपीकोलूखले दाम्ना बबन्ध 19/204 | जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्ति 23/91 | तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तं 20/160
गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य 21/112 | जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति 25/74 | तद्भावलिप्सुना कार्या 22/154
गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले 21/49 | जीवभूतां महाबाहो ययेदं 20/116 | तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र 25/139
गौड़ेन्द्रस्य सभा-विभूषणमणिः 24/343 | जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दु 23/73 | तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां 19/211
गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् 16/1 | ज्ञानं मे परमगुह्यं यद्विज्ञान 25/103 | तन्मयी या भवेद्भक्तिः 22/146
ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः 25/137 | ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो 20/371 | तन्माययातो बुध 20/119, 24/132
ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे 24/18 | ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा 24/82 | तपस्विनो दानपरा यशस्विनो 22/20
घ | त | तव मधुरस्वरकण्ठी गायति 23/30
घ्राणश्च तत्पादसरोजसौरभे 22/134 | त आवेशा निगद्यन्ते जीवा 20/371 | तवास्मीति वदन् वाचा तथैव 22/98
च | तं मत्वात्मजमव्यक्तं 19/204 | तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः 20/115
चतुर्विधा भजन्ते मां 24/89 | तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा 23/21 | तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो 17/186, 25/56
। 523
[ तल्लभ्यते-नारायण श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं 24/163
तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान् 22/107
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो 22/142
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं 20/58
तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् 24/67
तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम 25/37
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे 19/134
तस्याः पारे परव्योम 21/51, 88
तस्याः सुदुःखभय-शोक 19/201
तस्यारविन्दनयनस्य 17/142, 24/45, 24/110, 25/151
तस्यैव हेतोः प्रयतेत 24/163
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु 25/39
तावत् कर्माणि कुर्वीत 22/61
तावद्भक्तिसुखस्यात्र 19/176
तितिक्षवः कारुणिकाः 22/78
तितिक्षा दुःखसंमर्षो 19/212
तीव्रेण भक्तियोगेन 22/36, 24/85, 24/191
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः 20/57
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं 22/55
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो 23/107
तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि 20/251
तेजोवारिमृदां यथा 20/357, 25/141
ते ते प्रभावानिचया विहिताश्च 21/49
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा 25/99
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते 18/65
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया 19/72
ते वै विदन्त्यतितरन्ति 24/184
तेषां सततयुक्तानां 24/167, 186
तेषामसौ क्लेशल 22/22, 24/135, 25/31
तेष्वशान्तेषु मूढ़ेषु 22/86
तैस्तैरतुल्यातिशयैः 20/353
त्रय्या चोपनिषद्भिश्च 19/203
त्रिजगन्मानसार्कर्षि-मुरली 23/79
त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य 24/52
त्वं पासि नस्त्रिभुवनञ्च 20/299
त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतं 23/29
त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद 24/37
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्ध 15/237
द
दक्षिणो विनयी हीमान् 23/70
दत्ताभयश्च भुजदण्डयुगं 24/48
ददामि बुद्धियोगं तं 24/167, 186
दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय 20/151
दीपाच्चिरेव हि दशान्तरं 20/316
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना 19/173
दुरूहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा 22/129
दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं 21/112
देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय 19/197
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां 22/137
देवी कृष्णमयी प्रोक्ता 23/64
देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः 23/68
देहश्च विक्लवधियः सहसैव 19/201
दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां 20/274
दैवी ह्येषा गुणमयी 20/121, 22/23, 24/133
द्युपतय एव ते न 21/15
द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि 20/267
द्वापरे परिचर्यायां कलौ 20/343
द्वापरे भगवान् श्यामः 20/335
द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको 23/21
ध
धन्यस्यायं नवप्रेमा 23/36
धन्यः स्म मूढ़मतयोपि 17/36
धन्येयमद्य धरणी तृण 24/200
धर्मः प्रोज्झित-कैतव 24/95, 25/142
धर्मस्य तत्त्वं निहितं 17/186, 25/56
धर्मी किशोर एवात्र नित्य 20/378
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद् 16/145
धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं 24/175
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञै 20/344
न
न कर्हिचिन्मत्पराः 22/158
न च्छन्दसा नैव जलाग्नि 22/52
न ज्ञानं न च वैराग्यं 22/142
न तथास्य भवेन्मोहो 22/87
न तद्भक्तेषु चान्येषु स 22/71
नद्योऽद्रयः खगमृगाः 24/200
न निर्विण्णो नातिसक्तो 22/50
न पारयेऽहं चलितुं नय 19/207
न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि 23/27
न भजन्त्यवजानन्ति 22/28
नमस्ते वासुदेवाय नमः 20/336
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः 19/50
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेम 19/53
न यत्र माया किमुतापरे 20/270
न शौरिचिन्ताविमुख 22/88
न साधयति मां योगो 20/137
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 20/137
नातः परं परम यद्भवतः 25/36
नात्र शास्त्रं न युक्तिञ्च 22/151
नान्तं विदाम्यहममी 21/13
नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य 17/133
नामसङ्कीर्त्तनं श्रीमन्मथुराण्डले 22/128
नायं सुखापो भगवान् देहिनां 24/82
नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु 23/63
नारायण-कलाः शान्ता 24/118
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