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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1953, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1953

पचीसवाँ अध्याय 25/189-194 ]
अनुवाद-किसी अन्य पण्डितने कहा, - ऐसा मत
करो, प्राण देनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह तो
छोटा सा दोष है। श्रीसुबुद्धिरायको पण्डितोंके अलग-
अलग विचारोंके कारण प्रायश्चितके विषयमें संशय हो
गया, इसलिये उन्होंने कुछ भी नहीं किया ॥ 189 ॥
महाप्रभुके काशी आनेपर, सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन करके
प्रायश्चितकी व्यवस्थाकी जिज्ञासा :-
तबे यदि महाप्रभु वाराणसी आइला।
ताँरे मिलि' राय आपन-वृत्तान्त कहिला ॥ 190 ॥
अनुवाद-फिर जब महाप्रभु वाराणसीमें आये, तब
श्रीसुबुद्धिरायने उनसे मिलकर उन्हें अपना सम्पूर्ण
वृत्तान्त कह सुनाया ॥ 190 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु मथुरा जानेसे पूर्व जब
वाराणसी आये थे, उस समय श्रीसुबुद्धिरायके साथ
उनका मिलन हुआ था ॥ 190 ॥
महाप्रभुके द्वारा सबसे उत्तम व्यवस्था और
श्रीसुबुद्धि रायको शिक्षा :-
प्रभु कहे, - "इँहा हैते याह' वृन्दावन।
निरन्तर कर कृष्णनामसङ्कीर्त्तन ॥ 191 ॥
नामाभास और शुद्धनामके फलका भेद :-
एक 'नामाभासे' तोमार पाप-दोष याबे।
आर 'नाम' लइते कृष्णचरण पाइबे ॥ 192 ॥
आर कृष्णनाम लैते कृष्णस्थाने स्थिति।
महापातकेर हय एइ प्रायश्चित्ति ॥”193 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसुबुद्धिरायसे कहा, - "तुम यहाँसे
वृन्दावन चले जाओ और निरन्तर श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन
करो। नाम करते हुए जब एक 'नामाभास' भी हो
जायेगा, तब उसके प्रभावसे ही तुम्हारे पापका दोष
चला जायेगा। और नाम करते हुए जब तुम्हारा
शुद्धनाम होगा, तब तुम श्रीकृष्णके श्रीचरणोंको प्राप्त
करोगे। श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें स्थान प्राप्त करनेपर फिर
कोई पाप-अपराध नहीं होता और नित्य सिद्धदेहसे
निरन्तर शुद्धनाम ही होता है। महापापी तकके लिये
भी यही प्रायश्चित है॥"191-193 ॥
अमृतानुक्रमणिका-विष्णुपुराण (2/6/36-40) में पापोंके
प्रायश्चितके विषयमें कहा है-
“यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः।
पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ॥ 36 ॥
पापानामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा।
तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ॥ 37 ॥
पापे गुरूणि गुरूणि स्वल्पान्यल्पे च तद्विदः।
प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादयः ॥ 38 ॥
प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्म्मात्मकानि वै।
यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥ 39 ॥
कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते।
प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम् ॥” 40 ॥
अर्थात् "जितने जीव स्वर्गमें हैं उतने ही नरकमें
हैं, जो पापी पुरुष (अपने पापका) प्रायश्चित नहीं
करते वे ही नरकमें जाते हैं। भिन्न-भिन्न पापोंके
अनुरूप जो-जो प्रायश्चित हैं उन्हीं-उन्हींको महर्षियोंने
वेदार्थका स्मरण करके बतलाया है। हे मैत्रेय !
स्वायम्भुवमनु आदि स्मृतिकारोंने महान् पापोंके लिये
महान् और अल्प पापोंके लिये अल्प प्रायश्चित्तोंकी
व्यवस्था की है। किन्तु जितने भी तपस्यात्मक और
कर्मात्मक प्रायश्चित हैं उन सबमें श्रीकृष्णस्मरण सर्वश्रेष्ठ
है। जिस पुरुषके चित्तमें पाप-कर्मके बाद पश्चाताप
होता है उसके लिये ही प्रायश्चित्तोंका विधान है, बिना
पश्चातापके प्रायश्चितसे पापोंका क्षय नहीं होता। किन्तु
यह हरिस्मरण तो एकमात्र स्वयं ही परम प्रायश्चित
है॥"191-193 ॥
अयोध्याके मार्गसे श्रीरायका नैमिषारण्यमें जाना
और कुछ दिन वहाँ वास :-
पाञा आज्ञा राय वृन्दावनरे चलिला।
प्रयाग, अयोध्या दिया नैमिषारण्ये आइला ॥ 194 ॥
। 507