श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
ग्यारहवाँ अध्याय 11/242-243 ]
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 243 ॥ करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन
कर रहा है ॥ 242-243 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे
'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णनं नाम एकादश परिच्छेदः।
अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके कीर्त्तन-विलासका
वर्णन किया। (ग्रन्थकार आशीर्वाद कर रहे हैं) जो श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णन
इसका श्रवण करेगा, वह महाप्रभुका दास बन जायेगा। नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 463
बारहवाँ अध्याय
**कथासार—**श्रीमहाप्रभुका दर्शन करनेके लिये राजाने बहुत चेष्टा की। सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको राजाके चित्तके भाव बतलाये। महाप्रभुके तब भी (राजासे मिलना) अस्वीकार करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुसे उनका एक बहिर्वास (वस्त्र) लेकर राजाके पास भिजवा दिया। किसी और दिन जब श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजापर कृपा करनेके लिये कहा, तो महाप्रभु उनसे सम्मत नहीं हुए, किन्तु उन्होंने राजाके पुत्रको लानेकी आज्ञा दे दी; राजपुत्रके कृष्णोद्दीपक वेशको देखकर महाप्रभुने उसपर कृपा की। रथयात्रासे पहले ही अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरकी धुलायी और सफाई की। उसके बाद इन्द्रद्युम्न सरोवरमें स्नान करके उपवनमें समस्त वैष्णवोंको लेकर महाप्रभुने प्रसाद सेवा की। मन्दिर-मार्जनके समय जब किसी गौड़ीयने महाप्रभुके चरणोंमें जल देकर उस जलको पान किया, तब एक प्रेम-रहस्य उदित हुआ। दूसरी ओर, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालके मूर्च्छित होनेपर उसकी मूर्च्छाको भङ्ग होते न देखकर महाप्रभुने उसे चेतन किया। प्रसाद सेवनके समय श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुमें थोड़ा प्रेमकलह हुआ था। श्रीअद्वैत प्रभुने कहा,–'अज्ञात कुल-शील नित्यानन्दके साथ एक पंक्तिमें भोजन करना गृहस्थ-ब्राह्मणका कर्तव्य नहीं है'; उसके उत्तरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,–“अद्वैताचार्य 'अद्वैत-सिद्धान्त'में निपुण हैं, इसके साथ भोजन करनेसे सज्जन लोगोंका चित्त ना जाने किस प्रकारका हो जाता है?” इन दोनों प्रभुओंकी बातमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, उसे सद्भक्त ही अनायास समझ सकते हैं। वैष्णवोंकी सेवा होनेके बाद श्रीस्वरूप आदि सज्जनोंने घरके भीतर प्रसाद सेवा की। श्रीनवयौवन-दर्शनके दिन भक्तोंको लेकर महाप्रभुने जगद्बन्धु (जगन्नाथ)के दर्शनमें विशेष प्रसन्नता प्राप्त की।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गुण्डिचा मार्जन करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :—
श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः
सम्मार्जयन् क्षालनतः स गौरः।
स्वचित्तवच्छीतलमुज्ज्वलञ्च
कृष्णोपवेशौपयिकं चकार ॥1॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीगौरचन्द्रने अपने आत्मीय भक्तों सहित श्रीगुण्डिचा मन्दिरको पोंछ और धो करके उसे अपने शीतल और उज्ज्वल चित्तकी भाँति स्वच्छ करके श्रीकृष्णके बैठने योग्य किया था॥1॥
अनुभाष्य—
सः गौरः आत्मवृन्दैः (निजभक्तगणैः सह) श्रीगुण्डिचा-मन्दिरं सम्मार्जयन् (मलादि-विरहितं कुर्वन्) क्षालनतः (प्रक्षालनादिना) स्वचित्तवत् (आत्महृदयवत्) शीतलं (भोगवासनानलजनित-त्रितापविहीनम्) उज्ज्वलं (दीप्तिविशिष्टं) च कृष्णोपवेशौपयिकं (कृष्णस्य वासयोग्यं स्थानं) चकार।
**श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥
**अनुवाद—**श्रीगौरचन्द्रकी जय हो जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो एवं समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥
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[ 12/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गौरभक्तोंसे ग्रन्थकारकी श्रीकृष्णचैतन्यके
गुण-लीला-वर्णन करनेकी शक्तिकी प्रार्थना :-
जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण।
शक्ति देह,—करि येन चैतन्य-वर्णन॥३॥
अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो जय हो।
आप सभी मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं महाप्रभुकी
लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥३॥
दक्षिण देशसे आनेके बाद राजा प्रतापरुद्रकी
महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा—
पूर्वे दक्षिण हैते प्रभु यबे आइला।
ताँरे मिलिते गजपति उत्कण्ठित हैला॥४॥
दर्शन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यको महाप्रभुकी
अनुमतिके लिये पत्र भेजना :-
कटक हैते पत्री दिल सार्वभौम-ठाञि।
प्रभुर आज्ञा हय यदि, देखिवारे याइ॥५॥
अनुवाद—दक्षिण भारतसे जब महाप्रभु लौट आये,
तब गजपति (राजा प्रतापरुद्र) उनसे मिलनेके लिये बड़े
उत्कण्ठित हो गये। कटकसे राजाने श्रीसार्वभौमको पत्र
लिखा कि यदि महाप्रभुकी आज्ञा हो, तो मैं उनके
दर्शनके लिये आ जाऊँ॥४-५॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी निषेध आज्ञाका बताना
और राजाके द्वारा पुनः लोभरूपी पत्र भेजना :-
भट्टाचार्य लिखिल,—प्रभुर आज्ञा ना हैल।
पुनरपि राजा ताँरे पत्री पाठाइल॥६॥
भक्तोंके पास अभीष्ट सिद्धि हेतु प्रार्थना :-
'प्रभुर निकटे आछे यत भक्तगण।
मोर लागि' ताँ-सबारे करिह निवेदन॥७॥
सेइ सब दयालु मोरे हञा सदय।
मोर लागि' प्रभुपदे करिबे विनय॥८॥
ताँ-सबार प्रसादे मिले श्रीप्रभुर पाय।
प्रभुकृपा बिना मोर राज्य नाहि भाय॥९॥
महाप्रभुकी कृपाके अभावमें राजाका निर्वेद
और राज्य त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :-
यदि मोरे कृपा ना करिबे गौरहरि।
राज्य छाड़ि' योगी हइ' हइब भिखारी॥'१०॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने उत्तरमें लिखा,—अभी
महाप्रभुकी ऐसी आज्ञा नहीं हुई है। यह सुनकर राजाने
फिरसे उन्हें एक पत्र लिखकर भेजा,—'महाप्रभुके पास
जितने भक्त रहते हैं, उन सबसे मेरे ओरसे निवेदन
करना कि वे सब दयालु भक्त मुझपर कृपा करके मेरे
लिये महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करें। उन सबकी
कृपासे ही मुझे महाप्रभुके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हो सकती
है। महाप्रभुकी कृपाके बिना अब मेरा राजपाटमें मन
नहीं लगता। यदि श्रीगौरहरि मुझपर कृपा नहीं करेंगे,
तो मैं राजपाट छोड़कर योगी बनकर घर-घर भिक्षा
करूँगा॥'६-१०॥
अनुभाष्य—'कल्याणकल्पतरु' ग्रन्थमें श्रीमद्भक्तिविनोद
ठाकुरने लिखा है—
“काँदिया, काँदिया जानाइब दुःखग्राम।
संसार-अनल ह'ते मागिब विश्राम॥
शुनिया आमार दुःख वैष्णव-ठाकुर।
आमा लागि' कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥
वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय।
मो-हेन पामर-प्रति ह'बेन सदय॥”
अर्थात् “मैं रोते-रोते अपने दुःखकी गाथा सुना
रहा हूँ। अब मैं इस संसार-अग्निसे छुटकारा चाहता
हूँ। हे वैष्णव-ठाकुर ! मेरे दुःखकी गाथाको सुनकर
श्रीकृष्णसे मेरे लिये ज़ोर देकर प्रार्थना करना। वैष्णवकी
प्रार्थना सुनकर दयामय श्रीकृष्ण मेरे जैसे पापीके प्रति
भी दयाशील होंगे॥”७-९॥
सभी भक्तोंको राजाका पत्र दिखाना :-
भट्टाचार्य पत्री देखि' चिन्तित हञा।
भक्तगण-पाश गेला सेइ पत्री लञा॥११॥
466 ।
बारहवाँ अध्याय 12/11-21 ]
सबारे मिलिया कहिल राज-विवरण।
पिछे सेइ पत्री सबारे कराइल दरशन ॥ 12॥
अनुवाद—राजाका पत्र पढ़कर श्रीभट्टाचार्य बड़े
चिन्तित हो गये। वे उस पत्रको लेकर भक्तोंके पास
गये। पहले श्रीभट्टाचार्यने सभी भक्तोंसे मिलकर उनको
राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी तीव्र उत्कण्ठाके विषयमें
बतलाया और बादमें सबको राजाका पत्र भी
दिखलाया ॥ 11-12 ॥
राजाकी महाप्रभुके प्रति भक्तिको
देखकर सभी भक्तोंको विस्मय :-
पत्री देखि' सबार मने हइल विस्मय।
प्रभुपदे गजपतिर एत भक्ति हय !! 13 ॥
अनुवाद—राजाके पत्रको देखकर सभीके मनमें
आश्चर्य हुआ कि गजपति राजाकी महाप्रभुके चरणोंमें
इतनी भक्ति है॥ 13 ॥
सभीकी महाप्रभुके दृढ़ सङ्कल्पमें आस्थाके कारण भय
और राजाको अप्रिय सत्य बात कहनेकी अनिच्छा :-
सबे कहे, - "प्रभु ताँरे कभु ना मिलिबे।
आमि सब कहि यदि, दुःख से मानिबे ॥" 14 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने कहा,- "महाप्रभु राजासे
कभी भी नहीं मिलेंगे, परन्तु यह बात यदि हम सब
राजासे कहेंगे, तो उनको बहुत दुःख होगा॥" 14॥
श्रीसार्वभौमकी युक्ति - महाप्रभुको राजाकी
भगवद्भक्तिकी निष्ठा वर्णन करनेकी इच्छा :-
सार्वभौम कहे, - "सबे चल' एकबार।
मिलिते ना कहिब, कहिब राज-व्यवहार ॥" 15 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौमने कहा- "आइये, हम सब
एक बार महाप्रभुके पास चलते हैं। हम उन्हें राजासे
मिलनेके लिये नहीं कहेंगे, केवल राजाके व्यवहारकी
ही बात कहेंगे ॥" 15 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, - हम सब
मिलकर महाप्रभुके सामने राजाके सुवैष्णव-व्यवहारके
बारेमें बतलायेंगे। राजाको दर्शन देनेके लिये अनुरोध
नहीं करेंगे ॥ 15 ॥
महाप्रभुके निकट आकर भी सभीको
राजाकी बात कहनेमें भय :-
एत बलि' सबे गेला महाप्रभुर स्थाने।
कहिते उन्मुख सबे, ना कहे वचने ॥ 16 ॥
अनुवाद—इतना कहकर श्रीसार्वभौम सबके साथ
महाप्रभुके पास गये। वे सब कहनेके लिये महाप्रभुके
सामने आये, परन्तु कुछ कह नहीं सके ॥ 16 ॥
सभीकी भय-चकित-दृष्टिको देखकर महाप्रभुके
द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा :-
प्रभु कहे, - "कि कहिते सबार आगमन ?
देखिये कहिते चाह, - ना कह, कि कारण ? ॥" 17॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "आप क्या कहनेके
लिये यहाँ आये हैं? मैं देख रहा हूँ कि आप कुछ
कहना चाहते हैं, किन्तु कुछ कह नहीं रहे, क्या कारण
है?" ॥ 17 ॥
नित्यानन्द प्रभुका भयभीत होकर निवेदन :-
नित्यानन्द कहे, - "तोमाय चाहि निवेदिते।
ना कहिले रहिते नारि, कहिते भय चित्ते ॥ 18 ॥
योग्यायोग्य तोमाय सब चाहि निवेदिते।
तोमा ना मिलिले राजा चाहे योगी हैते ॥ 19 ॥
श्रीगौरकृपाके अभावमें राज-प्रतिज्ञाका निवेदन :-
काणे मुद्रा लइ' मुञि हइब भिखारी।
राज्यभोग नहे चित्ते बिना गौरहरि ॥ 20 ॥
राजाका गाढ़ गौर-अनुराग :-
देखिब से मुखचन्द्र नयन भरिया।
धरिब से पादपद्म हृदये तुलिया ॥" 21 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "हम आपसे
। 467
[ 12/18–29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कुछ निवेदन करना चाहते हैं, कहे बिना रह नहीं पा
रहे हैं और कहनेमें भय हो रहा है। योग्य हो या
अयोग्य हो, हम सब आपसे निवेदन करना चाहते हैं
कि अगर आप राजासे नहीं मिलेंगे, तो वे योगी बन
जायेंगे। उन्होंने कहा हैं कि श्रीगौरहरिके बिना मुझे
राज्य-भोगकी इच्छा नहीं है, इसलिये मैं कानोंमें मुद्रा
धारणकर भिखारी बन जाऊँगा। तब मैं महाप्रभुके
मुखचन्द्रको अपने नेत्रोंसे जी भरकर देखूँगा और उनके
श्रीचरणकमलोंको उठाकर अपने हृदयपर धारण
करूँगा॥”18-21॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'काणे मुद्रा'—पश्चिम भारतमें
योगियोंको 'कान-फाटा योगी' कहते हैं। योगी लोग
कानमें घोंघेकी हड्डीके द्वारा एक चिह्न धारण करते हैं।
राजाने कहा,–श्रीगौरहरिके दर्शन बिना राज्य-भोग
चित्तमें नहीं है, अर्थात् अच्छा नहीं लगता॥20॥
महाप्रभुका आचार्योचित कठोर संन्यास-धर्मपरक वाक्य :-
यद्यपि शुनिया प्रभुर कोमल हय मन।
तथापि बाहिरे कहे निष्ठुर वचन॥22॥
भक्तोंकी राजदर्शनरूपी इच्छा जानकर प्रभुका आरोप :-
“तोमा-सबार इच्छा,—एइ आमारे लञा।
राजाके मिलह इँह कटकेते गिया॥23॥
विधिके उल्लङ्घनके कारण लोकनिन्दा और श्रीदामोदर
पण्डितके वाक्य-दण्डकी सम्भावना :-
परमार्थ थाकुक्, लोके करिबे निन्दन।
लोके रहु—दामोदर करिबे भर्त्सन॥24॥
मर्यादा प्रदर्शनके छलसे श्रीदामोदरकी
अनधिकार चर्चाके प्रति कटाक्ष :-
तोमा-सबार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे।
दामोदर कहे यबे, मिलि तबे ताँरे ॥"25॥
अनुवाद—यद्यपि यह सब सुनकर महाप्रभुका मन
कोमल हो गया, तथापि बाहरसे कठोर होकर उन्होंने
निष्ठुर वचन कहे,—“आप सबकी इच्छा यह है कि
आप सब मुझे कटकमें ले जाकर राजासे मिलवायेंगे।
परमार्थकी बात तो दूर रहे, लोग भी निन्दा करेंगे। यदि
लोक-निन्दाकी बातको भी छोड़ दें, तो यह दामोदर
ही मेरी भर्त्सना करेगा। आप सबके कहनेपर भी मैं
राजासे नहीं मिलूँगा, किन्तु यदि दामोदर कह दे, तो
मैं राजासे मिल सकता हूँ॥”22-25॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पारमार्थिक-विचारसे संन्यासीके
लिये राजाका दर्शन करना दोषपूर्ण है। उस दोषकी तो
बात ही नहीं—लोग तो संन्यासीके अति छोटेसे दोषको
देखनेसे ही निन्दा करते हैं। लोकनिन्दा परित्यागका
कुछ तात्पर्य है,—जगत्में धर्म-प्रचार ही संन्यासीका
कर्म है। जगत्में यदि निन्दा हुई, तो धर्म-प्रचारकार्य
ठीकसे नहीं होता; इसलिये लोक-रक्षा करना भी
आवश्यक है। लोक-निन्दाकी बात दूर रहे—मेरे
निकट यह जो दामोदर पण्डित बैठा है, इसके हाथों
छुटकारा पाना कठिन है, यह अवश्य ही मेरी भर्त्सना
करेगा। केवल आपकी आज्ञासे राजाके साथ साक्षात्कार
नहीं कर सकता; यदि दामोदर उनसे मिलनेके लिये
कहे, तभी मैं ऐसा कर सकता हूँ।' महाप्रभुके इस
वाक्यके अनेक गूढ़ अर्थ हैं,—दामोदरकी भक्तिके
वशीभूत होनेपर भी उसका वाक्यरूपी दण्ड बहुत बार
महाप्रभुके लिये अयोग्य होता है। इस बातसे दामोदरको
वह प्रवृत्ति छोड़नी होगी॥24-25॥
श्रीदामोदरका अभिमान और आरोप :-
दामोदर कहे,—“तुमि स्वतन्त्र ईश्वर।
कर्त्तव्याकर्त्तव्य सब तोमार गोचर ॥26॥
आमि कोन् क्षुद्रजीव, तोमाके विधि दिब?
आपनि मिलिबे ताँरे, ताहाओ देखिब ॥ 27 ॥
राजा तोमारे स्नेह करे, तुमि—स्नेहवश।
ताँर स्नेहे कराबे ताँरे तोमार परश॥28॥
यद्यपि ईश्वर तुमि परम-स्वतन्त्र।
तथापि स्वभावे हओ प्रेम-परतन्त्र ॥ 29 ॥
अनुवाद—श्रीदामोदरने कहा,—“आप स्वतन्त्र ईश्वर
468 ।
बारहवाँ अध्याय 12/26-34 ]
हैं। क्या कर्त्तव्य है और क्या अकर्त्तव्य, यह आप
भली-भाँति जानते हैं। मैं एक क्षुद्र जीव कौन होता
हूँ जो आपको विधि-नियम बतलाऊँगा ? आप स्वयं ही
राजासे मिलेंगे, मैं यह देखूँगा। राजा आपसे स्नेह करते
हैं और आप भी उनके स्नेहके वशीभूत हैं। राजाका
स्नेह ही उन्हें आपका स्पर्श प्राप्त करायेगा। यद्यपि
आप ईश्वर हैं, इसलिये परम-स्वतन्त्र हैं, तथापि अपने
स्वभावके कारण आप प्रेमके अधीन रहते हैं।"26-29॥
अनुभाष्य-यद्यपि आप ईश्वर हैं, इसलिये किसीके
भी द्वारा किसी प्रकारसे बँधे नहीं है, तथापि अपने
स्वभावके कारण आप अपने ऐकान्तिक भक्तोंकी
प्रीतिसे ही बँधे हैं॥ 29 ॥
महाप्रभुके मतका समर्थन करते हुए श्रीनित्यानन्द
प्रभुके द्वारा राजाके अनुरागका समर्थन :-
नित्यानन्द कहे, - 'ऐछे हय कोन् जन।
ये तोमारे कहे, 'कर राजदरशन' ॥ 30 ॥
कृष्णानुरागीका स्वभाव और याज्ञिक-ब्राह्मणोंकी
पत्नियोंके कृष्णानुरागका दृष्टान्त :-
किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय।
इष्ट ना पाइले निज-प्राण से छोड़य ॥ 31 ॥
याज्ञिक-ब्राह्मणी सब ताहाते प्रमाण।
कृष्ण लागि' पति-आगे छाड़िलेक प्राण ॥ 32 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-'इस त्रिभुवनमें
ऐसा कौन है जो आपसे राजाका दर्शन करनेके लिये
कह सके ? किन्तु क्या यह अनुरागी व्यक्तियोंका
स्वभाव नहीं है कि वे अपने इष्टको न पानेसे अपने
प्राणोंका भी त्याग कर देते हैं। याज्ञिक ब्राह्मणियाँ सब
इसका प्रमाण हैं, श्रीकृष्णके लिये वे अपने पतियोंके
सामने ही अपने प्राण त्यागनेके लिये तत्पर हो गयीं
थी॥ 30-32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-एक दिन जब श्रीकृष्ण गोपबालकों
और गैयाओंको लेकर मथुराके निकट पहुँचे, तब
गोपबालकोंको भूख लगी। श्रीकृष्णने कहा, - 'यहाँ पासमें
एक वनमें याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं, उनके पास
जाकर मेरे नामसे भोजन माँग लो।' गोपबालकोंने
जाकर जब भोजनकी याचना की, तब कर्मजड़ याज्ञिक
ब्राह्मणोंने उन्हें भोजन नहीं दिया। उन ब्राह्मणोंकी
पत्नियोंने श्रीकृष्णके प्रति स्वाभाविक अनुरागवशतः
गोपबालकोंकी याचनाको सुनकर पतियोंके यज्ञका त्याग
करके श्रीकृष्णको भोजन देनेके लिये अनेक विपत्तियोंको
स्वीकार किया। तात्पर्य यह है कि भगवद्-तत्त्वमें
अनुराग होनेपर उनकी सेवाके अभावमें भक्त प्राण
त्यागनेके लिये भी तत्पर होता है॥ 31-32 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 2/28, 43 और 45 संख्या
देखें। मध्यलीला 4/186 संख्या एवं अन्त्यलीला 4/61-64
संख्या इस प्रसङ्गमें विचारणीय हैं। याज्ञिक ब्राह्मण
पत्नियोंको श्रीकृष्णप्राप्ति-प्रसङ्गके लिये भागवत दशम-
स्कन्ध 23वाँ अध्याय देखें॥ 31-32 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी युक्ति :-
एक युक्ति आछे, यदि कर अवधान।
तुमि ना मिलिलेह ताँरे, रहे ताँर प्राण ॥ 33 ॥
एक बहिर्वास यदि देह' कृपा करि'।
ताहा पाञा प्राण राखे, तोमार आशा धरि' ॥ "34 ॥
अनुवाद-ऐसी एक युक्ति है, जिसपर आप विचार
करें जिसके द्वारा आपके राजासे नहीं मिलनेपर भी
उनके प्राण बचे रह सकते हैं। यदि आप कृपा करके
अपना एक बहिर्वास दें, तो राजा उसे पाकर अपनी
अभिलाषा पूर्ण होनेकी आशासे अपने प्राण धारण कर
सकते हैं॥ "33-34 ॥
अनुभाष्य-राजाके भाग्यमें आपके दर्शनकी प्राप्ति
किसी भी प्रकारसे नहीं होगी और आपके दर्शन न
होनेके कारण उनके प्राण उत्कण्ठित हुए हैं। ऐसे
समयमें यदि आपका एक पहना हुआ बहिर्वास कृपा
करके उन्हें प्रदान करें, तभी उनके प्रति आपकी दया
। 469
[ 12/34-42 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
है, ऐसा वे समझेंगे और भविष्यमें उनकी अभिलाषा
पूर्ण हो सकती है,–इस आशासे राजा प्राण धारण कर
सकेंगे ॥ 34 ॥
श्रीनित्यानन्दादिके वशीभूत महाप्रभु :–
प्रभु कहे,–“तुमि-सब परम विद्वान्।
येइ भाल हय, सेइ कर समाधान ॥”35 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप सब परम विद्वान
हो। जैसा उचित समझते हैं, वैसा ही कीजिये ॥”35 ॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीगोविन्दसे
महाप्रभुका बहिर्वास लेना :–
तबे नित्यानन्द-गोसाञि गोविन्देर पाश।
मागिया लइल प्रभुर एक बहिर्वास ॥ 36 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा उस बहिर्वासको
राजाके पास भेजना :–
सेइ बहिर्वास सार्वभौम-पाश दिल।
सार्वभौम सेइ वस्त्र राजारे पाठा'ल ॥ 37 ॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगोविन्दसे
महाप्रभुका एक बहिर्वास माँगकर ले लिया। उस
बहिर्वासको उन्होने श्रीसार्वभौमको दिया और श्रीसार्वभौमने
उस वस्त्रको राजाके पास भिजवा दिया॥ 36-37 ॥
महाप्रभुके वस्त्रको महाप्रभुसे अभिन्न
जानकर राजाके द्वारा उसकी सेवा :–
वस्त्र पाञा राजार हैल आनन्दित मन।
प्रभुरूप करि' करे वस्त्रेर पूजन ॥ 38 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके वस्त्रको पाकर राजाके मनमें
बहुत आनन्द हो गया। राजा उस वस्त्रको महाप्रभुका
ही रूप जानकर उसकी पूजा करने लगे ॥ 38 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुकी जिस प्रकार आग्रहपूर्वक पूजा
करनेकी बात राजाने सोची थी, महाप्रभुके द्वारा दिये
गये बहिर्वासके खण्डको महाप्रभुके समान मानकर राजा
उसी प्रकार पूजा करने लगे। महाप्रभुके श्रीअङ्गके साथ
उनके द्वारा पहने गये वस्त्र-भूषणादिका नित्य अभेद हैं।
सन्धिनी-शक्तिमान्-विग्रह श्रीबलदेवकी ही कला, 'शेष'-रूपी
विष्णु-शय्या और वस्त्रादि विविधरूपोंमें अपने आराध्य
श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवा करती हैं। इसलिये वे सभी वस्तुएँ
श्रीकृष्णसे अभिन्न रूपमें शुद्धसेवकोंके लिये सेव्य हैं।
विशेषतः महाप्रभु अद्वयज्ञान सच्चिदानन्दविग्रह स्वयं
भगवान् हैं। इस प्रकार सच्चिदानन्दमय गुरु-वैष्णवोंको
और उनके द्वारा व्यवहार किये गये उपकरणोंको
परस्पर अभिन्न अर्थात् जीवोंके नित्य परम-अर्चनीय
विग्रहके रूपमें जानने होंगे ॥ 38 ॥
पुरीमें आकर महाप्रभुका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये
श्रीरायको राजकार्यसे निवृत्तिके लिये राजाकी अनुमति :–
रामानन्द राय यबे 'दक्षिण' हैते आइला।
प्रभुसङ्गे रहिते राजाके निवेदिला ॥ 39 ॥
रायको महाप्रभुके दर्शन कराने हेतु राजाका अनुरोध :–
तबे राजा सन्तोषे ताँहारे आज्ञा दिला।
आपनि मिलन लागि' कहिते लागिला ॥ 40 ॥
“महाप्रभु महाकृपा करेन तोमारे।
मोरे मिलिबारे अवश्य साधिबे ताँहारे ॥”41 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय जब दक्षिण भारतसे
आये, तो उन्होंने महाप्रभुके साथ रहनेके लिये राजासे
निवेदन किया। तब राजाने प्रसन्नतापूर्वक उनको राजकार्य
छोड़कर महाप्रभुके साथ रहनेके लिये अनुमति दे दी।
फिर महाप्रभुके साथ अपने मिलनेके सम्बन्धमें कहने
लगे,—“महाप्रभुकी आपपर अपार कृपा है। इसलिये
मुझे उनसे मिलवानेके लिये आप भी यत्न
करना ॥”39-41 ॥
राजाके साथ कटकसे पुरी आनेपर ही
श्रीरायको महाप्रभुका दर्शन :–
एकसङ्गे दुइ जन क्षेत्रे यबे आइला।
रामानन्द राय तबे प्रभुरे मिलिला ॥ 42 ॥
470 ।
बारहवाँ अध्याय 12/42-51 ]
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय और राजा प्रतापरुद्र,
दोनों जब एक ही साथ नीलाचल आ गये, तब
श्रीरामानन्द राय महाप्रभुसे मिले ॥ 42 ॥
महाप्रभुसे राजाके लिये आवेदन :—
प्रभुपदे प्रेमभक्ति जानाइल राजार।
प्रसङ्ग पाञा ऐछे कहे बारबार ॥ 43 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजाकी
उनके श्रीचरणोंमें प्रेमभक्तिको जनाया। और बादमें भी
प्रसङ्ग पाकर उसी बातको बार-बार कहते ॥ 43 ॥
व्यवहारमें चतुर श्रीरामानन्द :—
राजमन्त्री रामानन्द—व्यवहारे निपुण।
राजप्रीति कहिं द्रवाइल प्रभुर मन ॥ 44 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके कारण
व्यवहारमें निपुण थे। इसलिये राजाकी प्रीतिको बतलाते
हुए धीरे-धीरे उन्होंने महाप्रभुके मनको द्रवीभूत कर
दिया ॥ 44 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके
कारण राजकीय-व्यवहारादि सभी विषयोंमें बड़े ही
निपुण थे, इसलिये राजाकी महाप्रभुके प्रति जो प्रीति है,
उसका वर्णन करके उन्होंने महाप्रभुके चित्तको द्रवीभूत
कर दिया था ॥ 44 ॥
उत्कण्ठित राजाको दर्शन देनेके
लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :—
उत्कण्ठाते प्रतापरुद्र नारे रहिबारे।
रामानन्द साधिलेन प्रभुरे मिलिबारे ॥ 45 ॥
रामानन्द प्रभु-पाय कैल निवेदन।
“एकबार प्रतापरुद्रे देखाह चरण॥” 46 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठाके कारण
राजा प्रतापरुद्रसे रहा नहीं जा रहा था, इसलिये
श्रीरामानन्द रायने उन्हें महाप्रभुसे मिलानेका एक उपाय
निकाला। श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन
किया,—“आप एकबार राजा प्रतापरुद्रको अपने
श्रीचरणोंका दर्शन दे दीजिये ॥” 45-46 ॥
रायसे ही महाप्रभुकी सद्विचारकी याचना :—
प्रभु कहे,—“रामानन्द, कह विचारिया।
राजाके मिलिते युयाय संन्यासी हञा ? ॥ 47 ॥
राजार मिलने भिक्षुकेर दुइ कुल नाश।
परलोक रहु, लोके करे उपहास ॥” 48 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द! तुम स्वयं
ही विचार करके बतलाओ कि क्या संन्यासी होकर
राजासे मिलना उचित है? राजासे मिलनेसे भिक्षुकके
दोनों कुल नाश हो जाते हैं। परलोककी तो बात दूर
रहे, इस लोकमें भी लोग उसका उपहास करते
हैं ॥” 47-48 ॥
महाप्रभुमें श्रीरायका विधि-निषेधसे अतीत ‘ईश्वर’-ज्ञान :—
रामानन्द कहे,—“तुमि ईश्वर स्वतन्त्र।
कारे तोमार भय, तुमि नह परतन्त्र ॥” 49 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप तो स्वतन्त्र
ईश्वर हैं। आपको किसीका भय नहीं है, क्योंकि आप
किसीके अधीन नहीं हैं ॥” 49 ॥
स्वयंको विधिके द्वारा बाध्य दिखलाकर
महाप्रभुकी छलनेकी चेष्टा :—
प्रभु कहे,—“आमि मनुष्य, आश्रमे संन्यासी।
कायमनोवाक्ये व्यवहारे भय वासि ॥ 50 ॥
वैध संन्यासीके लिये निष्कलङ्क आचरण ही कर्त्तव्य :—
शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय।
संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय ॥” 51 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं ईश्वर नहीं, एक
साधारण मनुष्य हूँ और उसपर आश्रमसे संन्यासी हूँ।
इसलिये मेरे तन, मन और वाक्यसे व्यवहारके विषयमें
। 471
[ 12/50-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लोग क्या कहेंगे, इसका भय करता हूँ। जिस प्रकार
सफेद वस्त्रपर स्याहीका एक छोटासा भी बिन्दु छिपता
नहीं है, उसी प्रकार संन्यासीके छोटेसे दोषकी भी सब
लोग चर्चा करते हैं॥"50-51॥
अनुभाष्य-मैं चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यासमें स्थित
मनुष्य मात्र हूँ, ईश्वर नहीं। इसलिये तन-मन-वाक्यसे
लौकिक व्यवहारके व्यभिचारकी आशङ्का करता हूँ
अर्थात् दूसरोंकी अपेक्षा रखता हूँ॥ 50 ॥
महापापीके उद्धारके लिये भगवद्भक्त राजाका भी महाप्रभुके
दर्शनका सौभाग्य प्राप्त करनेका अवश्य ही अधिकार :-
राय कहे, - "यत पापी करियाछ अव्याहति ।
ईश्वर-सेवक तोमार भक्त गजपति ॥" 52 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा, - "आपने तो
अनेक पापियोंका उद्धार किया है। गजपति राजा तो
श्रीजगन्नाथके सेवक और आपके भक्त हैं॥" 52 ॥
महाप्रभुकी फिर भी राजाका दर्शन करनेकी अनिच्छा :-
प्रभु कहे, - "पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस।
सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश ॥ 53 ॥
जड़ 'विषयी'-संज्ञा-सर्वगुण नाशक :-
यद्यपि प्रतापरुद्र-सर्व गुणवान्।
ताँहारे मलिन कैल एक 'राजा' नाम ॥ 54 ॥
अन्तमें श्रीरामानन्द रायके आग्रहसे महाप्रभुकी राजाके
पुत्रके साथ मिलनेकी इच्छा :-
तथापि तोमार यदि महाग्रह हय।
तबे आनि' मिलाह तुमि ताँहार तनय ॥ 55 ॥
पिता और पुत्रमें दैहिक-धातुगत अभेद :-
“आत्मा वै जायते पुत्रः" - एइ शास्त्रवाणी।
पुत्रेर मिलने येन मिलिबे आपनि ॥ "56 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "जिस प्रकार दूधसे भरे
कलशमें यदि मदिराकी एक बूँद भी गिर जाय, तो कोई
भी उसे स्पर्श नहीं करता। यद्यपि राजा प्रतापरुद्रके
सर्वगुणवान् होनेपर भी एक 'राजा' नामने ही उनको
मलिन किया हुआ है, तथापि यदि आपका बहुत आग्रह
है, तो उनके पुत्रको लाकर मुझसे मिलवा सकते हो।
शास्त्रोंमें कहा गया है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें आता
है, इसलिये पुत्रके मुझसे मिलनेसे जैसे उनका (राजाका)
अपना मिलना हो जायेगा ॥" 53-56 ॥
अनुभाष्य - 'तनय' - पुरोषत्तम जाना (?)
श्रीभगवदुक्ति (भाः 10/78/36)- "आत्मा वै पुत्र
उत्पन्न इति वेदानुशासनम्" अर्थात् "जीव स्वयं ही पुत्रके
रूपमें उत्पन्न होता है, इस प्रकारसे वेदोंका निर्देश है";
इस श्लोककी श्रीधर-स्वामीकी टीका - "आत्मा वै पुत्रनामासि
स जीवः शरदः शतम्" इत्यादि वेदानुशासनम् ॥ 55-56 ॥
राजाको श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी कृपाका समाचार देना;
राजपुत्रको महाप्रभुके पास लाना :-
तबे राय याइ' सब राजारे कहिला।
प्रभुर आज्ञाय ताँर पुत्र लञा आइला ॥ 57 ॥
अनुवाद-तब श्रीरामानन्द रायने जाकर महाप्रभुकी
सारी बात राजाको बतला दी और महाप्रभुकी आज्ञा
अनुसार राजाके पुत्रको अपने साथ ले आये ॥ 57 ॥
श्यामवर्ण किशोर राजपुत्रसे महाप्रभुको
'श्रीकृष्ण'की उद्दीपना :-
सुन्दर, राजार पुत्र-श्यामल-वरण।
किशोर वयस, दीर्घ कमलनयन ॥ 58 ॥
पीताम्बर, धरे अङ्गे रत्न-आभरण।
श्रीकृष्ण-स्मरणे तँह हैला 'उद्दीपन' ॥ 59 ॥
ताँरे देखि' महाप्रभुर कृष्णस्मृति हैल।
प्रेमावेशे ताँरे मिलि' कहिते लागिल ॥ 60 ॥
वैष्णवदर्शनकी चूड़ान्त कथा :-
“एइ-महाभागवत, याँहार दर्शने।
व्रजेन्द्रनन्दन-स्मृति हय सर्वजने ॥ 61 ॥
राजपुत्रको श्रीकृष्ण मानकर महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :-
कृतार्थ हइलाङ आमि इँहार दर्शने।"
एत बलि' कैल तारे पुनः आलिङ्गने ॥ 62 ॥
472 ।
बारहवाँ अध्याय 12/58-67 ]
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रका पुत्र श्याम वर्णका और
देखनेमें अति सुन्दर था। उसकी किशोर अवस्था थी
और कमलके समान सुन्दर बड़े नयन थे। उसने
पीताम्बर पहन रखा था और उसके अङ्गोंमें अनेक
रत्नोंके आभूषण शोभा पा रहे थे। उसे देखते ही
श्रीकृष्ण-स्मरणका 'उद्दीपन'-भाव प्रकाशित हो जाता था,
इसलिये उसे देखकर महाप्रभुको श्रीकृष्णकी स्मृति हो
आयी। उससे मिलकर प्रेमावेशमें महाप्रभुने उसका
आलिङ्गन किया और कहने लगे, —“यह तो महाभागवत
है, इसे देखनेसे सभीको व्रजेन्द्रनन्दनकी स्मृति होती है।
इसके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया हूँ।” इतना कहकर
महाप्रभुने उसे पुनः आलिङ्गन किया॥ 58-62॥
अनुभाष्य—महाप्रभुने राजपुत्रकी आत्माका दर्शन
किया, उसके बाहरी अनात्म देह और भोग्य-अनुशीलनपर
मनका दर्शन नहीं किया। महाप्रभुमें राजपुत्रको 'विषयीका
पुत्र विषयी', इसलिये उसे 'स्त्री सङ्गी' एवं स्वयंको
'स्त्री-भोक्ता पुरुष' माननेकी धारणा बिल्कुल भी नहीं है।
अर्थात् जिस प्रकार श्रीकृष्णबहिर्मुख मायावादी जीव
निसर्गसुलभ जड़में चिद्का आरोप करते हैं अथवा
भूमिमें पूज्यबुद्धि रखते हैं, उस प्रकारसे सच्चिदानन्दमय
वास्तव-वस्तुके दर्शनमें महाप्रभुमें किसी प्रकारके मनोधर्मसे
उत्पन्न कल्पना अथवा आरोपका लेशमात्र भी अवकाश
नहीं है। यद्यपि महाप्रभु स्वयं अद्वयज्ञान विषय-विग्रह
हैं, तथापि उन्होंने अपनेको 'आश्रय'-जातीय 'गोपी'
मानकर राजपुत्रको साक्षात् 'व्रजेन्द्र-नन्दन' रूपमें देखा,
यही शुद्ध जीवात्माका अद्वयज्ञान-दर्शन अथवा वैष्णव
दर्शन है (मध्यलीला आठवें अध्यायकी 277 संख्या
देखें)। (कठ और मुण्डकोपनिषद्)—
“यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते
तनूं स्वाम्” अर्थात् जब जीवात्मा भगवान्के प्रति
सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब
उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह
प्रकट करते हैं। इस अभय-दर्शनके अभावके कारण
ही जीवका अविद्याजनित सभी अनर्थोंका आह्वान
अथवा संसार है। “संसारे आसिया प्रकृति भजिया
'पुरुष' अभिमाने मरि” (ठाकुर श्रीभक्तिविनोदकृत 'कल्याण
कल्पतरु') अर्थात् संसारमें आकर जीव स्वयंमें पुरुष
(भोक्ता) अभिमान रखकर प्रकृतिका (मायाका) भजन
करनेसे जन्म-मृत्युके बन्धनमें जकड़ जाता है॥ 59-61॥
आलिङ्गनके फलस्वरूप राजपुत्रमें श्रीकृष्णप्रेमावेश :—
प्रभुस्पर्शे राजपुत्रेर हैल प्रेमावेश।
स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ, पुलक विशेष॥ 63॥
उसके प्रेमका दर्शन करके भक्तोंके द्वारा प्रशंसा :—
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नाचे, करये रोदन।
ताँर भाग्य देखि' श्लाघा करे भक्तगण॥ 64॥
अनुवाद—महाप्रभुका स्पर्श पाते ही राजपुत्रमें प्रेमका
आवेश हो गया और उसके शरीरमें स्वेद, कम्प, अश्रु,
स्तम्भ तथा पुलकादि विशेष सात्त्विक विकार उदित
होने लगे। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहकर नाचने और रोने
लगा। उसका ऐसा सौभाग्य देखकर सभी भक्त उसकी
प्रशंसा करने लगे॥ 63-64॥
महाप्रभुके द्वारा राजाके पुत्रको आश्वासन
और नित्य सङ्गकी याचना :—
तबे महाप्रभु ताँरे धैर्य कराइल।
'नित्य आसि आमाय मिलिह'—एइ आज्ञा दिल॥ 65॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने उसे धैर्य धारण कराया
और आदेश दिया,—'तुम नित्य आकर मुझसे मिला
करो॥' 65॥
पुत्रके दर्शन और आलिङ्गनसे राजाको
महाप्रभुके स्पर्शकी अनुभूति :—
विदाय हञा राय आइल राजपुत्रे लञा।
राजा सुख पाइल पुत्रेर चेष्टा देखिया॥ 66॥
पुत्रे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला।
साक्षात् स्पर्श येन महाप्रभुर पाइला॥ 67॥
। 473
[ 12/66-77 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—महाप्रभुसे विदायी लेकर श्रीरामानन्द राय
राजपुत्रको लेकर राजाके पास आ गये। अपने पुत्रकी
चेष्टा (महाप्रभुका आलिङ्गन प्राप्त करना) सुनकर
राजाको बहुत प्रसन्नता हुई। अपने पुत्रका आलिङ्गन
करके राजा प्रतापरुद्र भी प्रेममें आविष्ट हो गये मानो
उन्हें साक्षात् महाप्रभुका स्पर्श प्राप्त हो गया हो॥66-67॥
राजाके पुत्रकी गौरभक्तोंमें गणना :-
सेइ हैते भाग्यवान् राजार नन्दन।
प्रभुभक्तगण-मध्ये हैला एकजण॥68॥
अनुवाद—उस दिनसे भाग्यवान् राजपुत्र भी महाप्रभुके
भक्तोंमें एक भक्त हो गया॥68॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका कीर्तन-विलास :-
एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे।
निरन्तर क्रीड़ा करे सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥69॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ
सङ्कीर्त्तनका आनन्द लेते हुए निरन्तर लीलाएँ करते
थे॥69॥
श्रीअद्वैतादिका सगण महाप्रभुको निमन्त्रण :-
आचार्य्यादि भक्त करे प्रभुरे निमन्त्रण।
ताँहा ताँहा भिक्षा करे लञा भक्तगण॥70॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य्यादि प्रमुख भक्त महाप्रभुको
अपने-अपने स्थानपर निमन्त्रण करते और महाप्रभु
अपने भक्तोंके साथ वहाँ-वहाँ जाकर भोजन ग्रहण
करते॥70॥
रथयात्रा निकटवर्ती :-
एइमत नाना-रङ्गे कत दिन गेल।
जगन्नाथेर रथयात्रा निकट हइल॥71॥
अनुवाद—इस प्रकार अनेक मधुर लीलाएँ करते-
करते कुछ दिन बीत गये और श्रीजगन्नाथकी रथयात्राका
समय निकट आ गया॥71॥
काशीमिश्र, पड़िछा और श्रीभट्टाचार्यसे महाप्रभुके द्वारा
गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जनके लिये अनुमतिकी याचना :-
प्रथमेइ काशीमिश्रे प्रभु बोलाइल।
पड़िछा-पात्र, सार्वभौमे बोलाञा आनिल॥72॥
तिनजन-पाशे प्रभु हासिया कहिल।
गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-सेवा मागि' निल॥73॥
अनुवाद—महाप्रभुने पहले श्रीकाशीमिश्रको और
फिर पड़िछा और श्रीसार्वभौमको अपने पास बुलवाया।
उन तीनोंसे महाप्रभुने मुस्कुराते हुए गुण्डिचा-मन्दिर-
मार्जन-सेवा माँगी॥72-73॥
अनुभाष्य—'गुण्डिचा-मन्दिर'—श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे
पूर्व-उत्तर दिशामें एक कोसकी दूरीपर स्थित है।
रथयात्राके समय श्रीजगन्नाथदेव एक सप्ताहके लिये वहाँ
जाते हैं। बादमें पुनः रथमें लौट आते हैं। जनश्रुतिके
आधारपर यह जाना जाता है कि श्रीइन्द्रद्युम्न राजाकी
पत्नीका नाम 'गुण्डिचा' था। शास्त्रग्रन्थोंमें गुण्डिचा-मन्दिरका
उल्लेख है। गुण्डिचा मन्दिरके प्राङ्गणकी लम्बाई 288
हाथ और चौड़ाई 215 हाथ है। मूल मन्दिरकी लम्बाई
36 हाथ, चौड़ाई 30 हाथ है। नाट्य-मन्दिरकी लम्बाई
32 हाथ और चौड़ाई 30 हाथ है॥73॥
पड़िछाकी दैन्योक्ति :-
पड़िछा कहे,—“आमि-सब सेवक तोमार।
ये तोमार इच्छा, सेइ कर्त्तव्य आमार॥74॥
राजाकी आज्ञासे महाप्रभुकी सेवाका अधिकार :-
विशेषे राजार आज्ञा हञाछे आमारे।
प्रभुर आज्ञा येइ, सेइ शीघ्र करिबारे॥75॥
पड़िछाकी गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जनके तत्त्वमें अनभिज्ञता :-
तोमार योग्य सेवा नहे मन्दिर-मार्जन।
एइ एक लीला कर, ये तोमार मन॥76॥
महाप्रभुके द्वारा घड़े और झाडू संग्रह :-
किन्तु घट, सम्मार्जनी बहुत चाहिये।
आज्ञा देह—आजि सब इँहा आनि दिये॥”77॥
474 ।
बारहवाँ अध्याय 12/74-85 ]
अनुवाद-पड़िछाने कहा,—“हम सब आपके सेवक
हैं। आपकी जो भी इच्छा होगी, उसका पालन करना
हमारा कर्त्तव्य है। विशेषरूपसे राजाने हमें आज्ञा दी
है कि महाप्रभुकी जो आज्ञा हो, उसका शीघ्र पालन
किया जाय। मन्दिरकी सफाई करनेकी सेवा आपके
योग्य नहीं है। यह तो आप एक लीला कर रहे हैं,
इसलिये जैसी आपकी इच्छा। किन्तु मन्दिरकी सफाई
करनेके लिये बहुतसे घड़ों और झाड़ुओंकी आवश्यकता
होगी। आप आज्ञा दीजिये तो मैं आज ही वे सब कुछ
लाकर रख दूँगा ॥” 74-77॥
नूतन एकशत घट, शत सम्मार्जनी।
पड़िछा आनिया दिल प्रभुर इच्छा जानि' ॥ 78 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी इच्छा जानकर पड़िछाने उन्हें
एक सौ नये घड़े और एक सौ झाडू लाकर दे
दिये ॥ 78 ॥
प्रभातमें भक्तोंके साथ महाप्रभुका गुण्डिचामें जाना :—
आर दिने प्रभाते लञा निजगण।
श्रीहस्ते सबार अङ्गे लेपिला चन्दन ॥ 79 ॥
श्रीहस्ते दिल सबारे एक एक मार्जनी।
सबगण लञा प्रभु चलिला आपनि ॥ 80 ॥
अनुवाद-अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने अपने
भक्तोंको अपने साथ लिया और अपने श्रीहाथोंसे उन
सबके अङ्गोंमें चन्दन लगाया। उसके बाद महाप्रभुने
सबको अपने श्रीहाथोंसे एक-एक झाडू दिया। इस
प्रकार स्वयं अपने भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभु गुण्डिचा
मन्दिरको चल दिये ॥ 79-80 ॥
पहले अपने आचरणके द्वारा आदर्श-प्रदर्शन :-
गुण्डिचा-मन्दिरे गेला करिते मार्जन।
प्रथमे मार्जनी लञा करिल शोधन ॥ 81 ॥
भितर मन्दिर उपर, – सकल माजिल।
सिंहासन माजि' पुनः स्थापन करिल ॥ 82 ॥
छोट-बड़-मन्दिर कैल मार्जन-शोधन ।
पाछे तैछे शोधिल श्रीजगमोहन ॥ 83 ॥
अनुवाद-गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन करनेके लिये
भक्तोंके साथ महाप्रभु वहाँ पहुँचे। पहले झाडू लेकर
महाप्रभुने वहाँ सफाई की। महाप्रभुने मन्दिरके भीतर
सभी स्थानों और छतको भी अच्छेसे साफ किया।
उन्होंने सिंहासनको हटाकर उसे पूरी तरहसे साफ
करके उसे फिर उसी स्थानपर स्थापित कर दिया।
गुण्डिचा-मन्दिरके अन्दर बने अन्यान्य सभी छोटे-बड़े
मन्दिरोंका मार्जन करके उनको साफ किया। बादमें वैसे
ही श्रीजगमोहनकी भी सफाई की ॥ 81-83 ॥
अनुभाष्य-गुण्डिचाके मूल मन्दिरमें बारह हाथ
चौड़ी और दो हाथ ऊँची एक रत्नवेदी है,-यही
सिंहासन है। 'श्रीजगमोहन'- मूलमन्दिर और नाट्य-मन्दिरके
बीचका मन्दिर 32 हाथ लम्बा है ॥ 82-83 ॥
महाप्रभुके द्वारा स्वयं सफाई करके शिक्षा-दान :-
चारिदिके शत भक्त सम्मार्जनी करे।
आपनि शोधेन प्रभु, शिखा'न सबारे ॥ 84 ॥
अनुवाद-सैकड़ों भक्त हाथमें झाडू लेकर सभी
ओरसे मन्दिरकी सफाई कर रहे थे और महाप्रभु स्वयं
भी सफाई करते हुए सभीको शिक्षा दे रहे थे ॥ 84 ॥
भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका अनुसरण :-
प्रेमोल्लासे शोधेन, लयेन कृष्णनाम।
भक्तगण 'कृष्ण' कहे, करे निज-काम ॥ 85 ॥
अनुवाद-महाप्रभु प्रेमोल्लाससे मन्दिरकी सफाई
करते हुए साथमें मुखसे श्रीकृष्णनामका कीर्तन कर रहे
थे। इसी प्रकार सभी भक्त भी हाथोंसे अपना सफाईका
कार्य करते हुए 'कृष्ण' नामका उच्चारण कर रहे
थे॥ 85 ॥
। 475
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ (लाइन-दर-लाइन) है:
[ 12/86-95 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अश्रुओंके जलसे मन्दिरका मार्जन :-
धूलि-धूसर तनु देखिते शोभन।
काँहा काँहा अश्रुजले करे सम्मार्जन॥86॥
अनुवाद—महाप्रभुका शरीर धूल-धूसरित होनेपर अधिक शोभायुक्त दिखलायी दे रहा था। मन्दिरका मार्जन करते हुए कभी-कभी उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे और कहीं-कहीं तो वे उन अश्रुओंसे ही धुलाई कर रहे थे॥86॥
सर्वत्र सम्पूर्णरूपसे शोधन-मार्जन :-
भोगमन्दिर शोधन करि' शोधिल प्राङ्गन।
सकल आवास क्रमे करिल शोधन॥87॥
अनुवाद—महाप्रभुने जहाँ भोग रखा जाता है, उस भोग-मन्दिरकी सफाई करके बाहर मन्दिरके प्राङ्गणकी सफाई की। और फिर महाप्रभुने क्रमशः सभी आवास-स्थानोंकी सफाई की॥87॥
अनुभाष्य—'भोग मन्दिर'—इसकी लम्बाई 40 हाथ और चौड़ाई 17 हाथ है॥87॥
भक्तोंके द्वारा तृण-धूलि आदिको बाहर फेंकना :-
तृण, धूलि, झिँकुर, सब एकत्र करिया।
बहिर्वासे लञा फेलाय बाहिर करिया॥88॥
एइमत भक्तगण करि' निज-वासे।
तृण, धूलि बाहिरे फेलाय परम-हरिषे॥89॥
अनुवाद—महाप्रभुने तिनके, धूल और छोटे-छोटे कङ्कड़ आदिको एकत्रित कर लिया तथा उन्हें अपने बहिर्वासमें भरकर बाहर फेंक दिया। इसी प्रकार सभी भक्तोंने भी तिनके, धूल आदिको एकत्रित करके अपने वस्त्रोंमें भरकर परम-हर्षके साथ बाहर फेंक दिया॥88-89॥
मलके परिमाणके अनुसार मार्जनका तारतम्य :-
प्रभु कहे,—"के कत करियाछ सम्मार्जन।
तृण, धूलि देखिलेइ जानिब परिश्रम॥"90॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"एकत्रित तिनके, धूलको देखनेसे ही पता चलेगा कि किसने कितना परिश्रम किया है और कितनी सफाई की है॥"90॥
सबकी अपेक्षा महाप्रभुके मार्जन-फलस्वरूप गुण्डिचाका अधिक निर्मल होना :-
सबार झाँयाटान बोझा करिल एकत्र।
सबा हैते प्रभुर बोझा अधिक हइल॥91॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने झाडू लगाकर जो धूलि-कङ्कड़ आदि एकत्रित किये थे, उनका एक-एक ढेर लगाया, परन्तु महाप्रभुका ढेर सबसे बड़ा था॥91॥
सेवकोंके साथ सेव्यका सेवा-निर्वाह :-
एइमत अभ्यन्तर करिल मार्जन।
पुनः सबाकारे दिल करिया वण्टन॥92॥
मन्दिरको गन्दगी रहित करनेकी महाप्रभुकी आज्ञा :-
"सूक्ष्म धूलि, तृण, काँकर, सब करह दूर।
भालमते शोधन करह प्रभुर अन्तःपुर॥"93॥
अनुवाद—इस प्रकार मन्दिरको भीतरसे साफ करके महाप्रभुने पुनः सभीको मन्दिरके भीतर एक-एक खण्डको सफाईके लिये भक्तोंमें बाँटकर उनसे कहा,—"आप सब सूक्ष्म धूलि, तृण और कङ्कड़ादि सबको बाहर फेंककर श्रीजगन्नाथके अन्तःपुरको अच्छेसे साफ कर दो॥"92-93॥
दो बार मन्दिरकी सफाई :-
सब वैष्णव लञा यबे दुइबार शोधिल।
देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल॥94॥
अनुवाद—सभी वैष्णवोंको साथ लेकर जब मन्दिरकी दो बार सफाई कर ली, तब मन्दिरको साफ देखकर महाप्रभुका मन सन्तुष्ट हुआ॥94॥
अन्य मण्डलीकी मन्दिर मार्जनमें सहायता :-
आर शत-जन शत-घटे जल भरि'।
प्रथमेइ लञा आछे काल अपेक्षा करि'॥95॥
476 ।
बारहवाँ अध्याय 12/95-106 ]
'जल आन' बलि' यबे महाप्रभु कहिल।
तबे शत घट आनि' प्रभु-आगे दिल ॥ 96 ॥
अनुवाद—पहलेसे अन्य सौ भक्त सौ घड़ोंमें जल
भरकर अपनी सेवाके समयकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
जब महाप्रभुने जल लानेके लिये कहा, तभी उन्होंने सौ
घड़े जल लाकर महाप्रभुके सामने रख दिया ॥ 95-96 ॥
मन्दिरमें सर्वत्र पानीसे धुलाई :-
प्रथमे करिल प्रभु मन्दिर प्रक्षालन।
ऊर्ध्व-अधो भित्ति, गृह-मध्य, सिंहासन ॥ 97 ॥
खापरा भरिया जल ऊर्ध्वे चालाइल।
सेइ जले ऊर्ध्वे सब भित्ति प्रक्षालिल ॥ 98 ॥
अनुवाद—उस जलको लेकर पहले महाप्रभुने मुख्य
मन्दिरको धोया, तब वहाँ मन्दिरकी दीवारोंको ऊपर-नीचे
और मन्दिरके भीतरके सभी स्थानोंके साथ सिंहासनको
भी साफ किया। महाप्रभु और सभी भक्त ठीकरोंमें पानी
भरकर छतकी ओर फेंकने लगे। नीचे गिरते हुए
जलसे दीवारें भी धुल गयीं ॥ 97-98 ॥
अपने हाथोंसे भगवान्के सिंहासनकी सफाई :-
श्रीहस्ते करेन सिंहासनेर मार्जन।
प्रभुर आगे जल आनि' देय भक्तगण ॥ 99 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु अपने हाथोंसे सिंहासनकी
सफाई करने लगे और भक्त उनको जल लाकर देने
लगे ॥ 99 ॥
भक्तोंकी विचित्र सेवा :-
भक्तगण करे गृह-मध्य प्रक्षालन।
निज निज हस्ते करे मन्दिर मार्जन ॥ 100 ॥
केह जल आनि' देय महाप्रभुर करे।
केह जल देय ताँर चरण-उपरे ॥ 101 ॥
केह लुकाञा करे सेइ जलपान।
केह मागि' लय, केह अन्ये करे दान ॥ 102 ॥
अनुवाद—भक्तगण अपने हाथोंमें झाडू लेकर मन्दिरके
भीतर जलसे धुलाई करने लगे। कोई जल लाकर
महाप्रभुके हाथोंमें दे रहा था, तो कोई जल लेकर
उनके चरणोंमें डाल रहा था। कोई छिपकर महाप्रभुके
चरणोंका जल पान कर रहा था। कोई किसीसे माँगकर
उस जलका पान कर रहा था, तो कोई स्वयं ही
दूसरेको दे रहा था ॥ 100-102 ॥
नालीसे जलका निकलना :-
घर धुइ' प्रणालीकाय जल छाड़ि' दिल।
सेइ जले प्राङ्गण सब भरिया रहिल ॥ 103 ॥
अनुवाद—मन्दिरके सभी कक्षोंको धोनेके बाद
जलको नालीमें छोड़ दिया और उस जलसे बाहर
प्राङ्गण भर गया ॥ 103 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रणालिकाय'—नालीमें ॥ 103 ॥
अपने वस्त्रोंसे गृह और सिंहासनका मार्जन :-
निज-वस्त्रे कैल प्रभु गृह सम्मार्जन।
महाप्रभु निज-वस्त्रे माजिल सिंहासन ॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अपने वस्त्रसे कक्षोंको पोंछकर
साफ किया और अपने वस्त्रसे ही सिंहासनको भी
चमकाया ॥ 104 ॥
श्रीराधाके निर्मल मनके साथ स्वच्छ
और धुले हुए मन्दिरकी उपमा :-
शत घट जले हैल मन्दिर मार्जन।
मन्दिर शोधिया कैल-येन निज मन ॥ 105 ॥
निर्मल, शीतल, स्निग्ध करिल मन्दिरे।
आपन-हृदय येन धरिल बाहिरे ॥ 106 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सौ घड़े जलसे मन्दिरके सभी
कक्ष साफ हो गये। महाप्रभुने मन्दिरको अपने मनके
समान स्वच्छ कर दिया। महाप्रभुने मन्दिरको ऐसा
निर्मल, शीतल तथा स्निग्ध कर दिया, मानो उन्होंने
। 477
[ 12/105-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अपने हृदयको ही बाहर प्रकाशित कर दिया
हो॥105-106॥
सौ-सौ भक्तोंके द्वारा मन्दिरको स्वच्छ करनेकी चेष्टा :-
शत-शत जन जल भरे सरोवरे।
घाटे स्थान नाहि, केह कूपे जल भरे॥107॥
पूर्ण कुम्भ लञा आइसे शत भक्तगण।
शून्य घट लञा याय, आर शत जन॥108॥
अनुवाद—सैकड़ों लोग सरोवरसे जल भरकर ला रहे थे, घाटपर खड़े होनेका स्थान नहीं था। इसलिये कुछ लोगोंने कुएँसे ही जल भरना आरम्भ किया। सैकड़ों भक्त पानीसे भरे घड़ोंको ला रहे थे और अन्य सैकड़ों भक्त खाली घड़ोंको भरनेके लिये ले जा रहे थे॥107-108॥
श्रीनित्यानन्द, श्रीअद्वैत, श्रीस्वरूप, श्रीभारती, श्रीपुरी आदिका मन्दिर-मार्जन, अन्य भक्तोंके द्वारा जल लाना :-
नित्यानन्द, अद्वैत, स्वरूप, भारती, पुरी।
इँहा बिना आर सब आने जल भरि'॥109॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीब्रह्मानन्द भारती और श्रीपरमानन्द पुरीके अतिरिक्त सभी भक्त जल भरकर ला रहे थे॥109॥
अनुभाष्य—वैष्णवगण जल लानेके कार्यमें नियुक्त थे। श्रीनित्यानन्दप्रभु, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीदामोदर-स्वरूप, श्रीब्रह्मानन्द-भारती और श्रीपरमानन्द पुरी—ये पाँच लोग महाप्रभुके साथ जल ग्रहण करके सफाईके कार्यमें व्यस्त थे॥109॥
मन्दिरको स्वच्छ करनेमें सभीका उत्साह :-
घटे घटे ठेकि' कत घट भाङ्गि' गेल।
शत शत घट लोक ताँहा लञा आइल॥110॥
अनुवाद—घड़ेसे घड़ा टकरानेसे कई घड़े टूट गये, किन्तु लोग फिरसे सैकड़ों नये घड़े वहाँ लेकर आ गये॥110॥
मन्दिरकी सफाई और धुलाईके समय प्रतिक्षण कृष्णनाम-कीर्तन :-
जल भरे, घर धोय, करे हरिध्वनि।
'कृष्ण' 'हरि' ध्वनि बिना आर नाहि शुनि॥111॥
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि करे घटेर प्रार्थन।
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि करे घट समर्पण॥112॥
येइ येइ कहे, सेइ कहे कृष्णनामे।
कृष्णनाम हइल सङ्केत सब-कामे॥113॥
अनुवाद—कुछ भक्त जल भरकर ला रहे थे और कुछ कक्षोंको धो रहे थे, परन्तु सभी हरि-ध्वनि कर रहे थे। इस प्रकार 'कृष्ण' 'हरि'की ध्वनिके अतिरिक्त और कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था। कुछ भक्त 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए घड़ा माँग रहे थे और अन्य कुछ भक्त उनको 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए घड़ा दे रहे थे। जिसको जो भी कुछ कहना होता, वह श्रीकृष्ण नाम बोलकर ही कहता, अतः श्रीकृष्णनाम ही सभी कार्योंका सङ्केत बन गया॥111-113॥
महाप्रभुके द्वारा प्रतिक्षण कृष्ण-नाम-ग्रहण और अकेले ही एक सौ भक्तोंके समान सेवा :-
प्रेमावेशे प्रभु कहे 'कृष्ण' 'कृष्ण'-नाम।
एकले प्रेमावेशे करे शतजनेर काम॥114॥
स्वयं ही आचार और उपदेशकारी :-
शत-हस्ते करेन येन क्षालन-मार्जन।
प्रतिजन-पाशे याइ' करान शिक्षण॥115॥
अनुवाद—प्रेमावेशमें महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम कह रहे थे। इस प्रकार प्रेमावेशमें वे अकेले ही सौ भक्तोंका कार्य रहे थे मानो स्वयं सौ हाथोंसे धुलाई-सफाई कर रहे हों। वे प्रत्येक भक्तके पास जाकर उसे भी सफाई करना सिखा रहे थे॥114-115॥
अच्छे सेवकोंकी सेवाकी प्रशंसा :-
भालकर्म देखि' तारे करे प्रशंसन।
मने ना मिलिले करे पवित्र भर्त्सन॥116॥
478 ।
बारहवाँ अध्याय 12/116-127 ]
“तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे।
एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” 117 ॥
ए-कथा शुनिया सबे सङ्कुचित हञा।
भाल-मते कर्म करे सबे मन दिया ॥ 118 ॥
अनुवाद-किसीके अच्छे कार्यको देखकर महाप्रभु
उसकी प्रशंसा करते और किसीके कार्यसे सन्तुष्ट नहीं
होनेपर उसको मधुर वचनोंसे झिड़कते हुए कहते, -
“अहो! तुम तो बहुत अच्छा कार्य कर रहे हो, तुम
दूसरोंको भी ऐसा करना सिखाओ, जिससे वे भी
अच्छी तरहसे कार्य करें।” महाप्रभुकी ऐसी बातको
सुनकर वे सब लज्जित हो जाते और मन लगाकर
अच्छी प्रकारसे सफाई करने लगते ॥ 116-118 ॥
मन्दिरमें सर्वत्र धुलाई :-
तबे प्रक्षालन कैल श्रीजगमोहन।
भोगमन्दिर-आदि तबे कैल प्रक्षालन ॥ 119 ॥
नाटशाला धुइ' धुइल चत्वर-प्राङ्गण।
पाकशाला-आदि करि' करिल प्रक्षालन ॥ 120 ॥
मन्दिरेर चतुर्दिक् प्रक्षालन कैल।
सब अन्तःपुर भालमते धोयाइल ॥ 121 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने मन्दिरके जगमोहन और
भोगमन्दिर आदिकी धुलाई की। नाटशालाकी धुलाईके
बाद उन्होंने चारों ओरके प्राङ्गणकी भी धुलाई की तथा
फिर रसोईघर आदिको भी धोया। इस प्रकार चारों
ओरसे मन्दिर अन्दर-बाहरसे धुल गया ॥ 119-121 ॥
एक गौड़ीय-भक्तका महाप्रभुके चरणोंको
धोकर चरणामृतका पान :-
हेनकाले गौड़ीय एक सुबुद्धि सरल।
प्रभुर चरण-युगे दिल घट जल ॥ 122 ॥
सेइ जल लञा आपने पान कैल।
ताहा देखि' महाप्रभुर मने रोष हैल ॥ 123 ॥
अनुवाद-उसी समय एक बङ्गालसे आये एक
बुद्धिमान सरल भक्तने महाप्रभुके दोनों चरणकमलोंपर
घड़ेका जल डाल दिया और फिर उस जलको लेकर
उसने पी लिया। ऐसा देखकर महाप्रभुके मनमें क्रोध
आ गया ॥ 122-123 ॥
जगद्गुरु आचार्यकी लीला-प्रदर्शक महाप्रभुका क्रोध :-
यद्यपि गोसाञि तारे हञाछे सन्तोष।
धर्मसंस्थापन लागि' बाहिरे महारोष ॥ 124 ॥
माध्व-गौड़ीयेश्वरसे श्रीदामोदरस्वरूपसे
महाप्रभुकी शिकायत :-
शिक्षा लागि' स्वरूपे डाकि' कहिल ताँहारे।
“एइ देख तोमार 'गौड़ीया'र व्यवहारे ॥ 125 ॥
भगवान्के मन्दिरमें चरण-धोना-जीवका सेवापराध :-
ईश्वर-मन्दिरे मोर पद धोयाइल।
सेइ जल आपनि लञा पान कैल ॥ 126 ॥
महाप्रभुकी सेवापराधके (?) भयसे कातरता :-
एइ अपराधे मोर काँहा हबे गति।
तोमार 'गौड़ीया' करे एतेक दुर्गति ॥” 127 ॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु भीतरसे उसके प्रति सन्तुष्ट
थे, परन्तु धर्मकी स्थापना करनेके लिये बाहरसे बहुत
रोष प्रकट कर रहे थे। महाप्रभुने अन्य लोगोंको शिक्षा
देनेके लिये श्रीस्वरूप दामोदरको बुलाया और उनसे
कहा, -“यह अपने 'गौड़ीया'का व्यवहार तो देखो। इसने
भगवान्के मन्दिरमें मेरे चरणोंको धोया और उसी
जलको लेकर स्वयं पान कर लिया। इस अपराधके
कारण मेरी कहाँ गति होगी? तुम्हारे 'गौड़ीया'ने मेरी
ऐसी दुर्गति कर दी है ॥” 124-127 ॥
अनुभाष्य - 'तोमार' - सभी गौड़ीय-वैष्णव ही श्रीदामोदर
स्वरूपके अधीन हैं, इसलिये महाप्रभुने 'तोमार'
(तुम्हारे)-शब्द प्रयोग किया।
जीवोंके नित्यप्रभु भगवान्के मन्दिरमें पैर धोना
आदि उनके नित्यदास जीवोंके लिये मर्यादाके उल्लङ्घनके
कारण सेवापराध है (हः भः विः); किन्तु महाप्रभु तो
। 479
[ 12/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्वयं भगवान् हैं, इसलिये उनके ऊपर किसी अपराधादिका
आरोप पूर्णतः असम्भव और वेद-विरुद्ध है। तथापि वे
बाहरसे जगद्गुरु, लोकशिक्षक और आचार्यका कार्य
कर रहे हैं, इसलिये उन्होंने अपने आपको भगवान्का
एक विभिन्नांश जीवमात्र मानकर निर्बोध तथाकथित
गुरुओंको सेवापराधसे सतर्क करनेके लिये शिक्षा
दी॥ 125-127॥
श्रीस्वरूपके द्वारा उस 'गौड़ीय'को
गुण्डिचासे बाहर निकालना :-
तबे स्वरूपगोसाञि तार घाड़े हात दिया।
ढेका मारि' पुरीर बाहिर राखिलेन लञा॥ 128॥
महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा-भिक्षा :-
पुनः आसि' प्रभु पाय करिल विनय।
“अज्ञे अपराध क्षमा करिते युयाय॥” 129॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने हाथसे उसकी
गर्दनको पकड़कर उसे धक्का मारकर मन्दिरसे बाहर
कर दिया और फिर महाप्रभुके चरणोंमें विनती की,—
“वह अज्ञानी है, इसलिये उसके अपराधको क्षमा करना
ही उचित है॥” 128-129॥
अनुभाष्य—'ढेका'—धक्का; 'पुरीर'—गुण्डिचा-
पुरीके॥ 128॥
महाप्रभुका क्षमा करना; सभीको
अपने दोनों ओर बैठाना :-
तबे महाप्रभुर मने सन्तोष हइल।
सारि करि' दुइ पाशे सबारे बसाइल॥ 130॥
बीचमें महाप्रभुका तिनके आदि एकत्रित करना :-
आपने बसिया माझे, आपनार हाते।
तृण, काँकर, कुटा लागिला कुड़ाइते॥ 131॥
कम इकट्ठा करनेवाले व्यक्तियोंसे
प्रसाद-ग्रहणरूप दण्ड :-
“के कत कुड़ाय, सब एकत्र करिब।
यार अल्प, तार ठाञि पिठा-पाना लइब॥” 132॥
अनुवाद—तब महाप्रभु सन्तुष्ट हो गये। उन्होंने
पंक्ति बनवाकर सभी भक्तोंको अपने दोनों ओर बैठा
लिया और महाप्रभु स्वयं उनके बीचमें बैठ गये। फिर
महाप्रभु अपने हाथोंसे तिनके, कङ्कड़ और कूड़ेको
एकत्रित करने लगे और उन्होंने कहा,—“मैं सबको
बुलाकर देखूँगा कि किसने कितना कूड़ा एकत्रित किया
है। जिसका कम होगा, उससे मैं पिठा-पाना
लूँगा॥” 130-132॥
गुण्डिचा मन्दिरको सम्पूर्णरूपसे निर्मल करना :-
एइमत सब पुरी करिल शोधन।
शीतल, निर्मल कैल—येन निज-मन॥ 133॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ
सम्पूर्ण गुण्डिचा मन्दिरकी सफाई की। मन्दिरको उन्होंने
ऐसा शीतल और निर्मल बना दिया, जैसा उनका मन
है॥ 133॥
नालीके द्वारसे जलका निकलना :-
प्रणालिका छाड़ि' यदि पानि बाहाइल।
नूतन-नदी येन समुद्रे मिलिल॥ 134॥
अनुवाद—नालीसे पानीको छोड़नेपर उसके तेज
प्रवाहको देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई नयी
नदी समुद्रमें मिलने जा रही है॥ 134॥
गुण्डिचा मन्दिरके विभिन्न मार्गोंकी सफाई :-
एइमत पुरद्वार-आगे पथ यत।
सकल शोधिल, ताहा के वर्णिबे कत॥ 135॥
अनुवाद—इस प्रकार उन्होंने मन्दिरके मुख्य द्वारके
आगे सभी मार्गोंकी भी सफाई की। यह सब कुछ कैसे
हुआ, कौन इसका वर्णन कर सकता है॥ 135॥
अनुभाष्य—'गुण्डिचा-मार्जनलीला-रहस्य'—जगद्गुरु
महाप्रभु इस लीलाके द्वारा यह शिक्षा दे रहे हैं कि यदि
कोई सौभाग्यवान् जीव श्रीकृष्णको अपने हृदय-सिंहासनपर
बैठानेकी इच्छा करता है, तो सबसे पहले उसे अपने
480 ।
बारहवाँ अध्याय [12/135 ]
हृदयके मलको धोना उचित है; हृदयको निर्मल, शान्त
और भक्तिसे उज्ज्वल करना आवश्यक है। हृदयक्षेत्रमें
काँटेयुक्त तिनके अथवा जङ्गली-घास, धूलि और
कङ्कड़ादि-रूप अनर्थ थोड़ेसे रहनेपर भी परमसेव्य
भगवान्को वहाँ बैठाया नहीं जा सकता। हृदयका यह
मल अथवा कूड़ा-अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और
योग-चेष्टादिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रीलरूप
गोस्वामी प्रभुने कहा है, -
“अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥"
जहाँ भक्तिके अतिरिक्त अन्य अभिलाषा, ज्ञान-कर्म-
योग-तपस्या आदि अथवा भक्तिप्रतिकूल-भावके द्वारा
आत्माकी नित्य स्वाभाविक वृत्ति 'भक्ति' ढक गयी है,
वहाँ शुद्धभक्ति नहीं है। शुद्धसत्त्वमयी शुद्धभक्तिके बिना
श्रीकृष्णका आविर्भाव नहीं होता।
'अन्य अभिलाषा' अर्थात् 'जगत्में जब तक रहूँगा,
केवल अपनी इन्द्रियोंके द्वारा भोग ही करूँगा'-ऐसी
अन्य अभिलाषा,—यह काँटेयुक्त तिनकेकी भाँति शुद्ध-
जीवकी सुकोमल हृदयवृत्ति केवला-भक्तिको (शुद्धभक्तिको)
छलनी करती है। कर्मचेष्टा अर्थात् याग, यज्ञ, दान,
तपस्यादिके द्वारा 'स्वर्गादि उच्च लोकोंमें सुख अथवा
इस लोकमें सुख भोग करूँगा', इस प्रकार जो
वासनामयी क्रिया है, वह धूलिके समान है। कर्मके
बवण्डरसे उड़ती हुई वायुके द्वारा वासनारूपी धूलिराशि
हमारे स्वच्छ और निर्मल हृदय-दर्पणको ढक देती है।
सत् और असत् कर्मोंकी वासनारूपी असंख्य धूलि-
राशिने हरिविमुख-जीवके हृदयको अनेक जन्म-जन्मान्तर
तक मलिन किया है, इसलिये उसकी कर्मवासना दूर
नहीं हो रही। हरिविमुख जीव सोचता है, कर्मके द्वारा
कर्मरूप काँटेको निकाला जा सकता है, अर्थात्
पुण्य-कर्मके द्वारा पाप-कर्मके फलका नाश किया जा
सकता है, किन्तु ऐसी धारणा गलत है। ऐसी धारणाके
वशीभूत होकर जीव केवल अपनेसे ही छल करता
है। हाथीको स्नान करा देनेपर जैसे वह फिरसे शरीरपर
धूलि मल लेता है, उसी प्रकार कर्मके द्वारा कर्मकी
वासना दूर नहीं होती। एकमात्र केवलाभक्तिके द्वारा ही
जीवोंकी समस्त असुविधाएँ दूर होती हैं। तब उसके
उस निर्मल हृदयरूपी सिंहासनपर ही श्रीभगवान् विश्राम-
योग्य स्थान प्राप्त करते हैं। इसलिये भक्तकविने गान
किया है,—“भक्तेर हृदये सदा गोविन्द विश्राम।”
निर्विशेष और कैवल्ययोग अथवा ज्ञान-योगादिकी
चेष्टाएँ-ठीक कङ्कड़के समान हैं। उसके द्वारा श्रीहरिकी
सन्तुष्टि अथवा सेवा तो दूरकी बात है, अपितु यह
श्रीहरिकी देहमें काँटा चुभानेका प्रयास है। यद्यपि
निर्विशेष-ब्रह्मानुसन्धानमें पहले मुक्तिकी कामनाकी
अवस्थामें श्रीहरिका नामादि गौणरूपमें स्वीकार किया
जाता है, किन्तु मुक्त अथवा ब्रह्म-अभिमानके समय
उनका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जाता;
इसलिये भगवान् वैसे दुर्भागे विमुक्त-अभिमानी जीवके
हृदयमें आविर्भूत नहीं होते। इसलिये श्रीगौरसुन्दरने इन
सब तिनकों, धूलि, छोटे-छोटे कङ्कड़ादि कूड़ेको
भगवान्के मन्दिरकी चारदीवारीके भीतर भी नहीं रखा,
परन्तु अपने वस्त्रमें भरकर उनको बाहर फेंक दिया-कहीं
बादमें हवाके साथ उड़ते हुए ये सब जञ्जाल पुनः
श्रीमन्दिरमें प्रवेश ना कर जाँय।
बहुत बार कर्म-ज्ञानादिकी चेष्टाके दूर होनेपर भी
हृदयमें सूक्ष्म-सूक्ष्म मल रह जाते हैं। उनकी 'कुटिनाटि',
'प्रतिष्ठाशा', 'जीवहिंसा', 'निषिद्धाचार', 'लाभ', 'पूजा'
आदिके साथ तुलनाकी जा सकती है।
'कुटिनाटी'-शब्दका अर्थ कपटता है।
'प्रतिष्ठाशा'-शब्दसे-निर्जनभजनादि अथवा ढोंगके
द्वारा 'अज्ञानी लोग मुझे एक बड़ा साधु अथवा महान्त
कहेंगे'-ऐसी जड़्रीय-सम्मानादिकी आशा अथवा विषय-
भोगसे स्वार्थको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे कठोर हुए हृदयमें
कृत्रिम विकारादि भावाभास-प्रदर्शनके द्वारा 'भक्त' अथवा
'अवतार'के रूपमें सजनेकी आशाको समझना चाहिये।
॥ 481
[ 12/135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
'जीवहिंसा'-शब्दसे शुद्धभक्तिके प्रचारमें निराशा
अथवा कृपणता करना, मायावादी, कर्मी और
अन्याभिलाषीको आश्रय देना या उनके मनको रखनेवाली
बात बोलना।
'लाभ-पूजा'-शब्दसे धर्मके नामपर हरिनाम, मन्त्र,
विग्रह या भागवतके द्वारा जीविका अर्जित करनेके लिये
सरल लोगोंको ठगकर धनादि अथवा सम्मानकी प्राप्तिको
समझना चाहिये।
'निषिद्धाचार'-शब्दसे स्त्रीसङ्ग एवं कर्मी, ज्ञानी और
अन्याभिलाषी आदि कृष्ण-अभक्तोंके सङ्गको समझना
चाहिये।
इस प्रकार एक बार बहुत दिनोंसे सञ्चित बड़े-बड़े
कङ्कड़, तिनके, धूलिराशि आदिको झाड़कर फेंक देनेके
बाद श्रीगौरसुन्दरने दो-दो बार मन्दिरको पूरी तरहसे
साफ करके जलके द्वारा धो दिया। फिर भी कहीं कोई
सूक्ष्म दाग-धब्बे आदि रह गये, तो महाप्रभु अपने पहने
हुए सूखे वस्त्रके द्वारा उनको घिस-घिसकर श्रीमन्दिर
और भगवान्के बैठने योग्यस्थान सिंहासनको साफ
करने लगे।
इस प्रकारसे धुलाई, सफाई और घिसने आदिके
बाद श्रीमन्दिरमें धूलिकणोंका लेश, यहाँ तक कि एक
छोटा सा दाग भी नहीं रहा। श्रीमन्दिर स्फटिक मणिकी
भाँति निर्मल हो गया, केवल इतना ही नहीं, और
सुशीतल भी हो गया। अर्थात् साधकका 'सूर्यतापसे तप्त
मरुभूमिके समान' हृदय तापरहित अर्थात् विषयभोग-
वासनासे उत्पन्न आध्यात्मिकादि तीनों तापोंकी अग्निकी
ज्वालासे रहित हो गया। वास्तवमें उसके हृदयसे
अन्याभिलाष और कर्म-ज्ञान-योगादि चेष्टारूपी भुक्ति-
मुक्तिकी कामना दूर होकर आत्मवृत्ति शुद्धभक्ति प्रकटित
होनेपर जीव इस प्रकार शान्त और सुशीतल हो जाता
है।
बहुत बार समस्त प्रकारकी कामनाओं और
वासनाओंके दूर होनेपर भी हृदयके किसी-किसी
अज्ञात कोनेमें एक छोटासा दाग रह जाता है, उसे
अज्ञानी जीव समझ नहीं पाता; वह 'मुक्तिकी कामना'
है। निर्विशेषवादियोंकी सायुज्य मुक्तिकी कामना तो
दूरकी बात है—अन्यान्य चार प्रकारकी मुक्तियोंकी
कामनारूप सूक्ष्म दागको भी श्रीमन्महाप्रभुने अपने
वस्त्रके द्वारा घिसकर दूर किया।
इस प्रकारसे श्रीगौरसुन्दर जीवोंके मङ्गलके लिये
अपनेको जीव मानकर जगद्गुरुके रूपमें स्वयं शिक्षा
देने लगे कि किस प्रकारसे साधक अपने हृदयको
वृन्दावनरूपमें परिणत करके स्वराट् (स्वतन्त्र) श्रीकृष्णके
स्वच्छन्द विहारका स्थल बनानेके लिये, श्रीकृष्णेन्द्रिय-
प्रीतिवाञ्छाके लिये, अत्यधिक उत्साहपूर्वक उच्च स्वरसे
श्रीकृष्णनाम करते-करते श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये अपने
हृदयको साफ करेंगे।
“यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा कीर्त्तनाख्या
भक्ति-संयोगेनैव।”
अर्थात् “यद्यपि भक्तिके अन्य अङ्गोंका पालन भी
कलियुगमें कर्त्तव्य है, तथापि उन सबका पालन
कीर्त्तनके संयोगसे करेंगे।”
महाप्रभु प्रत्येक भक्तके निकट जाकर उसका हाथ
पकड़कर मन्दिर-मार्जन-सेवाकी शिक्षा देने लगे। जिसका
कार्य अच्छा हो रहा था, उसकी प्रशंसा की। और
जिसका कार्य (श्रीकृष्णवाञ्छापूर्तिमयी श्रीराधाके भावयुक्त)
महाप्रभुके मनकी इच्छानुसार नहीं हो रहा था, उसे भी
मीठी डाँट देकर हाथ पकड़कर श्रीकृष्णसेवाकी प्रणालीकी
शिक्षा दी।
केवल इतना ही नहीं—श्रीचैतन्यशिक्षाके अनुगत
होकर जिन्होंने भजनमें कौशल प्राप्त किया है, ऐसे
अद्वयज्ञानमें भक्तियोगयुक्त शुद्धहृदयवाले भक्तोंको अन्य
विमुख जीवोंके 'आचार्य'का कार्य करनेके लिये भी
आदेश देकर उत्साहित किया। (117 संख्या)।
पुनः, जो जितने अधिक परिमाणमें अभद्रराशि
(मैल)को हृदयसे निकालकर सफाई करनेमें समर्थ होंगे,
वे उतने अधिक महाप्रभुके प्रिय होंगे एवं जिनकी
482 ।
बारहवाँ अध्याय 12/135-144 ]
अनर्थ-निवृत्ति सामान्य (बहुत कम) ही हुई है, उनके
लिये दण्ड-स्वरूप श्रीहरि-गुरु-वैष्णव-सेवाको ही विधि
कहकर निर्देश किया गया है॥135॥
नृसिंह मन्दिरकी सफाईके बाद सभीका विश्राम :-
नृसिंहमन्दिर-भितर-बाहिर शोधिल।
क्षणेक विश्राम करि' नृत्य आरम्भिल॥ 136 ॥
अनुवाद-उसके बाद महाप्रभुने श्रीनृसिंह मन्दिरको
भी भीतर और बाहरसे स्वच्छ कर दिया। तब थोड़ासा
विश्राम करनेके बाद नृत्य करना आरम्भ किया॥136॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नृसिंह-मन्दिर'-गुण्डिचा मन्दिरके
पासमें ही एक सुन्दर और पुराना नृसिंह मन्दिर है।
वहाँ नृसिंह चतुर्दशीके दिन बहुत बड़ा महोत्सव होता
है। श्रीमुरारिगुप्त-रचित श्रीचैतन्यचरित-ग्रन्थ में, श्रीनवद्वीपधाममें
नृसिंह-मन्दिर अर्थात् श्रीनृसिंह-पल्लीका वर्णन है, जहाँपर
भी उसी दिन एक बहुत बड़ा उत्सव होता है॥136॥
चारों ओर महासङ्कीर्त्तन और बीचमें महाप्रभुका नृत्य :-
चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन।
मध्ये नृत्य करेन प्रभु मत्तसिंह-सम॥ 137 ॥
अनुवाद-चारों ओर भक्तगण कीर्त्तन कर रहे थे
और बीचमें महाप्रभु मत्त-सिंहकी भाँति नृत्य कर रहे
थे॥ 137 ॥
महाप्रभुके अष्टसात्त्विक-विकार और अश्रुवर्षण :-
स्वेद, कम्प, वैवर्ण, पुलक, हुँकार।
निज-अङ्ग धुइ' आगे चले अश्रुधार॥ 138 ॥
चारिदिके भक्त-अङ्ग कैल प्रक्षालन।
श्रावणेर मेघ येन करे वरिषण॥ 139 ॥
महा-उच्चसङ्कीर्त्तने आकाश भरिल।
प्रभुर उद्दण्ड-नृत्ये भूमिकम्प हैल॥ 140 ॥
अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुमें पसीना, कम्प,
वर्ण-परिवर्तन, अश्रु, पुलक, हुँकारादि अष्ट-सात्त्विक
विकार उदित होने लगे। उनके नेत्रोंसे ऐसी अश्रुओंकी
धारा बहने लगी जो उनके अपने अङ्गोंके साथ-साथ
सामनेवालोंको भी धो रही थी। उनकी अश्रुधारासे चारों
ओर एकत्रित भक्तोंके शरीर ऐसे धुल गये मानो
श्रावणके मेघ वर्षण कर रहे हों। भक्तोंके उच्च
सङ्कीर्त्तनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया और महाप्रभुके
उद्दण्ड नृत्यसे मानो भूकम्प आ गया॥138-140॥
उच्च-स्वरसे स्वरूप दामोदरके
कीर्त्तनसे महाप्रभुका आनन्दपूर्वक नृत्य :-
स्वरूपेर उच्च-गान प्रभुरे सदा भाय।
आनन्दे उद्दण्ड नृत्य करे गौरराय॥ 141 ॥
नृत्यके अन्तमें विश्राम :-
एइमत कतक्षण नृत्य ये करिया।
विश्राम करिला प्रभु समय जानिया॥ 142 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरका उच्चस्वरमें गान
महाप्रभुको सदैव प्रिय लगता था, इसलिये उनके गानको
सुनकर श्रीगौरराय आनन्दपूर्वक उद्दण्ड नृत्य कर रहे
थे। इस प्रकार कुछ देर तक नृत्य करनेके बाद
महाप्रभुने परिस्थिति देखकर नृत्य करना बन्द कर
दिया॥ 141-142॥
श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालको नृत्य करनेका आदेश :-
आचार्य-गोसाञिर पुत्र श्रीगोपाल-नाम।
नृत्य करिते ताँरे आज्ञा दिल गौरधाम॥ 143 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र जिनका नाम श्रीगोपाल
है, उनको तब गौरधाम महाप्रभुने नृत्य करनेका आदेश
दिया॥ 143॥
अनुभाष्य-'श्रीगोपाल'-आदिलीला 12/19-26 संख्या
देखें॥143॥
नृत्य करनेसे श्रीगोपालकी मूर्च्छा :-
प्रेमावेशे नृत्य करि' हइला मूर्च्छिते।
अचेतन हञा तैंह पड़िला भूमिते॥ 144 ॥
। 483