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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1311

[ 12/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गौरभक्तोंसे ग्रन्थकारकी श्रीकृष्णचैतन्यके
गुण-लीला-वर्णन करनेकी शक्तिकी प्रार्थना :-
जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण।
शक्ति देह,—करि येन चैतन्य-वर्णन॥३॥
अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो जय हो।
आप सभी मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं महाप्रभुकी
लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥३॥
दक्षिण देशसे आनेके बाद राजा प्रतापरुद्रकी
महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा—
पूर्वे दक्षिण हैते प्रभु यबे आइला।
ताँरे मिलिते गजपति उत्कण्ठित हैला॥४॥
दर्शन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यको महाप्रभुकी
अनुमतिके लिये पत्र भेजना :-
कटक हैते पत्री दिल सार्वभौम-ठाञि।
प्रभुर आज्ञा हय यदि, देखिवारे याइ॥५॥
अनुवाद—दक्षिण भारतसे जब महाप्रभु लौट आये,
तब गजपति (राजा प्रतापरुद्र) उनसे मिलनेके लिये बड़े
उत्कण्ठित हो गये। कटकसे राजाने श्रीसार्वभौमको पत्र
लिखा कि यदि महाप्रभुकी आज्ञा हो, तो मैं उनके
दर्शनके लिये आ जाऊँ॥४-५॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी निषेध आज्ञाका बताना
और राजाके द्वारा पुनः लोभरूपी पत्र भेजना :-
भट्टाचार्य लिखिल,—प्रभुर आज्ञा ना हैल।
पुनरपि राजा ताँरे पत्री पाठाइल॥६॥
भक्तोंके पास अभीष्ट सिद्धि हेतु प्रार्थना :-
'प्रभुर निकटे आछे यत भक्तगण।
मोर लागि' ताँ-सबारे करिह निवेदन॥७॥
सेइ सब दयालु मोरे हञा सदय।
मोर लागि' प्रभुपदे करिबे विनय॥८॥
ताँ-सबार प्रसादे मिले श्रीप्रभुर पाय।
प्रभुकृपा बिना मोर राज्य नाहि भाय॥९॥
महाप्रभुकी कृपाके अभावमें राजाका निर्वेद
और राज्य त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :-
यदि मोरे कृपा ना करिबे गौरहरि।
राज्य छाड़ि' योगी हइ' हइब भिखारी॥'१०॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने उत्तरमें लिखा,—अभी
महाप्रभुकी ऐसी आज्ञा नहीं हुई है। यह सुनकर राजाने
फिरसे उन्हें एक पत्र लिखकर भेजा,—'महाप्रभुके पास
जितने भक्त रहते हैं, उन सबसे मेरे ओरसे निवेदन
करना कि वे सब दयालु भक्त मुझपर कृपा करके मेरे
लिये महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करें। उन सबकी
कृपासे ही मुझे महाप्रभुके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हो सकती
है। महाप्रभुकी कृपाके बिना अब मेरा राजपाटमें मन
नहीं लगता। यदि श्रीगौरहरि मुझपर कृपा नहीं करेंगे,
तो मैं राजपाट छोड़कर योगी बनकर घर-घर भिक्षा
करूँगा॥'६-१०॥
अनुभाष्य—'कल्याणकल्पतरु' ग्रन्थमें श्रीमद्भक्तिविनोद
ठाकुरने लिखा है—
“काँदिया, काँदिया जानाइब दुःखग्राम।
संसार-अनल ह'ते मागिब विश्राम॥
शुनिया आमार दुःख वैष्णव-ठाकुर।
आमा लागि' कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥
वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय।
मो-हेन पामर-प्रति ह'बेन सदय॥”
अर्थात् “मैं रोते-रोते अपने दुःखकी गाथा सुना
रहा हूँ। अब मैं इस संसार-अग्निसे छुटकारा चाहता
हूँ। हे वैष्णव-ठाकुर ! मेरे दुःखकी गाथाको सुनकर
श्रीकृष्णसे मेरे लिये ज़ोर देकर प्रार्थना करना। वैष्णवकी
प्रार्थना सुनकर दयामय श्रीकृष्ण मेरे जैसे पापीके प्रति
भी दयाशील होंगे॥”७-९॥
सभी भक्तोंको राजाका पत्र दिखाना :-
भट्टाचार्य पत्री देखि' चिन्तित हञा।
भक्तगण-पाश गेला सेइ पत्री लञा॥११॥
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