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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1323

[ 12/105-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अपने हृदयको ही बाहर प्रकाशित कर दिया
हो॥105-106॥

सौ-सौ भक्तोंके द्वारा मन्दिरको स्वच्छ करनेकी चेष्टा :-
शत-शत जन जल भरे सरोवरे।
घाटे स्थान नाहि, केह कूपे जल भरे॥107॥
पूर्ण कुम्भ लञा आइसे शत भक्तगण।
शून्य घट लञा याय, आर शत जन॥108॥

अनुवाद—सैकड़ों लोग सरोवरसे जल भरकर ला रहे थे, घाटपर खड़े होनेका स्थान नहीं था। इसलिये कुछ लोगोंने कुएँसे ही जल भरना आरम्भ किया। सैकड़ों भक्त पानीसे भरे घड़ोंको ला रहे थे और अन्य सैकड़ों भक्त खाली घड़ोंको भरनेके लिये ले जा रहे थे॥107-108॥

श्रीनित्यानन्द, श्रीअद्वैत, श्रीस्वरूप, श्रीभारती, श्रीपुरी आदिका मन्दिर-मार्जन, अन्य भक्तोंके द्वारा जल लाना :-
नित्यानन्द, अद्वैत, स्वरूप, भारती, पुरी।
इँहा बिना आर सब आने जल भरि'॥109॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीब्रह्मानन्द भारती और श्रीपरमानन्द पुरीके अतिरिक्त सभी भक्त जल भरकर ला रहे थे॥109॥

अनुभाष्य—वैष्णवगण जल लानेके कार्यमें नियुक्त थे। श्रीनित्यानन्दप्रभु, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीदामोदर-स्वरूप, श्रीब्रह्मानन्द-भारती और श्रीपरमानन्द पुरी—ये पाँच लोग महाप्रभुके साथ जल ग्रहण करके सफाईके कार्यमें व्यस्त थे॥109॥

मन्दिरको स्वच्छ करनेमें सभीका उत्साह :-
घटे घटे ठेकि' कत घट भाङ्गि' गेल।
शत शत घट लोक ताँहा लञा आइल॥110॥

अनुवाद—घड़ेसे घड़ा टकरानेसे कई घड़े टूट गये, किन्तु लोग फिरसे सैकड़ों नये घड़े वहाँ लेकर आ गये॥110॥

मन्दिरकी सफाई और धुलाईके समय प्रतिक्षण कृष्णनाम-कीर्तन :-
जल भरे, घर धोय, करे हरिध्वनि।
'कृष्ण' 'हरि' ध्वनि बिना आर नाहि शुनि॥111॥
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि करे घटेर प्रार्थन।
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि करे घट समर्पण॥112॥
येइ येइ कहे, सेइ कहे कृष्णनामे।
कृष्णनाम हइल सङ्केत सब-कामे॥113॥

अनुवाद—कुछ भक्त जल भरकर ला रहे थे और कुछ कक्षोंको धो रहे थे, परन्तु सभी हरि-ध्वनि कर रहे थे। इस प्रकार 'कृष्ण' 'हरि'की ध्वनिके अतिरिक्त और कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था। कुछ भक्त 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए घड़ा माँग रहे थे और अन्य कुछ भक्त उनको 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहते हुए घड़ा दे रहे थे। जिसको जो भी कुछ कहना होता, वह श्रीकृष्ण नाम बोलकर ही कहता, अतः श्रीकृष्णनाम ही सभी कार्योंका सङ्केत बन गया॥111-113॥

महाप्रभुके द्वारा प्रतिक्षण कृष्ण-नाम-ग्रहण और अकेले ही एक सौ भक्तोंके समान सेवा :-
प्रेमावेशे प्रभु कहे 'कृष्ण' 'कृष्ण'-नाम।
एकले प्रेमावेशे करे शतजनेर काम॥114॥

स्वयं ही आचार और उपदेशकारी :-
शत-हस्ते करेन येन क्षालन-मार्जन।
प्रतिजन-पाशे याइ' करान शिक्षण॥115॥

अनुवाद—प्रेमावेशमें महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम कह रहे थे। इस प्रकार प्रेमावेशमें वे अकेले ही सौ भक्तोंका कार्य रहे थे मानो स्वयं सौ हाथोंसे धुलाई-सफाई कर रहे हों। वे प्रत्येक भक्तके पास जाकर उसे भी सफाई करना सिखा रहे थे॥114-115॥

अच्छे सेवकोंकी सेवाकी प्रशंसा :-
भालकर्म देखि' तारे करे प्रशंसन।
मने ना मिलिले करे पवित्र भर्त्सन॥116॥

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