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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 311

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३९॥
अमृतप्रवाह भाष्य—तमः अर्थात् मायिकजगत्के परे ब्रह्मधामरूप 'सिद्धलोक' है। वहाँ
ब्रह्मसुखमें मग्न मायावादी लोग और भगवान्के द्वारा मारे गये कंसादि असुर वास करते हैं;
पातञ्जल-योगी भी कैवल्य प्राप्तकर उस लोकको प्राप्त होते हैं॥३९॥
अनुभाष्य—तमसः पारे (त्रिगुणातीते प्रदेशे) तु सिद्धलोकः [वर्त्तते], यत्र सिद्धाः (निर्भेदब्रह्मज्ञानसिद्धाः,
कैवल्ययोगसिद्धाश्च) हरिणाः (कृष्णेन) हताः दैत्याः च, ब्रह्मसुखे (निर्विशेषब्रह्मेश्वर-सायुज्ये) मग्नाः [सन्तः]
वसन्ति हि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है।
पहले उल्लेख किया गया ३५-३६ संख्याका अनुभाष्य भी द्रष्टव्य है॥३९॥
परव्योममें स्थित द्वितीय चतुर्व्यूह द्वारकाके आदि-चतुर्व्यूहका प्रकाश :-
सेइ परव्योमे नारायणेर चारि पाशे।
द्वारकार चतुर्व्यूह द्वितीय प्रकाशे॥४०॥
अनुवाद—उस परव्योममें परव्योमाधिपति नारायणके चारों ओर द्वारकाके चतुर्व्यूहका दूसरा
प्रकाश विराजमान है॥४०॥
अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें (चतुर्व्यूहवर्णन प्रसङ्गमें ८३-८४ संख्या)—
“पादे तु परमव्योम्नः पूर्वाद्यो दिक्षचतुष्टये। वासुदेवादयो व्यूहाश्चत्वारः कथिताः क्रमात्॥ तथा पादविभूतौ
च निवसन्ति क्रमादिमे। जलावृत्तिस्थ-वैकुण्ठस्थितवेदवतीपुरे॥ सत्योर्द्धे वैष्णवे लोके नित्याख्ये द्वारकापुरे।
शुद्धोदादुत्तरे श्वेतद्वीपे चैरावतीपुरे। क्षीराम्बुधिस्थितानन्तक्रोड़े-पर्यङ्क-धामनि॥”
अर्थात् पद्मपुराणमें कहा गया है कि परव्योमके पूर्वादि चार दिशाओंमें वासुदेवादि चतुर्व्यूह
क्रमानुसार अवस्थान करते हैं। और एकपादविभूतिमें अर्थात् प्रपञ्चमें क्रमसे चार स्थानोंमें ये
वासुदेवादि चार मूर्तियाँ वास करती हैं। जलसे आवृत्त वैकुण्ठमें वेदवतीपुरमें वासुदेव,
सत्यलोकके ऊपर विष्णूलोकमें सङ्कर्षण, नित्य द्वारकापुरमें प्रद्युम्न और शुद्धजलके समुद्रके
उत्तर तट-स्थित क्षीरसमुद्रके मध्य श्वेतद्वीपमें ऐरावतीपुरमें अनन्तशय्यापर अनिरुद्ध वास करते
हैं॥४०॥
ये सब तुरीय-विराट्, गर्भ और कारणके अतीत :-
वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध।
'द्वितीय चतुर्व्यूह' एइ—तुरीय, विशुद्ध॥४१॥
अनुवाद—द्वितीय चतुर्व्यूहके वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, - ये चिन्मय और विशुद्ध
हैं॥४१॥
अनुभाष्य—सङ्कर्षणका दूसरा नाम 'महासङ्कर्षण' भी है। (परवर्त्ती ४२-४८ संख्यामें इसका
वर्णन हुआ है)॥४१॥
द्वितीय-चतुर्व्यूहगत महासङ्कर्षण ही चित्-शक्तिके मूल-आश्रय :-
ताँहा ये रामेर रूप-महासङ्कर्षण।
चिच्छक्ति-आश्रय तिहाँ, कारणेर कारण॥४२॥