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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

[ ५/३६-३९
नराकृतिका दर्शन किया। उसी समय सुदर्शन-चक्रके आघातसे उसका दैत्यशरीर विनष्ट हो गया
और वह परब्रह्ममें लीन हो गया। श्रीकृष्णसे द्वेषजनित अतिशय आवेशके कारण शिशुपालने
उनमें सायुज्य-लय प्राप्त किया—यह बात कहकर श्रीकृष्णकी बाल्यलीलामें पूतनादिको मोक्ष,
किन्तु अन्य अवतारोंमें एवं ईश्वरचेष्टासे मारे गये कालनेमी आदिकी मोक्ष-अभावकी आलोचना
करनेके लिये यह गद्य कहा गया है। ‘हि’—प्रसिद्धि अर्थमें है। अन्यान्य अवतारोंकी अपेक्षा
अवतारीका विद्वेष अर्थात् प्रतिकूलभावसे कीर्तन और स्मरण करनेसे असुरकी भी सद्गति होती
है।” श्रीपाद बलदेव विद्याभूषणकृत भाष्य भी द्रष्टव्य है।
श्रीसनातन गोस्वामीकृत बृहद्भागवतामृत (गोलोक महात्म्य-नामक २/२/२००-२०१) में—
‘अहो श्लाघ्यः कथं मोक्षो दैत्यानामपि दृश्यते। तैरेव शास्त्रैर्निन्द्यन्ते ये गो-विप्रादि-घातिनः॥ सर्वथा
प्रतियोगित्वं यत् साधुत्वासुरत्वयोः। तत्साधनेषु साध्ये च वैपरीत्यं किलोचितम्॥’
इस श्लोकका श्रीसज्जनतोषणीके दसवें खण्डमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरकृत अनुवाद—“जिन
सभी दैत्योंकी शास्त्रोंमें गो-ब्राह्मणादिके घातकके रूपमें निन्दा की गयी है, उन कंसादि दैत्योंने
जो सायुज्य मुक्ति प्राप्त की, उस मुक्तिको किस प्रकार प्रशंसनीय कहा जा सकता है? भगवद्भक्त
ही साधु हैं और भगवत्-विद्वेषी ही असुर हैं। साधुओं और असुरोंके लक्षणोंमें जिस प्रकार
सर्वदा विपरीत-धर्म होता है, उनके साधन और साध्यके विषयमें भी उसी प्रकार विपरीत-भाव
रहना आवश्यक है। असुरोंका साधुओंसे विद्वेष और गो-ब्राह्मणोंकी हत्या ही साधन है तथा
मोक्ष ही साध्य है। भक्तोंका भक्ति ही साधन है और प्रेम ही साध्य है। इसलिये जो लोग
उस सायुज्य मुक्तिके लिये प्रयास करते हैं, वे लोग असुरोंकी भाँति केवल ज्ञान-चेष्टारूप
असाधु-साधनका ही आश्रय करते हैं॥” ३६॥
ब्रह्मलोकके ऊपर चित्-विलासमय परव्योम :—
तैछे परव्योमे नाना चिच्छक्तिविलास।
निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब बाहिरे प्रकाश॥ ३७॥
अनुवाद—परव्योममें चित्-शक्तिके द्वारा नाना प्रकारके विलास होते हैं अर्थात् वहाँ अनेक
प्रकारकी विशेषताएँ हैं तथा निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब उस परव्योमका बाहरी प्रकाशमात्र है॥ ३७॥
निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानकारीको चिन्मात्र-ब्रह्मलोक ही प्राप्य :—
निर्विशेष-ब्रह्म सेइ केवल ज्योतिर्मय।
सायुज्येर अधिकारी ताँहा पाय लय॥ ३८॥
अनुवाद—निर्विशेष ब्रह्म केवल भगवान्‌की ज्योतिमात्र है और जो सायुज्य मुक्तिके अधिकारी
होते हैं, वे उस ज्योतिमें लीन हो जाते हैं॥ ३८॥
ज्ञानी, योगी और हरिद्वेषीकी गति :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२८०)में ब्रह्माण्डपुराणका वचन—
सिद्धलोकस्तु तमसः पारे यत्र वसन्ति हि।
सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः॥ ३९॥
२६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत