श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1697, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/174-181 ]
(ii) वैभव-चौबीस मूर्तियाँ-
(क) आवरण-चतुर्व्यूहगत वासुदेवादि चार मूर्तियाँ;
(ख) प्रत्येककी तीन-तीन मूर्तियाँ करके बारह
मूर्तियाँ-बारह महीनों और तिलकोंके आदर्श
देवता;
(ग) इन चारोंकी पुरुषोत्तम और अच्युतादि आठ
विलासमूर्तियाँ।
इन चौबीस मूर्तियोंके ही अस्त्रधारणके भेदसे
भिन्न-भिन्न नाम हैं॥ 174॥
(2) श्रीकृष्णरूपी द्विभुज श्रीवासुदेव अथवा
श्रीदेवकीनन्दन, (3) श्रीकृष्णरूपी चतुर्भुज
श्रीवासुदेव अथवा श्रीदेवकीनन्दन :-
वैभवप्रकाश यैछे देवकी-तनुज।
द्विभुज-स्वरूप कभु, कभु हन चतुर्भुज॥ 175॥
उक्त चतुर्भुज-उक्त द्विभुजका ही प्रकाश-विग्रह :-
ये-काले द्विभुज, नाम-वैभवप्रकाश।
चतुर्भुज हैले, नाम-प्राभवविलास॥ 176॥
अनुवाद-श्रीदेवकीनन्दन स्वयंरूप श्रीकृष्णके
वैभव-प्रकाश हैं। वे श्रीदेवकीनन्दन कभी द्विभुज-स्वरूपमें
और कभी चतुर्भुज-स्वरूपमें प्रकाशित होते हैं। जिस
समय वे द्विभुज होते हैं, तब उनका नाम वैभवप्रकाश
होता है। जब वे चतुर्भुज होते हैं, तब उनका नाम
प्रभावविलास होता है॥ 175-176॥
व्रजेन्द्रनन्दनमें गोप-अभिमान और श्रीवासुदेवमें
क्षत्रिय-अभिमान :-
स्वयंरूपेर गोपवेश, गोप-अभिमान।
वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश, 'आमि-क्षत्रिय'-ज्ञान॥ 177॥
श्रीवासुदेवकी अपेक्षा श्रीनन्दनन्दनमें चार
अधिक चमत्कारिताएँ :-
सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य, वैदग्ध्य-विलास।
व्रजेन्द्रनन्दने इहा अधिक उल्लास॥ 178॥
अनुवाद-स्वयंरूपमें श्रीकृष्णका गोपवेश और
गोप-अभिमान होता है। श्रीवासुदेवके रूपमें वे क्षत्रिय
वेश धारण करते हैं और 'मैं क्षत्रिय हूँ'-ऐसा ज्ञान
रहता है॥ 177॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 178॥
अनुभाष्य-वसुदेव-नन्दनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य
और वैदग्ध्य-विलासकी अपेक्षा नन्दनन्दनके ये चार
विलास अधिक आनन्द प्रदान करनेवाले हैं॥ 178॥
श्रीनन्दनन्दनके माधुर्यसे श्रीवासुदेव भी
मुग्ध और आकृष्ट :-
गोविन्देर माधुरी देखि' वासुदेवेर क्षोभ।
से माधुरी आस्वादिते उपजाय लोभ॥ 179॥
दृष्टान्तस्थल-मथुरा और द्वारकामें :-
मथुराय यैछे गन्धर्वनृत्य-दरशने।
पुनः द्वारकाते यैछे चित्र-विलोकने॥ 180॥
अनुवाद-श्रीगोविन्दके माधुर्यको देखकर श्रीवासुदेव
भी क्षुब्ध हो जाते हैं और उनमें उस माधुरीका
आस्वादन करनेका लोभ उत्पन्न हो जाता है। जैसे
मथुरामें गन्धर्व नृत्यको देखकर और पुनः द्वारकामें
श्रीगोविन्दके अङ्कित चित्रको देखकर श्रीवासुदेवका चित्त
श्रीगोविन्दकी ओर आकर्षित हो गया था॥ 179-180॥
अनुभाष्य-नन्दनन्दनके लोभनीय माधुर्यको देखकर
श्रीवासुदेव क्षुब्ध हो जाते हैं; उस माधुरीके आस्वादनमें
लुब्ध होनेका प्रसङ्ग मथुरामें गन्धर्व नृत्य-दर्शनमें और
द्वारकामें नन्दनन्दन श्रीकृष्णके चित्राङ्कनको देखकर
सुस्पष्ट हुआ है॥ 179॥
ललितमाधव (4/19)में :-
उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी-परिमलस्याभीरलीलस्य मे
द्वैतं हन्त समक्षयन् मुहुरसौ चित्रीयते चारणः।
चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं सत्यं सखे मामकं
यस्य प्रेक्ष्य स्वरूपतां व्रजवधूसारूप्यमन्विच्छति॥ 181॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 181॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखे, यह चारण (नट) मेरे
। 251