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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1696

[ 20/170-174 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-आदिलीला 1/74 संख्या देखें ॥ 170 ॥
(ख) वैभव-प्रकाशकी संज्ञा :-
सेइ वपु, सेइ आकृति पृथक् यदि भासे।
भावावेश-भेदे नाम 'वैभवप्रकाश' ॥ 171 ॥
अनुवाद-भाव और आवेशके भेदसे जो देह और
आकृति स्वयंरूपसे पृथक् प्रकाशित होती है-उसे
'वैभवप्रकाश' कहते हैं॥ 171 ॥
एक ही अंशी श्रीकृष्णके असंख्य प्राभव और
वैभव-प्रकाशमें अचिन्त्यशक्तिके कारण परस्परमें
नाम-रूपादिकी विचित्रता :-
अनन्त-प्रकाशे कृष्णेर नाहि मूर्त्तिभेद।
आकार-वर्ण-अस्त्रभेदे नाम-विभेद ॥ 172 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण-स्वरूपके अनन्त रूपोंमें प्रकाशित
होनेपर भी उन सबमें कोई पार्थक्य नहीं है, किन्तु
आकार, वर्ण और अस्त्रके भेदसे उनके भिन्न-भिन्न नाम
हैं॥ 172 ॥
श्रीमद्भागवत (10/40/7)में :-
अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते।
यजन्ति तन्मयास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम् ॥ 173 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-(सात्वत और शैव तन्त्रादिमें)
उल्लिखित विधिके द्वारा जो संस्कृतात्मा [अर्थात् दीक्षा
ग्रहण करनेके बाद पवित्र हो गये] हैं, वे अनेक
मूर्तियोंमें [प्रकाशित] एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन
करते हैं॥ 173 ॥
अनुभाष्य-भगवान् श्रीबलराम और श्रीकृष्णको
रथमें चढ़ाकर गोकुलसे मथुरा लेकर जानेके मार्गमें
महात्मा अक्रूर यमुनाके जलमें प्रवेश करके वहाँ
विष्णुलोकमें शेष, नारद और चतुःसनादिके साथ परम
ऐश्वर्यमय भगवान्‌के दर्शन करके स्तव करते-करते
सांख्य-योगत्रयी मार्गका विषय बतलाकर वैष्णव और
शैव-पाशुपतादि दीक्षामें दीक्षित व्यक्तियोंके उपासना-मार्गके
सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,-
अन्ये (जनाः) च ते (त्वया) अभिहितेन (कथितेन)
विधिना (पाञ्चरात्रिकविधानादिना) संस्कृतात्मानः (वैष्णव-शैव-
दीक्षाया-दीक्षिताः संस्कृताः आत्मानः येषां ते) तन्मयाः
(तन्मयत्वेन आत्मानम् अप्राकृतसेवनधर्मपरं भावयन्तः त्वदेकप्रधाना
इति वा) बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकं (वासुदेव-सङ्कर्षण- प्रद्युम्नानिरुद्ध-भेदेन
तथा युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदेन च बहुमूर्त्ति महानारायणरूपेण
मूर्त्तिकं च त्वां) वै (एव) यजन्ति (अर्चयन्ति)।
श्लोक-भावानुवाद-अन्य जन जो वैष्णव-शैव-
दीक्षामें दीक्षित हो गये हैं, वे आपके द्वारा कथित
पाञ्चरात्रिक विधिके अनुसार आपमें चित्तको निवेश
करके वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-भेदसे तथा
युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदसे अनेक मूर्तियोंमें प्रकाशित
महानारायणरूप एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन करते
हैं॥ 173 ॥
(ख) वैभव प्रकाश-(1) श्रीबलराम :-
वैभवप्रकाश कृष्णेर-श्रीबलराम।
वर्णमात्र-भेद, सब-कृष्णेर समान ॥ 174 ॥
अनुवाद-श्रीबलराम श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं।
श्रीकृष्णसे इनका केवल वर्णका भेद है, अन्यथा वे
प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही हैं॥ 174 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-स्वयंरूप, तदेकात्मरूप, आवेश,
वैभव, प्राभवादि समझनेके लिये परस्परका सम्बन्ध
संक्षेपमें नीचे प्रदर्शित हुआ। श्रीकृष्णके आदि तीन
रूप-
(1) 'स्वयंरूप'-व्रजमें गोपमूर्त्ति श्रीकृष्ण,
(2) 'तदेकात्मरूप'-
(क) 'स्वांशक'-
(i) कारणब्धिशायी, गर्भोदशायी, क्षीरोदशायी,
(ii) मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंहादि।
(ख) 'विलास'-
(i) प्राभव-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध;
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