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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1698, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1698

[ 20/181-186 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
द्वितीय स्वरूपकी भाँति मेरी अद्भुत-माधुरीसुगन्धयुक्त
गोपलीलात्मिका लीलाको चित्रित कर रहा है। मेरा चित्त
केलि-कौतूहलके द्वारा द्रवीभूत होकर मेरे अपने
चरित्रका दर्शन करते हुए व्रजवधुओंके सारूप्य अर्थात्
उनके जैसे स्वरूपको धारण करनेकी इच्छा कर रहा
है॥ 181 ॥
अनुभाष्य-
हे सखे, असौ चारणः (नटः) उद्गीर्णाद्भुतमाधुरी-परिमलस्य
(उद्गीर्णः उत्थितः निर्गतः अद्भुतायाः अपूर्वायाः माधुर्याः
परिमलः सुगन्धः यस्य तस्य) आभीरलीलस्य
(गोपनन्दनन्दन-लीलामयस्य) मे (मम) द्वैतं (द्वितीयमूर्त्तिं)
समक्षयन् (दर्शयन्) मुहुः (पुनः पुनः) चित्रीयते; यस्य
स्वरूपतां (सादृश्यं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) हन्त (अहो) मामकं
(मदीयं) चेतः (मनः) सत्यं केलिकुतूहलोत्तरलितं (केलिषु
व्रजजनोचितक्रीड़ासु कुतूहलाय उत्सुक्याय उत्तरलितम् अतिशयेन
द्रवीभूतं सत्) व्रजवधूसारूप्यं (श्रीवार्षभानव्याः सदृशरूपतां)
अन्विच्छति (वाञ्छति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥
ललितमाधव (8/34)में :-
अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी
स्फुरतु मम गरीयानेष माधुर्यपूरः।
अयमहपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः
सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 182 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण बोले,-"अहो! ये प्रगाढ़
माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष
कौन हैं? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें
देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका
बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी मेरी इच्छा हो रही
है॥" 182 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 182 ॥
(ख) तदेकात्मरूपकी संज्ञा :-
सेइ वपु भिन्नाभासे किछु भिन्नाकार।
भावावेशाकृति-भेदे 'तदेकात्म'-नाम ताँर ॥ 183 ॥
अनुवाद-जब वह विग्रह भिन्न-आभासमें और
कुछ भिन्न आकारमें प्रकट होता है, तब वह भाव,
आवेश अथवा आकृतिके भेदके कारण 'तदेकात्म'
कहलाता है ॥ 183 ॥
वह दो प्रकारका-(1) विलास और (2) स्वांश :-
तदेकात्मरूपे 'विलास', 'स्वांश'-दुइ भेद।
विलास, स्वांशेर भेदे विविध विभेद ॥ 184 ॥
अनुवाद-तदेकात्मरूपमें 'विलास' और 'स्वांश'-ये
दो भेद होते हैं। विलास और स्वांशके भेदसे विविध
विभेद (अर्थात् एकसे विकसित होकर अनेक रूप)
होते हैं ॥ 184 ॥
अनुभाष्य- 'विलास'-आदिलीला 1/77 संख्या देखें।
'स्वांश'-लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें 17वाँ श्लोक-
“तादृशो न्यूनशक्तिं यो व्यक्ति स्वांश ईरितः।
सङ्कर्षणादि मत्स्यादिर्यथा तत्वत्वधामसु॥”
स्वयंरूपके साथ अभिन्न होकर भी जो विलासकी
अपेक्षा न्यून (बहुत कम) शक्ति प्रकाश करते हैं, उन्हें
'स्वांश' कहते हैं। जैसे अपने-अपने धाममें विराजमान
सङ्कर्षणादि पुरुषावतार, मत्स्यादि लीलावतार, मन्वन्तरावतार
और युगावतारगण ॥ 184 ॥
दो प्रकारके विलास-(क) प्राभव और (ख) वैभव :-
प्राभव-वैभव-भेदे विलास-द्विधाकार।
विलासेर विलास-भेद-अनन्त प्रकार ॥ 185 ॥
अनुवाद-प्राभव और वैभवके भेदसे विलास दो
प्रकारके होते हैं। विलासके भी विलास-भेद असंख्य
प्रकारके हैं ॥ 185 ॥
(क) प्राभवविलास-मथुरा और द्वारका-पुरीमें आदि
चतुर्व्यूहकी चार मूर्तियाँ :-
प्राभवविलास-वासुदेव, सङ्कर्षण।
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,-मुख्य चारिजन ॥ 186 ॥
अनुवाद-श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और
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