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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1695, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1695

बीसवाँ अध्याय 20/165-170 ]
“यद्रूपं तदभेदेन स्वरूपेण विराजते।
आकृत्यादिभिरन्यादृक् स तदेकात्मरूपकः॥”
“जो रूप स्वयंरूपके साथ एक रूपमें ही प्रकाशित
होता है, किन्तु आकृति और वैभवादिमें (अङ्ग-गठन
और चरित्रादिमें) भिन्न रूपमें प्रकाशित होता है, उसे
'तदेकात्मरूप' कहते हैं; वह—स्वांश और विलासके
भेदसे दो प्रकारका है।”
'आवेशरूप'—(लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डका 18वाँ
श्लोक)—
“ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः।
त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥”
“जिन सब जीवोंमें श्रीजनार्दन ज्ञान-शक्ति आदि
कलाओंके द्वारा आविष्ट होते हैं, उन सब महत्तम
जीवोंको 'आवेश' कहा जाता है॥” 165 ॥
(क) 'स्वयंरूप'—दो प्रकार के; (1) 'स्वयं रूप'
व्रजेन्द्रनन्दन और (2) 'स्वयंप्रकाश' :—
'स्वयंरूप' 'स्वयंप्रकाश'—दुइरूपे स्फूर्ति।
स्वयंरूपे—एक 'कृष्ण' व्रजे गोपमूर्ति॥ 166 ॥
अनुवाद—भगवान्का स्वयंरूप (मूल रूप) 'स्वयंरूप'
और 'स्वयंप्रकाश'—इन दो रूपोंमें प्रकाशित होता है।
स्वयंरूपमें श्रीकृष्ण व्रजमें गोपबालकके रूपमें प्रकाशित
हैं॥ 166 ॥
श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासमेंसे (2) स्वयं
प्रकाश दो प्रकारके—(क) प्राभव, और (ख) वैभव;
उनमेंसे (क) प्राभवप्रकाशरूपमें अनेकरूपोंसे लीला या
विलास जैसे रासमें, जैसे महिषी-विवाहमें :—
'प्राभव'-'वैभव'रूपे द्विविध प्रकाशे।
एक-वपु बहु रूप यैछे हैल रासे॥ 167 ॥
महिषी-विवाहे हैल बहुविध मूर्ति।
'प्राभव-प्रकाश'—एइ शास्त्र-परसिद्धि॥ 168 ॥
अनुवाद—भगवान्का स्वयंप्रकाश दो प्रकारका होता
है—'प्राभव'-प्रकाश और 'वैभव'-प्रकाश। जैसे रासमें
एक ही विग्रह (जितनी गोपियाँ थीं, उनके साथ
एक-एक रूपमें) अनेक रूपोंमें प्रकाशित हुआ। इसी
प्रकार द्वारकामें एक ही विग्रह (सोलह हजार एक सौ
आठ) महिषियोंके साथ विवाहमें उतने ही रूपोंमें
प्रकाशित हुआ। विग्रहके इन विस्तारोंको शास्त्रोंमें
'प्राभव-प्रकाश' कहा जाता है॥ 167-168 ॥
वे आत्मारामगणोंके भी मनका हरण करनेवाले,
कभी भी प्राकृत नहीं :—
सौभर्यादि-प्राय सेइ कायव्यूह नय।
कायव्यूह हैले नारदेर विस्मय ना हय॥ 169 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 169 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सौभरि आदि ऋषियोंने योगबलसे
कायव्यूह होकर अपना-अपना कार्य सम्पन्न किया था।
किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक मूर्तियोंका प्रकाश वैसा
नहीं है; क्योंकि, योगमार्गके कायव्यूहको देखकर नारदमें
विस्मय उत्पन्न नहीं होता॥ 169 ॥
अमृतानुकणिका—नारदजी स्वयं कायव्यूहकी सृष्टि
करना जानते हैं, इसलिये उन्हें कायव्यूह देखकर
आश्चर्य नहीं होता। कायव्यूह योगबलसे निर्मित होता
है, परन्तु प्रकाश वैसा नहीं है, इसमें एक ही देह भिन्न
स्थानोंपर प्रकट होती है। श्रीकृष्णके विभु होनेके कारण
उनके लिये यह सम्भव है। कायव्यूहमें क्रियाकी
समानता होती है अर्थात् मूल कायके द्वारा की गयी
क्रिया अन्य कायव्यूहमें भी वैसे ही फलित होती है।
प्रकाशमें रूपकी समानता होती है और क्रियाओंमें
विभिन्नता होती है, जैसा कि नारदजीने द्वारकाके विभिन्न
महलोंमें देखा॥ 169 ॥
श्रीमद्भागवत (10/69/2) :—
चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्।
गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥ 170 ॥
अनुवाद—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही
श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें प्रत्येक घरमें एक साथ
सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥ 170 ॥
। 249