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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1571

सत्रहवाँ अध्याय 17/212-219 ]
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥212॥
पुनः शुक कहे, -कृष्ण 'मदनमोहन'।
तबे आर श्लोक शुक करिल पठन ॥213॥
अनुवाद-पुनः शुकने कहा, -श्रीकृष्ण तो 'मदनमोहन'
हैं। तब शुकने एक और श्लोक पढ़ा॥213॥
शुकका गान, - श्रीकृष्ण ही 'मदनमोहन' :-
गोविन्दलीलामृत (13/31)-
वंशीधारी जगन्नारी-चित्तहारी स शारिके।
विहारी गोपनारीभिर्जीयान्मदनमोहनः ॥214॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥214॥
अमृतप्रवाह भाष्य-शुकने कहा, - हे सारिके, वे
वंशीधारी जगत्की नारियोंके चित्तका हरण करनेवाले,
गोपनारियोंके साथ विहार करनेवाले मदनमोहन जययुक्त
हों॥214॥
अनुभाष्य-
हे शारिके, वंशीधारी (मुरलीधरः) जगन्नारीचित्तहारी (जगतां
चतुर्दशभुवनानां नारीणां चित्तचौरः) गोपनारीभिः (व्रजाङ्गनाभिः
सार्द्धं) विहारी (केलिरतः), सः (प्रसिद्धः) मदनमोहनः जीयात्
(सर्वोत्कर्षेण वर्त्तताम्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥214॥
पुनः शारी कहे शुके करि' परिहास।
ताहा शुनि' प्रभुर हैल विस्मय-प्रेमोल्लास॥215॥
अनुवाद-पुनः सारिका शुकसे परिहास करते हुए
कुछ कहने लगी, जिसे सुनकर महाप्रभुको आश्चर्यजनक
प्रेमोल्लास हुआ ॥215॥
सारीका गान, - श्रीकृष्णके मदनमोहन
होनेका मुख्य कारण श्रीराधा :-
गोविन्दलीलामृत (13/32) में-
राधा-सङ्गे यदा भाति तदा 'मदनमोहनः'।
अन्यथा विश्वमोहोऽपि स्वयं 'मदनमोहितः'॥216॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥216॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सारिकाने परिहास करते हुए
उत्तर दिया, - श्रीकृष्ण जब श्रीराधाके साथ शोभा पाते
हैं, तभी वे 'मदनमोहन' हैं। श्रीराधाके साथमें नहीं
रहनेपर विश्वमोहन होनेपर भी वे स्वयं ही मदनके द्वारा
मोहित होते हैं॥216॥
अनुभाष्य-
हे शुक, यदा कृष्णः राधासङ्गे भाति (विराजते) तदा
[एव] स कृष्णः- 'मदनमोहनः'; अन्यथा (राधासङ्गरहितः सन्
स कृष्णः) स्वयम् [एव] विश्वमोहः (विश्वमोहनः) अपि स्वयं
मदनमोहितः (मदनेन कन्दर्पेण मोहितः- “इतस्तस्तामनुसृत्य
राधिकामनङ्गबाण-व्रणखिन्नमानसः इति न्यायात्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [मदनके
द्वारा मोहितका उदाहरण, 'श्रीगीतगोविन्द', तृतीय
सर्गमें]-(अनङ्गबाणसे जर्जरित श्रीकृष्ण 'हाय! मैंने
श्रीराधाका क्यों परित्याग किया-मेरा उनके साथ कैसे
मिलन होगा-इस प्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीराधाका
इधर उधर अन्वेषण करने लगे।)॥216॥
मयूरके दर्शनसे महाप्रभुको श्रीकृष्णके
रूपकी स्मृति और मूर्च्छा :-
शुक-शारी उड़ि' पुनः गेल वृक्षडाले।
मयूरेर नृत्य प्रभु देखे कुतूहले ॥217॥
मयूरेर कण्ठ देखि' प्रभुर कृष्णकान्ति-स्मृति हैल।
प्रेमावेशे महाप्रभु भूमिते पड़िल॥218॥
अनुवाद-शुक और सारिका उड़कर पुनः वृक्षकी
डालपर जाकर बैठ गये और महाप्रभु कौतूहलपूर्वक
मयूरके नृत्यको देखने लगे। मयूरके नीले कण्ठको
देखकर महाप्रभुको श्रीकृष्णकी अङ्गकान्तिकी स्मृति हो
आयी और वे प्रेमके आवेशमें भूमिपर गिर पड़े॥ 217-218॥
भट्टाचार्यके साथ ब्राह्मणकी महाप्रभुकी शुश्रूषा :-
प्रभुरे मूर्च्छित देखि' सेइ त' ब्राह्मण।
भट्टाचार्य-सङ्गे करे प्रभुर सन्तर्पण॥219॥
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